गणित शिक्षक के किस प्रमेय से घायल हुआ दैनिक जागरण का पटना संस्करण?

बिहार की राजधानी पटना के कुम्हरार की संकरी गली में संचालित ‘सुपर 30’ को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है। गरीब युवाओं को आईआईटी में प्रवेश दिलाने वाले इस संस्थान के संस्थापक आनंद इन दिनों जागरण समूह के दो अखबारों के पटना संस्करण के निशाने पर हैं। उन पर निशाने की वजह क्या केवल व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता है? या फिर इसकी कोई सामाजिक वजह है? बता रहे हैं नवल किशोर कुमार :

पिछले एक सप्ताह से जागरण समूह के समाचार-पत्र सुपर थर्टी के नाम से कोचिंग चलाने वाले बिहार के चर्चित गणित शिक्षक आनंद के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। समूह द्वारा युवाओं के लिए प्रकाशित दैनिक ‘आईनेक्सट’ पिछले एक सप्ताह से ‘एक्सपोज आनंद’ नाम से विशेष पृष्ठ प्रकाशित कर रहा है तथा दैनिक जागरण आनंद से जुड़ी नकारात्मक खबरों को लगतार  मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित कर रहा है। प्रभात खबर, राष्ट्रीय सहारा और दैनिक हिंदुस्तान ने इस संबंध में मौन साध रखा है।

पटना के कुम्हार में अपने संस्थान में युवाओं को कोचिंग देते सुपर 30 के संस्थापक आनंद

अति-पिछडी जाति से आने वाले आनंद गरीब बच्चों को आईआईटी में प्रवेश दिलाने के लिए मशहूर रहे हैं। विश्व की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित आनंद दुनिया भर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रकाओं द्वारा अपने काम के लिए सराहे जाते रहे हैं। ऐसे में यह जानना रोचक होगा कि इससे संबंधित पूरा मामला क्या है तथा वह कौन सा तीर है, जो जागरण समूह मे पटना संस्करण के कर्मियों के दिल पर लग गया है?

पहले अभयानंद ने बोला हमला, फिर टूट पड़े अखबार

सुपर 30 के संस्थापक आनंद पर इस बार सबसे पहले बिहार के पूर्व डीजीपी रहे अभयानंद ने हमला बोला। एक सप्ताह पहले उन्होंने कोतवाली थाना में सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट के खिलाफ मामला दर्ज कराया। पोस्ट में यह बताया गया था कि किस प्रकार अभयानंद अपने रसूख का इस्तेमाल कर सुपर 30 के तर्ज पर रहमानी 30 संस्थान चला रहे हैं और इसकी आड़ में अकूत संपत्ति अर्जित कर रहे हैं। अभयानंद द्वारा मामला दर्ज कराये जाने के बाद पटना पुलिस ने एक्शन लिया। तफ्तीश के दौरान एक व्यक्ति का नाम सामने आया और वह कोई और नहीं बल्कि आनंद का एक कर्मचारी था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और कोतवाली थाना के हाजत में बंद कर दिया।

बाबा साहेब द्वारा लिखित ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ का हिंदी अनुवाद ‘जाति का विनाश’ बिक्री के लिए अमेजन पर उपलब्ध

इस बात की जानकारी आनंद को मिली तब वे कोतवाली थाना पहुंचे। उन्होंने अपने कर्मचारी को गिरफ्तार किये जाने का विरोध किया और पुलिस पर उसे छोड़ने का दबाव बनाया। इस क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि यदि पुलिस के पास पक्के सबूत हैं तो वह उनके कर्मचारी के बदले उन्हें गिरफ्तार करे।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से सम्मान प्राप्त करते आनंद

दूसरे दिन इस खबर को स्थानीय अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित किया। आनंद के खिलाफ अभियान की शुरूआत पटना से प्रकाशित आई नेक्सट नामक अखबार ने शुरु किया। ‘एक्सपोज आनंद’ के नाम से सीरीज के पहले दिन से ही यह बताने की कोशिश की गयी कि आनंद सुपर 30 के नाम पर एक तरफ तो अकूत संपत्ति अर्जित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ गरीब बच्चों को आईआईटी में निशुल्क कोचिंग देने के नाम पर विश्व स्तर पर प्रशंसा बटोर रहे हैं। अखबार ने एक के बाद एक कई खुलासे किए। एक खुलासे में तो अखबार ने यह भी लिखा कि आनंद और उनके परिजनों ने पिछले एक दशक में करोड़ों रुपए की संपत्ति अर्जित की है। जबकि आये दिन विभिन्न साक्षात्कारों में खुद को गरीब बताते हैं। अखबार के मुताबिक अानंद की मां के पास 22 भूखंड हैं जिनकी कीमत करोड़ों में है। उनकी पत्नी, भाई, बहन और बहनोई की संपत्ति खंगाली गयी।

