भूख से अकाल मौत नहीं मर रहे ओबीसी, दलित और आदिवासी, सरकारें दे रही मृत्युदंड

सैंकड़ों वर्ष पूर्व लोगों को भूखा रखकर उन्हें मरने को मजबूर कर मृत्युदंड देने के कई उदाहरण पश्चिम के देशों में मिलते हैं। भारत के कई राज्यों में यह अघोषित रूप से आज भी जारी है। अकेले झारखंड में पिछले दस महीने में दस लोगों की मौत हो चुकी है। भुखमरी के सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं विशद कुमार :

लगभग एक दशक पूर्व झारखंड के बोकारो जिला मुख्यालय से मात्र तीन-चार किलोमीटर दूर के इलाके में तीन लोगों की भूख से मरने की खबर आई थी। यह खबर ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए थी क्योंकि बोकारो में ही एशिया का सबसे बड़ा इस्पात कारखाना भी है। एक गांव है द्वारिका ब्राह्मण जहां दो लोगों की मौत इसलिए हो गई थी क्योंकि उन्हें मनरेगा की मजदूरी लगभग आठ माह से नहीं मिली थी और उनके कई दिन फांके में गुजरे थे, क्योंकि गांव के अन्य लोगों ने भी उनकी भूख मिटाने में अपने हाथ खड़े कर दिए थे। कारण था कि उस गांव के लगभग सभी लोग मजदूर थे और सभी बमुश्किल अपना भेट भर पाते थे। गांव का नाम भले ही ब्राह्मण द्वारिका था, मगर ब्राह्मण कम दलित अधिक थे। इसकी कहानी यह है कि ब्राह्मणों ने दशकों पहले यहां दलितों को अपनी सेवा करने के लिये बसाया था।

वहां आठ लोगों को मनरेगा की मजदूरी नहीं मिली थी। मगर दो की मौत के बाद जो हंगामा खड़ा हुआ, उसके बाद जिला प्रशासन की कुम्भकर्णी नींद टूटी और बाकी मरने से बच गए। जहां बाकी की जान जाने से बच गयी, वहीं जिला प्रशासन भी भूख से हुई मौत पर अपनी जवाबदेही से बच गया। उसने बड़ी चालाकी से शहर के एक नर्सिंग होम से दोनों की मौत का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया जिसमें मौत का कारण भूख नहीं, डायरिया बताया गया था। यह सर्टिफिकेट सबसे बड़ा मजाक था, क्योंकि जिनके पास खाने के लिए अनाज का एक दाना तक नहीं था, वे निजी नर्सिंग होम में इलाज करा रहे थे।

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दूसरी घटना इतनी मार्मिक थी जिसे देखकर विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही क्षेत्र है जहां एशिया का सबसे बड़ा इस्पात संयंत्र है। पुरूलिया रोड स्थित कांशीझरिया के बगल में बसा एक छोटा सा टोला था। बमुश्किल दस-बारह घरों वाला मुसलमानों के इस टोले की एक सोलह साल की लड़की की मौत भूख से हो गई थी। इसकी मौत मीडिया में सुर्खियां नहीं बनी थी। हमें तो उन मजदूरों की मौत की खबर कवर करने के दौरान किसी ने बताया और हम चल पड़े थे। वैसे आज उस लड़की का नाम और उस टोले का नाम स्मरण में नहीं है मगर वह दृश्य आज भी जेहन में कौंध रहा है। उस लड़की का बाप मानसिक रूप से विक्षिप्त था और मां इधर-उधर कुछ काम करके या भीख मांगकर अपना और उसका पेट पालती थी। घर के नाम पर दूसरे किसी की दीवार से सटा पलास्टिक की चादर से बनी कथित छत के नीचे वे रहते थे। बर्तन के नाम पर प्लास्टिक का ग्लास और लोटा था। खाना पकाने के लिए अल्मुनियम के दो बर्तन थे। यही उनकी कुल जमा पूंजी थी। लड़की को बुखार आया था तो किसी ने उसे बुखार उतरने की दवा दे दी थी और उसका बुखार उतर भी गया था। मगर बुखार उतरते ही वह भूख-भूख का गुहार लगा छटपटाने लगी थी। बेटी की छटपटाहट देख मां कुछ खाना मिलने की आस में कई जगह हाथ-पैर मारी, मगर कहीं से कुछ नहीं मिला। अंतत: भूख की छटपटाहट से बेटी के प्राण पखेरू उड़ गए।

