फॉरवर्ड प्रेस

जाति का विनाश : भारत निर्माण की कुंजी

भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) की विश्व-प्रसिद्ध पुस्तक ’एनिहिलेशन आॅफ कास्ट’ का हिन्दी अनुवाद एक नये कलेवर एवं नवीनतम संदर्भ-उल्लेखों के साथ फारवर्ड प्रेस के ज़रिए ’द मार्जिनालाइज्ड’ प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा हाल ही में प्रकाशित कराया गया है, जो पिछले कई अनुवादों से अलग तथा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह पुस्तक मुख्यतः बाबा साहेब के उस प्रसिद्ध भाषण पर केन्द्रित है, जो उन्होंने सन् 1936 में ’जात-पात तोड़क’ मण्डल द्वारा लाहौर के प्रस्तावित वार्षिक अधिवेशन में अध्यक्ष के रूप में बोलने के लिए लिखा था। परंतु यह भाषण वह इसलिए नहीं दे पाये क्योंकि जात-पात तोड़क मंडल के आयोजकों को इसके कुछ अंशों पर आपत्ति थी। इस कारण यह कार्यक्रम अनिश्चित समय के लिए टाल दिया गया। यद्यपि कार्यक्रम के आयोजक इस प्रस्तावित भाषण की विषयवस्तु और प्रतिपादन से बहुत प्रभावित थे, किन्तु उन्हें हिन्दू धर्म के मामलों पर की गयी उनकी कुछ टिप्पणियों पर आपत्ति थी जिसे डॉ. आंबेडकर ने अपने लिखित भाषण से हटाने के उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार इस महत्वपूर्ण वक्तव्य को लेकर जात-पात तोड़क मंडल में ऊहा-पोह की स्थिति उत्पन्न हो गयी तथा इस अधिवेशन को ही प्रकटतः रद्द कर दिया गया।

 

प्रस्तावित लाहौर अधिवेशन के इस भाषण को डा. आंबेडकर ने अपने खर्च पर मई 1936 में एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कराया जिसकी चर्चा गांधी जी (2 अक्टूबर 1869 – 30 जनवरी 1948) ने अपने पत्र ’हरिजन’ में की तथा लिखा ’’कोई सुधारक इस व्याख्यान की उपेक्षा नहीं कर सकता। जो रूढ़िवादी हैं, वे इसे पढ़कर लाभान्वित होंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि व्याख्यान में आपत्ति करने लायक कुछ भी नहीं है। इसे सिर्फ़ इसलिए पढ़ना चाहिए कि इस पर गंभीर आपत्ति की जा सकती है। डा. आंबेडकर हिन्दुत्व के लिए एक चुनौती हैं।’’

बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर और महात्मा गांधी की प्रतिमायें

इसके जवाब में डॉ. आंबेडकर ने एक लम्बा जवाब लिखा जिसमें सिद्ध किया गया था कि गांधी जी के विचार कितने पोंगापंथी और तर्क-विरूद्ध हैं। निष्कर्ष रूप में उन्होंने लिखा, ’’मेरी राय में हिन्दू समाज को एक नैतिक पुनरूत्थान की ज़रूरत है जिसे स्थगित रखना ख़तरनाक है।’’ इस प्रकार के कई उद्धरण इस पुस्तक में शामिल किये गये हैं जो गांधी और आंबेडकर के बीच बहस-तलब रहे थे। इस प्रकार के सवाल-जवाब को इस नयी अनुवादित पुस्तक में शामिल करके बहुत से प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत किया गया है जो एक आम पाठक के मन में उठेगा।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

इस पुस्तक को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने में एक अतिरिक्त कार्य यह किया गया है कि व्याख्यान में आए विभिन्न संदर्भों के बारे में उसी पृष्ठ पर नीचे विस्तृत टिप्पणी दे दी गयी है, जिससे विषय को अच्छी तरह समझने में आसानी हो जाती है। संदर्भ-टिप्पणियों में ऐतिहासिक संदर्भों का समय-काल तथा उसका सार-संक्षेप देकर इस पुस्तक को अधिक उपयोगी तथा पठनीय बना दिया गया है।

