फॉरवर्ड प्रेस

लिंचिंग के ख़ौफ़ तले जी रहा है भारत

लिंचिंग की विचारधारा और सुप्रीम कोर्ट की चूक

‘‘कानून किसी व्यक्ति को मुझसे स्नेह करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता परंतु वह उसे मुझे लिंच करने से रोक सकता है‘‘। ये शब्द मार्टिन लूथर किंग जूनियर के हैं जो उन्होंने उस समय कहे थे जब अमरीका में नस्लीय भेदभाव अपने चरम पर था और अफ्रीकी-अमरीकियों की लिंचिंग आम थी। समाज के हाशिए पर पड़े अफ्रीकी-अमरीकियों की लिंचिंग एक घृणा जनित अपराध थी जो कि श्वेतों और अश्वेतों के बीच गहरी खाई के रेखांकित करती थी। आज कई साल बाद ये शब्द शायद भारत पर भी लागू होते हैं जहां मुसलमानों, दलितों और अन्य वंचित समुदायों की लिंचिंग आम हो गई है। निर्दोष नागरिकों को खून की प्यासी भीड़ें अपना निशाना बना रही हैं, इन भीड़ों में शामिल लोगों के दिलों में ‘दूसरों‘ के प्रति नफरत भरी होती है और वे ‘दूसरों‘ को मनुष्य ही नहीं मानते। पारंपरिक और सोशल मीडिया के धूर्ततापूर्ण प्रचार के जरिए एक समुदाय में दूसरे समुदाय के प्रति भय का भाव भर दिया जाता है। फिर गौरक्षा, अलग-अलग धर्मों के महिलाओं और पुरूषों के बीच मित्रता आदि जैसे भावनात्मक मुद्दों के जरिए इस भय और घृणा को हवा देकर सामान्य लोगों को हत्यारों में बदल दिया जाता है। यह विडंबना ही है कि जो व्यक्ति गौरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होता या जो लव जेहाद के खिलाफ नहीं होता उसे राष्ट्रवादी ही नहीं माना जाता। केन्द्रीय गृह मंत्रालय द्वारा एकत्रित आंकड़ों के अनुसार सन् 2014 से लेकर 3 मार्च 2018 के बीच देश में माब लिंचिंग की 40 घटनाएं हुईं जिनमें 45 लोग मारे गए।

सीएसएसएस द्वारा भी इस तरह की घटनाओं पर नजर रखी जाती रही है। सीएसएसएस, द हिन्दू, द टाईम्स ऑफ़ इंडिया और द इंडियन एक्सप्रेस के मुंबई संस्करणों में प्रकाशित खबरों के आधार पर आंकड़े संकलित करता है। इन तीन समाचार पत्रों में छपी खबरों के अनुसार जनवरी 2014 से लेकर 31 जुलाई 2018 के बीच देश में माब लिंचिंग की 109 घटनाएं हुईं। इनमें गौरक्षा, लव जेहाद, बच्चा चोरी आदि से जुड़ी घटनाओं के अतिरिक्त मुस्लिम टोपी और हिन्दू श्रेष्ठतावादी नारे लगाने के लिए लोगों को मजबूर किए जाने से जुड़ी घटनाएं शामिल हैं। इन 109 घटनाओं में से 22 महाराष्ट्र में हुई 19 उत्तरप्रदेश में और 10 झारखंड में। ये तीनों ही राज्य भाजपा शासित हैं।

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इन 109 घटनाओं में 78 लोग मारे गए और 174 लोग घायल हुए। 78 मृतकों में से 32 मुसलमान, 21 हिन्दू[1], 6 दलित और 2 आदिवासी थे। सत्रह मामलों में समाचार पत्रों की खबरों में यह स्पष्ट नहीं था कि लिंचिंग का शिकार व्यक्ति किस धर्म या समुदाय का था। जो 174 लोग घायल हुए उनमें से 64 मुसलमान, 42 दलित, 21 हिन्दू और 6 आदिवासी थे जबकि 41 मामलों में संबंधित व्यक्ति की सामाजिक व धार्मिक पृष्ठभूमि स्पष्ट नहीं थी।

इन आंकड़ों से साफ है कि माब लिंचिंग का शिकार होने वालों में मुसलमानों और दलितों की संख्या काफी अधिक है।

