फॉरवर्ड प्रेस

रामस्वरूप वर्मा की यादें

रामस्वरूप वर्मा (जन्म : 22 अगस्त, 1923 – निधन : 19 अगस्त, 1998)

रामस्वरूप वर्मा

रामस्वरूप वर्मा जी को पहली दफा 1974 में देखा। हालांकि उन्हें उसके तीन साल पहले से जानता था। मुझे स्मरण है, 1971 का साल रहा होगा, जब मेरे हाथ एक पुस्तिका लगी। यह हिंदुस्तानी शोषित समाज दल का चुनाव घोषणा पत्र था। शोषित दल, बिहार के जुझारू नेता जगदेव प्रसाद के प्रयासों से बना एक राजनीतिक दल था। जो परिवर्तित होकर हिंदुस्तानी शोषित दल हो गया था। कुछ ही समय बाद यह नामांतरित होकर शोषित समाज दल हो गया। जब मैंने वह घोषणा पत्र देखा-पढ़ा, तब मुझे वह प्रभावित नहीं कर सका। उसमें कृषक क्रांति पर जोर था, जिसकी बुनियाद लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्रित्व काल में सरकारी स्तर पर रखी गयी थी। हालांकि इसकी मांग विभिन्न राजनीतिक संगठनों द्वारा एक अरसे से की जा रही थी। 1971 में मैं बिलकुल तरुण था, इंटर का छात्र, लेकिन राजनीतिक रूप से बिलकुल अनजान नहीं था। जानने की उत्सुकता रहती थी और चूकि मार्क्स-एंगेल्स का कम्युनिस्ट घोषणा पत्र पढ़ चुका था, इसलिए मन में यह बात जम चुकी थी कि किसी भी राजनीतिक दल की रीती-नीति को जानने का सबसे अच्छा तरीका है– उसके घोषणा पत्र को पढ़ा जाय और इसी भाव से मैंने उक्त पुस्तिका पढ़ी थी। जिस किसी ने वह पुस्तिका दी थी, उसी ने बताया था कि इसे रामस्वरूप वर्मा ने लिखा है, और कि वह उत्तरप्रदेश के एक जानेमाने नेता हैं।

जैसा कि मैंने बताया घोषणापत्र का मुझ पर प्रभाव नहीं पड़ा। याद करता हूँ उसमें भारत के वन्य क्षेत्र का आंकड़ा दिया गया था और कहा गया था कि हमारी पार्टी चाहती है कि इसे आधुनिक मशीनों द्वारा काट कर कृषि भूमि में तब्दील कर दिया जाय और यह भी कि यह जमीन उन लोगों में वितरित की जाय जो कृषि करना जानते हैं। इससे अनाज के मामले में देश न केवल आत्मनिर्भर हो जायेगा बल्कि उसकी इस क्षेत्र में सम्पन्नता सकल राष्ट्रीय उत्पाद को करिश्माई अंदाज़ में उछाल देगी।

उन दिनों पर्यावरण पर बहुत जोर नहीं था। फिर भी वनस्पति विज्ञान का छात्र होने के कारण मुझे वन्य क्षेत्र के महत्व की थोड़ी जानकारी थी। मार्क्सवादी साहित्य की पढ़ाई शुरू कर चुका था और नतीजतन अनगढ़ रूप से ही सही, मन में यह बात जम चुकी थी कि भारत का भला तभी होगा जब कृषिक्षेत्र पर आबादी के बोझ को कम किया जाय। उस वक़्त तक हमने इतना ही जाना-समझा था कि अंग्रेजी राज में ब्रिटिश उत्पादों, खासकर कपड़ा का बाजार भारत में जबरन बना दिया गया और भारतीय कपड़ा उद्योग को विनष्ट कर दिया गया। छोटे-छोटे शहरों में जो दस्तकार कपड़ा बनाने में लगे थे, वे बेरोजगार होकर गाँवों में चले गए और कृषि पर बोझ बन गए। हमलोगों की समझदारी थी कि इसके लिए औद्योगीकरण को विकसित किया जाय। वह घोषणापत्र वन्य भूमि को विनष्ट कर अधिक कृषि क्षेत्र विकसित करने की वकालत कर रही थी। हमारा बुनियादी मतभेद यही था।

