संयुक्त राष्ट्र में उठी दलित महिलाओं के उत्पीड़न की आवाज

नारी शिक्षा, नारी सम्मान और नारी उत्थान की बातें भारत में खूब होती हैं, लेकिन दलित महिलाओं का सवर्णों द्वारा उत्पीड़न कम नहीं हो रहा है। पुलिस, प्रशासन और सत्ता भले ही इसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई न करते हों, लेकिन अब इस उत्पीड़न के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में आवाज़ उठने लगी है। प्रस्तुत है एक रिपोर्ट

भारत में जातिगत हिंसा और खासकर दलित महिलाओं पर हिंसा के मामले आए दिन अखबारों, चैनलों और सोशल मीडिया पर देखने-सुनने को मिलते रहते हैं। समस्या यह है कि भारत में उत्पीड़न के खिलाफ कानून होने के बावजूद भी दलित महिलाओं का उत्पीड़न होता रहता है और पुलिस, प्रशासन, सत्ता की ओर से कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की जाती, जिससे उत्पीड़न करने वालों को सबक मिल सके। बीते 21 जून 2018 को दलित महिलाओं के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न के सवाल को लेकर जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में सवाल उठाया गया।

वहां इस मामले को रखने वाले कुछ भारतीय ही हैं। इनमें पूर्व संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त नव पिल्लै, संयुक्त राष्ट्र की विशेष संवाददाता रशिदा मंजु, भारतीय उच्च न्यायालय में वकील वृंदा ग्रोवर, अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच की महासचिव आशा और एनएफडीडब्ल्यु (नेशनल फेडरेशन फॉर दलित वुमेन) की राष्ट्रीय संयोजक एवं राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड (वैकल्पिक नोबेल पुरस्कार) 2006 की विजेता डॉ. रूथ मनोरामा प्रमुख हैं।

जिनेवा में संयुक्त राष्ट्रसंघ मानवाधिकार परिषद की बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते प्रतिभागी

इस मौके पर राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान की संयोजक प्रोफेसर विमल थोराट ने कहा कि हर साल राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की रिपोर्ट में यह बात सामने आती है कि दलितों के खिलाफ किए गए अपराधों में अधिकांश अपराध दलित महिलाओं के खिलाफ किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि दलित महिलाओं के खिलाफ हिंसा की समीक्षा के हमारे अनुभव से आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्फलता और निर्धारित कानूनी ढांचे के तहत मामलों की जांच में पुलिस द्वारा जानबूझकर लापरवाही स्पष्ट हो जाती है।

डॉ.रूथ मनोरमा ने जातिगत हिंसा को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंच के दायरे में शामिल करवाने के लिए बहुत संघर्ष किया है। वह कहती हैं कि समुदाय की महिलाओं की रक्षा के लिए बनाये गये संवैधानिक एवं कानूनी  प्रावधान, विकास योजनाएं, संस्थान और प्रक्रियाएं सब अनुचित हैं। ये सब जाति आधारित हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाने में बेअसर और बेकार साबित हुए हैं। रशिदा मंजु ने जाति प्रेरित दमन का शिकार महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए ग़ैर बराबरी और उत्पीड़न के अंतर्निहित कारणों को संबोधित करने के प्रति सरकार की जवाबदेही की तत्काल आवश्यकता को दोहराया । नव पिल्लै भी संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग में दलित महिलाओं पर हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं।

अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच की महासचिव आशा ने कहा कि जाति आधारित उत्पीड़न हमारी ज़िंदगियों पर कहर बरसाता है। इसकी जड़ें गहरी बैठी हुई हैं। उससे निपटने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति के लिए प्रस्तुत किये गये कानूनी और विकासात्मक दृष्टिकोण के पाखंड को हम पर्दाफाश करेंगे। दलित महिलाओं पर हो रहा उत्पीड़न बंद होना चाहिए। इस उत्पीड़न के खिलाफ आप सब भी हमारे साथ खड़े हों। वहीं, वृंदा ग्रोवर का कहना है कि भारत की सबसे ज़्यादा पक्षपात-ग्रसित और असुरक्षित महिलाओं को न्याय प्रदान करने में अदालतों की विफलता हमें अंतर्निहित और प्रणालीगत चुनौतियों की जांच करने के लिए मज़बूर करती है।

सवाल यह है कि क्या जातिगत अपराधों को कभी भी ऐसे विश्वस्तरीय मानवाधिकार संकट के रूप में देखा जाएगा, जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए? दूसरा सवाल यह कि अगर संयुक्त राष्ट्र में भारतीय दलित महिलाओं पर उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठती है, तो क्या भारत सरकार की हीला-हवाली पर कोई असर पड़ेगा? क्या उत्पीड़कों के खिलाफ ठोस कार्रवाई होनी शुरू होगी?

(कॉपी एडिटर : सिद्धार्थ)  


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