सीएसएसएस ने यह पाया कि सन् 2014 से माब लिंचिंग की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा अनमने ढंग से इन घटनाओं की निंदा किए जाने का कोई असर नहीं हुआ है। इसका कारण यह है कि माब लिंचिंग की घटनाओं पर क्षोभ व्यक्त करने के बाद उन व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही में तेजी नहीं लाई गई जो इस तरह की घटनाओं में शामिल थे। इस मामले में सबसे अधिक ढ़िलाई भाजपा शासित राज्यों में की गई।

यह स्थिति बहुत खतरनाक है। इससे यह पता चलता है कि संस्कृति और धर्म के स्व-नियुक्त रक्षकों पर कोई लगाम नहीं है। हैरत नहीं कि 109 घटनाओं में से 82 भाजपा शासित राज्यों में हुईं, 9 समाजवादी पार्टी के शासनकाल में, 5 कांग्रेस सरकारों वाले राज्यों में और 4 तृणमूल कांग्रेस शासित प्रदेश में। इन 109 घटनाओं में से 39 बच्चा चोरी से जुड़ी थीं और इतनी ही गौरक्षा से जबकि 14 घटनाएं अलग-अलग धर्मों के महिलाओं और पुरूषों के बीच मित्रता के चलते भड़कीं।

इसका अर्थ यह है कि माब लिंचिंग की घटनाओं में से 42-42 घटनाओं का संबंध गौरक्षा और बच्चा चोरी की अफवाहों से था। अन्य कारणों में शामिल हैं चोर होने का संदेह और हिन्दू श्रेष्ठतावादी नारे लगाने से इंकार किया जाना।

उच्चतम न्यायालय का निर्णय

देश में माब लिंचिंग की घटनाओं में अभूतपूर्व वृद्धि की पृष्ठभूमि में उच्चतम न्यायालय ने 17 जुलाई 2018 को तहसीन पूनावाला बनाम भारतीय संघ प्रकरण में अपने फैसले में लिंचिंग की कड़ी निंदा करते हुए ऐसी घटनाओं को रोकने और दोषियों को सजा दिलवाने के लिए एक तंत्र की स्थापना करने का निर्देश दिया। निर्णय में यह कहा गया कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम की जानी चाहिए और अगर वे होती हैं तो दोषियों को सजा दिलवाने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। यह निर्णय  दो कारणों से समयानुकूल और महत्वपूर्ण है। पहला, उच्चतम न्यायालय ने बिना किसी लागलपेट के इस तरह की हिंसा की कड़ी निंदा की और जोर देकर कहा कि ये असंवैधानिक हैं, प्रजातांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाली हैं और बहुवाद के लिए खतरा हैं। दूसरे, निर्णय में ऐसी प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया गया जिससे इस तरह की घटनाओं से निपटा जा सके। परंतु इस निर्णय में कुछ महत्वपूर्ण पक्षों को नजरअंदाज किया गया है जिनपर हम आगे चर्चा करेंगे।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज में कानून सबसे ऊपर होता है और इसका उल्लंघन करने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती। निर्णय में कानून के उन स्व-नियुक्त रक्षकों की कड़ी आलोचना की गई है जो कानून अपने हाथ में लेकर उन लोगों को ‘सजा‘ देते हैं जिन्हें वे किसी अपराध का दोषी मानते हैं। अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्याय व्यवस्था का यह सर्वमान्य और स्थापित सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाए जब तक कि निष्पक्ष विचारण के बाद उसे दोषी न करार दे दिया गया हो। किसी भी व्यक्ति, व्यक्तियों के समूह या समुदाय को यह अधिकार नहीं है कि वह आरोपी को निष्पक्ष विचारण के उसके अधिकार से वंचित करे।

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याचिकाकर्ता की वकील इंदिरा जयसिंह ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि माब लिंचिंग की घटनाओं में ऐसे नागरिकों को शिकार बनाया जा रहा है जो अल्पसंख्यक समुदायों के हैं और समाज के निचले वर्गों से आते हैं। उन्होंने कहा कि केन्द्र और राज्यों की सरकारों को इस तरह की घटनाएं रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाने चाहिए। निर्णय में न्यायालय ने राज्य को यह याद दिलाया कि हिंसा को रोकना उसका कर्तव्य है और उसे यह पता लगाना चाहिए कि साम्प्रदायिक विद्वेष क्यों और कैसे बढ़ रहा है। न्यायालय ने यह भी कहा कि सामाजिक तानेबाने को मजबूत करने की जिम्मेदारी राज्य की है। कानून के स्व-नियुक्त ठेकेदारों के लिए सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है। निर्णय में यह साफ किया गया है कि गौरक्षा सहित किसी भी मुद्दे को लेकर सड़क पर तुरंत ‘आरोपी को सजा देने की प्रवृत्ति‘ पर नियंत्रण लगाया जाना चाहिए क्योंकि यह कानून के राज का स्पष्ट और घनघोर उल्लंघन है।

