दलितों को शंकराचार्य, महामंडलेश्वर और मंदिंर का पुजारी बनाने के पीछे मंशा क्या है?

दलितों के बीच से कुछ लोगों को हिंदू मंदिरों का पुजारी और शंकराचार्य या महामंडलेश्वर बनने का प्रलोभन दिया जा रहा है, क्योंकि दलितों का तेजी से हिंदू धर्म से मोहभंग हो रहा है। हिंदुत्ववादियों को यह डर सता रहा है कि कहीं 23 करोड़ दलित हिंदू धर्म न छोड़ दें। पूरे मामले का विश्लेषण कर रहे हैं तेजपाल सिंह ‘तेज’ :

हिंदुत्ववादियों को डर सता रहा है कि कहीं 23 करोड़ दलित हिंदू धर्म न छोड़ दें

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि आरएसएस और भाजपा भारत को हिन्दू राष्ट्र बना देना चाहते हैं और इसको साकार करने की रणनीति पर विचार करने के लिए यहाँ-वहाँ छोटे बड़े हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन मीटिंग करते रहते हैं। आरएसएस और हिंदू महासभा से जुड़े हिंदू राष्ट्र बनाने के इस विचार में 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद एक नई जान सी पड़ी थी। केंद्र में मोदी सरकार बनने के साथ ही आर एसएस और भाजपा फुफकारने ही नहीं डसने भी लगी थी। और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवाकर संघ ने तरह-तरह के नए-पुराने उग्र हिंदुत्ववादियों को पूरी तरह से बेलगाम कर दिया। तथाकथित ये हिंदू राष्ट्रवादी तत्व चाहते हैं कि भारत में हर किसी का खान-पान, पहनावा, रहन सहन और पूजा पद्धति आदि एक समान वैसा हो जैसा ये मानते और चाहते हैं। यह कहना तो मुश्किल है कि तरह-तरह के स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करने वाले ये हिंदू राष्ट्रवादी क्या कोई समान रणनीति बना पाएंगे, पर यह स्पष्ट है कि अपनी उग्र कार्रवाईयों के जरिए आम लोगों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटाने की कोशिश ये जरूर करते रहते हैं। विज्ञान एवं तकनीक के वर्तमान युग में भी धार्मिक कट्टरपंथी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए नित नए-नए तरीके तलाशने में लगे हैं। धर्म के नाम पर उग्रवाद का सहारा लेना भी आजकल नैतिक हो गया है। मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे आदि का विवाद उठाना, लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काना आदि इसी क्रम के आम कृत्य हैं। यही कारण है कि समय-समय पर धर्म परिवर्तन के मामले अक्सर प्रकाश में आते रहते हैं। एक आकलन के अनुसार, हिन्दू धर्म ही सबसे ज्यादा विघटित हुआ है।

दलित समुदाय के महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरी का पट्टाभिषेक (फोटो : डेलीहंट)

धर्म परिवर्तन नया नहीं है। यह भी कि जब-जब भी धर्म परिवर्तन हुआ, तब-तब हिन्दुओं ने ही धर्म परिवर्तन किया। चाहे कोई ईसाई बना या सिख, चाहे कोई मुसलमान बना या बौद्ध….वे सबके-सब हिन्दू ही रहे हैं। किंतु हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को सदैव एक ही चिंता रही है कि उनके धर्म के लोग दूसरे धर्म में जा रहे हैं। उन्हें इसकी चिंता कभी नहीं रही कि ये लोग हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में क्यों जा रहे हैं। जब हिन्दू समाज के दलित वर्ग के लोग हिन्दू धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म ग्रहण करते हैं तो हिन्दू धर्म के नेता खूब हो-हल्ला मचाते हैं। वस्तुत: दलित वर्ग के लोग दूसरा धर्म इसलिए ग्रहण करते हैं क्योंकि वे अच्‍छी तरह समझ गए हैं कि हिन्दू धर्म में रहते उन्हें न तो सामाजिक-आर्थिक समानता मिलेगी और न ही शारीरिक अत्याचारों से मुक्ति।