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इस घटना के लगभग तीन साल बाद, यानी 1974 के सितम्बर में जगदेव प्रसाद की हत्या हो गयी। इस वक़्त  बिहार में जयप्रकाश आंदोलन पूरे उफान पर था। जगदेव प्रसाद की निर्मम हत्या ने पूरे बिहार, खास कर मध्य भाग को राजनीतिक रूप से खासा उत्तेजित कर दिया था। इसी दौर में कभी रामस्वरूप वर्मा जी से मुलाकात हुई। वह पटना आते थे, तब ज्यादातर गाँधी मैदान के पास स्थित इंडिया होटल में ठहरते थे। कभी-कभार रामबुझावन बाबू के यहां। वर्मा जी का जोर राजनीति से अधिक अर्जक संघ के प्रचार-प्रसार पर होता था, जो उनके ही द्वारा 1966 में स्थापित एक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था थी। अर्जक संघ का उद्देश्य द्विजवादी सामाजिक व्यवस्था का उच्छेद कर एक समतामूलक समाज बनाना था। पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रामबुझावन सिंह उस वक़्त अर्जक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। पटना में पत्राचार का मेरा पता रामबुझावन बाबू का ही था, जिनसे मेरा घरेलू रिश्ता था। उन्ही के घर पर पहली दफा वर्मा जी से मिलना हुआ। मोहक व्यक्तित्व था उनका। कपड़ों के शौक़ीन थे। गोरा रंग और सुनहले फ्रेम का चश्मा। सब मिलाकर कहें तो रईसों वाली धज़ थी। पहली मुलाकात में मुझे यही लगा कि किसी सम्पन्न किसान-जमींदार परिवार से आते हैं और शौकिया तौर पर राजनीति में सक्रिय हैं। जगदेव बाबू अब नहीं थे, लेकिन मैंने महसूस किया वर्मा जी उनके विरुद्ध व्यक्तित्व वाले थे। पहली मुलाकात बस परिचय और देखा-देखि वाली ही रही। न उन्होंने मेरी कोई नोटिस ली न मैंने ही। सच कहूं तो एक विकर्षण हुआ।

अगली मुलाकातों में बातें होने लगी और फिर बहसें भी। मेरी एक पुस्तिका तब आई थी लखनऊ के बहुजन कल्याण प्रकाशन से; ‘मनुस्मृति : एक प्रतिक्रिया’। इसे उन्होंने अब तक पढ़ लिया था और थोड़ी प्रशंसा भी की थी। वह ‘अर्जक’ नाम से एक टेबलायड पत्रिका भी निकालते थे। उसमें लिखने के लिए आमंत्रित किया। अब तक वह जान गए थे कि मेरी जड़ें मार्क्सवाद और बौद्ध मत में है। वह खुद क्या थे, इसका भान नहीं होने देते थे। उद्धृत तो वह किसी को नहीं करते थे। यह पता लगाना मुश्किल था कि वह किसी से प्रभावित हैं। हाँ, उनमें विलक्षण तार्किकता थी और विमर्श करने में उन्हें पराजित करना मुश्किल था। वह वैज्ञानिक चेतना पर जोर देते थे और मॉडर्न साइंस व तकनीक से उपलब्ध ज्ञान पर उनका जोर था। धार्मिक अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर वह प्रहार करते थे। वह किसी भी तरह के वर्चस्ववाद के खिलाफ थे। जनतंत्र, समत्व और प्रगतिशील ख्याल उनकी वैचारिकता के आधार थे।

