जानें, विद्रोही दलित कवि नामदेव ढसाल के बारे में

दलित-बहुजन लेखक जब लिखेगा तो पुष्प वर्षा तो होगी नहीं, उसके शब्द तो आग उगलेंगे ही। जिनकी मर्यादाओं को मनुवादियों ने पहले ही तार-तार कर रखा हो, उनसे मर्यादित शब्द की अपेक्षा करनी भी नहीं चाहिए। नामदेव ढसाल के शब्द भी किसी मर्यादा का पालन नहीं करते थे। लेकिन वे दलित पैंथर से शिव के सैनिक बन गए। इसकी वजह क्या रही, बता रहे हैं मोहनदास नैमिशराय :

महाराष्ट्र के बाहर दलित साहित्य के पाठकों/शोधार्थियों/समीक्षकों के भीतर 70 और 80 के दशक में उत्सुकता कहें या उत्तेजना वह बरकरार रही। या फिर उस विद्रोही पैंथर कवि से मिलने की बेचैनी रही, उनके भीतर रही, जिसकी कविता पढ़ते हुए हर किसी की भावनाएं उद्वेलित हो ही जाती थी। दलित पैंथर का यह ऐतिहासिक दौर था। जब सनातनी परम्पराएँ टूट रही थी और दलित साहित्य, संस्कृति पर पूरे देश मे जोरदार विमर्श होने लगा था। दलित आंदोलन अपने चरम पर था। दलितों के भीतर चेतना का सूरज तेजी के साथ उगने लगा था। महाराष्ट्र में विशेष रूप से दलित आंदोलन आंधी बनकर उभरने लगा था।

नामदेव ढसाल (15 फरवरी 1949 – 15 जनवरी 2014)

नामदेव का पहला कविता संग्रह ‘गोलपीठा’ था। यह 1972 में प्रकाशित हुआ था। जिसके आने पर मराठी साहित्य जगत में एक भूचाल-सा आ गया। बहुत से सवर्ण लेखकों और समीक्षकों को बुरा लगना लाजमी था। उसका कारण नामदेव के शब्द थे, जो उन पर और उनकी संस्कृति पर हथौड़े की तरह वार करते थे। दलित लोगों की जिंदगी जिस अभिव्यक्ति की मांग कर रही थी, वही सब कुछ नामदेव की कविताओं में जोरदार तरीके से उभरा। बम्बई के रेड लाइट एरिया के जीवन का अनचाहा पहलू , पिंजरों में बंद देह उत्सव के लिए तैयार महिलाएं। भूख और बेचैनी की कशमकश से जुझतीं वे। पेट और पेट के नीचे की भूख मिटाने के लिए देह बिक्री की विवशता का चित्रण विस्तार से कवि नामदेव ढसाल की ‘गोलपीठा’ कविता संग्रह में बेबाक़ी से आता है। उनकी कविता में वेश्यावृत्ति से जुड़ी महिलाओं के सवाल दर सवाल उभरते है। उन सवालों में आंसू नहीँ होते है बल्कि आक्रोश होता है। जीवन का ऐसा सच, जिससे देह भोगने वाले रिश्ते तो बनाते है,लेकिन सतही। उनकी कविता-

लीक हुआ सूरज

बुझने लगा रात की बाहों में

तब मैं पैदा हुआ फुटपाथ पर

चीथड़ों में पला

और अनाथ हो चला

मुझे जन्म देने वाली मां

चली गई आकाश के बाप की ओर

फुटपाथ के भूतों की यातनाओं से

ऊबकर धोती का अंधेरा धोने के लिए

और फ्यूज आदमी की भांति

मैं बढ़ता रहा

रास्ते की गंदगी पर

पांच पैसा दे दो

पांच गाली ले लो

कहता हुआ

दरगाह के रास्ते पर।

अपनी इस कविता में नामदेव भी स्वयं मौजूद होता है। उसकी माँ होती है और होता है पीड़ित महिलाओं की कशमकश से घिरा परिवेश। इस कविता में नामदेव का विचार अलग तरह से उभरता है। वह भिनभिना कर पांच गालियां देकर पैसा बटोरता है। पैसे के लिए हाथ नही पसारता। जीवन का नया दर्शन था उसका। जिसे उसने अपने जीवन मे भी निभाया और साहित्य में भी।

