डीयू में ओबीसी, दलित, आदिवासी शिक्षक इतने कम क्यों? संसदीय समिति ने पिलायी डांट

दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के 271 पदों पर एससी के तीन शिक्षक हैं। एसटी का एक भी प्रतिनिधित्व नहीं है। संसदीय समिति ने आरक्षण नीति की अवहेलना के लिए डीयू की कड़ी आलोचना की है। बता रहे हैं कमल चंद्रवंशी :

आज से तीन साल पहले ये चौंकाने वाली जानकारी आई थी कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में देशभर में 58 फीसदी एससी, एसटी और ओबीसी के पद रिक्त पड़े हैं। यहां तक कि दिल्ली विश्वविद्यालय में भी आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व निर्धारित संख्या से बहुत कम है। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक खबर के अनुसार उच्च शिक्षा के लिए गठित संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय को डांट पिलायी है। हालांकि इस मामले में संसदीय समिति के अध्यक्ष सत्यनारायण जटिया ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में विस्तृत जानकारी देने से इंकार किया है। उन्होंने बताया कि समिति की रिपोर्ट लोकसभा को सौंप दी गयी है। लेकिन अभी इसे सदन के पटल पर नहीं रखी गयी है। वहीं इसी मामले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति ने भी सवाल खड़ा किया है।

सत्यनारायण जटिया, अध्यक्ष, उच्च शिक्षा के लिए संसदीय समिति

टाइम्स ऑफ इंडिया में  प्रकाशित खबर के अनुसार संसदीय समिति ने कहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन आरक्षण नीति को लागू करने में नाकाम रहा है। इस समिति ने पाया कि विश्वविद्यालय ने पिछले दो दशक से एससी और एसटी शिक्षकों को नियमानुसार से प्रतिनिधित्व नहीं दिया और योग्य उम्मीदवारों के बावजूद ऐसी मनमानी की।

विश्वविद्यालयों में आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधित्व को लेकर ही लोकसभा की अनुसूचित जनजाति और जनजाति कल्याण समिति ने अपनी 22वीं रिपोर्ट पेश की है। इस समिति ने भी पाया कि पर्याप्त संख्या में योग्य उम्मीदवारों के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन आरक्षित सीटों पर एससी-एसटी को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने में नाकाम रहा है। समिति ने विश्वविद्यालय के ढुलमुल रैवेये की कड़ी आलोचना की है। समिति का कहना है कि विश्वविद्यालय हमेशा बहाना बनाता है कि योग्य उम्मीदवारों के अभाव में ऐसा हो रहा है। लेकिन समिति का कहना है कि ये विश्वविद्यालय का यह महज रटा-रटाया जवाब है और इसका सच्चाई से कोई लेनादेना नहीं है। समिति ने कहा है कि प्रतिभाशाली और योग्य एससी, एसटी उम्मीदवारों की कोई कमी नहीं है। खासकर दिल्ली में यूजीसी-नेट पास लोगों की किसी तरह की कमी नहीं है।

दिल्ली विश्वविद्यालय का परिसर

समिति का कहना है कि 2015 में प्रोफेसरों के कुल स्वीकृत 264 पदों में से विश्वविद्यालय के पास कालेजों में सिर्फ तीन प्रोफेसर ही हैं। और एसटी के मामले में तो इस स्तर पर एक भी प्रतिनिधित्व नहीं है। एसोसिएट प्रोफेसर के 271 पदों पर एससी से 7 शिक्षक हैं और एसटी से महज एक शिक्षक है। समिति ने कहा है कि असिसटेंट प्रोफेसरों के मामले में 2 दशक से शिक्षक पदों आरक्षण श्रेणी से हैं लेकिन हालत ये है 421 पदों में एससी के 10 असिसटेंट प्रोफेसर कम हैं जब कि 8 एसटी में पद खाली है। नियमानुसार कुल पदों में से 15 फीसद पद एससी और 7.5 फीसद पद एसटी उम्मीदवारों से भरे जाने चाहिए थे।

सक्रियता कैसे आई?

दरअसल देखा जाए तो सरकार और विश्वविद्यालयों की मनमानी की पूरी कहानी 2015 में सामने आई। जब पता चला कि 39 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षक पद के लिए 58 फीसदी एससी-एसटी, ओबीसी के आरक्षित पद खाली हैं। इन वर्गों के लिए स्वीकृत 4763 पद में से सिर्फ 1977 पदों पर असिस्टेंट प्रोफेसर, एसो. प्रोफेसर, प्रोफेसर की नियुक्तियां हुई हैं।

इसके अलावा असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए बीएचयू और एचएनबी गढ़वाल ने स्वीकृत पदों से ज्यादा नियुक्तियां सामान्य वर्ग में कर ली थी। 2015 में एक आरटीआई के माध्यम से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से केंद्रीय विश्विद्यालय में एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के शिक्षकों का ब्यौरा मांगा गया था था। उस समय बीएचयू में स्वीकृत पद से ज्यादा असिस्टेंट प्रोफेसर रखे गए थे। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुल 6107 असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर के पद खाली थी। इनमें 1135 एससी, 610 एसटी और 1041 ओबीसी कोटे की आरक्षित पद शामिल थे। जबकि शिक्षकों के कुल स्वीकृत पद 16339 हैं।

दिल्ली के ताजा आंकड़े को शामिल कर लें तो भी स्थिति 2015 से खराब है। प्रोफेसर पद के लिए एससी कोटे के लिए स्वीकृत 276 पदों में सिर्फ 38 पद और एसटी कोटे के लिए स्वीकृत 124 में से सिर्फ 11 पद पर नियुक्तियां हुई थीं। जबकि शारीरिक विकलांग कोटे से 232 पद खाली हैं। इस संबंध में यूजीसी ने कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन को नोटिफिकेशन जारी किया था, जिसमें यूजीसी ने कहा है कि आरक्षित पदों को भरने की पूरी जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन की है।

 

(कॉपी एडिटर : नवल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार 

About The Author

Reply