फॉरवर्ड प्रेस

मेधावी आदिवासी स्कॉलर का पीएचडी प्रवेश रद्द, वर्धा में बवाल

अकादमिक जगत में सरकारी क़ायदे-कानून का आलम ये हो चुका है कि पहले तो वो आदिम ज़माने के बनाए लगते हैं लेकिन जहां पर थोड़ी बहुत गुंजाइश बची भी होती है उसे संस्थानों की चकाचौंध में रहने वाले सरकारी कारकून ख़त्म करने पर आमादा होते हैं। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में थारू आदिवासी जनजाति के एक शोधार्थी का पीएचडी प्रवेश जिस तरह निरस्त किया गया वह तो कम से कम यही बताता है।

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

वर्धा विश्वविद्यालय में इस मामले में बवाल इसलिए भी ज्यादा बढ़ गया है कि कि जिस एसटी छात्र को शोध से वंचित किया जा रहा है उसे लेकर सारी संस्तुति यानी कार्रवाई करने की इजाज़त किसी और की नहीं बल्कि केंद्र के शोध निदेशक प्रोफ़ेसर लेल्ला करुण्यकरा ने की है जो ख़ुद दलित-बहुजन समाज की प्रतिनिधि आवाज़ रहे हैं। शोधार्थी भगत नारायण महतो पर लेल्ला कारुण्यकरा की संस्तुति पर कुलपति के फ़ैसले पर प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। इसीलिए कई अन्य छात्र सगंठनों के साथ अब आइसा के छात्र नेता भी पूरे मामले में कूद गए हैं। उन्होंने कुलपति से मुलाक़ात के बाद अल्टीमेटम दिया की समाधान नहीं हुआ तो वो आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।

क्या है पूरा मामला :

थारू आदिवासी जनजाति समाज के प्रतिभाशाली शोधार्थी भगत नारायण महतो ने वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वलिद्यालय से ही एमफिल किया है। एमफिल उन्होंने प्रथम श्रेणी से पास किया। इसके बाद उन्होंने दिसंबर 2017 में पीएचडी के लिए प्रवेश पत्र दिया। लेकिन, इस प्रवेश पत्र को इसलिए रद्द कर दिया गया कि अभ्यर्थी यानी भगत नारायण महतो ने कथित तौर पर जरूरी हाजिरी नहीं दी और नियमानुसार रजिस्ट्रेशन से पहले शोध प्रबंध के बारे में सेमीनार में प्रस्तुति नहीं दी।इसमें शोध की गुणवत्ता, उसकी संभावना या शोधार्थी की प्रतिभा का आकलन कहीं भी आधार नहीं है। यानी असल में विद्यार्थी की परिस्थिति या उसके पक्ष को सुना ही नहीं गया। ऐसा होता तो मुमकिन है प्रोफेसर लेल्ला करुण्यकरा की अनुशंसा इतनी कठोर नहीं होती। उन्होंने शोधार्थी के मामले में सीधे कहा है, “अवैधानिक। या संभवतः उसे फौरन करने की जल्दी (बिना शोधार्थी का पक्ष सुने) वह नहीं करते। महतो ने दलित जनजाति अध्ययन केंद्र में पीएचडी के लिए प्रवेश लिया, मगर प्रवेश नहीं मिला।  

प्रो. लेल्ला करुण्यकरा, केंद्र निदेशक, वर्धा

शोधार्थी का पक्ष :

