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मध्यप्रदेश : आदिवासी युवाओं के संगठन ‘जयस’ से घबराई भाजपा और कांग्रेस

सन 2011 में जब डॉ हीरालाल अलावा फेसबुक पोस्ट में ‘जय आदिवासी युवा शक्ति’ लिखते थे, तब उनको शायद ही अंदाजा रहा हो कि एक दिन यह नाम भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के लिए सिरदर्द बन जाएगा। लेकिन आदिवासी बहुल मध्यप्रदेश में आज सचमुच यह नाम दोनों पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ‘जय आदिवासी युवा शक्ति’ यानि ‘जयस’ ने इस समर में कूदने की आधिकारिक घोषणा कर दी है। इसी तैयारी के चलते संगठन द्वारा 29 जुलाई, 2018 से आदिवासी प्रभाव वाले विधानसभा क्षेत्रों में ‘आदिवासी अधिकार महारैली’ निकाली जा रही है। इन रैलियों में बड़ी संख्या में भीड़ देखकर भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों का सियासी गणित बिगड़ने लगा है।

जयस के ‘आदिवासी अधिकार महारैली’ में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने से भाजपा-कांग्रेस की बढ़ रही है चिंता

मध्यप्रदेश के 231 विधानसभा सीटों में से आदिवासियों के लिए 47 विधानसभा सीट सुरक्षित हैं, जबकि 40 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर आदिवासी मतदाता ही निर्णायक भूमिका में होते हैं। ऐसे में जयस की चुनावी तैयारियों से भाजपा और कांग्रेस की चिंता स्वाभाविक है।

भाजपा और कांग्रेस की असल चिंता क्या है?

हाल ही में जयस के संरक्षक डॉ. हीरालाल अलावा ने आदिवासी प्रभाव वाले 80 विधानसभा सभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है। मध्यप्रदेश की राजनीति में कहावत है कि आदिवासी प्रभाव वाली ये 80 विधानसभा सीटें ही सत्ता की असल कुंजी हैं।

विधानसभा के आंकड़ों को देखें तो वर्तमान में भाजपा के पास 166, कांग्रेस के पास 57, बसपा के पास 4, निर्दलीय 3 और 1 मनोनीत विधायक हैं। आदिवासी आरक्षित सीटों में से 32 पर भाजपा और 14 पर कांग्रेस काबिज है, जबकि एक सीट पर निर्दलीय विधायक है।

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आदिवासियों को परंपरागत रूप से कांग्रेसी वोटबैंक माना जाता था, लेकिन साल 2003 से आदिवासी वोटबैंक भाजपा के पाले में चला गया। यही कारण है कि कांग्रेस से सत्ता छिन गई। अब जबकि जयस एक तीसरे मोर्चे के रुप में धमक रहा है तो भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस की बढ़ती बेचैनी बता रही है कि आदिवासी वोटबैंक जयस के साथ जा रहा है।

दरअसल भाजपा-कांग्रेस की यह बेचैनी जायज भी है, क्योंकि पिछले साल ही जयस, मध्यप्रदेश के कालेजों में होने वाले छात्र-चुनावों में भी भाजपा-कांग्रेस समर्थित छात्र संगठनों के उम्मीदवारों को पटखनी दे चुका है। पहली बार ही छात्र संगठनों की चुनावी राजनीति में उतरे जयस की छात्र-इकाई ’आदिवासी छात्र संघ’ ने कई इलाकों में एबीवीपी और एनएसयूआई जैसे देशव्यापी संगठनों का सूपड़ा साफ कर दिया था।

जयस की असली रणनीति क्या है?

जयस के संस्थापक डॉ. अलावा ने नारा दिया है– अबकी बार आदिवासी सरकार। यह नारा आदिवासियों द्वारा अक्सर ही सुनने को मिल जाता है।

युवाओं के बीच डॉ हीरालाल अलावा

डॉ. अलावा ने फारवर्ड प्रेस से चर्चा में कहा कि “आजादी के बाद से ही भाजपा और कांग्रेस, दोनों पार्टियों ने आदिवासियों को ठगा है। दोनों ने आदिवासियों को सिर्फ वोटबैंक समझा और दूसरी श्रेणी के इंसानों जैसा बर्ताव किया”। वे मानते हैं कि देश में संविधान की पांचवीं अनुसूची का सरेआम उल्लंघन किया गया है। उन्होंने कहा कि “सरकार द्वारा ही आदिवासियों की जमीन लूट ली गयी और उस जमीन के तमाम संसाधनों की भी भारी लूट हुई है”।

मौजूदा सरकारी नीतियों पर वे कहते हैं कि ‘‘आदिवासी अधिकारों के हनन का विरोध करने पर मारपीट की जाती है और नरसंहार भी हुए हैं लेकिन अब यह नहीं चलेगा”। वे बताते हैं कि अब भाजपा-कांग्रेस के गुलाम आदिवासी नेताओं का विधानसभा-लोकसभा जाना आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि ‘‘अब आदिवासियों की बात करने वाले, पांचवीं और छठी अनुसूची की बात करने वाले और आदिवासियों के परंपरागत नियमों के साथ ही उनके मानवाधिकारों पर काम करने वाले आदिवासी नेता ही जयस के समर्थन से विधानसभा-लोकसभा में जाएंगे। इसके लिए गांव-गांव जाकर हम लोग आदिवासियों को जागरूक भी कर रहे हैं”।