नामदेव के प्रथम कविता संग्रह ‘गोलपीठा’ की भाषा शैली तथा शब्दों का चयन अलग है। वैसा उनकी अन्य कविताओं में नही मिलता। यह बात प्रसिद्व मराठी नाट्यकार विजय तेंदुलकर ने ‘गोलपीठा’ की प्रस्तावना में भी कही है।

ऐसा कहा जाता है कि हर लेखक के प्रत्येक सृजन के पीछे कोई न कोई घटना होती है। ‘गोलपीठा’ की रचना की पृष्ठभूमि में भी घटना विशेष से जुड़ी है। नामदेव किसी से प्रेम करते थे,लेकिन उनका प्रेम परवान न चढ़ सका। कारण जाति का था। जाहिर बात है उन्हें धक्का तो लगना ही था। यही कारण रहा कि उन्हें शराब और अंधेरी गलियों का सहारा लेना पड़ा। वैसे भी उनका बचपन इस तरह के परिवेश का चश्मदीद गवाह रहा था। बम्बई के ग्रांट रोड ईस्ट की तरफ आप जब लोकल ट्रेन से उतरते हैं तो एक किलोमीटर के बाद वेश्यालय नजर आने लगते हैं। फॉकलैंड और गोलपीठा नजदीक है। भरे पूरे बाजार जहाँ सब कुछ खुला है। कोई रोक-टोक नहीं। वहाँ स्कूल भी है और दवाखाने भी।  ब्रिटिश पीरियड से यह सब चला आ रहा है, कभी कोई पाबंदी नहीं। न ही इन बाजारों को बंद करने के लिए आंदोलन। ऐसा भी कहा जाता है कि जैसे शराब पीने वालों को सरकार ने लाइसेंस दिया हुआ था, वैसे ही इस बाजार को भी लाइसेंस मिला हुआ था, लोग आते थे, जाते थे। महिलाएं भी वही रहती थीं और उनसे होने वाले बच्चे भी।

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यह बात कितने लोगों को मालूम है कि नामदेव के दर्द के पीछे क्या था? कितनी सामाजिक विषमता की यातनाएं झेल कर उन्होंने बचपन से जवानी में प्रवेश किया और जब जवान हुए तो उन्हें समाज की भाषा समझ आई । हजारों अंतर्विरोध उनके सामने थे। जिन सभी को उन्होंने अपनी कविताओं में उजागर किया। उनकी कविता में पाठकों को वह ताप महसूस होगा।

उजाले और अंधेरे के बीच

प्रेम और दुखों के बीच

मैंने दर्द के बाहर की जगह

कविता के लिए दी

मैंने सही मायने में

खुद को जमीन में बो दिया

और मेड़ पर खड़े होकर

इंतजार करता रहा

स्वयं के उगने का।

बहुत सारी कड़वी स्मृतियों की बीच घिरे थे नामदेव। 15 फरवरी, 1949 को पुणे जिले के पुरगाँव के दलित परिवार में नामदेव का जन्म हुआ था। बचपन मे ही नामदेव अपने पिता लक्ष्मण ढसाल जी के साथ बम्बई आ बसे। उनके पिता बम्बई के कत्लखाने में कार्य करते थे।  पहले गांव फिर बम्बई। धर्म और रूढ़ियों के संस्कार दोनों जगह थे। जिन्हें झेलना था नामदेव को और एक सशक्त कवि बनना था। ऐसा कवि जिसके शब्दों में हिन्दू धर्म व्यवस्था को जलाने की ताकत थी।