शोधार्थी भगत नारायण महतो ने कहा, “मेरा पक्ष साफ है। मैंने सभी सम्बंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिसमें मेरे प्रवेश की तिथि और जब-जब मेरा अवकाश स्वीकृत/अस्वीकृत हुआ, उससे जुड़े सभी तथ्यों के दस्तावेजी सुबूत मेरे पास हैं। पूर्व में किसी तरह भी सेमिनार में शोध प्रबंध संबंधी प्रस्तुति के बारे में मुझे विभाग से कोई जानकारी नहीं दी गई। लेकिन अब मेरी बात को मानने से कुलपति इनकार कर रहे हैं। इसके उलट मुझ पर लापरवाही बरतने और पढ़ने में कमजोर होने की आरोप लगाए जा रहे हैं, जो कि गलत है। शोधार्थी का आरोप है कि कुलपति ने केंद्र निदेशक की सिफारिश के बाद उनका प्रवेश निरस्त किया। गैरहाजिरी को लेकर शोधार्थी का कहना है कि पिता की मृत्यु के बाद घर का सारा जिम्मा उन्हीं के सिर पर है। पढ़ाई के साथ परिवार की जिम्मेदारी उन्हें निभानी होती है। इसी दौरान एक बार वो किन्हीं कारणों अपने घर बिहार के पश्चिमी चंपारण चले गए थे। घर जाने से पहले उन्होंने विश्वविद्यालय की सभी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया। अवकाश के लिए भी उन्होंने 20 अप्रैल 2018 आवेदन दिया गया था, जिसे विभागाध्यक्ष प्रोफेसर लेल्ला कारुण्यकरा ने नामंजूर कर दिया था। लेकिन, उन्हें 25 अप्रैल 2018 को ई-मेल के माध्यम से इसकी सूचना दी गई। इस दौरान वह गृह जिले बिहार पहुँच चुके थे, जहाँ इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। कुल मिलाकर उन्हें देरी से जानकारी मिली कि उनकी छुट्टी पास नहीं हुई है। सूचना मिलने के बाद शोधार्थी महतो वर्धा पहुँचे। लेकिन, तब तक देर हो चुकी थी। इसके लिए शोधार्थी ने कुलपति से क्षमायाचना भी की।

छात्र संगठनों का मिला साथ :

इधर, शोधार्थी भगत नारायण महतो को छात्र संगठनों का समर्थन मिला है। इनमें वामपंथी संगठन आइसा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र सगंठन एबीवीपी शामिल हैं। कुलपति से मिलने वाले छात्र प्रतिनिधियों का कहना है कि विश्वविद्यालय की कोशिश पीएचडी प्रवेश निरस्त करने को सही ठहराने की है। छात्र नेताओं ने कुलपति गिरीश्वर मिश्र पर सीधा आरोप लगाया है कि उनको (कुलपति को) यह तक ज्ञात नहीं है कि उनके ही विश्वविद्यालय के इस विभाग में एमफिल में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाला शोधार्थी भगत नारायण महतो एक होनहार छात्र है। छात्र प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि पूरे मामले के कर्ता-धर्ता प्रोफेसर लेल्ला करुण्यकरा हैं और उन्होंने शोधार्थी को बिना मौका दिए और उनका पक्ष जाने बिना ही प्रवेश निरस्त कर दिया। हालांकि, खुद महतो और छात्र संगठन के प्रतिनिधियों का पक्ष सुनकर विश्वविद्यालय प्रशासन पशोपेश में है।

भगत नारायण महतो, शोधार्थी वर्धा

कुलपति की भूमिका :

आइसा के छात्र प्रतिनिधि मंडल के राजेश सारथी और राजू कुमार 25 मई 2018 को कुलपति से मिले। उन्होंने शोधार्थी का पूरा पक्ष रखा और फौरन आवश्यक कार्यवाही करने का आग्रह किया। आइसा नेताओं ने कहा कि मामले को ज्यादा पेचीदा बनाने की कोशिश की गई, तो वे संबंधित विभाग की दूसरी कारगुजारियों का भी वह चिट्ठा खोलने से पीछे नहीं हटेंगे, जो कथित वित्तीय अनियमिततों से जुड़ा है। कुलपति से मिलकर लौटे दूसरे छात्र संगठनों के प्रतिनिधि राम सुन्दर शर्मा और अनुपम राय ने बताया कि कुलपति ने केंद्र निदेशक की अनुशंसा की तरफदारी की है। छात्र प्रतिनिधियों ने पीएचडी निरस्तीकरण की प्रक्रिया को लेकर कहा कि संवैधानिक पहलू यही है कि केंद्र निदेशक या कुलपति को बोर्ड ऑफ स्टडी से पीएचडी निरस्त करने का अधिकार नहीं है। उन्हें सिर्फ छात्र को गाइड करना होता है। छात्र को पीएचडी में रखना या न रखना विश्वविद्यालय की अकादमिक काउंसिल के अधिकार क्षेत्र का मामला है। छात्र नेताओं का कहना है कि सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि इस बारे में काउंसिल के एक भी सदस्य को इस कार्यवाही से अवगत नहीं कराया गया।