एक कार्यक्रम में आनंद को सम्मानित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

आनंद के प्रमेय से चित्त हुए विरोधी

अपने गर्दिश के दिनों में आनंद का परिवार पापड़ बेचता था। मार्केटिंग के कायदे आनंद बचपन में ही समझ गये थे। एक शिक्षक के रूप में उनकी मार्केटिंग का ही परिणाम रहा कि आज वे पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। आनंद के पत्रकार मित्रअंजनी तिवारी यह मानते हैं कि पिता की मृत्यु के बाद आनंद ने जब अपने घर की जिम्मेवारी संभाली तब उनके पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह कोचिंग खोल सकें। मां ने कर्ज लेकर कुछ पैसे हाथ में रखे तब रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमैटिक्स की नींव पड़ी।

आनंद ने शुरू से ही अपनी आक्रामक मार्केटिंग की रणनीति अपनायी। छात्रों के साथ स्वयं भी खूब मेहनत करते और शिक्षण की नयी तकनीकों का इस्तेमाल किया। मेहनत रंग लायी। बाद में उनकी मेहनत जब रंग लायी तब आनंद ने इसका विस्तार करना चाहते थे। रास्ते में पैसा और सुरक्षा दोनों आवश्यक था। इसमें अभयानंद ने उनका साथ दिया। आनंद को एक साथ दोनों चीजें मिल गयी। सामाजिक स्वीकृति भी इसीमें शामिल है। गौर तलब है कि आनंद ने उन दिनों अपना उद्यम शुरू किया था जब बिहार में अखबार जंगलराज की दुहाई दे रहे थे। उपर से अति पिछड़ा वर्ग का एक युवा पटना के द्विज मठाधीशों को चुनौती दे रहा था।

प्रारंभिक दिनों में युवाओं को पढ़ाते आनंद

आनंद के करीबी यह मानते हैं कि यदि आनंद की जातिगत पृष्ठभूमि कुछ और होती तो उन्हें वह सब नहीं झेलना पड़ता जो उन्हें पूर्व में भी झेलना पड़ा था और आज भी झेलना पड़ा रहा है। अभयानंद ने श्रेय और संपत्ति में हिस्सेदारी को लेकर दबाव बनाया तब आनंद ने बड़ा दांव खेला। उन्होंने एक झटके में अभयानंद को अपने उद्यम से अलग कर दिया। अभयानंद की ओर से भी तब कई हमले हुए थे। लेकिन आनंद की परवान चढ़ती लोकप्रियता और अभयानंद की अपनी व्यस्तता ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।

जानकार बताते हैं कि अभयानंद ही वह शख्स थे जिन्होंने सुपर 30 का कांसेप्ट आनंद को दिया। जब वे स्वयं बिहार के डीजीपी पद से सेवानिवृत्त हुए तब राज्य सरकार से सेवानिवृत्ति के उपरांत मिलने वाले मलाईदार पद का परित्याग कर उन्होंने सुपर 30 के मुकाबले रहमानी 30 की शुरूआत की। उनका उद्यम भी चल निकला। इसमें सेक्यूलर एप्रोच की मार्केटिंग शामिल थी। आनंद को गलत और खुद को सही साबित करने के लिए अभयानंद ने पहली बार 2013 में मीडिया के सामने अपने संभावित छात्रों की सूची जारी कर दी जिसकी सफलता की गारंटी उन्होंने दी थी। अखबार के लोगों ने आनंद पर भी दबाव बनाया कि वह भी अभयानंद की तरह अपने छात्रों की सूची पहले जारी करें।

अर्थशास्त्री सह पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ आनंद

लेकिन आनंद ने ऐसा नहीं किया। आनंद पूर्व के जैसे आईआईटी प्रवेश परीक्षा का परिणाम आने के बाद ही सफल छात्रों की सूची सार्वजनिक की। इसे लेकर आनंद की आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया। परंतु इसी बीच आनंद ने बढ़ते राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल किये बगैर अपने उद्यम का विस्तार किया। जबकि अभयानंद तमाम कोशिशों के बावजूद सुपर 30 की चमक को कम करने में नाकाम रहे।

