फॉरवर्ड प्रेस

हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया पर जारी बहस में हिस्सा लें

सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को खत्म कर ‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया’ के नाम से एक नयी संस्था बनाने जा रही है।

नयी संस्था के पक्ष और विपक्ष में अनेक तर्क दिये जा रहे हैं। कुछ अकादमिशयनों को इससे उच्च-शिक्षा में व्याप्त अनियमितता के दूर होने व गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी की उम्मीद है, वहीं अनेक इसे शिक्षा का सरकारी-बाजारीकरण बता रहे हैं। दलित-बहुजन पक्षधरता के साथ काम करने वाले कुछ लोगों का मत है कि यूजीसी जैसी संस्थाओं को अधिक अधिकार दिए जाने का अर्थ द्विज वर्चस्व कायम करने की आजादी से अधिक कुछ नहीं रहा है। इससे न तो गुणवत्ता पूर्ण शोध हासिल किया जा सका, न ही विश्व के शिक्षा-पटल पर हम अपना कोई स्थान बना सके। स्वायत्तता के नाम पर उच्च अध्ययन संस्थानों ने अपने परिसरों में सामाजिक-विविधता के लिए प्रवेश निषेध का बोर्ड लगाये रखा। संसद के हस्तक्षेप से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश की सबसे विशाल आबादी–अन्य पिछड़ा वर्ग–का प्रवेश तो हुआ है, लेकिन आज भी उन्हें इससे बाहर रखने के लिए असंख्य स्तरों की रोक बरकार है। हालांकि इस मत के विपरीत दलित-बहुजन धारा के अनेक बुद्धिजीवियों को भय है कि कहीं इससे शिक्षा के भगवाकरण को तो बढ़ावा नहीं मिलेगा।

हम ‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया’ को केंद्र में रख कर इन्हीं मुद्दों पर बहस आमंत्रित कर रहे है। अगर आप इस विषय पर कुछ सोच-विचार रहे हैं  तो कृपया हमें अपने सुचिंतित लेख प्रकाशनार्थ भेजे।

बहस की शुरूआत हम स्वतंत्र पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता विशद कुमार के लेख से कर रहे हैं। लेख इस ईमेल पर भेजें : editor@forwardpress.in  

प्रबंध संपादक


शिक्षा का बाजारीकरण कर रही है सरकार

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) को खत्म कर उसकी जगह नयी शिक्षा नीति लाने का केंद्र के फैसले पर कई अकादमिशियनों को इस तर्क के साथ ऐतराज है कि नेताओं को अकादमिक विषयों में शामिल नहीं होना चाहिए।

गौरतलब है कि पिछले माह मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यूजीसी अधिनियम, 1951 को रद्द कर उसके स्थान पर हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया, 2018 (एचईसीआई) लाने की घोषणा की थी। जिसे अमली जामा पहनाने तैयारी जोर-शोर पर है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) ने भी यूजीसी को खत्म करने के सरकार के  फैसले का विरोध किया है। डूटा ने साफ कहा कि नई संस्था के आने से शिक्षा प्रणाली में सरकार का सीधा हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। क्योंकि यूजीसी और एचईसीआई में काफी बड़ा अंतर है। यूजीसी के पास विश्वविद्यालयों को रेगुलेट करना और उन्हें अनुदान यानी कि ग्रांट देने का अधिकार है। जबकि एचईसीआई के पास अनुदान देने का अधिकार नहीं होगा। एचईसीआई के आने पर अनुदान सीधे मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से जारी किया जाएगा।

मंत्रालय ने नये एजुकेशन सिस्टम को लागू करने के लिए एक ड्राफ्ट तैयार किया है। ड्राफ्ट के अनुसार आयोग पूरी तरह अकादमिक मामलों पर ध्यान देगा।

मशहूर अकादमिशियन जयप्रकाश गांधी कहते हैं कि “नये सिस्टम का ढ़ांचा इस प्रकार है कि उससे शिक्षा के बारे में फैसलों में राजनीतिक दलों की ज्यादा चलेगी जबकि आदर्श रूप से यह काम शिक्षाविदों और अकादमिक विद्वानों द्वारा होना चाहिए, वे देश को आगे ले जा सकते हैं।

दूसरी ओर, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार ‘कम सरकार और अधिक शासन’, ग्रांट संबंधी कार्यों को अलग करना, इंस्पेक्टर राज की समाप्ति, अकादमिक गुणवत्ता पर बल, घटिया एवं फर्जी संस्थानों को बंद करने का आदेश, नये उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम, 2018 (एचईसीआई) के अहम बिंदु हैं।