क्या बोले केंद्र निदेशक :  

पूरे मामले में हमने जब केंद्र निदेशक प्रोफेसर लेल्ला करुण्यकरा से उनका पक्ष जाना तो उन्होंने कहा, “मैं व्यक्तिगत रूप से भगत या किसी भी अन्य छात्र के खिलाफ नहीं हूँ। मैं खुद भारतीय दलित समाज से हूँ और इसके नाते मुझे पता है कि एससी/एसटी/ओबीसी के छात्रों के सामने कितनी सारी कठिनाइयाँ आती हैं। इन कठिनाइयों को मैं समझता हूँ, लेकिन मैं यूजीसी के नियमों से बाहर नहीं जा सकता। किसी भी छात्र के लिए यूजीसी के नियम नहीं तोड़ सकता, चाहे वह विशेष समाज से ही संबंधित क्यों न हो। भगत ने पीएचडी छुट्टियों को लेकर बार-बार यूजीसी नियमों को तोड़ा है। इसलिए, उनका प्रवेश अस्थाई तौर पर रद्द कर दिया गया है। इस मामले को देखने के लिए विश्वविद्यालय ने एक समिति गठित की है। दुर्भाग्य से मुझे लक्ष्य करते हुए एबीवीपी ने इस मुद्दे को राजनीतिक हवा दी है। इस मामले में एबीवीपी ने मेरे खिलाफ विश्वविद्यालय से शिकायत की है। इसलिए अब सवाल सिर्फ भगत के प्रवेश के बारे में ही नहीं, बल्कि मेरी सत्य-निष्ठा का भी है। विश्वविद्यालय की समिति ही तय करेगी कि आगे क्या अच्छा है और क्या होना चाहिए।”

क्या हो सकता है आगे :

कुलपति गिरीश्वर मिश्र, वर्धा

जाहिर है अब गेंद कुलपति गिरीश्वर मिश्र के पाले में है। ऐसा नहीं है कि भगत नारायण महतो की प्रतिभा से वह वाकिफ नहीं हैं। वह दोनों पक्षों को सुन चुके हैं। उनको शोधार्थी का प्रवेश रद्द करने के दूसरे बिंदू (रजिस्ट्रेशन से पहले सेमिनार में प्रस्तुति न देने) पर गौर करना होगा, जिसे महतो के प्रवेश को रद्द करने का मुख्य आधार बनाया गया। उनको बताना होगा कि क्या इससे संबंधित किसी भी तरह की आवश्यक जानकारी या सूचना विश्वविद्यालय की वेबसाइट, ई-मेल के जरिए या अन्य किसी भी प्रकार के माध्यम से शोधार्थी को दी गई? हकीक़त यह है कि विश्वविद्यालय पहुँचने के बाद शोधार्थी ने जब पंजीयन पूर्व सेमिनार प्रस्तुति के बारे में केंद्र सहायक से पता किया, तो उनको बताया गया कि 2017 बैच के पीएचडी शोधार्थी का पंजीयन पूर्व सेमिनार हुआ ही नहीं है। अब विश्वविद्यालय कमेटी के सामने यही एक बड़ा सवाल होगा, जहाँ से भगत नारायण महतो की दावेदारी पुख्ता होगी और उनको पीएचडी में प्रवेश की एक गुंजाइश बन सकेगी। अगर ऐसा होता है तो निश्चित ही वर्धा की साख बचेगी और शोधार्थी के भविष्य से भी खिलवाड़ नहीं होगा। केंद्र निदेशक प्रोफेसर लेल्ला कारुण्यकरा की सत्य-निष्ठा को भी यहाँ से कोई आँच नहीं आने वाली।

(कॉपी सम्पादन : प्रेम बरेलवी)


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