अपनी बहसों में वह सतर्क और तार्किक बने रहते थे। बीच-बीच में रजनीश के अंदाज़ में कथाएं भी सुनाते थे। एक दफा हमारी बात का विषय अंतर्जातीय विवाह था। उन्होंने कहा– मणि, मैं तो इस वाहियात चीज का समर्थन कभी नहीं कर सकता। मैं चौंका। यह क्या कह रहे हैं? उन्होंने कहा मनुष्य की एक जाति होती है। मनुष्य का विवाह गाय, बैल से नहीं हो सकता। आप जैसे ही अंतर्जातीय कहते हो, आप जातिवाद को स्वीकार कर लेते हो। इस सूक्ष्म तार्किकता की मैंने उम्मीद नहीं की थी। बहसों में सचेत होना, मैंने उनसे सीखा।

गुस्से और बदला लेने की भावना को वह अमानवीय कहते थे। मनुष्यता की एक गरिमा होती है और उसका निरंतर परिसंस्कार करना होता है। गुस्से को लेकर वह एक कथा कहते थे। आपको सुनना चाहिए। एक गृहस्थ था। उसके घर कुछ अतिथि आए, और थालियों की कमी पड़ गयी। पड़ोस से उसने थाली मांग लायी। अतिथियों को खिलाया। अतिथियों के विदा होने पर पड़ोसी की थाली लौटा दी। पड़ोसी को ज्ञात हुआ उसके यहां से जो थाली ले जाई गयी थी उसमें पड़ोसी ने अपने अथितियों को मांस खिलाया है। वह शुद्ध शाकाहारी था। पड़ोसी के इस छल से वह क्रोध से आग-बबूला हो गया। उसने बदला लेने का निश्चय किया। ऐसा बदला लूंगा कि उसकी पीढ़ियां याद करेगी। कुछ रोज बाद वह भी पड़ोसी के यहाँ से थाली उधार मांग लाया। मांस तो फिर भी कुछ लोग खाते हैं, मैं उसमें बिष्टा खाऊंगा। उसने अपना निश्चय पूरा किया और थाली लौटा दी। वर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, क्रोध से इसी तरह मनुष्य का नुकसान होता है।

कानपुर देहात में अर्जक संघ का ऑफिस

मैंने यही महसूस किया कि उनकी दिलचस्पी राजनीति से अधिक सामाजिक परिवर्तन में है। इसी उद्देश्य से उन्होंने अर्जक संघ स्थापित किया था। समाज में बाज़ दफा अवचेतन शक्तियां काम करती हैं। मुझे लगता है हिंदी क्षेत्र में आधुनिक जमाने में बड़ा सामाजिक आंदोलन नहीं हुआ था। कोई फुले-आंबेडकर तो नहीं ही हुआ, आर्य समाज भी सहारनपुर से आगे नहीं बढ़ सका। यहां की मिहनतक़श जातियों में, किसानों-दस्तकारों में एक लोकतांत्रिक प्रतिरोध कसमसा रहा था। इसी कसमसाहट को रामस्वरूप वर्मा-जगदेव प्रसाद की जोड़ी ने राजनीतिक स्वर दिया था। वर्मा जी का मानना था कि सामाजिक परिवर्तन के बिना पर कोई राजनीतिक परिवर्तन संभव नहीं है। यह जोतीराव फुले की विचारधारा है। यही वैचारिकी बीसवीं सदी में गोखले-गाँधी के मॉडरेट सिद्धांत से जुड़ी रही और थोड़े परिवर्तित रूप में गैरब्राह्मणवादी ख्यालों के साथ आंबेडकर-पेरियार की राजनीतिक धारा में प्रस्फुटित हुई। अवचेतन रूप से रामस्वरूप वर्मा-जगदेव प्रसाद की वैचारिक धारा यही है। दलित राजनीति में इसका परिष्कार कांशीराम ने किया, लेकिन पिछड़े वर्गों की राजनीतिक धारा आज भी लोहियावादी मकड़जाल का शिकार है। इसे तोड़े बिना पिछड़ों की राजनीतिक धारा लगातार कमजोर होगी।

