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झारखंड :  भूख से मौत का सिलसिला जारी, कटघरे में रघुवर सरकार

झारखंड में पिछले 10 माह में 12 लोगों की भूख से मौत ने सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिया हैं। हालांकि रघुवर दास सरकार वास्तविकता को दबाते हुए इन मौतों को स्वाभाविक या बीमारी की मौत बता रही है। खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने तो राज्य में भोजन का अधिकार का हनन के खिलाफ आवाज उठाने वालों और इन भूख से मौतों को उजागर करने वालों के खिलाफ उल्टे आरोप लगाए हैं। सरकार चाहती तो भूख से मौतों से सबक लेते जन वितरण प्रणाली में सुधार के लिए व्यापक कदम उठाती और इन मौतों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करती।

रघुवर दास, झारखंड के मुख्यमंत्री

गिरिडीह में सावित्री देवी, चतरा में मीना मुसहर और रामगढ़ में चिंतामन मल्हार की भूख से मौतों ने साबित कर दिया है कि राज्य में भुखमरी की समस्या को हल करने के लिए सरकार गंभीर नहीं है।

2 जून 2018 को भूख से मौत का शिकार हुई सावित्री देवी के परिवार वालों को पता नहीं था कि उन्होंने दाल कब पकायी। परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था। कुछ महीने पहले उन्होंने राशन कार्ड के लिए आवेदन किया गया था। इस मामले में सरकार कहती है कि सावित्री देवी ने राशन कार्ड के लिए आवेदन ही नहीं किया। हालाकि सावित्री देवी का विधवा पेंशन 2014 में ही स्वीकृत कर दी गई थी लेकिन बैंक खाते में पेंशन की राशि अप्रैल 2018 में आयी, जब इस योजना से आधार को जोड़ा गया। सावित्री देवी को यह जानकारी नहीं थी कि पेंशन की राशि खाते में जमा कर दी गयी है।

खाद्य मंत्री की असंवेदनशीलता

रामगढ़ के मांडू प्रखंड के चिंतामन मल्हार आर्थिक तंगहाली और अनाज के अभाव में जी रहे थे और मरने से पहले भूखे थे। उनके पास भी राशन कार्ड नहीं था। प्रशासन ने चिंतामन के भूख से मौत की बात को स्वीकार करने के बजाय उनके बेटे के अंगूठे का निशान एक झूठे वक्तव्य पर ले लिया जिसमे चिंतामन मल्हार की मौत भूख से नहीं बल्कि स्वाभाविक होने की बात लिखी थी। आश्चर्य करने वाली बात यह है कि खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने बाद में कहा कि चिंतामन मल्हार ने स्वीकार किया है कि उसके पिता की मौत भूख से नहीं  हुई है। इतना ही नहीं रामगढ़ के मामले में तो खाद्य आपूर्ति मंत्री द्वारा भूख से मौत की जांच के लिए मृत शरीर को जमीन से निकालकर उसके पोस्टमार्टम करने का सुझाव दिया गया। इससे पता चलता है कि खाद्य आपूर्ति मंत्री भुखमरी के मुद्दे पर कितने असंवेदनशील हैं। बेटे द्वारा पिता के मृत शरीर को जमीन से निकाल कर पोस्टमार्टम करने से मना करने को इस बात के प्रमाण के तौर पर देखा गया कि चिंतामन की मृत्यु भूख से नहीं हुई है।

सरयू राय, खाद्य आपूर्ति मंत्री, झारखंड सरकार

चतरा में कूड़ा बीनने का काम करने वाली मीना मुसहर के पड़ोसियों ने बताया कि वह कुपोषित थी। वह अपने बच्चे को भी नहीं खिला पायी जिसकी मौत एक सप्ताह पहले ही हुई थी। मीना मुसहर के पास भी राशन कार्ड नहीं था। झारखंड सरकार ने मीना मुसहर की मौत से यह कहकर पल्ला झाड लिया कि वह बिहार के गया से आई थी। खाद्य आपूर्ति मंत्री ने तो यहां तक कह दिया गया कि जिनके पास राशन कार्ड नहीं है उनके भूख से मौत की जिम्मेदारी खाद्य आपूर्ति विभाग की नहीं है।

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जन वितरण प्रणाली के तहत अनाज न मिलना झारखंड में अब तक हुई भूख से मौत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार तो है ही लेकिन भूख से मौत का शिकार व्यक्ति एवं उनका परिवार को सामाजिक सुरक्षा पेंशन और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून (नरेगा) के अंतर्गत मिलने वाले काम न मिलना भी इन भूख से मौतों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। कुल 12 में से 4 भूख से मौत का शिकार हुए व्यक्ति सामाजिक सुरक्षा पेंशन के भी हकदार थे लेकिन  प्रशासनिक विफलता एवं आधार संबंधित समस्याओं के चलते उन्हे पेंशन नहीं मिल रही थी।

सरकार की नाकामियों को भोजन का अधिकार अभियान ने उजागर किया है। उन्होंने रांची में बीते 20 जून को संवाददाता सम्मेलन कर बताया गया कि झारखंड में पिछले 10 महीने में हुई 12 भूख से मौत का कारण राज्य में गरीब और वंचितों को जन वितरण प्रणाली का लाभ नहीं मिल रहा है। राज्य में खाद्य सुरक्षा की आपातकालीन स्थिति है। इस संकट को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है ग्रामीण क्षेत्रों में जन वितरण प्रणाली का सार्वभौमीकरण एवं साथ में पोषक वस्तु जैसे दाल एवं खाद्य तेल शामिल किया जाए। इन मौतों ने यह भी साबित कर दिया कि राज्य में अन्त्योदय श्रेणी के अंतर्गत आने वाले परिवारों का दायरा बढाने की जरुरत है।

अनाज बैंक बनाने का प्रस्ताव

सरकार इन व्यापक और प्रभाशाली कदमो को उठाने के बजाय अनाज बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा है। मान लिया जाए कि ऐसे अनाज बैंक बन भी जाते है तो इस बात की गारंटी कौन लेगा कि गरीब और वंचितों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो। झारखंड में हो रही लगातार भूख से मौत से सबक लेकर उपरोक्त सुझाए गए कदम उठाने के बजाय राज्य  सरकार द्वारा नगड़ी में जन वितरण प्रणाली में डीबीटी का पायलट प्रोजेक्ट लागू कर राज्य में भुखमरी की स्थिति को बढा रही है। हालांकि सरकार का दावा है कि नगड़ी में डीबीटी के पायलट प्रोजेक्ट को वापस लेना चाहती है। इस बारे में केंद्र सरकार को लिखा भी गया है लेकिन नगड़ी के डीबीटी पायलट लागू हुए 8 महीने हो गए है। लेकिन इसे अब तक वापस नहीं लिया गया है। सरकार ने नगड़ी में सामाजिक अंकेक्षण तो कराया है लेकिन इसके परिणाम को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

(कॉपी एडिटर : बी. आनंद)


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