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बता दें कि इसकी भूख से हुई मौत काे मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दी। अमुमन जैसा कि होता है, भूख से हुई मौतों के बाद जब वे खबरें सुर्खियों में होती हैं तो सरकारी सुविधाएं मरने वालों के परिवार तक पहुंचनी शुरू हो जाती हैं। हम घटना के करीब 10 दिन बाद गए थे और उसकी मां सहित गांव के लोगों ने बताया था कि कोई भी सरकारी मदद नहीं मिली थी। हमने इस बावत जानकारी के लिए जिला कलेक्टर एवं सिविल सर्जन से भेंट करने की कोशिश की थी मगर दोनों नदारद थे। 

अक्टूबर 2017 में झारखंड के झरिया में भुखमरी के शिकार एक रिक्शाचालक का बिलख्ता परिवार

हाल में सुर्खियों में आई खबरों के मुताबिक झारखंड में भूख से 10 लोगों मौतें हुई हैं। बता दें कि ये खबरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अखबारी मीडिया की खबरें बनी। जबकि ऐसी कितनी मौतें होती हैं जिनका कोई लेखा-जोखा नहीं होता है। उल्लेखनीय है कि 2017 अक्टूबर माह में झारखंड के सिमडेगा की 11 वर्षीय संतोषी कुमारी की भूख से हुई मौत काफी चर्चे में इसलिये रही कि उसकी मां कोयली देवी का राशन कार्ड आधारकार्ड के अभाव में नहीं बना था, इस कारण उसे सरकारी राशन नहीं मिल पा रहा था, संतोषी स्कूल में मिलने वाले मध्याह्न भोजन से अपनी भूख मिटाती थी और थोड़ा खाना बचाकर अपनी मां के लिये भी लाती थी। कहना ना होगा कि दोनों मां-बेटी को चौबीस घंटे में एक बार ही भोजन मिल पाता था। कभी—कभी कोयली देवी को कुछ काम मिल जाने से दोनों को दो समय भी खाना नसीब हो जाता था। इस बीच संतोषी की मौत का कारण बना स्कूल का बंद हो जाना। कतिपय कारणों से कुछ दिनों के लिये स्कूल बंद हो गया। संतोषी को लगातार चार-पांच दिनों तक खाना नहीं मिल पाया और अंतत: वह भात-भात रटते-रटते मर गई।

उसी माह में धनबाद के झरिया के बैजनाथ दास की मौत भी राशन कार्ड के अभाव में भूख से हो गई। 2017 नवंबर माह में बोकारो जिले के बारू गांव की विधवा रोहिणी देवी की मौत भूख के कारण इसलिये हो गई कि उसे 15 महीने से विधवा पेंशन नहीं मिला था। 2 नवंबर को उसका शव उसके घर में पाया गया। इसी तरह 13 जनवरी 2018 को गिरिडीह के थान सिंगाडीह की बुधनी सोरेन की मौत भूख से हुई।

रामगढ़ के आरा कुंदरिया का चिन्तामन मल्हार जो जंगलों से चिड़िया पकड़ कर बेच कर अपना गुजारा करता था, अस्वस्थ्य रहने के कारण जंगल नहीं जा सका और खाने के अभाव में 14 जून 2018 को उसने दम तोड़ दिया। उल्लेखनीय है कि इसी माह में गिरिडीह जिला के मंगरगड़ी गांव की सावित्री देवी की मौत भूख से उस वक्त हो गई जब उसे राशनकार्ड के अभाव में सरकारी राशन नहीं मिल पाया और उसे लगातार चार दिन से अनाज का एक दाना भी नहीं मिल पाया था।

जून 2018 में झारखंड के चतरा में सावित्री देवी नामक महिला की मौत भुखमरी के कारण होने पर केंद्रीय खाद्य आपूर्ति व उपभोक्ता मंत्री रामविलास पासवान ने राज्य सरकार का अपराध करार दिया था

वहीं दूसरी तरफ चतरा जिले के इटखोरी बाजार में मीना मुसहरीन की मौत भी भूख से हो गई। मीना अपने परिवार के साथ इटखोरी थाना क्षेत्र में रहकर कचड़ा चुनने का काम करती थी। वह पिछले कई दिनों से बीमार थी।  दस दिनों से उसे खाना नहीं मिला था, जिससे उसकी मौत हो गई।

भूख के आंकडों के संबंध में बताते चलें कि भूख से हुई मौतों को हर सरकारें और उसका प्रशासन बीमारी से हुई मौत बताने का हर संभव प्रयास करता रहता है। प्राय: इस कोशिश में कुपोषण भी इनकी सूची में शामिल है। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि प्रशासन द्वारा कुपोषण को भी बीमारी की ही श्रेणी में रखा जाता है। तब सवाल उठता है कि कुपोषण का कारण भोजन की अनुपलब्धता है या कोई अन्य शारीरिक बीमारी?