गौरतलब है कि यूजीसी अपनी बेवसाइट पर फर्जी संस्थानों की सिर्फ सूची प्रकाशित करती है। लेकिन एचईसीआई के पास फर्जी व खराब गुणवत्ता वाले संस्थानों को बंद करने का अधिकार होगा। आदेश नहीं मानने वाले संस्थान के खिलाफ जुर्माना और सजा दोनों का प्रावधान होगा। साफ जाहिर है कि किसी भी संस्थान पर खराब गुणवत्ता का आरोप लगाकर बंद करने की दादागिरी सरकार सुरक्षित कर रही है जो सरकार की नीयत पर संदेह पैदा करता है।

उच्च शिक्षा वित्त एजेंसी (HEFA) के कार्य विस्तार को मिली मंजूरी

सरकारी नीयत एवं अकादमिक संदेहों को खारिज करते हुए मंत्रालय के एक प्रवक्ता का कहना है कि “प्रस्तावित एचईसीआई कानून, 2018 के तहत ग्रांट से जुड़े कामों की जिम्मेदारी मंत्रालय को दिये जाने के संबंध में जाहिर की गयी आशंकाएं बेबुनियाद हैं। ग्रांट से जुड़े कार्य मंत्रालय को सौंपे जाने के संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं किया गया है, भले ही अतीत में कई विशेषज्ञ समितियां नियम बनाने वाली और ग्रांट जारी करने वाली संस्थाओं को अलग करने की सिफारिश कर चुकी हैं और यह शासन के ठोस सिद्धांतों पर आधारित है।”

प्रवक्ता के अनुसार, “ग्रांट जारी करने की प्रक्रिया सही तरीके से ऑनलाइन होगी। यह ऐसी प्रणाली है जिसमें न्यूनतम मानवीय दखल के कारण पारदर्शिता और प्रभावशीलता की गारंटी होती है। हम वादा करते हैं कि अगर यूजीसी की ग्रांट देने की मौजूदा प्रणाली की जगह कोई व्यवस्था होती है तो इसे निष्पक्ष तरीके से संचालित किया जाएगा।’

एचईसीआई उच्च शिक्षा के निजीकरण की ओर एक और कदम

सरकार ने यूजीसी को खत्म करने के चार तर्क दिए हैं–

  1. शिक्षा की गुणवत्ता, शोध व रेगुलेशन को बेहतर करना।
  2. शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता देना।
  3. इंस्पेक्टर राज को खत्म करना।
  4. खराब संस्थानों पर कार्रवाई करना, क्योंकि यूजीसी सिर्फ उन संस्थानों के नाम अपनी वेबसाइट पर डाल सकती थी, कार्रवाई नहीं कर सकती थी।

यह सच है कि बहुत बड़े-बड़े फर्ज़ीवाड़े उच्च-शिक्षा के क्षेत्र में हुए हैं, और इस क्षेत्र में भाई-भतीजावाद का बोलबाला रहा है। जिस कारण कुछ बुद्धिजीवी यूजीसी को खत्म करना एक प्रगतिशील कदम बता रहे हैं। लेकिन नये उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम, 2018 के ड्राफ्ट का मजमून जानने के बाद कई सवाल जेहन को परेशान करते हैं।

बहुजन विमर्श को विस्तार देती फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

जैसे :

  1. नया आयोग केंद्र सरकार के अधीन रहेगा। हर मामले में केंद्र सरकार दखल कर सकती है। यदि आयोग और केंद्र सरकार में किसी मुद्दे पर तनाव बनता है, तो अंतिम फैसला केंद्र सरकार का होगा। चाहे किसी संस्थान को मान्यता देने का सवाल हो या कुछ और, एक ऐसा आयोग जो खुद ही स्वायत्त नहीं है वह कैसे संस्थानों को स्वायत्तता देगा?
  2. यह आयोग पैसे का लेन-देन नहीं करेगा, सिर्फ शिक्षा, मान्यता, शोध व गुणवत्ता को देखेगा। इसके बावजूद आयोग में एक उद्योगपति को लिया जाएगा। अब सवाल यह है कि उद्योगपति का आयोग में क्या काम? किसलिये ऐसा किया जा रहा है ?
  3. इस आयोग से शोध व गुणवत्ता कैसे बेहतर होगी, इसकी कोई प्रक्रिया ड्राफ्ट में नहीं दी हुई है।
  4. सिर्फ आयोग बदलने से इंस्पेक्टर राज कैसे खत्म होगा, इस पर भी ड्राफ्ट में कुछ नहीं है। क्या नया आयोग बनाने से इंस्पेक्शन करने वाले एक दम से ईमानदार हो जायेंगे?
  5. इस आयोग को खराब संस्थानों पर कार्रवाई करने का अधिकार होगा। सवाल यह है कि यह अधिकार यूजीसी के पास क्यों नहीं था?

