यादवों को बी.पी. मंडल और लालू में बांटने की काेशिश

लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा का थिंक टैंक रणनीतियां बनाने में व्यस्त् है। राष्ट्रीय स्तर पर वर्तमान बनाम अतीत के तर्ज पर मोदी बनाम नेहरु की रणनीति तो जारी है ही, बिहार में भी लालू बनाम मंडल की तैयारी है। जाहिर तौर पर इसकी वजह यह है कि नीतीश कुमार को साथ मिलाने के बाद भी भाजपा लालू प्रसाद का तोड़ नहीं खोज पा रही है। उपेंद्र कश्यप की रिपोर्ट :

आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय बवाल जारी है। चुनावी वर्ष में इसके कई मायने हैं। भाजपा पर संविधान प्रदत आरक्षण व्यवस्था खत्म करने का आरोप लगाने वालों पर आरोप लग रहा है कि वे विभिन्न जातियों में बंटे हिन्दुओं को एकजुट होने से रोकने के लिए आरक्षण-कार्ड खेल रहे हैं। वास्तविकता जो भी हो, इस बीच एक नयी कोशिश दिख रही है। बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल को ‘भारत रत्न’ देने की मांग करते हुए नया आन्दोलन शुरू हो रहा है। प्रदेश के सभी 38 जिला में 9 से 20 अगस्त तक कार्यक्रम होगा। इसकी तैयारी चल रही है। इसका आगाज अगस्त क्रान्ति दिवस यानी 9 अगस्त 2018 को मधेपुरा से हो रहा है। वही मधेपुरा जो यादवों के सन्दर्भ में सर्वाधिक शिक्षित माना जाता है, जहां लालू संसदीय चुनाव में मात खा चुके हैं। एक साल तक यह कार्यक्रम चलेगा और अगले 25 अगस्त 2019 को काशी में समाप्त होगा, जहां मंडल का जन्म हुआ था।

राजद प्रमुख लालू प्रसाद

तब तक लोकसभा का चुनाव ख़त्म और नए प्रधानमंत्री का शपथग्रहण भी हो चुका होगा। याद करिए- इससे पहले बी.पी. मंडल को ‘भारत रत्न’ देने की मांग यादव समाज से कब उठी थी? इस मांग को लेकर एक साल तक चलने वाले कार्यक्रम के प्रणेता हैं- पूर्व लोकसभा सदस्य डॉ. रंजन यादव। आपको याद आया, वही रंजन यादव जो लालू प्रसाद के ‘चाणक्य’ कहे जाते थे। बाद में लालू प्रसाद यादव के विरोधी बन गये। फिलहाल वे भाजपा में है। स्वाभाविक है उनकी हर राजनीति को भाजपा-हित से जोड़ कर देखा जाएगा। हालांकि खुद रंजन यादव इस लेखक से बताते है-आयोजक कोई राजनीतिक दल नहीं ‘हम मंडल के लोग’ है। इस आयोजन या मांग से भाजपा का कोई लेना देना नहीं है।

‘प्रथम यादव मुख्यमंत्री सामाजिक वैज्ञानिक बी.पी. मंडल’ बुकलेट का होगा प्रकाशन

उनके इंकार के बावजूद यह आसानी से समझा जा सकता है कि इस अभियान से हित तो भाजपा का ही सधने वाला है। बी.पी. मंडल को भारत रत्न दिलाने की मांग के साथ लालू के अपने समाज में कद कम करने की कोशिश यह कैसे है? इसका संकेत रंजन यादव के बयान से तो मिलता ही है, छपने वाले प्रस्तावित बुकलेट से भी प्रतीत होता है। ‘पिछड़ों के मसीहा: बिहार के प्रथम यादव मुख्यमंत्री सामाजिक वैज्ञानिक बी.पी. मंडल’ –का प्रकाशन किया जाना है। इस पर ध्यान दें – ‘प्रथम यादव मुख्यमंत्री!’