नामदेव ढसाल अपनी पत्नी मलिका के साथ

मैंने भी जितना मराठी दलित कवियों और लेखकों को पढ़ा था तथा उनके बारे में सुना था, उससे जिज्ञासा तो पैदा हुई थी ही। जिज्ञासा नही कहनी चाहिये बल्कि मैं भीतर से उद्वेलित हुआ था। मन में सवाल दर सवाल उभरते थे कि आखिर कौन से ज्वालामुखी था, उसके भीतर, वह विद्रोही कवि क्यों बना? उसने हिन्दू धर्म और उसकी व्यवस्था पर लानत क्यों भेजी, हिन्दू देवी देवताओं को क्यों वह गालियां देता रहा? लाजमी बात थी कि मेरी तरह लाखों साथियों के बीच इस तरह के सवाल उभरे होंगे। आखिर क्यों उसने ‘गोलपीठा’ ही लिखी, क्यों वह ‘गांडू बगीचा’ कविता लिखता रहा, क्यों उसकी कविताओं में बार बार गांडू, भड़वा और दलाल जैसे शब्द आते रहे? गोलपीठा की रचना और दलित आंदोलन कहें तो साथ-साथ चलते रहे। क्योंकि दलित आंदोलन के गर्भ से ही दलित साहित्य बाहर आया था। जिन दिनों नामदेव के भीतर दलित साहित्य के निर्माण की प्रक्रिया चल रही थी, उन दिनों पूरे देश में दलितों पर उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ रही थीं। महाराष्ट्र भी इससे अछूता नही रहा था। 24 मई, 1972 को समाजवादी चिंतक मधु लिमये द्वारा यह ज्वलन्त सवाल लोकसभा में उठाया गया। इस तरह से जैसे यह सब परिस्थितियां दलित पैंथर के गठन की तैयारी कर रही थी। रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं की उदासीनता भी एक कारण था। जो राजनीति के टुकड़ों में बंटे थे। स्वयं रिपब्लिकन पार्टी अनगिनत टुकड़ों में बंटी थी। जे.वी. पवार के अनुसार इस स्थिति से निबटने और सरकार पर दबाव डालने के उद्देश्य से हम लोग जिनमें दया पवार, अर्जुन डांगले, नामदेव ढसाल, राजा ढाले और प्रह्लाद चन्द्वन्कर दादर के ईरानी होटल में मिले। और दलित उत्पीड़न के खिलाफ ज्ञापन तैयार कर उस पर हस्ताक्षर करने की बात हुई। बाद में उमाकांत रणधीर, भीमराव शीरे वाले, गंगाधर गाड़े आदि ने उस पर हस्ताक्षर किए। सम्भवतः दलित पैंथर की पहली बैठक बम्बई के सिद्धार्थनगर में 9 जुलाई 1972 को हुई। इस बैठक का प्रारम्भ दलित पैंथर संगठन के निर्माण को घोषित करने वाले परचे से हुआ। नामदेव की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। अगर यह कहा जाए कि उन्होंने दलित पैंथर को अपने खून से सींचा तो गलत नही होगा। 70 के दशक में ही नामदेव के साथ अन्य दलित पैंथर्स ने जुझारू तरीके से संगठन को आगे बढ़ाया। किसी भी रूप में उन्होंने हार नही मानी थी। उन्होंने कुछ माह टैक्सी भी चलाई। इस तरह आम आदमी से परिचित होते चले गए।

