फॉरवर्ड प्रेस

हाथों से मैला कब तक उठाएगा देश?

‘स्वच्छ भारत’ लिखे चश्मे की लोकप्रियता के बीच यह खबर सरकार के लिए किसी भी लिहाज से अच्छी नहीं है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश में करीब सात लाख (संख्या पर विवाद रहा है) से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो मानव मल को हाथों से साफ करने पर मजबूर हैं। केंद्र सरकार ने सामाजिक न्याय मंत्रालय से कहा है कि मैनुअल स्केवेंजर यानी हाथ से मानव मल साफ करने वाले स्वच्छताकर्मियों की तादाद को पता करने के साथ-साथ यह भी आंकड़ा तैयार किया जाए कि इन चार सालों में सफाईकर्मियों ( ज्यादातर वाल्मीकियों)  के कितने लोगों को नौकरी मिली और कितनों ने यह काम छोड़ा। लेकिन फिलवक्त इसे लेकर चल रहा सर्वे सरकारी फाइलों में दम तोड़ रहा है। हालांकि मैनुअल स्केवेंजर वाले सफाईकर्मियों की तादाद को लेकर बना विवाद 2007 से बाद भी खत्म नहीं हुआ है।

आपको ध्यान दिला दें कि 2014 में स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालयों के अधिकाधिक निर्माण की मुहिम बहुत तेजी से बढ़ी थी और इस कवायद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व स्तर पर ख्याति दिलाने के लिए खासी मदद की थी। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, ‘हाथ से मैला उठाने वाले लोगों और परिवारों की पहचान के लिए करीब 18 राज्यों में चलाया जा रहा सर्वे तय समय पर पूरा नहीं हो पाया है।’ सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय, नीति आयोग और राज्य सरकारों के साथ मिलकर ये सर्वे कराना शुरू किया था। सर्वे इसी साल जनवरी में शुरू हुआ था। सर्वे के पहले चरण का काम  30 अप्रैल को पूरा होना था। लेकिन इसे लेकर सामाजिक न्याय मंत्रालय से लेकर तमाम मंत्रालय और विभाग खामोश हैं।

एक कार्यक्रम में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के कर्ताधर्ता

लखनऊ में जैसे कुछ वाल्मीकि समुदाय के कुछ प्रतिनिधि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से 26 जून को मिले और इस समाज के लोगों के लिए किए सरकार के रोजगार वादे का ध्यान दिलाया था कि इसी बीच बाराबंकी, लखीमपुरखीरी और बिजनौर में सैकड़ों परिवारों के हाथों से मैला साफ करने के मामले ने तूल पकड़ लिया। उत्तर प्रदेश के अनुसूचित जाति  एवं जनजाति वित्तीय विकास निगम के अध्यक्ष डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल के मुताबिक, “हजारों परिवार आज भी हाथ से मैला उठाने को मजबूर हैं। उनके पास जीवनयापन कोई दूसरा रास्ता नहीं है।” गौरतलब है कि केरल ही ऐसा राज्य है जहां मैला ढोने वालों को चिन्हित करने का अधिकांश काम पूरा हुआ है। बताया जाता है कि गुजरात, यूपी, महाराष्ट्र,  झारखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से इस काम में कथित तौर पर देरी हो रही है।

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय के मुताबिक 2018 में अब तक उत्तर प्रदेश में 28,796 लोग हाथ से मैला उठाते हैं। सर्वेक्षण के लिए लगाए गए पंजीकरण शिविरों में कुल 53,236 मैला उठाने वालों की संख्या पंजीकृत की गई है। यह आंकड़ा सरकारी तौर पर पंजीकृत है, जाहिर है असल संख्या कहीं ज्यादा है। यूपी में खुद बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता मनीष शुक्ला कहते हैं, “स्वच्छ भारत अभियान को केवल सफाई के मुद्दों से जोड़ने की जगह मानव की गरिमा पर केंद्रित करना होगा। आजादी के 7 दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी ये राष्ट्रीय शर्म है कि साफ-सफाई में लगे हजारों परिवार सामाजिक तौर पर अपमानित और अमानवीय जीवन जीने को मजबूर हैं। सामाजिक उत्पीड़न का  दंश झेलने के अलावा मैला ढोने वाले इस पेशे के साथ जुड़ी कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं खड़ी हो रही हैं।”