भारतवर्ष एक ऐसा देश है जिसके समाज में गहरा अलगाव रहा है क्योंकि भारतीय जनसमूह में अलग-अलग प्रकार की अनेक जातियां व धर्म हैं। सबकी आर्थिक, धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति अलग-अलग हैं। हिन्दू धर्म में व्यापक जाति-भेद ही हिन्दू धर्म के निरंतर विघटन का मूल कारण कहा जाएगा। स्पृश्य हिन्दू और अस्पृश्य हिन्दू के बीच की सामाजिक असमानता ने धर्म परिवर्तन में और चार चाँद लगाए हैं। कितना अफसोसनाक सत्य है कि एक हिन्दू एक गैर-हिन्दू के प्रति मुख्यत: हिन्दूपन की भावना से व्यवहार करता है किंतु अपने ही धर्म की दूसरी जाति के हिन्दू के प्रति जाति-भावना से व्यवहार करता है। अन्य धर्मों के मुकाबले, हिन्दू धर्म आध्यात्मिकता अर्थात रूढ़िवादिता को अधिक प्राथमिकता देता है। उल्लेखनीय है कि भारत में हिन्दू धर्म जाति-प्रथा के पोषक तत्वों में प्रमुख है। हिन्दू धर्म ने श्रमिक वर्ग को अभावों भरा धर्मान्ध जीवन ही दिया है। फलत: पूंजीवादी वर्ग पूंजी के माध्यम से बिना किसी श्रम के धनी बना है और श्रमिक वर्ग सिर पर धर्मान्धता का ताज पहन कर पूंजी से वंचित धर्म के बल पर जीवन चलाता है। पूंजीवादी वर्ग न केवल शासक है अपितु श्रमिकों का नाना प्रकार से शोषण करता रहा है। जगजाहिर है कि जातिगत अत्याचारों के चलते  धर्म परिवर्तन की गति को बल मिल रहा है। इससे हमें यह याद आता है कि डॉ. आंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जातिप्रथा से बचने के लिए, हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था। आज भी दलित धर्म-परिवर्तन करने में अपनी मुक्ति देखते हैं।

उल्लेखनीय है कि धार्मिक अधिकारों पर संघ परिवार का पूरा पहरा है। जानना होगा कि हिन्दू धर्म के स्वंभू हिन्दू धर्मरक्षक धर्मांतरण को तो मुद्दा बनाते हैं लेकिन जाति पर आधारित शोषण-दमन, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार जैसे मसले उनकी नजर में कोई समस्या नहीं हैं। धर्मांतरण की इन घटनाओं के तटस्थ विश्लेषण से यह साफ़ हो जायेगा कि दूसरा धर्म ग्रहण करने वाले ज्यादातर लोग हिंदू समाज की दलित-वंचित जातियों के या फिर गरीब आदिवासी रहे हैं। ऊंची और दबंग जाति के लोग इनके साथ जानवरों सा बर्ताव करते हैं। दलित और वंचित जातियों को समाज में हर जगह भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

गौरतलब है कि हिन्दूवादी शक्तियों को हिन्दू धर्म से निरंतर अलग होते जा रहे तथाकथित निम्न जातियों के लोगों के हितों की चिंता आज भी नहीं है, चिंता है तो बस इतनी कि हिन्दू धर्म से अलग हुए लोगों को वापिस हिन्दू धर्म में कैसे मिलाया जाय। इस हेतु प्रत्येक स्तर पर विविध प्रकार से नापाक प्रयास किए जा रहे हैं। दलित वर्ग के लोगों को मन्दिरों में पुजारी बनाए जाए जाने के प्रयास इनमें से मुख्य है। हिन्दूवादी शक्तियां पुजारी बनाए जाने वाले दलितों को हिन्दू धर्म से अलग हुए लोगों से संपर्क साधकर उन्हें पुन: हिन्दू धर्म में वापिस लाने का काम दिया जा रहा है।उदाहरणार्थ दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण, 5 अगस्त 2018) के अनुसार हाल फिलहाल इसकी कमान अनुसूचित जाति से आने वाले महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि को सौंपी गई है। महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि धर्म बदलने वाले के संपर्क में हैं और दावा है कि अनुसूचित जातियों के लोग कुम्भ में ‘घर वापसी’ करेंगे। इलाहाबाद के जागरण संवाददाता के अनुसार, ‘भय, लोभ अथवा उपेक्षा के चलते अतीत में दूसरा धर्म अपनाने वाले अनुसूचित जाति के लोग कुंभ में पुन: हिन्दू धर्म में वापसी करेंगे। धर्मांतरण करने वाले लोगों की हिन्दू धर्म में वापसी के लिए जूना अखाड़ा देशभर में संपर्क अभियान चला रहा है। वह ईसाई, बौद्ध व मुस्लिम धर्म अपनाने वाले लोगों से मिलकर उन्हें धार्मिक, सामाजिक संरक्षण देने का दिलासा देकर पुन: हिन्दू धर्म में आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कन्हैया के संपर्क में आकर धर्मांतरण करने वाले 340 लोग हिन्दू धर्म में लौटने को तैयार हैं। इसमें 185 बौद्ध, 125 ईसाई व बाकी मुस्लिम हैं। सबसे अधिक 140 लोग पूर्वांचल के हैं। मध्य प्रदेश के 40, गुजरात के 34, पंजाब के 46, महाराष्ट्र के 80 लोग भी ऐसा कर सकते हैं।’