पुस्तक के आरंभ में डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखी गयी भूमिका का अनुवाद दिया गया है जिसे उन्होंने क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय संस्करण के लिए लिखा था। इस भूमिका के ज़रिए यह बख़ूबी समझा जा सकता है कि बाबा साहब हिन्दू धर्म की बुराइयों को चिन्हित कर उसे दूर करने के बारे में कितने सजग तथा अपने विचारों में कितने अडिग थे। द्वितीय संस्करण की भूमिका में वे लिखते हैं, ’’दुनिया उन विद्रोहियों की बहुत ऋणी है जो पुरोहितों के सामने उनसे बहस करते हैं और दावा करते हैं कि इस वर्ग से भी ग़लती हो सकती है। प्रत्येक प्रगतिशील समाज अपने विद्रोहियों को जो सम्मान देता है, मुझे उसका लालच नहीं है। अगर मैं हिन्दुओं को महसूस करा पाता हूं कि वे भारत के बीमार लोग हैं और उनकी बीमारी अन्य भारतीयों के स्वास्थ्य और खुशी के लिए खतरे पैदा कर रही है, तो मेरी संतुष्टि के लिए इतना काफ़ी है।

पूना पैक्ट के दौरान आमरण अनशन कर रहे महात्मा गांधी और दबाव में समझौते पर हस्ताक्षर करते आंबेडकर को प्रतिबिंबित करती एक कलाकृति

इस प्रकार के सूत्र-वाक्य पुस्तक में भरे पड़े हैं जिनसे भारतीय समाज की आँखें खुल जानी चाहिए। पुस्तक की शुरुआत में ही डा. आंबेडकर ने उन परिस्थितियों एवं कारणों का भी उल्लेख किया है जिसके कारण यह भाषण नहीं दिया जा सका। इस ब्योरेवार घटनाक्रम को ही पढ़कर यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू समाज में रूढ़िवादिता ने इसके विरूद्ध कोई तर्कसंगत बात सुनने, समझने तथा मानने तक की हिम्मत और इजाज़त तक नहीं दे रखी है। इस पुस्तक में हिन्दू धर्मशास्त्रों के उद्धरणों के माध्यम से तर्कपूर्ण ढंग से यह सिद्ध किया गया है कि हिन्दू जाति-समस्या धार्मिक धारणाओं पर टिकी हुई है। अतः बिना इन धारणाओं को अर्थात् बिना इन धर्मशास्त्रों को नष्ट किए जाति का विनाश असम्भव है। चूंकि तथाकथित हिन्दू सुधारवादी इन धर्मग्रन्थों को भी रखना चाहते हैं तथा सामाजिक सुधार भी करना चाहते हैं इसलिए हिन्दू धर्म में समाज सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बचती है। डा. आंबेडकर के वे विचार भी महत्वपूर्ण हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि बिना सामाजिक और धार्मिक क्रांति के राजनैतिक क्रांति नहीं हो सकती है। इस बारे में उन्होंने आयरलैंड, रोम एवं अमेरिका का उदाहरण देते हुए कम्यूनल अवार्ड का भी ज़िक्र किया है। पुस्तक में जातिगत अत्याचार की घटनाओं के उदाहरण द्वारा इसका ब्योरा देकर जाति के दंश को चिन्हित किया गया है।