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट का पहला हिस्सा

सरकार के कामकाज में लेटलतीफी का आलम ये है ऐन जब सर्वेक्षण का एक चरण खत्म हो जाना चाहिए था तो प्रशासनिक इकाइयों को उसके बाद सुध आई है। अंबाला (हरियाणा) में मैनुअल स्केवेंजर अधिनियम 2013 की परिभाषा के तहत राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के आदेश के बाद मैनुअल स्केवेंजर की पहचान करने को लेकर अप्रैल और मई में शिविर लगे। धौलrtपुर (राजस्थान) में भी 26 अप्रैल पहला मैनुअल स्केवेंजर सर्वेक्षण शिविर लगा जिसमें महज साठ लोगों द्वारा मैनुअल स्केवेंजर के रूप में पंजीकरण कराया गया।  बहरहाल, सरकारें इस काम में स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद भी ले रही हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक, पूरे देश में सात लाख 40 हजार से ज्यादा घर ऐसे हैं जहां मानव मल हाथों से हटाया जाता है। ध्यान रहे परिवार को इकाई बताया गया है जबकि हम जानते हैं कि वाल्मीकि परिवारों के बच्चों और महिलाओं तक सारे सदस्य इस काम में लगे होते हैं। सामाजिक आर्थिक जातीय गणना बताती है कि ग्रामीण इलाको में एक लाख 82 हजार से ज्यादा परिवार, हाथ से मैला उठाते हैं। लेकिन स्पष्ट रूप से कोई निश्चित संख्या अभी नहीं मिली है। चिन्हीकरण के काम में कई खामियों को दूर करने के लिए सामाजिक न्याय मंत्रालय ने इस साल जनवरी में ये पायलट सर्वे शुरू किया।

विश्वसनीयता पर सवाल: रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा

ताजा रिपोर्ट, जिसमें कुछ ही राज्यों के आंकड़े हैं, कहती है, “सर्वेक्षण के लिए लगाए गए पंजीकरण शिविरों में कुल 53,236 मैला उठाने वाले लोग पंजीकृत हुए। ये आंकड़े सर्वेक्षण किए गए 18 राज्यों में से सिर्फ 12 राज्यों का है। अन्य छह राज्यों के आंकड़े मांगे गए हैं। इसके अलावा ये आंकड़े देश के 600 जिलों में सर्वेक्षण के पहले चरण में चुने गए 121 जिलों के हैं। सर्वेक्षण में पाया गया है कि मध्य प्रदेश में हाथ से मैला उठाने वालों की संख्या 8,016 है और राजस्थान में 6,643 है।” गुजरात में मैनहोल में मरने वाले मजदूरों की संख्या बहुत ज्यादा बताई गई है। सीवेज पाइपलाइनों में प्रवेश करने वाले मजदूर सीवर लाइनों के अवरोध को हाथ से साफ करते हैं। यह कार्य हाथ से मैला उठाने के समान ही अमानवीय है।

दरअसल पहले चरण में बाल्टियों और गड्ढों में जमा और शौचालयों से मल उठाने वालों की गिनती की जा रही है। दूसरे चरण में वे लोग गिने जाएंगे जो सेप्टिक टैंकों, सीवरों और रेलवे पटरियों की सफाई करते हैं। 2007  में मैनुअल स्केवेंजरों के पुनर्वास के तहत स्वरोजगार योजना शुरू की गई थी। करीब एक लाख 18 हजार से ज्यादा लोग 18 राज्यों में चिन्हित किए गए थे।

क्या है कानून?

शुष्क शौचालयों के निर्माण (निषेध) अधिनियम (1993) संसद में पारित कर मैला ढोने और शुष्क शौचालयों के निर्माण को ग़ैर क़ानूनी करार दिया गया। इसके तहत दोषियों को एक वर्ष की कैद और  2000 रुपये जुर्माने का प्रावधान था, लेकिन यह क़ानून कभी सही ढंग से लागू नहीं हुआ। कानून पारित होने से पहले ही इसके दुरुपयोग की आशंका व्यक्त की जा रही थी। इस तरह के मामलों में स़िर्फ ज़िलाधिकारी ही मुक़दमा दायर कर सकता था। रिकॉर्ड कहता है कि 1993 से लेकर 2002 तक एक भी म़ुकदमा दर्ज नहीं हुआ था। जानकारों का कहना है कि 1993 से 2012 के बीच केंद्र और राज्य सरकारों ने यह प्रथा पूरी तरह से समाप्त करने के लिए कई बार समय सीमा बदली, लेकिन हालात ज्यों के त्यों बने रहे।

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सफाई कर्मचारी आयोग के गठन का भी कोई अपेक्षित नतीजा सामने नहीं आया, बल्कि उल्टा असर यह हुआ कि अगर कोई ग़ैर सरकारी संस्था या सिविल सोसायटी का कोई व्यक्ति इस समस्या को लेकर सरकार या किसी ज़िम्मेदार अधिकारी के पास जाता, तो उसे आयोग में अपनी शिकायत दर्ज करने के लिए कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया जाता। सफाई कर्मचारी आयोग और 1993 का क़ानून इस प्रथा को खत्म करने में पूरी तरह से नाकाम रहे। सिविल सोसायटी और इस क्षेत्र में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं के दबाव के बाद 2013  में हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम (प्रोहिबिशन ऑफ एंप्लॉयमेंट एज मैनुअल स्केवेंजर एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट) पारित हुआ। इस कानून में यह प्रावधान किया गया कि सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई करने वालों को भी मैनुअल स्केवेंजेर स्वीकार किया जाए। कोई भी इंसान सफाई के लिए सीवर के अंदर नहीं जाएगा, यदि जाएगा भी, तो आपात स्थिति में और पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ। एक्ट में इस प्रथा से जुड़े लोगों के पुनर्वास के लिए आर्थिक सहायता देने के लिए सर्वे कराने का भी प्रावधान रखा गया था।