इस सवाल पर प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं होता है, उल्टा समाज के कुछ दलाल तबकों के माध्यम से मामले को दबाने की कोशिश की जाती है। दूसरा सवाल यह है कि जब कई सामाजिक संगठन भूख से हुई मौतों पर सर्वे करते हैं तब हम कैसे ‘भूख से हुई मौत’ को झूठला सकते हैं। भूख के आंकडों पर जब हम चर्चा करते हैं तो सयुंक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कुपोषित लोगों की संख्या 19.07 करोड़ है। जो दुनिया के कुपोषित लोगों के आंकड़ों में सर्वाधिक है। आंकड़े बताते है कि देश में 15 से 49 वर्ष की 51.4 फीसदी महिलाओं में खून की कमी है। पांच वर्ष से कम उम्र के 38.4 फीसदी बच्चों की लंबाई उनकी आयु के हिसाब से कम है और 21 फीसदी का वजन अत्यधिक कम है।

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भोजन की कमी से हुई बीमारियों से सालाना तीन हजार बच्चे दम तोड़ देते हैं। 2016 के वैश्विक भूख सूचकांक में 118 देशों में भारत को 97वां स्थान मिला था, जो अब 100 वें स्थान पर है और इसे ‘गंभीर श्रेणी’ में रखा गया है।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन का आकलन है कि पिछले 15 वर्षों में पहली बार भूख का आंकड़ा बढ़ा है। साल 2015 में जहां दुनिया भर में 77.7 करोड़ लोग भूख के शिकार थे, वहीं 2016 में यह संख्या बढक़र 81.5 करोड़ पहुंच गई। इस साल के वैश्विक भूख सूचकांक पर निगाह डालें तो इसमें भारत तीन पायदान नीचे लुढक़ा है और हम उत्तर कोरिया से भी पिछड़ गए हैं। 

हालांकि पाकिस्तान को छोडक़र दक्षिण एशिया के तमाम देशों की स्थिति अच्छी है। सूचकांक में पाकिस्तान 106वें, चीन 29वें, नेपाल 72वें, म्यांमार 77वें, श्रीलंका 84वें और बांग्लादेश 88वें पायदान पर हैं। आज भारत में 21 फीसदी से अधिक बच्चे कुपोषित है। सबको पोषण उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता का राग आलापने के बावजूद भ्रष्टाचार, लालफीताशाही तथा अन्य वजहों से लोगों तक खाद्यान्न नहीं पहुंच पा रहा है। हाल ही में राजस्थान में गरीबों को सरकारी राशन की दुकानों से वितरित किए जाने वाले गेहूं को कालाबाजारी में बेच दिए जाने का बड़ा मामला प्रकाश मेंआया है। इस सिलसिले में खाद्य विभाग के कई अधिकारियों और कर्मचारियों को निलंबित किया गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 21 फीसदी से अधिक बच्चे कुपोषित हैं

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भुखमरी कुपोषण का चरम रूप है। शिशु मृत्युदर असामान्य होने का प्रमुख कारण भी कुपोषण ही है। भारत को भुखमरी और कुपोषण से निजात दिलाने के लिए यह आवश्यक है कि गरीब-अमीर के बीच की खाई को पाटा जाए और सबको जीने के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए।

वैसे तो केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक गरीबी से मुक्ति के लिए अलग-अलग कार्यक्रमों के बीच समन्वय बढ़ाने और उन्हें गति देने हेतु कार्य योजना बनाई है। प्रधानमंत्री कार्यालय की मानें तो वह चाहता है कि विभिन्न मंत्रालय चिन्हित योजनाओं के लिए समेकित रूप से काम करें। ग्रामीण विकास मंत्रालय गरीबी से मुक्ति के लिए कई योजनाओं को महत्वपूर्ण मानते हुए नए सिरे से अभियान चलाकर लक्ष्य तय करने की कवायद में लगा है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की मानें तो दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना के तहत वर्ष 2016-17 के दौरान एक लाख 62 हजार 586 लोगों को प्रशिक्षित किया गया है। करीब 84 हजार 900 लोगों को रोजगार मिला है, जाहिर तौर पर यह उंट के मुंह मे जीरा के बराबर है।

भूख से हुई मौत पर क्या कहते हैं डाक्टर?