80 के दशक में मेरे संघर्ष के दिन थे। जीवन में कुछ करना भी चाहता था। दलित साहित्य का बीज जो बहुत पहले मेरे भीतर पड़ चुका था, अब पेड़ बनने की अपनी प्रक्रिया में था। 1980 में मेरे द्वारा संपादित ‘सफ़दर एक बयान’ कविता संग्रह छप चुका था। 1981 में मैंने बहुजन अधिकार हिंदी पाक्षिक शुरू किया था और 80 के दशक के मध्य तक में मंडी हाउस जाने लगा था। जहां नाटकों से सम्बंधित गतिविधियां बढ़ने लगी थीं। बाद में मैंने ‘हेलो कॉमरेड’ नाटक भी लिखा था, जिसका मंचन भी हुआ था। इस बीच डीएवीपी के तहत कॉन्ट्रैक्ट आधार पर आठ वर्षों के लिए मुझे रेडिये कार्यक्रम ‘कौन कहा और कब’ भी मिला। इन सबसे मेरे भीतर बहुत कुछ जुड़ने लगा था। कहना न होगा कि मेरे भीतर कुछ करने की चाह तेजी के साथ उगने लगी थी।

अंततः 80 के दशक से लगभग प्रतिमाह बम्बई जाने की जो शुरुआत भी हुई,वह 90 के दशक तक जारी रही। अगर रेल आरक्षण नही मिलता तो में स्लीपर में ही बैठ कर यात्रा पूरी करता। आरम्भिक दौर में बम्बई में जिनसे मुलाकात हुई,उनमें दया पवार, राजा ढाले, जे.वी.पवार आदि थे। इन्हीं में एक दिन दया पवार से नामदेव का पता मिला। वे बम्बई के उपनगरीय महालक्ष्मी में रहते थे। मन मे संशय था। नामदेव मिलेंगे या नहीं। मेरे पास उनका फोन नम्बर नहीं था। उन दिनों मोबाइल होता भी नहीं था। फिर भी कुर्ला से लोकल ट्रेन पकड़ कर महालक्ष्मी तक पहुंचा। उनका पता मालूम किया। पूर्व की तरफ नीचे सीढ़ियां थी। उनसे उतर कर बस्ती में प्रवेश किया। दो या तीन कमरों का घर, जिसमें वे रहते थे। नजदीक जाकर मैं किसी से पूछना ही चाहता था। तभी एक महिला बोली, किसको मांगता है? यह बम्बई की आम भाषा थी। मैंने नामदेव का नाम बताया। सुनकर उसने हो का उच्चारण किया। फिर उसने पूछा, किधर से आये? जवाब दिया मैंने दिल्ली से, फिर वही उच्चारण, हो। तभी थोड़ा तेज आवाज में बोली वह, नामदेव तेरे कु दिल्ली से कोई मिलने आया। बम्बई में बोलने का ऐसा ही लहजा होता था। भीतर से किसी पुरूष की आवाज आई, भेज कौन मानस है? उसी महिला ने कहा, भीतर जाओ, तेरे कु नामदेव बुलाता है। मैं हिचकिचाते हुए कमरे में दाखिल हुआ। एक कुर्सी पर मैने किसी को बैठे देखा। चेहरे पर दाढ़ी, सांवला रंग। अच्छे डील डौल वाला शरीर, उंगलियों में सिगरेट। बदन पर हाफ पैंट और बनियान। बम्बई में अधिकतर लोग यही पहनते थे। उन्हें सामने देख मैंने जय भीम कहा। जवाब में उन्होंने भी जय भीम बोला। मैंने अपने बारे में बतलाया। मेरा नाम सुनकर वे बोले, बसों। बसों यानी बैठो। मैं उनके सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। तभी  उन्होंने कहा, आप तो बड़े लेखक और पत्रकार हो, में पढ़ता रहता हूं आपको। अच्छा लिखते हैं आप। 80 के दशक में मेरे आलेख नवभारत टाइम्स में छपने लगे थे। नव भारत टाइम्स में सम्पादकीय पृष्ठ पर वे आलेख छपते थे जो सभी संस्करण में जाते थे। मसलन बम्बई, राजस्थान, नागपुर, आदि लगभग 12 संस्करण छपते थे। इसका सीधा सा अर्थ था कि लगभग चार-पांच लाख पाठकों तक किसी लेखक की पहुंच होना लाजमी था। तब बम्बई में नवभारत टाइम्स हिंदी का लीडिंग अखबार था। महाराष्ट्र के साथी रुचि के साथ यही अखबार पढ़ते थे।