अभयानंद ने किया था कन्यादान

आनंद के करीबी मित्र और पत्रकार अंजनी तिवारी के अनुसार 1996 में आनंद ने प्रेम विवाह किया था। उनकी शादी में अभयानंद की अहम भूमिका थी। उस समय अभयानंद ने आनंद को सुपर 30 स्थापित करने में सहायता की थी। इसके पहले आनंद रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमैटिक्स नामक कोचिंग चलाते थे। आनंद ने अपनी ही कोचिंग की एक छात्रा से प्रेम विवाह किया जो भूमिहार जाति से थी। आनंद के इस प्रेम पर उस समय भी पटना के अखबारों में खूब हल्ला मचा था। अंजनी तिवारी बताते हैं कि उन दिनों पूरे बिहार के भूमिहार समाज के लोग आनंद को परिवार सहित जाने से मारने की धमकी देते थे। उनके गुस्से की वजह यह थी कि आनंद कहार (चंद्रवंशी) जाति से आते हैं जो कि बिहार में अति पिछड़ा वर्ग में शामिल है। लेकिन उस समय अभयानंद ने आनंद को संरक्षण प्रदान किया। यहां तक कि विवाह के समय उन्होंने कन्यादान भी किया।

पहले मैथ में थे फिसड्डी बाद में अमेरिकी जर्नल में छपा शोध पत्र

अंजनी तिवारी बताते हैं कि आनंद के साथ उनकी मित्रता इंटर से है। तब वे दोनों पटना के बी एन कॉलेज के छात्र थे। उन दिनों बी एन कॉलेज सहित पटना विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों में डिग्री के अलावा इंटरमीडियट की पढ़ाई भी होती थी। आनंद तब गणित में फिसड‍्डी रहते थे। इसे लेकर हम छात्र उनका मजाक भी उड़ाते थे। इसी बात को उन्होंने दिल पर ले लिया और गणित की पढ़ाई में जुट गये। वह 1991 का साल था जब अमेरिकी जर्नल मैथेमैटिकल स्पेक्ट्रम में उनका एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ। अपने शोध में आनंद ने एक प्रमेय का हल तो खोजा ही था, पूरी थ्योरी को बदल दिया।

आनंद के इस शोध पत्र को विश्व भर के गणितज्ञों ने सराहा। लेकिन पटना के अखबारों ने कोई तवज्जो नहीं दी। उनकी नींद तब खुली जब दिल्ली से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार द हिन्दू ने खबर प्रकाशित की। फिर तो पटना के अखबारों में भी उनके बारे में खबरें प्रकाशित होने लगी। आनंद शोध की दिशा में आगे बढ़ना चाहते थे। लेकिन इसी बीच उनके पिता की मृत्यु हो गयी।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ आनंद अपने उपर लिखित एक किताब का विमोचन

अंजनी के मुताबिक आनंद गरीब परिवार के थे। अर्थाभाव में उनकी मां पापड़ औरआचार आदि बनाती थीं। पिता के निधन के बाद आनंद पर पूरे परिवार की जवाबदेही आ गयी। उन्होंने पटना के कुम्हार में एक छोटे से कमरे में रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमैटिक्स नामक कोचिंग की शुरूआत की। पहले वह मैट्रिक और इंटर के छात्रों को पढ़ाते थे। इसके समानांतर वह शोध की दिशा में भी सक्रिय थे। 1993 में उनका एक और शोध प्रकाशित हुआ। इस शोध ने उन्हें गणितज्ञ के रूप में स्थापित कर दिया।

अभयानंद ने तब आनंद को अपना समर्थन दिया और उनसे मिले प्रोत्साहन के बाद आनंद ने सुपर 30 स्थापित किया। इसके जरिए आनंद ने 30 बच्चों को निशुल्क कोचिंग देकर आईआईटी में प्रवेश हेतु होने वाली परीक्षा के लिए तैयार किया। यह 1995 में हुआ। उनकी योजना सफल हुई। सभी तीस युवाओं ने सफलता के झंडे गाड़ दिया। इससे उनका हौसला बढ़ा। फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा।