रिम्स के मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डा. जे.के. मित्रा कहते हैं कि ‘भूख से होने वाली मौत का बाहर से कोई मेडिकली लक्षण नहीं दिखता है, सिवाय पोस्टमार्टम के।’ वे बताते हैं, ‘भूख से हुई मौत में मरीज के लीवर का वसा पूरी तरह गल जाता है। साथ ही पेट और अन्न स्टोरेज में अन्न के अंश नहीं होते।पोस्टमार्टम से भूख से होने वाली बीमारियों का पता नहीं चलता है। जैसे — खाना नहीं मिलने से विटामिन बी—12 की कमी होती है, जिससे हार्ट अटैक आ सकता है। यह पोस्टमार्टम में नहीं दिखेगा। टीबी के मरीज की मौत खाना न मिलने से कमजोरी की वजह से हो सकती है, लेकिन पोस्टमार्टम में मौत की वजह टीबी ही दिखेगी।’

भूख पर क्या कहता है स्वास्थ्य विज्ञान?

भुखमरी से प्रभवित व्यक्ति में चर्बी (वसा) की मात्रा और मांसपेशियों का भार काफी घट जाता है , क्योंकि शरीर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए इन ऊतकों का विघटन करने लगता है। जब शरीर अपने अत्यावश्यक अंगों जैसे तंत्रिका तंत्र और ह्रदय की मांसपेशियों (मायोकार्डियम) की क्रियाशीलता को बनाये रखने के लिए अपनी ही मांसपेशियों और अन्य ऊतकों का विघटन करने लगता है, इसे केटाबौलिसिस कहते हैं। भुखमरी से विटामिन की कमी एक सामान्य क्रिया है, जो प्रायः खून की कमी, बेरीबेरी, पेलेग्रा और स्कर्वी का रूप ले लेता है। संयुक्त रूप से ये बीमारियां डायरिया, त्वचा पर होने वाली अन्धौरी, शोफ़ और ह्रदय गति रुकने का कारण भी हो सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप इससे ग्रस्त व्यक्ति प्रायः चिड़चिड़ा और आलसी हो जाता है।

पेट की क्षीणता भूख के अनुभव को कम कर देती है, क्योंकि भूख का अनुभव पेट के उस हिस्से द्वारा नियंत्रित होता है जो कि खाली हो। भुखमरी के शिकार व्यक्ति इतने कमज़ोर हो जाते हैं कि उन्हें प्यास का अनुभव नहीं हो पाता और इसलिए निर्जलीकरण से ग्रस्त हो जाते हैं। मांसपेशियों के अपक्षय और शुष्क व फटी त्वचा, जो कि गंभीर निर्जलीकरण के कारण होती है, के परिणामस्वरूप सभी क्रियाएं पीड़ादायक हो जाती हैं। कमज़ोर शरीर के कारण बीमारियां होना साधारण है। उदाहरण के लिए, फंगस प्रायः भोजन नली के अन्दर विकसित होने लगता है, जिससे कि कुछ भी निगलना बहुत ही कष्टदायक हो जाता है।

भुखमरी से होने वाली ऊर्जा की स्वाभाविक कमी के कारण थकावट होती है और ऊर्जा की यह कमी लम्बे समय तक रहने पर पीड़ित व्यक्ति को उदासीन बना देती है। क्योंकि भुखमरी से पीड़ित व्यक्ति इतना कमज़ोर हो जाता है कि वह खाने और हिलने में भी असमर्थ हो जाता है और फिर अपने चारों और के वातावरण से उसका पारस्परिक सम्बन्ध भी कम होने लगता है। वह व्यक्ति रोगों से लड़ने में भी असमर्थ हो जाता है वहीं महिलाओं में मासिकधर्म भी अनियमित हो जाता है।