जल्दी ही पानी आ गया और चाय भी। नामदेव ने अपनी पत्नी का परिचय कराया। फिर मेरे बारे में बताया। दिल्ली के मोठे लेखक है। आपले मानस है यानी अपने ही आदमी हैं। बीच-बीच में वे मराठी भाषा में भी बोलते थे। उनकी पत्नी यानी मलिका अमरशेख बाहर चली गई तो फिर वे बोले, नैमिशराय जी आप अच्छा लिखते हैं। इन भड़वों की पुंगी खूब बजाते हो, ये साले ……। वे कुछ और बोलना चाहते थे तभी मलिका भीतर आ गई। वह पूछने लगी, कुछ और मांगता है। फिर बाहर चली गई। लगभग आधा घण्टा मैं वहां रहा। नामदेव मुझसे दिल्ली के साथियों के बारे में पूछने लगे। उधर दलित साहित्य में क्या चल रहा है आदि आदि। उन दिनों जो लिखते थे, उनके नाम भी  वे पूछ लेते थे।

वह मुलाक़ात लम्बी नहीं थी,पर एक दलित पैंथर को समझने के लिए काफी थी।

संक्षेप में कहा जाए तो नामदेव ढसाल का व्यक्तित्व बेहद खुरदरा था। वह जब बोलता था तो जैसे आग उगलता था। लोगों ने उसे मुस्कुराते हुए कम ही देखा था। पर जब हंसता था तो खुलकर।  हंसते हुए चेहरे पर रौनक आ जाती थी। बीच-बीच मे दांतों को कुरेदते हुए तिरछी नजरों से देखने की उसकी अलग शैली थी। साथियों को भी पता नही होता कि कब वह किस पर वार कर बैठे। किसके लिए कौन से शब्द इस्तेमाल करे। ऐसा उनके बारे में कहा जाता था और बहुत सी बातें भी।

पहली मुलाकात के बाद कुछ माह बाद दूसरी मुलाकात भी मेरी उनसे महालक्ष्मी के उसी घर मे हुई। उस दिन उनकी पत्नी मलिका अमरशेख को मैंने नए रूप में देखा। वे कहीं बाहर जाने को तैयार थीं। कार के पास खड़ी थीं। सफेद साड़ी से लिपटा उनका आबनूसी शरीर। खुले बाल, आंखों पर धूप का चश्मा। मझे देखकर जय भीम कहा। जाते हुए वह बोली, अच्छा नामदेव मैं जा रही हूं। देखो तो कौन आया है? और वे कार स्टार्ट कर चली गई। तभी नामदेव बाहर आये। पहले जाती हुई कार को देखा फिर मेरी तरफ। आइए नैमिशराय जी अंदर चलें। कहते हुए वे कमरे के भीतर चले गए। पीछे-पीछे मैं भी। पहले उन्होंने पानी दिया फिर चाय बनाने लगे। मैंने मना किया। उन्होंने कहा, नैमिशराय पहले चाय पी लो, बाद में देखते हैं। कहते हुए हल्के से मुस्कुराए। मैं चुप ही रहा। तब तक नामदेव मेरे और भी आलेख पढ़ चुके थे। इधर जब भी मैं बम्बई आता, नवभारत टाइम्स के अलावा जनसत्ता, संझा जनसत्ता, धर्मयुग तथा अन्य पत्र पत्रिकाओं के लिए लिखता था। ऐसे ही एक आलेख मैने लिखा था- ‘समंदर में डूबता सूरज और मैं’, जिसे नामदेव ने पढ़ा था। अच्छा लगा था उन्हें। उसी के बारे में बोले थे, नामदेव। नैमिशराय, कहीँ तुम समंदर में मत डूब जाना। यहां डूबने के लिए समंदर और गम होने के लिए जंगल भी है। बातें करते हुए उन्होंने चाय बना ली थी। फिर दो प्यालों में डाला। उनमें से एक प्याला मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, लीजिए चाय। मुझे मालूम है नैमिशराय न समंदर में डूबेगा और न जंगल मे गम होगा। अपनी बात पूरी कर नामदेव ने मेरी तरफ देखा था। कुछ पल हमारे बीच चुप्पी रही। मैंने चाय का पहला घूंट भरा। चाय के लिए धन्यवाद देते हुए कहा, अच्छी चाय थी। तुम्हें पसन्द आई।  मलिका रात में आयेगी। कोई कार्यक्रम है। कहते हुए फिर उन्होंने दिल्ली के बारे में जानकारी ली। मैं सिलसिलेवार उन्हें बताता रहा। वे सुनते रहे। उनकी चाय खत्म हुई तो उन्होंने सिगरेट सुलगा ली। घर में कोई और नहीं था। सामने एक छोटे टेबल पर कुछ पत्रिका तथा अखबार पड़े थे। सभी अव्यवस्थित। जैसे वे वैसे ही परिवेश। लगभग सभी लेखकों के बारे में ऐसा ही होता है। आंदोलन और साहित्य उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य होता है। घर से जैसे बेखबर होता है लेखक। तभी उनका फोन आया, उन्होंने बात की। कहीं शाम को बुलाया था उन्हें। तत्काल मना कर दिया नामदेव ने और कहा, दिल्ली से मोठे पत्रकार आये हैं, कल देखूंगा। आज नहीं।

