फॉरवर्ड प्रेस

क्या दलित शब्द बोलने-लिखने पर पाबंदी लगेगी?

देश में ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है, दलित शब्द जिनकी पहचान से जुड़ा हुआ है। वे अपने इतिहास, परंपरा, संघर्ष, साहित्य और अस्मिता को दलित शब्द के साथ समाहित करके चलते हैं। हाल के कुछ वर्षों में दलित उभार के तमाम आंदोलन और प्रतिरोध देखने को मिले हैं। लेकिन, क्या अब इस शब्द के लिखने-बोलने पर पाबंदी लगने वाली है? जून महीने की छह तारीख को बाम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) को कहा है कि मीडिया में इस्तेमाल किए जाने वाले दलित शब्द को वे छह सप्ताह के भीतर बंद कर दें। माना जा रहा है कि अदालत के आदेश के बाद पीसीआई मीडिया के लिए इसके निर्देश जारी करने जा रहा है।

महाराष्ट्र के अमरावती जिले के भीम शक्ति संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता पंकज मेश्राम ने दो साल पहले बाम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में दलित शब्द के इस्तेमाल के खिलाफ याचिका दायर की थी। अपनी अपील में उन्होंने कहा कि दलित शब्द असंवैधानिक और आपत्तिजनक है। इसके प्रयोग से नागरिकों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। मेश्राम के वकील एसआर नानावारे ने अदालत को केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा 15 मार्च को जारी परिपत्र का भी हवाला दिया जिसमें केन्द्र और राज्य सरकारों को दलित शब्द का इस्तेमाल करने से बचने और उसकी जगह पर अनुसूचित जाति से जुड़ा व्यक्ति शब्द इस्तेमाल करने की सलाह दी गई थी।

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956)

याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बी.पी. धर्माधिकारी और जस्टिस जेडए हक की खंडपीठ ने कहा कि चूंकि केन्द्र सरकार ने इस संबंध में अधिकारियों को जरूरी निर्देश जारी किया है, इसलिए हम पाते हैं कि वह कानून के अनुसार प्रेस काउंसिल और मीडिया को उस शब्द का इस्तेमाल करने से बचने के लिए उपयुक्त निर्देश जारी कर सकती है। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया मीडिया के लिए एक तरह के नैतिक नियंत्रणकारी संस्था का दायित्व निभाती है। इसके निर्देश हालांकि बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन माना जाता है कि अलग-अलग मीडिया संस्थानों द्वारा उनका पालन किया जाएगा।

इससे पूर्व मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भी इसी तरह का एक निर्देश जारी कर चुका है। वर्ष 2018 के शुरुआत में ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा था कि केन्द्र और राज्य सरकारों को पत्राचार में दलित शब्द के इस्तेमाल से बचना चाहिए क्योंकि यह शब्द संविधान में नहीं है। बाम्बे हाईकोर्ट के ताजा निर्देशों के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब दलित शब्द को लिखने-बोलने पर पाबंदी लगने जा रही है।

बाम्बे हाईकोर्ट में इसकी याचिका डालने वाले पंकज मेश्राम का कहना है कि वे अपने समुदाय के सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जिस समुदाय के पास संघर्ष करने का इतना समृद्ध इतिहास है, उसके लिए ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया जाना उचित नहीं है। उनका मानना है कि दलित शब्द का इस्तेमाल केवल वोटबैंक की राजनीति के लिए ही किया जाता है।

दलित शब्द की उत्पत्ति और इस्तेमाल को लेकर निश्चित होकर कुछ भी कह पाना मुश्किल है। माना जाता है कि 1930 के दशक से इस शब्द का इस्तेमाल करना शुरू किया गया। हालांकि, इस शब्द को पूरी तरह से स्थापना तब मिली जब 1970 के दशक में अमेरिका के ब्लैक पैंथर जैसी संस्था की तर्ज पर ही भारत में दलित पैथर का गठन हुआ और इसमें कई सारे उग्रपरिवर्तनवादी युवा शामिल हुए।

दलित पैंथर की स्थापना करने वालों में शामिल रहे नामदेव ढसाल ने 1973 में दलित शब्द को परिभाषित किया। उनके मुताबिक दलित शब्द में वे सभी लोग समाहित हैं जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग, नवबौद्ध, कामगार लोग, भूमिहीन और गरीब किसान, महिलाएं और वे सभी लोग शामिल हैं जो राजनीतिक, आर्थिक या धार्मिक शोषण के शिकार हैं। इस परिभाषा को संगठन के सदस्यों के बीच वर्षों तक चली बहस और विचार-विमर्श के बाद स्वीकार किया गया था। लेकिन, अब इसमें परिवर्तन की बात उठने लगी है। दलित पैंथर के सहसंस्थापक जे.वी. पवार कहते हैं कि उस समय के बाद से इस शब्द के अर्थ में काफी बदलाव आ चुके हैं अब इसे ज्यादातर पूर्व में अछूत रहे समुदाय के व्यक्तियों के लिए प्रयोग किया जाता है।

दलित शब्द की उत्पत्ति की बाबत भले ही निश्चित तौर कुछ नहीं कहा जा रहा हो लेकिन इस शब्द के समर्थक और विरोधी दोनों हैं। इस शब्द का समर्थन करने वाले इससे एक सकारात्मक अर्थ ग्रहण करते हैं, उनका कहना है कि इससे समुदाय की मुक्ति और उसके दृढ़ संघर्ष का अर्थ प्रतिध्वनित होता है। जबकि, इसका विरोध करने वाले दलित शब्द के साथ अपनी पहचान जोड़ने में सहज नहीं महसूस कर पाते।

लेखक और शिक्षक कांचा इलैया का कहना है कि इस शब्द को भारत भर में स्वीकार्यता मिली है और यह समुदायों को एक-दूसरे के पास लाने वाला बन रहा है। इस शब्द के जरिए अलग-अलग राज्यों के लोग अपनी भाषा और सांस्कृतिक विभिन्नताओं के बावजूद एक साथ आए हैं। इसने पूरे समुदाय के लिए एक राष्ट्रीय पहचान का निर्माण किया है। वही, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता गेल ऑम्वेट अपने ब्लाग में लिखती हैं कि अनुसूचित जाति एक कानूनी शब्द और यह तटस्थ जैसा है। यह किताबों में लिखे जाने के लिए तो ठीक हो सकता है। लेकिन, जातीय उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलन और कार्रवाइयों में ज्यादा मजबूत और दृढ़ पहचान की जरूरत होती है। जो कि अनुसूचित जाति शब्द से नहीं मिलती। जबकि, दलित शब्द से प्रतिरोध और विरोध को एक पहचान मिलती है।

(कॉपी एडिटर : नवल)


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