बसपा की कहानी मान्यवर कांशीराम की जुबानी

वर्ष 1989 में कांशीराम जी के भाषणों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यही वह वर्ष था जिसने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों को बदल दी। मंडल कमीशन की अनुशंसाएं लागू हुईं और फिर देश में दलित-बहुजनों के बीच एका भी नये स्वरूप में सामने आयी। नवल किशोर कुमार की समीक्षा :

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में शूद्रों को भी  मानवीय गरिमा के साथ जीने का हक है। सबसे पहले जोती राव फुले ने इस अधिकार पर दावा पेश  किया। उनके बाद बाबा साहेब डाॅ. भीम राव आंबेडकर ने शूद्रों के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता का संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित किया। लेकिन शूद्र इस देश पर राज कर सकते हैं, इसका अहसास मान्यवर कांशीराम ने कराया। यह उनके ही आंदोलन का ही परिणाम हुआ कि बहुजन समाज के प्रतिनिधि शासक बन सके। जाहिर तौर पर यह सब इतना आसान नहीं था। इसके लिए कांशीराम ने जमीनी स्तर पर कार्य किया। 1985 में उनके साथ जुड़े ए. आर. अकेला द्वारा संपादित किताब ‘मान्यवर कांशीराम साहब के ऐतिहासिक भाषण’ में उनके इस संघर्ष से आज की युवा पीढ़ी को रूबरू कराने की कोशिश है।

लेखक और संपादक ए. आर. अकेला अलीगढ़ के रहने वाले हैं और मान्यवर कांशीराम के ऐतिहासिक दस्तावेजों को संग्रहित किया है। अकेला जी द्वारा लिखित कई पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। इनमें ‘शंबूक ऋषि’, ‘भीम ज्ञान गीतांजलि’, ‘बुद्ध ज्ञान गीतांजलि’, ‘बसपा के बोल’, ‘मेरे मिशनरी गीत’,’अंगुलिमाल कातिल क्यों बना’, ‘युग प्रवर्तक आंबेडकर नाटक’, ‘बाबा साहेब ने कहा था’, ‘कांशीराम प्रेस के आइने में’, ‘कांशीराम साहब के साक्षात्कार’ शामिल हैं। कांशीराम जी के भाषणों को अकेला जी ने कई खंडों में तैयार किया है। अबतक इसके पांच खंड प्रकाशित हो चुके हैं। इसके नवीनतम खंड पांच में जनवरी 1989 से लेकर दिसंबर 1989 के बीच की अवधि में कांशीराम जी द्वारा दिये गये भाषणों का संग्रह है।

समीक्षित पुस्तक माननीय कांशीराम साहब के ऐतिहासिक भाषण (खंड 5) का कवर पृष्ठ

इस खंड के उनके भाषणों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यही वह वर्ष था जिसने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों को बदल दी। मंडल कमीशन की अनुशंसाएं लागू हुईं और फिर देश में दलित-बहुजनों के बीच एका भी नये स्वरूप में सामने आयी। कांशीराम स्वयं भी बहुजन समाज पार्टी को स्थापित करने के लिए दिन और रात एक कर  चुके थे। अपने भाषणों में वे बहुजन समाज के सामने उपस्थित चुनौतियों को प्रस्तुत करते थे और उसका जो समाधान भी बताते थे।

उदाहरण स्वरूप एक भाषण में कांशीराम जी ने कहा कि यदि बहुजन समाज एक दिन भूखे रह जाये, उससे भी देश पर अधिकार हासिल किया जा सकता है। उनके मुताबिक बहुजन समाज के 65 करोड़ लोग एक दिन एक समय  में पौने दो रुपए के मूल्य का खाना खाते हैं यानी एक समय में दो सौ करोड़ रुपए का खाना खाते हैं। पूरे देश में 542 सीटें हैं। एक सीट के लिए हमें 5 लाख रुपए की आवश्यकता है और इस प्रकार सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कुल 27 करोड़ रुपए की जरुरत है। कांशीराम बहुजनों को उनकी एकता की ताकत से परिचित कराना चाहते थे, जिसमें वे सफल भी हुए। इसे वर्तमान के सापेक्ष देखा जा सकता है।

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कांशीराम जी सामाजिक न्याय के पक्षधर तो थे ही लेकिन वे इसके एक दूसरे पहलु को भी उतना ही महत्व देते थे। उन्होंने आर्थिक न्याय के लिए आर्थिक मुक्ति आंदोलन चलाया। इसके तहत दो अभियान यथा भारतीय किसान मजदूर आंदोलन औjर भारतीय शरणार्थी आंदोलन शुरू किये गये। कांशीराम  पांच तरह के किसानों बात कहते थे। इनमें पहला बगैर जमीन के किसान, दूसरा एक या दो एकड़ जमीन वाले किसान, तीसरे पांच या दस एकड़ जमीन वाले किसान, चौथे वे जो 50 या 100 एकड़ जमीन वाले किसान जो खुद या दूसरों से खेती करवाते हैं और पांचवें वे जिनके पास हजारों एकड़ जमीन है लेकिन वे खुद खेती नहीं करते हैं। कांशीराम भूमि को उत्पादन का संसाधन मानते थे और इस पर बहुजनों का अधिकार सुनिश्चित करना चाहते थे। वामपंथियों के भूमि सुधार की राजनीति से इतर बहुजनों के लिए आजीविका के स्रोत का समुचित वितरण हो, इसके लिए व्यापक अभियान चलाया। वहीं शहरी इलाकों में रहने वाले गरीबों को उनका अधिकार दिलाने के लिए कांशीराम ने आंदोलन चलाया। वे पलायन करने वाले मजदूरों को शरणार्थी मानते थे। 1989 में जब जनता दल नीत सरकार राज कर रही थी और दिल्ली में गरीब-गुरबों की झोपड़ियां उजाड़ी जा रही थी, तब कांशीराम भारतीय शरणार्थी आंदोलन चलाया।

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बहरहाल 1989 का वर्ष भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित तो हुआ ही बहुजन समाज पार्टी के लिए भी उतना ही खास रहा। दरअसल यह एक चुनावी वर्ष था। लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए। बसपा को 13 सीटें विधानसभा में और तीन सांसद चुने गये। बसपा के कारण कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी। इस चुनाव में कांशीराम अमेठी सीट से राजीव गांधी के खिलाफ और पूर्वी दिल्ली से के. एल. भगत के खिलाफ चुनाव लड़े। उन्हें दोनों जगहों से हार मिली। इसके बावजूद उनका राजनीतिक अभियान जारी रहा। बाद में बहुजन समाज पार्टी का राजनीतिक ग्राफ बढ़ा और स्वयं कांशीराम भी सांसद चुने गए। समीक्षित किताब बहुजन समाज पार्टी के बढ़ते राजनीतिक विस्तार की प्रक्रिया से वाकिफ कराती है।

(कॉपी एडिटर : सिद्धार्थ)

 

किताब : माननीय कांशीराम साहब के ऐतिहासिक भाषण(खंड – 5)

प्रकाशक : आनंद साहित्य सदन

संपादक : ए. आर. अकेला

कीमत : 125 रुपए

पुस्तक मंगाने का पता : सिद्धार्थ मार्ग, छावनी, अलीगढ़ – 202001 (उत्तर प्रदेश)

मोबाइल : 9319294963, 7300600465


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