नामदेव ढसाल अपने मित्रों के साथ

काफी देर तक हम साहित्य और आंदोलन पर बातचीत करते रहे। इस बीच उनके लिए फिर फोन आया। नामदेव ने बात की। उन्होंने बताया अरुण काम्बले का फोन था। शाम होने लगी थी। उन्होंने फोन कर हाफ मंगाया। साथ में नमकीन भी। जल्द ही कोई आदमी यह सब दे गया। पेग बनाते हुए पूछा उन्होंने, कहाँ ठहरे हैं? जवाब में मैने कहा, कुर्ला। सुनकर वे चुप हो गए। फिर बोले, कोई परेशानी हो तो बताना। उनके साथ पीने का यह पहला अवसर था। शराब पीते हुए वे मुखर होने लगे थे। कभी नेताओं को कुछ कहते कभी सवर्णो की माँ बहन करते। मैंने दो ही पेग लिए। मुझे जाना भी था। रात होते होते मैं वहां से निकला। महालक्ष्मी से परेल और परेल से कुर्ला। वहां अशोक पंडित रहते थे। वही मैं ठहरा हुआ था। वे फ़िल्म से जुड़े थे। इसके लगभग तीन-चार महीने बाद मेरा फिर से बम्बई जाना हुआ। तो मैंने उन्हें फोन किया। नामदेव ने बम्बई सेंट्रल के पास ही एक बार का पता दिया। शाम के लगभग आठ बजे मैं पहुंचा। वे अकेले बैठ मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। मुझे देख कर बोले, आ गए नैमिशराय। कौन सी पियेंगे? जवाब में कहा मैंने कि जो भी आप पिलायेंगे। नामदेव ने मेरी और देखा। जैसे कुछ कहना चाहते थे, लेकिन बोले नहीं। थोड़ी देर में बेयरा आया। उन्होंने आर्डर दिया। जल्दी ही दो पेग के साथ बेयरा सींग दाना(मूंगफली) रख कर चला गया। लीजिये नैमिशराय, कहते हुए उन्होंने अपने जाम को मेरे जाम से टकराया। हमारा पहला पेग खत्म हुआ तो उन्होंने सलाद के साथ दो पेग और लाने के लिए कहा। बेयरा ऑर्डर लेकर चला गया। तभी उन्होंने खाली गिलास हाथ में लेकर कहा, नैमिशराय हम दलितों का जीवन भी ऐसा ही है। कोई भी आता है हमारे जीवन को अपने रंग में रंगने का प्रयास करता है। हम सिर्फ देखते हैं। तभी बेयरा दो पेग ले आया और खाली गिलास ले गया। नामदेव ने इस बार भरे हुए गिलास की ओर देखा ।कुछ कहना चाहते थे। जाम उठाया और तेजी के साथ आधी शराब पी ली। जाम को टेबल पर रखा। थोड़ी आवाज हुई। मैं उनके भीतर हो रही प्रतिक्रिया को महसूस कर रहा था। पर कुछ कहा नहीं। तभी वे बोले ऐसा क्यों होता है? मेरा जवाब था, हिन्दू धर्म व्यवस्था विषमता पर आधारित है। नामदेव ने सुना। जैसे भीतर से वे खौलने लगे हों। उन्होंने तीसरे पेग का ऑर्डर दिया। बेयरे को थोड़ा समय लगा। रात गहरी होने लगी थी। तीसरे पेग के बाद चौथा और फिर पांचवा। मैंने सिर्फ तीन ही लिए थे, पर नामदेव पेग पर पेग। समय काफी हो गया था। पीने वाले जाने लगे थे। टेबल कुर्सियां खाली होने लगी थीं। थोड़ी देर में वहां कोई न था हमारे अलावा। तभी मैनेजर आया और हाथ जोड़ कर उन्होंने रात होने की बात की। नामदेव ने उसकी तरफ देखा फिर मेरी और। मैंने भी चलने की बात धीरे से कही।