आप स्मरण कीजिए हिंदी क्षेत्र की राजनीति में जो सोशलिस्ट तत्व थे वे जमीनी हकीकत से कितनी दूर थे। वे सब के सब बहसी समाजवादी थे। इसमें राममनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने अपने विशेष अवसर के सिद्धांत के तहत ‘पिछड़ा पावैं सौ में साठ’ का नारा जरूर दिया था, लेकिन यह द्विज-शक्तियों की ओर से अनुग्रह की तरह की चीज थी; आत्मसम्मान का कोई भाव इसमें नहीं था। वर्मा-प्रसाद की जोड़ी ने इसे बहुजन-शोषित तबकों के आत्मसम्मान आंदोलन में तब्दील करने की कोशिश की। 1970 के इर्द-गिर्द यह बड़ी बात थी, क्योंकि तबतक हिंदी क्षेत्र में फुले-आंबेडकर बहुत कम चर्चा में थे।

रामस्वरूप वर्मा का परिमंडल बहुत समृद्ध था। इसमें जगदेव प्रसाद के अलावे महाराज सिंह भारती, मोतीराम शास्त्री आदि अनेक ऐसे नेता थे, जिनपर एक साथ और अलग-अलग भी काम करने की जरूरत है। महाराज सिंह भारती और मोतीराम शास्त्री वास्तव में मानव -रत्न थे। सोचता हूँ, आज यदि वे होते, तो मौजूदा स्थितियों पर कितना सोचते-विचारते। एक बार मेरे गांव ये तीनों आये। बरसात का समय था और ऐसी बारिश शुरू हुई कि ये दो रोज तक जाने की स्थिति में नहीं रहे। अद्भुत दृश्य था। अहर्निश बारिश और बहस की संगत। तीन दिग्गज साधु एक साथ। जाने कितनी बातें हुईं। आज सोचता हूँ, वे बातें टेप हुई होतीं तो आज बड़े काम की होतीं।

वर्माजी से आखिरी मुलाकात सासाराम रेलवे प्लेटफार्म पर हुई थी, उनकी मृत्यु के कुछ साल पूर्व। यह अचानक की मुलाक़ात थी। देश में तथाकथित मंडल-कमंडल दौर तब गुजर चुका था। वह अर्जक संघ की कोई सभा संबोधित करने के लिए आये थे। गाड़ी विलम्ब से थी। वह सीमेंट की बेंच पर अकेले बैठे गाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे, जैसा कि उन्होंने बताया। जो साथी उन्हें छोड़ने आये थे, उन्हें कोई आवश्यक काम था या आ गया था। उन्हें रोके रखना ठीक नहीं था, इसलिए उन्हें लौटा दिया। यह उनकी संवेदनशीलता थी। मैं तो उन्हें अनजान जगह में इस तरह अकेले देख कर हैरान हुआ, लेकिन बात के बाद सामान्य हो गया। हम लगभग बीस साल बाद मिल रहे थे। वह कृशकाय हो गए थे, लेकिन चेतना वही थी। ‘तुम तो नामी लेखक हो गए हो। तुम्हारी तस्वीर अख़बार में देखी थी।’ कह कर उन्होंने व्यंग्यात्मक मुस्कान बिखेरी। फिर हिंदी साहित्य पर बात करने लगे। आलोचना की, सामाजिक परिवर्तन में कबीर और रैदास की, भूमिका बतायी। मुझे उत्पीड़ित मानवता का सिपाही बनने के लिए ललकारा। बेहद खुश हुए। यात्रा में हुई कठिनाइयों का जिक्र करते हुए कहा– ‘कष्ट हुए, लेकिन तुम मिल गए सब भूल गया। आओ कभी, कहकर वह रुआंसे हो गए। शायद यह सोच कर कि मैं तो आने से रहा। उनकी गाड़ी आ चुकी थी। जाते समय फिर कहा तुम लोग आराम की दुनिया में खो गए हो। यह ठीक बात नहीं है। तुमसे मुझे उम्मीद है मणि। और गाड़ी खुल गयी थी।  

1998 में इसी अगस्त महीने में, भूल नहीं रहा हूँ तो 19 तारीख को उनका निधन हुआ। बीस तारीख को हमलोग पटना की एक सभा में बैठे थे। रामबुझावन बाबू ने ही सूचना दी कि वर्माजी नहीं रहे। सभा, शोक सभा में तब्दील हो गयी।

(कॉपी-संपादन : राजन)


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