अादिवासियों को अपनी जमीन बेचने का अधिकार देने की सिफारिश

झारखंड में आदिवासियों की जमीन कैसे हड़पी जाय, इसकी कवायद और विरोध दोनों लंबे समय से जारी है। हाल ही में टीएसी की बैठक में सरकार के प्रतिनिधि आदिवासियों ने ही सिफारिश की है कि सरकार गैर आदिवासियों को जमीन खरीदने के कानून को लचीला बनाये। विशद कुमार की रिपोर्ट

जब से झारखंड में रघुवर सरकार आई है, राज्य की जमीनों पर सरकार कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गई है। पत्थलगड़ी समर्थकों को राष्ट्रद्रोही साबित करने का मामला हो या एसपीटी एक्ट व सीएनटी एक्ट में बदलाव कर जमीन हथियाने का लचीलापन कानून बनाने की कवायद, इन सभी मामलों में सरकार की सक्रियता काफी तेजी से बढ़ी है।

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास

इसी कड़ी में भूमि अधिग्रहण अधिनियम लागू किया गया है। जिसका विपक्ष पूरजोर विरोध कर रहा है।

विदित है कि जनजातीय परामर्शदातृ समिति (टीएसी) की 22वीं बैठक बीते 3 अगस्त 2018 को हुई और कल्याण मंत्री डॉ. लुईस मरांडी की अध्यक्षता वाली समिति ने बैठक में अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री रघुवर दास को सौंपी। रिपोर्ट में समिति ने संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) में संशोधन कर वहां गैर अदिवासी को अपनी जमीन बेचने का अधिकार देने  की सिफारिश की है। साथ ही यह भी कहा गया है कि इस पर फैसले से पहले महाधिवक्ता की राय ली जायेगी। बैठक में समिति ने रांची नगर निगम क्षेत्र में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) में भी संशोधन की सिफारिश की है। रांची नगर निगम क्षेत्र में आदिवासी जमीन खरीद के लिए थाना क्षेत्र की सीमा हटायी जायेगी, पर खरीद सिर्फ आवासीय उद्देश्य से होगी। खरीद 20 डिसमिल से अधिक नहीं की जा सकेगी। कोई भी गैर आदिवासी (मूलवासी) सिर्फ एक ही बार जमीन खरीद सकता है।

जनजातीय परामर्शदात्री समिति की बैठक

बैठक में गैर आदिवासी पुरुष से शादी करने के बाद एसटी महिला पर आदिवासी जमीन खरीदने और अन्य लाभ लेने पर प्रतिबंध लगाने पर विचार-विमर्श हुआ। ओड़िशा ने एक कानून बना कर इस तरह का लाभ लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है। झारखंड में भी ”ओड़िशा शिड्यूल एरिया ट्रांसफर आफ इममुवेवल प्रोपर्टी बाइ शिड्यूल ट्राइब रेगुलेशन” के आधार पर कानून बनाने पर विचार किया गया। बैठक में इससे संबंधित प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति हो गयी है। इस संबंध में अलग से कोई  रेगुलेशन बनेगा या वर्तमान कानून में ही संशोधन होगा, इस मुद्दे पर देश भर के विभिन्न कोर्ट की रुलिंग की समीक्षा कर महाधिवक्ता की राय के बाद कार्यवाही होगी। प्रोजेक्ट भवन सभागार में हुई टीएसी की बैठक में सीएम रघुवर दास के अलावा अन्य संबंधित विभाग के मंत्री और सदस्य मौजूद थे।

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बैठक के बाद टीएसी के सदस्य विधायक शिवशंकर उरांव, जेबी तुबिद व लुइस मरांडी ने बताया कि सरकार पारंपरिक ग्राम प्रधानों की भी बैठक बुला कर उनकी राय लेगी। कानून में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करने से पहले अखबारों के माध्यम से प्रचार-प्रसार कर इस पर आम लोगों की भी राय ली जाय। यह काम तीन माह में  पूरा कर लिया जायेगा। इसके बाद ही सरकार अंतिम निर्णय लेगी। उप समिति की अगली बैठक फिर से 9 अगस्त को पुन: होगी।

आदिवासियों की जमीन पर पहले से ही है नजर

बताते चलें कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी) में संशोधन को लेकर विपक्ष की ओर से लगातार सवाल उठाये जा रहे हैं। वहीं, सरकार सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन को लेकर विधानसभा में बिल लाने की तैयारी करती रही।

झारखंड के गुमला में धान रोपतीं आदिवासी महिलायें

करीब 110 साल पुराने सीएनटी एक्ट में अब तक 26 संशोधन हो चुके हैं। जिसमें वर्ष 1947, 1969 व 1996 का संशोधन महत्वपूर्ण है। वर्ष 1947 के संशोधन के तहत थाने व जिले वाला मामला जुड़ा, जिसमें एसटी की जमीन का हस्तांतरण उसी थाने में तथा एससी व बैकवर्ड क्लास की जमीन का हस्तांतरण उसी जिले में होना निश्चित हुआ। परंतु जमीन का अवैध हस्तांतरण नहीं रुका। छपरबंदी व हुकुमनामा के तहत आदिवासियों की जमीन उनके हाथ से निकलती रही। इसकी वापसी की प्रक्रिया टाइटल शूट के तहत लंबी होने लगी। इसके बाद 1969 के संशोधन 71(1) में बिहार शिड्यूल एरिया रेगुलेशन के तहत आदिवासियों की भूमि  वापसी के लिए एसएआर कोर्ट का प्रावधान किया गया। इसमें अनुसूचित जनजाति का कोई सदस्य आवेदन देकर अपनी जमीन वापसी की गुहार लगा सकता था। इसके बाद वर्ष 1996 में सीएनटी एक्ट की धारा 49 में संशोधन कर उद्योग व खनन के लिए अनुसूचित जनजातियों की भूमि अधिग्रहण का प्रावधान किया गया।