पूर्व सांसद रंजन प्रसाद यादव

रंजन यादव ने बताया,”यादव समाज यही जानता है कि लालू प्रसाद ही प्रथम यादव सीएम थे, और आख़िरी भी। जबकि प्रदेश के प्रथम यादव मुख्यमंत्री बी.पी. मंडल थे। उनकी ही देन है कि यादव समेत तमाम पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिल रहा है। उतने मजबूत, पवित्र, साहसी और समाज के लिए समर्पित नेता दूसरा कोई नहीं हुआ।”

मंडल कमीशन की रिपोर्ट तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को सौंपते मंडल कमीशन के अध्यक्ष बी. पी. मंडल

रंजन यादव कहते हैं कि ऐसा क्यों है कि लोग लालू को जानते हैं और मंडल को नहीं। जबकि वे सामाजिक वैज्ञानिक थे। उनकी वजह से हिंदुस्तान के 27 फीसदी जो मंडल के लोग हैं, उनको आरक्षण मिला। हम वी.पी. सिंह के प्रति भी आभारी हैं, जिनकी सरकार चली गयी, किन्तु काम किया। रंजन यादव कहते हैं कि लालू यादव को जो करना था, वह नहीं किया, आज रोज शोर मचाते हैं कि आरक्षण ख़त्म हो जाएगा। आरक्षण कभी ख़त्म नहीं होगा। जो लाभ मिलना चाहिए था युवाओं को, वह दिया नहीं, इस कारण युवाओं में लालू के खिलाफ आक्रोश है।

बुकलेट के जरिए यादवों में पैठ बनाने की कोशिश

यह आयोजन यादव समाज के दिल में लालू प्रसाद की अपेक्षा बी.पी. मंडल की तस्वीर बैठाने की कोशिश दिखती है। एक हैण्डविल का वितरण यादव जागरण मंच के प्रदेश सचिव ई.राधाकृष्ण यादव द्वारा किया जा रहा है। इसमें बताया गया है कि कैसे राम मनोहर लोहिया और इंदिरा गांधी की खिलाफत के बावजूद मंडल पहले पिछड़े मुख्यमंत्री बने। यानी कांग्रेस भी लक्षित है, क्योंकि उसका और राजद का महागठबंधन है।

राजद प्रमुख लालू प्रसाद व पूर्व मुख्यमंत्री सह मंडल कमीशन के अध्यक्ष बी. पी. मंडल

बुकलेट में बताया गया है कि जब मंडल मुख्यमंत्री थे तब तुरंत बाद ही बरौनी रिफायनरी से तेल का रिसाव गंगा में होने से आग लग गयी। तब बिनोदानंद झा ने विधानसभा में कहा था- ‘शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग लगेगी ही।’ बताया गया है कि उनकी कोशिश से विधानसभा में ‘ग्वाला’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाई गयी। जब उनकी मांग यह कह कर खारिज की गई कि यह शब्द शब्दकोष में है तो असंसदीय कैसे होगा? तब मंडल ने कई गालियों को शब्दकोष में दिखाते हुए कहा कि-‘ये शब्द भी कैसे असंसदीय हो सकते हैं।’ तब मामला निपटा और “ग्वाला” शब्द का इस्तेमाल सदन में असंसदीय हो गया।

यह भी कहा गया है कि आरक्षण की व्यवस्था करना आसान नहीं था। बीपी मण्डल को देश की विशाल जनसंख्या में से जो सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से पिछड़े हैं,उनकी स्थिति सुधारने के लिए चिन्हित करने की जिम्मेदारी दी गयी थी। आयोग बनाया गया, कई सदस्य थे, किन्तु अध्यक्ष बी.पी. मंडल को बनाया गया, जिसे हम मंडल आयोग के नाम से जानते हैं। मोरारजी देसाई ने 1 जनवरी 78 को यह आयोग बनाया था। बी. पी. मंडल ने पूरे देश का भ्रमण किया और 24 महीने के अंदर सरकार को समर्पित अपनी रिपोर्ट में पिछड़ा वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की अनुशंसा की। इसे लंबे समय तक कांग्रेस ने ठंढे बस्ते में रखा और बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लागू किया।

(कॉपी एडिटर : नवल)


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