गांव-जवार से लेकर नदियों के जीने-मरने की कविताएँ

युवा कवि राकेश कबीर की कवितायें उनके जीवनानुभवों की ही कलात्मक अभिव्यक्ति हैं। वे नवउदारवादी दौर में गढ़े जा रहे कृत्रिम समाज को प्रश्नांकित करते हैं, मनुष्य को मशीन में तब्दील करने की कोशिशों का प्रतिवाद करते हैं और मनुष्यता को बचाने का गुहार करते एक कवि के रूप में सामने आते हैं। नवल किशोर कुमार की समीक्षा :

मैं मूल रूप से साहित्य का आदमी नहीं हूं। कवितायें और कहानियों से अधिक जीवन का यथार्थ अधिक आकर्षित करता है। इसकी वजह शायद यह कि मैं खबर का आदमी हूं। खबरें मेरे जीवन का हिस्सा हैं और हर खबर में एक खास बात होती है। मैं इसे खबर का बॉटम लाइन कहता हूं। यानी मेरे लिए वह खबर महत्वपूर्ण है जिसका बॉटम लाइन मानवीय सरोकार से जुड़ा होता है। कविताओं को भी मैं खबर के लिहाज से ही पढ़ता हूं। मसलन सबसे पहले अंतिम कविता और सबसे अंत में पहली कविता।

समीक्षित पुस्तक ‘नदियां बहती रहेंगी’ का कवर पृष्ठ

किसी कविता संकलन को पढ़ने का यह तरीका कवि हृदय को समझने का मौका देता है। राकेश कबीर की कविता संकलन ‘नदियां बहती रहेंगी’ असल में कविताओं से अधिक जीवन का यथार्थ है। एकदम खबर के जैसे। हर कविता खबर के माफिक जानकारी देती है। एक नौकरशाह होने के बावजूद उनके भीतर एक आम आदमी है जो उनके या उनके जैसे किसी अन्य बाबू के दफ्तर के बाहर अपनी जरुरतों के लिए पंक्ति में खड़ा है। उनकी अंतिम कविता ‘अमीरी’ की दो पंक्तियां हैं – ‘आंकड़ों की बाजीगरी से बेहतर होती है/ सामने खड़े इंसान की संवेदना’। इसी कविता में वह लिखते हैं – ‘और मैं मजबूर हूं कि मेरी संवेदना/ कुछ नहीं है आंकड़ों के सामने’।

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उत्तर प्रदेश के सीतापुर जनपद में नगर दंडाधिकारी के पद पर कार्यरत एक युवा के मन में एक विद्रोही है। अपनी किताब की भूमिका में ही वे कहते हैं कि कविता मेरे लिए अनवरत आत्मसंघर्ष है। इसी में वह देश में गौ रक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की तीखी आलोचना भी करते हैं और साथ ही भारत के कृषक समाज के लिए मवेशियों के उनके रिश्ते की व्याख्या भी करते हैं। जाहिर तौर पर सरकारी नौकरी में रहते हुए ऐसा करना मजबूत जिगर की निशानी तो है ही।

उनकी कविताओं में गांव-जवार तो है ही लेकिन वह एकांगी नहीं है। गांव, नदी और पहाड़ों की खूबसूरती के अलावा सूखे पड़े खेत, प्यासे लोग और भूख से तड़पते गांव भी है। वह ‘विकास’ पर अपनी कविता के जरिए प्रहार भी करते हैं। अपनी कविता में वे लिखते हैं – ‘विकास तुम मत आना/तुम आओगे तो बंजर हो जाएगी/हमारे पुरखों की हरी-भरी धरती/तुम आओगे तो वीरान हो जाएंगे/हमारे पहरेदार हरे-भरे जंग।”  

राकेश कबीर

राकेश कबीर अपनी कविताओं में नदियों की चर्चा करते हैं। उनकी नदियां नवजात की तरह कभी मासूम तो कभी कब्र में पांव डाल मौत का इंतजार करती दिखाई देती हैं। वहीं कुछ कविताओं में नदी सदैव बहती रहने को प्रतिबद्ध दिखती है। ‘नदियां बहती रहेंगी’ कविता में वह लिखते हैं – धरती के सीने में/तूफान भी उठेंगे/उसके पत्थर से कठोर / दिल पिघलेंगे भी/और शीतल पानी भी निकलेगा/नदियां अपने रास्ते जाएंगी भी/उनका रास्ता कौन रोकेगा‍!”

बहरहाल राकेश कबीर का युवा मन सकारात्मकता को प्राथमिकता देता है। उनकी कविताओं में प्रतिरोध का जज्बा है तो रोज बदलती दुनिया के लहूलूहान पांवों के निशान देखने पर मन में उठने वाली टीस भी है। यह कविता संकलन उन सभी के लिए उपयोगी है जो कविताओं को महज चंद शब्दों के तानेबाने से अधिक एक मुकम्मिल अहसास मानते हैं। वहीं अहसास जो मनुष्य को स्वयं से नहीं बल्कि मानवता से जोड़ता है।

किताब : नदियां बहती रहेंगी

कवि : राकेश कबीर

प्रकाशक : गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट एवं अगोरा प्रकाशन

मूल्य : 225 रुपए सजिल्द, 105 रुपए अजिल्द

पुस्तक मंगाने का पता : अगोरा प्रकाशन, ग्राम – अहिरान, पोस्ट – चमांव, शिवपुर,

जिला वाराणसी – 221003 (उत्तर प्रदेश)


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