एक सवाल के जवाब में डॉ. अलावा ने बताया कि जयस एक सामाजिक संगठन है। राजनीति की अपनी रणनीति पर बात करते हुए वे कहते हैं कि ‘‘अभी आनेवाले विधानसभा चुनाव में जयस के समर्थन से सिर्फ मध्यप्रदेश में ही चुनाव लड़ा जाएगा। इसके बाद लोकसभा और दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी जयस अपने समर्थन में उम्मीदवार उतार सकता है। लेकिन अभी सिर्फ मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव पर ही फोकस है”।

किस पार्टी से चुनाव लड़ने के जवाब में डॉ. अलावा ने बताया कि अभी जयस संगठन ने पार्टी रजिस्ट्रेशन कराने का निर्णय नहीं लिया है लेकिन ‘भारतीय ट्राईबल पार्टी’ और ‘गोंडवाना गणतंत्र पार्टी’ जैसे आदिवासी विचारधारा वाली कुछ पार्टियों से बात चल रही है। वे कहते हैं कि अंतिम रूप से संगठन जो निर्णय लेगा, वही सर्वमान्य होगा।

भाजपा और कांग्रेस की चुनावी रणनीति क्या है?

भोपाल से प्रकाशित ‘अग्निबाण’ और ‘पीपुल्स न्यूज’ जैसे समाचारपत्रों की मानें तो “आदिवासी इलाकों में जयस की सक्रियता बढ़ने से भाजपा और कांग्रेस के बीच खलबली मच गई है”। मीडिया की खबरें बताती हैं कि राज्य में भाजपा और कांग्रेस में अनुसूचित जनजाति मोर्चे की टीमों की बैठकें तेज हो गई हैं। भाजपा के प्रमुख आदिवासी नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है कि वे जयस के नेताओं को तोड़कर भाजपा में लाएं, वहीं कांग्रेस भी अपने आदिवासी नेताओं के जरिये जयस को कांग्रेस में मिलाने की पुरजोर कोशिशें कर रही है।

आदिवासी वोटबैंक खिसकता देखकर भाजपा की सरकार द्वारा पहली बार विश्व आदिवासी दिवस का आयोजन धार जिले में किया गया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आदिवासियों को लुभाने के लिए कई घोषणाएं की

सत्तारूढ़ भाजपा इस मामले में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती। इसी माह 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के एक कार्यक्रम में भाजपा विधायक रंजना बघेल ने कुछ आदिवासी युवाओं को भाजपा में शामिल कराया और बताया कि इन्हें जयस से तोड़ा गया है। वहीं सूत्रों की मानें तो कांग्रेस आलाकमान भी लगातार जयस नेताओं के संपर्क में है।

क्या कहते हैं भाजपा-कांग्रेस के आदिवासी नेता?

आदिवासी बहुल धार जिले की सुरक्षित मनावर विधानसभा सीट से लगातार चार बार से विधायक भाजपा की रंजना बघेल का पिछले दिनों स्थानीय अखबारों में बयान आया कि ‘‘भीड़ बढ़ाने के लिए जयस बाजार-हाट के दिन ही रैली करता है। जयस इस तरह से चुनाव नहीं जीत सकता। वह सिर्फ कांग्रेस का वोट काटेगा”। वहीं राजनगर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक बाला बच्चन ने कहा कि ‘‘जयस की रैली में भीड़ जुटने से क्या होता है, ये भीड़ वोट के रुप में नहीं बदलेगी, आदिवासी नहीं चाहते कि इस बार उनका वोट अलग-अलग बंटे”। कांग्रेस प्रवक्ता जेपी धनोपिया ने अपने एक बयान में कहा कि “हम लगातार जयस के संपर्क में हैं और जल्द जयस से समर्थन हासिल करने में हम लोग कामयाब होंगे”।

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इस तरह की खबरों के जवाब में डॉ. अलावा का बयान आया कि “जयस की रैलियों में स्वेच्छा से आने वाले लोगों की संख्या देखकर अब कांग्रेस-भाजपा के सपने में भी जयस आने लगा है”। उन्होंने आगे बताया कि शराब और पैसा बांटकर वोट लेने वाले लोगों को आदिवासी पहचान गए हैं। गठबंधन पर उन्होंने साफ किया कि जयस न तो भाजपा के साथ जाएगा और न ही कांग्रेस के साथ।

बहरहाल सभी के दावे चाहें जो भी हो, लेकिन यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि विधानसभा चुनाव में किसकी कितनी साख है। भाजपा अपनी कुर्सी बचा पाएगी या कांग्रेस सत्ता हासिल करेगी या फिर इस बार राज्य में जयस के समर्थन से ‘आदिवासी सरकार’ बनेगी। लेकिन इतना तो तय है कि ‘आदिवासी अधिकार महारैली’ में आदिवासियों की बढ़ती भीड़ देखकर भाजपा-कांग्रेस ने जयस को निशाने पर ले लिया है।

(कॉपी-संपादन : बी.साना)


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