पुस्तक में आर्थिक सुधार के लिए सामाजिक सुधार की आवश्यकता को भी सतर्क ढंग से रखा गया है। आर्थिक सुधार ही समता एवं स्वतंत्रता का एक मात्र तरीका है, ऐसा वामपंथी विचारकों की राय है। पुस्तक में तर्कपूर्ण विचार द्वारा यह साबित किया गया है कि धर्म, सामाजिक स्थिति और संपत्ति ये तीनों शक्ति या सत्ता के स्रोत होते हैं जो दूसरे की स्वतंत्रता को नियंत्रित करते हैं। एक उद्धरण में कहा गया है- जब तक लोग यह जानेंगे नहीं कि क्रान्ति के बाद उनके साथ किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा तथा जाति और धर्म के आधार पर कोई पक्षपात नहीं होगा, तब तक वे सम्पत्ति की समानता लाने वाली क्रान्ति में हिस्सा नहीं लेंगे।’’ एक अन्य जगह पर यह उद्धरण कि- जाति सिर्फ़ श्रम का विभाजन नहीं, यह श्रमिकों का भी विभाजन है।’’ आगे डा. आंबेडकर कहते हैं,   “जाति चूँकि मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं और रुझानों को सामाजिक नियमों की अनिवार्यता के अधीन कर देती है, इसलिए यह एक हानिकारक संस्था है।’’

महार आंदोलन के दौरान आंबेडकर अपने एक सहयोगी से बातचीत करते हुए

इस पुस्तक में अच्छी तरह से सिद्ध कर दिया गया है कि जाति हिन्दुओं को वास्तविक समाज या राष्ट्र बनाने से रोकती है।

पुस्तक के अन्तिम अंश में डॉ. आंबेडकर द्वारा कोलम्बिया विश्वविद्यालय में सन् 1916 में मानव विज्ञान के सेमिनार में प्रस्तुत शोध आलेख ’’कास्ट इन इण्डिया देयर मेकेनिज्म, जेनेसिस एण्ड डेवलेपमेन्ट’’ का हिन्दी अनुवाद भी शामिल किया गया है जो पूर्व के संस्करणों में नहीं हो पाया था तथा डा. अांबेडकर खु़द चाहते थे कि इस आलेख को ’एनिहिलेशन आॅफ कास्ट’ पुस्तक में शामिल किया जाता लेेकिन समय की कमी के कारण वे ऐसा नहीं कर पाये थे।

इस पुस्तक का जिस तन्मयता तथा सत्यनिष्ठा के साथ मशहूर लेखक पत्रकार राजकिशोर जी ने अनुवाद किया है वह सही मायने में एक समाजसेवा का कार्य है। इसके प्रकाशन से चन्द रोज़ पहले ही राजकिशोर जी निर्वाण प्राप्त हो गये। यह दुखद घटना भी पुस्तक के यादगार प्रकाशन के साथ जुड़ गयी है। इस पुस्तक के फुटनोट को तैयार करने में डा. सिद्धार्थ ने अपना श्रम तथा समय दिया है। उनकी कोशिशों के कारण बाबा साहेब के व्याख्यान में शामिल अनेक प्रसंगों के संदर्भ देने के कारण विषय को सुग्राह्य बनाने में भी सहायता मिलती है। इस पुस्तक को हिन्दी भाषी समाज के सामने लाकर फारवर्ड प्रेस ने एक ऐतिहासिक काम किया है। कुल 184 पृष्ठों की यह पुस्तक अपने कथ्य और तथ्य दोनों ही दृष्टि से रोचक एवं ज्ञानवर्धक है। पुस्तक के कवर पृष्ठ के पीछे प्रसिद्ध चिन्तक एवं लेखक कंवल भारती की छोटी सी टिप्पणी भी है, जो पुस्तक की उपयोगिता को रेखांकित करती है।

पुस्तक इतनी महत्वपूर्ण है कि यह हर भारतीय के घर में तो होनी ही चाहिए।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)

पुस्तक का नाम : जाति का विनाश

कुल पृष्ठ : 184

मूल्य : दो सौ रूपये (अजिल्द), चार सौ रुप(सजिल्द)

लेखक : डॉ. बी.आर. आंबेडकर

अनुवाद : राजकिशोर

संदर्भ टिप्पणियां : डा. सिद्धार्थ

प्रकाशक : द मार्जिनालाइज्ड पब्लिकेशन

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