बहुजन मुद्दों पर ‘विजन डॉक्यूमेंट 2019’ की तैयारी बैठक आयोजित

ओबीसी, दलित और आदिवासी समाज के भीतर आक्रोश और सजगता एक साथ दिख रही है। यह अपने को बहुजन के रूप  में संगठित करने की कोशिश कर रहा है। अपने बुनियादी मुद्दों को चिन्हित कर रहा है । इस संदर्भ विजन डॉक्यूमेंट 2019 तैयार करने के लिए बहुजन समाज के लोगों की एक बैठक हुई। एक रिपोर्ट

बीते 27 जुलाई 2018 को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के सभागार में विजन डॉक्यूमेंट कमेटी की बैठक संपन्न हुई। बैठक में ओबीसी को जनसंख्या के अनुपात में 52 प्रतिशत आरक्षण, निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण, ओबीसी आरक्षण के मामले में क्रीमीलेयर की समाप्ति, जाति जनगणना, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व आदि के प्रश्न पर गंभीर चर्चा हुई। बहुजन समाज के विभिन्न संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस बैठक में लोकतांत्रिक जनता दल के महासचिव अनिल जयहिंद, सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप मंडल, प्रो. रतनलाल, प्रो. लाल रत्नाकर, फारवर्ड प्रेस के संपादक(हिंदी) डॉ. सिद्धार्थ और सुशीला मोराले सहित कई प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक की अध्यक्षता सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. एस.एन. गौतम ने की।

बैठक के दौरान अपना विचार रखते प्रतिनिधि

बैठक में सभी ने एक स्वर से इस पर सहमति जाहिर किया कि ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदायों को अपने हकों के लिए एकजुट हो जाना चाहिए और 2019 के लोकसभा चुनावों में अपने एजेंडे को पुरजोर तरीके से रखना चाहिए। विभिन्न पार्टियों को इस बात के लिए बाध्य कर देना चाहिए कि वे बहुजन समाज के एजेंडे को अपने चुनावी घोषणा-पत्र में प्रमुखता से जगह दें।

वक्ताओं ने कहा कि जब संविधान में आरक्षण का प्रावधान जनसंख्या के अनुपात में हैं। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को  उनके जनसंख्या के अनुपात में क्रमश: 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, फिर ओबीसी समुदाय को सिर्फ 27 प्रतिशत आरक्षण ही क्यों? सभी ने एक स्वर से कहा कि ओबीसी को भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में 52 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। इसके साथ ओबीसी के लिए शिक्षा में आरक्षण को भी 27 प्रतिशत से बढ़ाकर 52 प्रतिशत किया जाना चाहिए। यदि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा इसके मार्ग में अवरोध है, तो संविधान में संसोधन किया जाना चाहिए। हमारे ही देश के तमिल नाडू जैसे राज्य में आरक्षण 69 प्रतिशत है।

इस बैठक में ओबीसी के लिए क्रीमीलेयर के के सवाल पर गंभीर चर्चा हुई। सभी ने इस बात पर सहमति जाहिर किया कि आरक्षण का आधार सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन है। इसके साथ क्रीमीलेयर की आर्थिक अवधारण नहीं जोड़ी जानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने क्रीमीलेयर की परिभाषित करने का काम सरकार पर छोड़ दिया था। उच्च जातियों के वर्चस्व के हिमायती नेताओं और नौकरशाहों ने मिलकर वार्षिक पारिवारिक आय को क्रीमीलेयर का मापदंड बना दिया। यह संवैधानिक रूप से गलत है। बैठक में सभी ने यह माना कि निजी क्षेत्र में आरक्षण के बिना धीरे-धीरे आरक्षण बेमानी होता जा रहा है।सरकारी- सार्वजनिक संस्थाओं का तेजी से निजीकरण हो रहा है। सरकारी क्षेत्र सिकुड़ रहा है, निजी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है। इस स्थित में ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदायों को निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू कराने के लिए एकजुट  होना चाहिए और संघर्ष करना चाहिए। पदोन्नति में आरक्षण एससी-एसटी के साथ ओबीसी को भी मिलना चाहिए। पदोन्नति में आरक्षण निर्णय के केंद्रों पर वंचित तबकों की भागीदारी को सुनिश्चित करता है।

वक्ताओं का मानना था कि कई सारे मुद्दों पर प्रगतिशील निर्णय देने वाले उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय अक्सर सामाजिक मुद्दों पर ओबीसी, दलित और आदिवासियों के खिलाफ निर्णय देते हैं। हाल में एससी/एसटी एक्ट, उच्च शिक्षा में शैक्षणिक पदों पर आरक्षण और पदोन्नति में आरक्षण पर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय इसके प्रमाण हैं। सभी ने माना कि इसका कारण यह है कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालयों में इन समुदायों का प्रतिनिधित्व नगण्य है। सभी लोग इस बात से सहमत थे कि ओबीसी, दलित और आदिवासियों की एकजुटता के बिना हम अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकते। बहुजन के रूप में हमारी एकजुटता ही हमारी ताकत बन सकती है।

अनिल जयहिंद ने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि  दो टूक कहूं तो मैं यादव जाति का हूं, कई बार मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि आज तक कोई भी यादव जाति का व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश क्यों नहीं हुआ? जबकि बहुत सारे वरिष्ठ वकील यादव जाति के सर्वोच्च न्यायालय में हैं, क्या कोई इस योग्य आज तक पाया ही नहीं गया। सबने एक स्वर से न्यायपालिका में आरक्षण को की मांग की जाय, इसका समर्थन किया।


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