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छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 11 नवंबर 1908 को लागू किया गया था। यह अधिनियम वास्तव में बंगाल काश्तकारी अधिनियम 1885 की ही कार्बन कॉपी है, जिसमें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के संदर्भ में कुछ प्रावधान जोड़े गये हैं।  छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट में कुल 271 धाराएं हैं। इन धाराओं के क्रियान्वयन संबंधी प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर अलग-अलग अधिसूचनाओं द्वारा उप नियमों की घोषणा की गयी, जिसे संकलित कर छोटानागपुर टेनेंसी रूल्स 1959 का नाम दिया गया। सारे प्रावधानों के आलोक में देखा जाये, तो छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम को 19 अध्यायों में बांटा गया है। अधिनियम के कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जो अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं।  इन्हीं के आधार पर यह धारणा बन गयी है कि यह अधिनियम केवल अनुसूचित जनजातियों से संबंधित प्रावधान वाला है। वास्तव में इसमें अनुसूचित जाति व पिछड़े वर्ग के रैयतों से संबंधित प्रावधान भी हैं।

क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ?

हाइकोर्ट के अधिवक्ता अभय मिश्रा के अनुसार सीएनटी एक्ट बनने के 110 वर्षों के बाद सामाजिक आर्थिक प्रक्षेत्र में काफी बदलाव आया है। इसको लेकर समय-समय पर एक्ट में संशोधन किया गया है। वर्ष 1908 में जब सीएनटी एक्ट लागू किया गया, उस वक्त 90 फीसदी लोगों की आजीविका का साधन कृषि था और सरकारी राजस्व का मुख्य स्रोत भी। इन्हीं कारणों से लगान संबंधी कई प्रावधान काफी कठोर थे। उस समय जमींदारी व जागीरदारी व्यवस्था लागू थी तथा रैयत व जमींदारों के बीच जमीन को लेकर अक्सर झगड़े होते रहते थे। इन झगड़ों के तात्कालिक निदान के लिए कई प्रावधान लाये गये। दूसरे शब्दों में कहें, तो जमींदार व रैयत के अधिकार व दायित्व परिभाषित किये गये।

सीएनटी-एसपीटी की धारा क्रमश: 21 एवं 13 में पूर्व से प्रावधान है कि रैयत स्वयं के उपयोग के लिए अपनी रैयती भूमि पर कृषि कार्य कर सकता है। इसके अतिरिक्त रैयती भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए गोदामों, पंप हाउसों, मकान, तालाब, बांस-बाड़ी आदि गैर कृषि कार्य में भी कर सकता है।

संशोधन के बाद पूर्व की शर्तों के अतिरिक्त गैर कृषि कार्यों यथा मैरेज हॉल, होटल आदि में भी रैयती भूमि का उपयोग करने का नियम बनाया गया है। इसमें मालिकाना हक भी उसी आदिवासी परिवार के पास रहेगा। वे अपनी जमीन पर दुकान, होटल, मैरेज हॉल आदि बनवा पायेंगे।

सीएनटी एक्ट की धारा 49 में पूर्व से प्रावधान है कि औद्योगिक परियोजना एवं खनन के लिए रैयती भूमि का हस्तांतरण किया जा सकता है।

संशोधन के बाद पूर्व की शर्तों के अतिरिक्त रेखीय परियोजनाओं यथा सड़क, केनाल, रेलवे, केबुल, ट्रांसमिशन, वाटर पाइप्स के लिए रैयती भूमि का हस्तांतरण किया जा सकता है। जनोपयोग सेवा यथा पाइप लाइंस, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, पंचायत भवन, अस्पताल, आंगनबाड़ी के लिए भी रैयती भूमि का हस्तांतरण किया जा सकता है। हस्तांतरण के बाद यदि भूमि का उपयोग परियोजना के लिए पांच वर्षों के अंदर नहीं किया जाता है, तो वह भूमि पुन: बिना कोई मुआवजा वापस किये पूर्व रैयतों को वापस हो जायेगी।

सीएनटी एक्ट की धारा 71 में पूर्व से प्रावधान है कि अनुसूचित जनजाति की भूमि के अवैध हस्तांतरण की वापसी एसएआर कोर्ट के माध्यम से की जाती है। धारा 71 एक के द्वितीय प्रावधान के तहत अनुसूचित जनजाति की भूमि गैर अनुसूचित जनजाति को हस्तांतरित करने के एवज में क्षतिपूर्ति देने का प्रावधान है।

संशोधन के बाद एसएआर कोर्ट के माध्यम से अनुसूचित जनजाति की अवैध हस्तांतरण भूमि की वापसी का प्रावधान रहेगा। परंतु द्वितीय व तृतीय परंतुक विलोपित कर दिया जायेगा, जिससे मुआवजा देकर भूमि को अंतरिति द्वारा अपने पास रखने का विकल्प समाप्त हो जायेगा।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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