मैला ढोने वाली एक महिला (फोटो:  ह्यूमन राइट वॉच)

इसी जून में लखीमपुर खीरी डेटलाइन से अमर उजाला की रिपोर्ट कहती है: मोहम्मदी ब्लॉक के मगरेना गांव में 72 घरों में आज भी शुष्क शौचालय हैं। पूरे गांव की सफाई का जिम्मा उठाने वाले परिवारों की खुद की जिंदगी नरक बनी हुई है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की सदस्य मंजू दिलेर ने यहां का दौरा किया तो पता चला शौचालय न बनने और मैला ढोने की प्रथा न बंद होने के पीछे प्रशासनिक उपेक्षा है। मंजू दिलेर ने सिर पर मैला ढोती महिलाओं को देखा तो वे सकते में आ गईं। उन्होंने जिला प्रशासन से इस संबंध में गहरी नाराजगी जाहिर की। गांव के वाल्मीकि समाज की पूनम, विमला, फूलन देवी, राममूर्ति देवी, रामकली, सरोजनी, गोरी, मनोजनी आदि गांव के छह दर्जन  घरों में मैला ढोने का काम आज भी कर रही हैं। आजादी के 70 साल बाद केवल तीन लोग शिवपाल, रामनिवास, राधेश्याम को इस वर्ष पक्के आवास मिले हैं। दर्जनों परिवार आज भी झोपड़पट्टी में जिंदगी गुजार रहे हैं। वाल्मीकि समाज के इन परिवारों के पास जमीन भी नहीं है, जिससे जीवनयापन हो सके। एक दो के पास मनरेगा के जॉब कार्ड बने थे, लेकिन उन्हें काम नहीं मिला। लोगों को साफ सुथरा रखने का जिम्मा जिनके कंधों पर है वे खुद गंदगी में रहने को मजबूर हैं।

सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक ने अपने भाषण में कहा था कि ‘स्वच्छता हमारा धर्म है’ तो लोगों ने इसे बहुत साधारण ढंग से लिया। हमें आश्चर्य हुआ कि किस तरह स्वच्छता और धर्म को मिलाया जा सकता है। धर्म एक विश्वास है जबकि स्वच्छता विज्ञान, लेकिन जब भारत के अलग-अलग विचारधाराओं वाले दो बड़ी राजनीतिक दलों के दो मशहूर नेताओं नरेंद्र मोदी और  जयराम रमेश ने एक ही सांस में शौचालय और मंदिर की बात कही (हालांकि अलग-अलग तरह से) तो हमें पता चला कि स्वच्छता एक दैविक चीज है, जैसा कि गांधीजी ने भी कहा था कि स्वच्छता ईश्वरीयता के समकक्ष है। पर्यावरणविद् सुनीता नारायण ने अपनी पुस्तक ‘व्हाई एक्सक्रीटा मैटर्स’ में कहा है कि अनेक शहर अपने ही मल में डूब रहे हैं। बहुत से नाले (दिल्ली में नजफगढ़ और लुधियाना में बुड्ढा नाला) पहले नदी थे। मुंबई में मीठी नदी थी अब वह गायब हो गई है  क्योंकि शहर ने इसे कचरे से भर दिया है।

डॉ. पाठक ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि किस तरह उन्हें बचपन में एक तथाकथित (डोम स्त्री) अस्पृश्य को छूने के बाद अपने को पवित्र करने के लिए गोमूत्र और गोबर निगलना पड़ा था। ऐसा अनुभव हममें से बहुतों का रहा है। सामाजिक अस्पृश्यता एक आदत बन गई है, जिसे हम एक धार्मिक आचार की तरह नियमित रुप से बरत रहे हैं। हमें इसको बदलना है। शौचालय के इस्तेमाल को लेकर भी ऐसी ही बात है। भारत-सरकार द्वारा चलाए गए संपूर्ण स्वच्छता अभियान के तहत सरकार ने करोड़ों घरेलू शौचालय बनवाए है। लेकिन अभी भी बहुत से लोग शौचालयों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि उनका इस्तेमाल वे अनाज या अन्य चीजें रखने के लिए करते हैं। यहां तक कि साढ़े तीन करोड़ शौचालय  जो निर्मित किए गए थे उनका नामोनिशान नहीं बचा है, वे गायब हैं।

(कॉपी एडिटर : नवल)

 

संदर्भ:

1-वार्षिक रिपोर्ट: सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय। लिंक है- http://mssurvey.nic.in/Private/Report/ReportLocal.aspx

 

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