सरकार का यह कहना कि फंड का लेनदेन सरकार खुद करेगी यह बहुत बड़ा झूठ है। राज्यों के विश्वविद्यालयों को फंड देने के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) बनाया गया है। केंद्रीय संस्थानों को बजट देने के लिए हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी (हिफा) बनायी गयी है। जिसके तहत केंद्रीय संस्थानों को लोन दिया जाएगा जो उन्हें बाद में चुकाना होगा और उसका ब्याज मंत्रालय वहन करेगी।

यह चीज़ें सरकार ने आयोग का ड्राफ्ट पेश करते हुए छुपाई हैं। कुल मिलाकर यह आयोग शिक्षा का बाजारीकरण की ओर एक और कदम है। इसके माध्यम से स्वायत्तता के नाम पर संस्थानों को अपना खर्च खुद चलाने को मजबूर किया जाएगा।

यूजीसी के ख़िलाफ़ बुद्धिजीवियों की तीखी प्रतिक्रिया

कुछ विद्वानों की मानें तो जब पिछले दिनों सरकार ने घोषणा की कि यूजीसी के खात्मे के बाद बनने वाला नया कमीशन बस अकादमिक मामलों को देखेगा और अनुदान का अधिकार मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास होगा, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि ये अधिकार मंत्रालय नहीं बाज़ार के पास होगा।

अब कैबिनेट के फैसले ने स्थिति और साफ कर दी है, कैबिनेट ने हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी की मूल पूंजी 2000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10000 करोड़ रुपये किए जाने की अनुमति दी। इसके के दायरे में पहले जहां इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी (आईआईटी), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी (एनआईटी), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साईंस (आईआईएससी), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साईंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसइआर) आते थे अब इसका दायरा बढ़ाकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है।

खेल को समझने के लिए एक नजर इधर भी

उधर यूजीसी को समाप्त किया गया इधर हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी  की पूंजी और दायरा बढ़ाया गया। मतलब विश्वविद्यालयों को शोध और विकास तथा आधारभूत संरचना के विकास के लिए दिये जाने वाले अनुदान को हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी  के माध्यम से लोन में बदल दिया गया है।

हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी  की अधिकारिक वेबसाइट पर जाकर इसके बारे में पढ़िये। ये सरकारी संस्थान नहीं है, ये रिजर्व बैंक और इंडिया (आरबीआई) के पास कम्पनी एक्ट के अंडर पंजीकृत एक नॉन बैंकिंग फाइनेंसिंग कम्पनी है जिसका पूरा नाम हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी  (हिफा) है। नाम पर ध्यान दीजिये ये फाइनेंस है, ग्रांट नहीं।

उच्च शिक्षा में आरक्षण : एक कदम आगे, तीन कदम पीछे

हायर एजुकेशन फाइनांसिंग एजेंसी  काम कैसे करती है? इसका काम बाज़ार से पूंजी लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों को उधार देना है। और बाज़ार से पूंजी लेने के बारे में वेबसाइट पर बताया गया है कि परोपकारी दानकर्ताओं और कॉरपोरेट के कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी  (सीएसआर) के द्वारा हिफा पूंजी जमा करेगी।

पूंजीवादी बाज़ार में कौन परोपकारी दानकर्ता है ये तो सरकार को ही पता होगा। और कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी  (सीएसआर) का खेल पुराना है। हिफा से एक तीर से कई निशान लगाये गये हैं। सीएसआर जहां पहले से ही एक पाखण्ड था, अब तो कॉरपोरेट को सीएसआर का भी इस्तेमाल मुनाफा कमाने के लिए करने का मौका दिया गया है, क्योंकि हिफा को अनुदान नहीं उधार देने के लिए बनाया गया है। और इस उधार का मूलधन चुकाने की व्यवस्था शिक्षण संस्थानों के संसाधनों से की जाएगी और ब्याज सरकार भरेगी।

मतलब शिक्षण संस्थानों की फीस भी बढ़ेगी, उनपर बाज़ार का नियंत्रण भी बढ़ेगा और सरकार जनता के पैसे को जनता के ऊपर खर्च न करके उसे कॉरपोरेट को ब्याज के नाम पर देगी। उच्च शिक्षा के बाज़ारीकरण की ये साजिश बहुत सुनियोजित है तथा चरणबद्ध तरीके से इसे अंजाम दिया जा रहा है। अगर अब भी शिक्षा को बचाने की लड़ाई नहीं लड़ी गयी तो कल हमारे बचाने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।

(कॉपी-संपादन : राजन)


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