चलो, चलते हैं।

कहते हुए वे कुर्सी से उठे। मुझे बम्बई सेंट्रल जाना था। वहां गेस्ट हाउस में मैं ठहरा था। इतने नशे की हालत में उन्होंने ठीक-ठाक कार ड्राइव की और मुझे बम्बई सेंट्रल छोड़ा। मैंने हाथ से इशारा किया। तभी वे बोले, कभी बम्बई आयें तो मिलना। मेरे मुंह से निकला, जरूर। इसके बाद मेरी उनसे नागपुर, दिल्ली और बम्बई में मुलाकात होती रही। हर मुलाकात में मैं उनको पढ़ने का प्रयास करता।

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अंतिम मुलाकात में एक दिन उन्होंने कहा था, नैमिशराय जी इतिहास के बंद तहखानों को खोलो। राजनीति के जीवंत भड़वों, दलालों पर और तेजी से वार करो। हिन्दूशाही का नकाब हटाओ। उनकी परम्पराओं, प्रथाओं को ध्वस्त करो। उनके देवी-देवताओं को कूड़े में फेंको। महालक्ष्मी के छोटे से घर से लेकर अंधेरी के बड़े और सुंदर घर तक,आमदार निवास की कैंटीन से वडाला में हुई दलित पैंथर की सभा तक, बम्बई सेंट्रल के नजदीक बार से लेकर गांडू बगीचे तक मे उससे हुई मुलाकातों में वेसे ही उद्वेलित करने वाले सवाल उभरते। इस बीच कितने मौसम बदल जाते, कितने परिवर्तन हो जाते, लेकिन नामदेव के भीतर एक ही मौसम होता। वही मौसम मुझे आकर्षित करता और उसके नजदीक होने के लिए प्रेरित करता।