भुखमरी का प्रयोग मृत्युदंड के लिए

इतिहास के अनुसार मानव सभ्यता की शुरुआत से लेकर मध्य युग तक भुखमरी का प्रयोग मृत्युदंड के रूप में किया जाता था। दंडित लोगों को चार दीवारों के भीतर कैद कर दिया जाता था अत: वे भोजन के अभाव में मर जाते थे। प्राचीन ग्रीको-रोमन सभ्यता में, भुखमरी का प्रयोग कभी-कभी ऊंचे दर्जे के दोषी नागरिकों से छुटकारा पाने के लिए भी किया जाता था, खासतौर पर रोम के कुलीन वर्ग की महिलाओं के गलत आचरण के सम्बन्ध में। उदहारण के लिए, 33 ईसा पूर्व टिबेरियस की भांजी और बहू लिविला को सैजनुस के साथ व्यभिचार पूर्ण सम्बन्ध होने और अपने पति कनिष्ठ द्रुसास की हत्या में सहपराधिता के लिए गुप्त रूप से उसकी मां द्वारा भूख से तड़पा कर मार डाला गया था। टिबेरियास की एक अन्य बहु, जिसका नाम एग्रिपिना द एल्डर (ज्येष्ठ एग्रिपिना) था (अगस्तस की पोती और कैलिग्युला की मां) भी भुखमरी के कारण मर गयी थी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि उसने इस प्रकार भूख से मरने का निर्णय स्वयं लिया था।

एग्रिपिना के एक बेटे और बेटी को भी राजनीतिक कारणों के चलते भूख से मार डालने की सजा दी गयी थी; उसका दूसरा बेटा द्रुसास सीज़र, 33 ईसा पूर्व में कारागार में डाल दिया गया था और टिबेरियस की आज्ञा द्वारा उसे भूख से तड़पा कर मार डाला गया था (वह 9 दिनों तक अपने बिस्तर में भरे सामान को चबाकर जीवित रहा था); एग्रिपिना की सबसे छोटी बेटी, जूलिया लिविला, को अपने चाचा, सम्राट क्लौडियस, द्वारा 41 वें वर्ष में देशनिकाला देकर एक द्वीप पर छोड़ दिया गया था और इसके कुछ समय बाद ही सम्राज्ञी मेसलिना द्वारा उसे भूख से तड़पा कर मार डालने की व्यवस्था कर दी गयी थी। यह भी संभव है कि पवित्र कुंवारियों को ब्रह्मचर्य का संकल्प तोड़ने का दोषी पाए जाने पर भुखमरी की सजा दी जाती हो।

19वीं शताब्दी में युगोलिनो डेला घेरार्देस्का, उनके बेटे और परिवार के अन्य सदस्यों को मुदा में, जो कि पीसा का एक बुर्ज़ है, में बंद कर दिया गया था और उन्हें भूख से तड़पा कर मार डाला गया था। उनके समकालीन, डेन्टे, ने अपनी उत्कृष्ट कृति डिवाइन कॉमेडी में घेरार्देस्का के बारे में लिखा है कि 1317 में स्वीडेन में, स्वीडेन के राजा बिर्गर ने अपने दोनों भाईयों को एक घातक कार्य, जो उन्होंने कई वर्षों पहले किया था, के लिए कारावास में डलवा दिया था। कुछ सप्ताह बाद, वे भूख के कारण मर गए। 1671 में कॉर्नवल में, सेंट कोलम्ब मेजर के जॉन ट्रेहेंबेन को दो लड़कियों की हत्या के लिए कैसल ऍन दिनस में एक पिंजरे में भूख से मरने की सज़ा देकर दण्डित किया गया था।

एक पोलैंड वासी धार्मिक भिक्षु, मेक्सिमिलन कोल्बे, ने औशविज़ केंद्रीकरण शिविर में एक अन्य कैदी, जिसे मृत्यु की सजा दी गई थी, को बचाने के लिए अपनी मृत्यु का प्रस्ताव रखा। उसे अन्य 9 कैदियों के साथ भूख से तड़पा कर मार डाला गया। दो सप्ताह तक भूख से तड़पने के बाद, सिर्फ कोल्बे और दो अन्य कैदी जीवित रह गए थे और उने फिनॉल की सूई लगाकर प्राणदंड दिया गया।

उपर्युक्त प्रकरणों के जिक्र का मतलब यह है कि आज हम जब भूख से मरने वालों के सामाजिक स्तर के आंकड़ों पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं इन आंकड़ों में समाज का सबसे पिछड़ा वर्ग दलित व आदिवासियों की संख्या सबसे उपर है। तो क्या हम भूख से मरने वालों के लिए इसे परोक्ष रूप से मृत्यु दंड की सजा नहीं मान सकते?

(कॉपी एडिटर : नवल)

(आलेख परिवर्द्धित : 22 अक्टूबर 2018, 11:50 AM)


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