अखबार में यह भी दावा किया गया है कि, ‘कुंभ में दूसरा धर्म ग्रहण करने वाले अनुसूचित जाति के लोगों का संगम तट पर मुंडन कराकर स्नान कराया जाएगा और कुछ को ‘महामंडलेश्वर’ भी बनाया जाएगा। महिलाओं का मुंडन नहीं होगा, उन्हें सिर्फ स्नान करना होगा। फिर सामूहिक पूजन कराकर हिन्दू धर्म में वापसी कराई जाएगी। कन्हैया प्रभुनंद बताते हैं कि अनुसूचित जाति के कुछ महात्मा लंबे समय से हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। अखाड़ा उन्हें ‘महामंडलेश्वर’ बनाकर सम्मानित करेगा। ऐसे आठ महात्मा हैं, जिनमें अनुसूचित जाति की तीन महिलाएं शामिल हैं। हिन्दू धर्म अपनाने वाले लोगों को तुलसी का पौधा, गीता की पुस्तक, रुद्राक्ष की मालाएं भी भेंट की जाएंगी। साथ ही हिन्दू धर्म के तीज-त्यौहार, संस्कार पर आधारित पुस्तक भी दिए जाएंगे ताकि वे खुद को इस धर्म से जोड़ सकें। महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि कहते हैं कि हिन्दू एक रहें, जाति-भेद में न बंटें, यह मुहिम तेज होगी। उन्हें काफी धनाढ्य लोग भी मिले जो बौद्ध, ईसाई व मुस्लिम बने हैं। उन्हें जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करके प्रताड़ित किया जाता था। ऐसे लोगों को वह पूरा सहयोग देंगे, जो उन्हें प्रताड़ित करेगा उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कराई जाएगी।’

दलित समुदाय के व्यक्ति को कंधे पर मंदिर ले जाता तेलंगाना के एक मंदिर का पुजारी

इस प्रकार के प्रयोग केरल में पहले ही किये जा चुके हैं। यह दलितों को सम्मान देने का कार्य नहीं अपितु कुछ लोगों को पुजारी बनाकर ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना का षड्यंत्र है। कमाल तो यह है कि कुछ ब्राह्मणवादी शक्तियां तो दलितों को पुजारी बनाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं और कुछ इसके विरोध में कार्य करते हैं। नवंबर 2017 की खबर है कि केरल में दलित कार्यकर्ताओं और पुजारी बनाए गए दलितों पर प्राणघातक हमलों की खबरें अब आम हो गई हैं। अनेक पुजारी ऐसे हैं जो जाति से तो दलित किंतु व्यवहार से केवल और केवल ब्राह्मणवादी ही हैं। यहाँ कहना अतिशयोक्ति न होगा कि उन्होंने वेदों का अध्ययन तो किया किंतु ब्राह्मणवाद की हकीकत को जानने का कोई प्रयास नहीं किया। यहाँ सवाल उठता है कि ऐसे दलित पुजारियों को दलित कैसे माना जाए। यूं तो केरल में आए दिन दलितों पर हमले और उनकी हत्या करने के मामले सामने आते रहते हैं। किंतु इसका किसी भी स्तर पर कोई प्रतिरोध देखने को नहीं मिलता। प्रतिरोध हो भी कैसे? जो लोग अपने ही घरवालों के विरोध में काम करते हैं, उनका समर्थक हो भी कौन सकता है।

त्रावणकोर देवास्वोम भर्ती बोर्ड (टीडीआरबी) ने 36 गैर-ब्राह्मणों को पुजारी के पद पर चुना था जिनमें से छह दलित समुदाय के थे। हालांकि राज्य में गैर-ब्राह्मण भी पुजारी बनते रहे हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर को छोटे-मोटे मठ-मंदिरों या निजी धार्मिक स्थलों में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी ही मिलती है। पैसा कमाने वाले मन्दिरों में नहीं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस प्रकार की कवायद जाति-प्रथा के उन्मूलन की दिशा में नहीं, अपितु ब्राह्मणवाद को जिन्दा रखने की दिशा में की जाती हैं। दरअसल, राजनीति के साथ-साथ इस प्रकार के घटिया प्रयोग धार्मिक क्षेत्र में भी खूब देखने को मिल रहे हैं। दुख की बात तो ये है कि दलित जातियों के लालची और नाम की महत्त्वाकांक्षा रखने वाले लोग ऐसे प्रलोभनों में फंसकर अपने ही वर्ग के लोगों को छलने का काम संभाल रहे हैं। इस प्रकार की नापाक गतिविधियां राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सर्वत्र देखने को मिल रही हैं।

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किंतु मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि आज का दलित और दमित समाज मन्दिर में प्रवेश करने और पूजा करने की मांग कतई नहीं करता, अब तो केवल ब्राह्मणवादी ताकतें गरीब और निरीह लोगों को जानबूझ कर मन्दिरों तक ले जाना चाहते हैं। कारण है कि देश का अधिकतर दलित और दमित बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर का अनुयायी है और किसी प्रकार की भी हिन्दूवादी सोच से निजात पाना चाहता है। दलितों को पुजारी बनाने या मन्दिरों में प्रवेश कराने की मुहिम ये सिद्ध करती है कि दलितों को आंबेडकरवादी सोच से अलग-थलग करना है। हिन्दुओं की चाल है कि यदि किसी दलित को मन्दिर में पुजारी बना दिया जाए तो दलितों का एक बड़ा वर्ग मन्दिरों में आना–जाना शुरू कर देगा और इस प्रकार डॉ. आंबेडकर का बौद्ध धम्म को अपनाने का विषय ठंडा ही नहीं, दूर की कौड़ी हो जाएगा।

(कॉपी-संपादक : सिद्धार्थ)


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