अपने मित्र व पत्रकार अंजनी तिवारी के साथ आनंद

अभयानंद के बाद नीतीश से मिली आनंद को सुरक्षा

बहरहाल अभयानंद के अलग होने के बाद भी आनंद सुपर 30 का संचालन करते रहे। यह वह समय था जब नीतीश कुमार बिहार में अति पिछड़ा वर्ग और महादलित की राजनीति कर रहे थे। उनके संरक्षण के कारण अभयानंद चाहकर भी आनंद की राह में मुश्किलें पैदा नहीं कर सके। नीतीश कुमार ने आनंद को सरकारी स्तर पर सुरक्षाकर्मी उपलब्ध करा दिया। साथ ही उनका उपयोग अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को लुभाने के लिए भी किया। आनंद से जुड़े एक करीबी ने बताया कि नीतीश कुमार उन्हें विधान परिषद में जगह देना चाहते थे लेकिन आनंद ने राज्यसभा की डिमांड रखी थी। बदलते समय के साथ आनंद ने राजनीति में हाथ आजमाना तो चाहते थे लेकिन वे सुपर 30 की कीमत पर कुछ भी नहीं चाहते थे। भाजपा भी आनंद को लेकर उत्साहित थी। परंतु आनंद ने उसे भी कोई भाव नहीं दिया। वहीं राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी उनकी प्रतिभा, सामाजिक पृष्ठभूमि और जमीन से जुड़ाव होने के कारण पुत्रवत स्नेह करते रहे हैं।

जाति द्वेष के कारण अखबार कर रहे आनंद पर हमला

लाेकतांत्रिक जनाधिकार पार्टी के युवा नेता श्याम सुन्दर कहते हैं कि पटना के अखबारों में ऊंची जाति के लोगों का वर्चस्व है। यदि आनंद की पृष्ठभूमि अति पिछड़ा वर्ग के बजाय ऊंची जाति की होती तो अखबारों का रूख अलग होता। श्याम सुन्दर के मुताबिक आज अखबार आनंद पर फर्जीवाड़ा करने का आरोप तब लगा रहा है जब आनंद और अभयानंद के बीच संपत्ति और श्रेय में हिस्सेदारी का झगड़ा सार्वजनिक हो गया है। यदि अानंद गलत हैं तो उनकी गलती में अभयानंद की भी बराबर की हिस्सेदारी है।

श्याम सुन्दर की टिप्प्णी को इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए कि वर्ष 2016 में सबाल्टर्न पत्रिका द्वारा कराये गये सर्वोक्षण के मुताबिक पटना के 7 हिंदी अखबारों में काम करने वाले तकरीबन 297 पत्रकारों में 237 सवर्ण जाति समूह के हैं, 41 पिछड़ी जाति के, 7 अति पिछड़ी जाति के और 1 पत्रकार दलित जाति के हैं। बिहार के इन हिंदी अखबारों में सवर्ण जाति समूह 80 प्रतिशत हैं; पिछड़ा 13 प्रतिशत, अति पिछड़ा 3 प्रतिशत और अज्ञात 4 प्रतिशत हैं। मीडिया में सर्वाधिक संख्या ब्राह्मण पत्रकारों की है। कुल 297 पत्रकारों में अकेले ब्राह्मणों की संख्या 105 है (35 प्रतिशत)। इसमें कायस्थ, राजपूत और भूमिहार जाति के पत्रकारों की संख्या जोड़ दी जाए तो सब मिलाकर यह 80 प्रतिशत हो जाता है। दूसरे नंबर पर राजपूत जाति के पत्रकार आते हैं जिनकी संख्या 46 है जो पूरी संख्या के 16 प्रतिशत हैं। इन 7 अखबारों में कायस्थ जाति समूह के 45 पत्रकार (15 प्रतिशत) हैं। दैनिक जागरण पहले नंबर पर है जहां सवर्ण समूह के 90 प्रतिशत पत्रकार कार्यरत हैं। इसमें पिछड़े-अति पिछड़े समूह के क्रमशः 6 और 2 प्रतिशत पत्रकार हैं। सवर्ण प्रभुत्व के लिहाज से दैनिक भास्कर दूसरे नंबर (87 प्रतिशत ) पर, ‘आज’ तीसरे नंबर पर (79 प्रतिशत), हिन्दुस्तान चौथे नंबर पर (77 प्रतिशत), प्रभात खबर पांचवें नंबर पर (70 प्रतिशत) और राष्ट्रीय सहारा छठे नंबर पर (69 प्रतिशत) है।

(कॉपी एडिटर : प्रमोद)

(आलेख 23 जुलाई 2018 अपराह्न 2:11 बजे परिवर्द्धित)


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