जीवन जैसे-जैसे आगे बढ़ता है वैसे-वैसे उसमे परिवर्तन आते हैं। नई-नई धाराए फूटती हैं,जो नए विचारों को जन्म देती हैं। ऐसे समय नामदेव के भीतर कशमकश थी। दलित साहित्य और आंदोलन में भी प्रतिस्पर्धा चल रही थी। वैसे यह प्रतिस्पर्धा दलित पैंथर के जन्म से ही शुरू हो गई थी। उसका कारण एक सीमा तक राजनीति भी थी। साथियों के बीच राजनीति ने अच्छे खासे तनाव और उलझन पैदा कर दिए थे। जो संगठन को नुकसान पहुँचा रहा था। वैसे देखा जाए तो नामदेव अलग-थलग पड़ता जा रहा था। आरम्भिक दौर में उसके साथ जो जुड़े, देखते-देखते वे अलग होते चले गए। ढसाल के शिवसेना में शामिल होने की घटना को कम से कम मैं दलित इतिहास का वह महत्वपूर्ण अध्याय ही कहूंगा जहाँ से मराठी दलित बुद्धिजीवियों के भीतर अलग-अलग राजनीतिक दलों में जाने की भूख और होड़ आरम्भ हो गई थी। हालांकि यह सिलसिला तो पहले भी था लेकिन वैसी वासना तब न थी। शिवसेना में प्रवेश का कारण, जैसा नामदेव ने बताया था। एक बार पुणे में रिपब्लिकन पार्टी की एकीकरण संबंधी बैठक चल रही थी। किसी सवाल पर प्रकाश आम्बेडकर से मेरी कहा-सुनी हो गई और प्रकाश ने मेरी छाती पर लात मारी। इस बारे में बाद में कई पत्र रिपब्लिकन पार्टी को लिखे, लेकिन किसी भी पत्र का मुझे जवाब नहीं मिला। इससे खिन्न होकर मैंने शिवसेना की सदस्यता ले ली। पर इससे अलग भी एक और कहानी है। वह कहानी नामदेव के बेटे और पत्नी से जुड़ी थी। वह कहानी परिवार की सुरक्षा से जुडी थी। जैसा एक बार स्वयं मलिका ने भी मुझसे अपने परिवार की समस्याओं को सांझा करते हुए अंधेरी वाले फ्लैट में बतलाया कि नामदेव के कारण परिवार संकट में आ गया है। हमारे बेटे का जीवन भी असुरक्षित हो गया है। मैं स्वयं परेशान हूँ। ऐसे में कब क्या हो जाए कुछ कहा नही जा सकता।

बाद में एक दो बार मोबाइल पर बातचीत हुई। बम्बई जाना मेरा कम हो गया था। नामदेव को किसी भी तरह की सलाह देना अपने आप को परेशानी में डालने के बराबर था। वह किसी की सलाह मानना तो दूर सुनता भी नही था। उसका अपना मिजाज था। जिसके चक्रव्यूह में कभी-कभी वह स्वयं फंस जाता था। बात कुछ भी हो नामदेव के इस फैसले ने मेरे साथ अन्य को भी हिला कर रख दिया था। जिस धर्म,जिस संस्कृति, जिन देवी-देवताओं, जिन परम्पराओं को नामदेव ठोकर मारता रहा अंत मे उन्हीं के जाल में स्वयं जाकर फंस गया। इसे नियति कहें या नामदेव की स्वीकृति। क्या एक दलित ज्वालामुखी का अंत ऐसे ही होना था। 15 जनवरी, 2014 को उनकी मृत्यु हुई। बहुत सारे सवाल अधूरे रह जाते है। कौन जवाब देगा?

भारत सरकार ने 1999 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा था। 2004 में साहित्य अकादमी ने जीवन गौरव प्रदान किया था। महाराष्ट्र सरकार ने भी उन्हें साहित्य सेवा के लिए पुरस्कृत किया था। ‘गोलपीठा’ के लिए उन्हें सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से नवाजा गया था।

उनकी अन्य पुस्तकों में ‘गांडू बगीचा’, ‘तुहि इयत्ता कांची’, ‘हड़की हदवल’ , ‘अंधले शतक’, ‘खेल’ आदि हैं। उनकी पत्नी मल्लिका भी एक प्रसिद्ध लेखिका है। उनकी आत्मकथा ‘मझे ध्वस्त होना है’  प्रसिद्ध हुई। उनके पिता शाहिर अमर शेख महाराष्ट्र के जाने-माने कवि और कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े रहे।

(कॉपी संपादन : नवल/सिद्धार्थ)


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