न्यायालय ने यह भी कहा कि विविधिता और बहुवाद का बना रहना ज़रूरी है और भीड़ द्वारा कानून अपने हाथ में लेना बहुवाद के लिए बहुत बड़ा खतरा है। न्यायालय ने कहा कि किसी भी संवैधानिक प्रजातंत्र में स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है। राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह सभी नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा करे फिर चाहे वे किसी भी जाति, धर्म, नस्ल या वर्ग के हों। ‘‘राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह धर्मनिरपेक्ष, बहुवादी और बहुसांस्कृतिक सामाजिक व्यवस्था को प्रोत्साहित करे ताकि विचारों और आस्थाओं की स्वतंत्रता बरकरार रह सके और परस्पर विरोधी परिपेक्ष्यों का सह अस्तित्व बना रहे‘‘। माब लिंचिंग और अन्य अपराधों के बीच विभेद करते हुए न्यायालय ने कहा कि लिंचिंग की घटनाओं के पीछे के उदेश्यों और उसके परिणामों के संबंध में दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली, यह कि माब लिंचिंग न्याय करने के अधिकार का भीड़ कौ सौंप देने जैसा है। और दूसरी, इससे नागरिकों को उन अधिकारों का उपभोग करने से वंचित किया जा रहा है जो संविधान उन्हें प्रदान करता है।

निर्णय में कमियां

उच्चतम न्यायालय का निर्णय अत्यंत प्रासंगिक और स्वागत योग्य है परंतु वह इस विषय पर कुछ नहीं कहता कि माब लिंचिंग की घटनाएं आखिर हो क्यों रही हैं। निर्णय में बहुवाद और प्रजातंत्र जैसे उच्च आदर्शों की चर्चा है और उसमें यह भी कहा गया है कि हर जाति, वर्ग और धर्म के नागरिक के मूल अधिकारों की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। परंतु माननीय न्यायाधीशों ने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि माब लिंचिंग एक ऐसा संगठित अपराध है जिसे सत्ताधारी पार्टी के नेताओं का संरक्षण प्राप्त है और यह भी कि शासक दल की विचारधारा माब लिंचिंग को औचित्यपूर्ण सिद्ध करती है। यह अनेक चुने हुए संवैधानिक पदाधिकारियों के वक्तव्यों और उनके प्रकाश में पुलिस द्वारा ऐसे मामलों में अपर्याप्त कार्यवाही किए जाने से जाहिर है। जहां कुछ राजनैतिक नेता इस तरह की घटनाओें की गंभीरता को कम कर बताने का प्रयास करते हैं वहीं कई उन्हें औचित्यपूर्ण भी ठहराते हैं। पिछले महीने केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने उन लोगों का माला पहनाकर स्वागत किया जिन्हें पिछले साल झारखंड में अलीमुद्दीन अंसारी की पीट-पीटकर हत्या करने का दोषी ठहराया गया था। अंसारी की हत्या इस आरोप मे की गई कि वह गायों की तस्करी कर रहा था। एक अन्य केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता जैसे-जैसे बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे इस तरह की घटनाओं में वृद्धि होगी। शायद उनका आशय यह था कि माब लिंचिंग की घटनाएं भाजपा को बदनाम करने के षड़यंत्र का हिस्सा हैं। जाहिर है कि मंत्रीजी यह स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि माब लिंचिंग एक गंभीर अपराध है। अलवर में एक मुसलमान की पीट-पीटकर हत्या करने की घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने कहा ‘‘गौवध आतंकवाद से भी बड़ा अपराध है। आतंकवादी तो एक या दो व्यक्तियों की हत्या करते हैं परंतु जब कोई गाय कटती है तो करोड़ों हिन्दुओं की भावनाएं आहत होती हैं‘‘।   

इन वक्तव्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि सरकार, लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के सम्बन्ध में बहुत गंभीर नहीं है। लिंचिंग को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है और इन घटनाओं को अंजाम देने वालों के मन में तनिक भी भय या संकोच नहीं है। इस पक्ष पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय खामोश है। न्यायालय को यह कहना चाहिए था कि जो लोग लिंचिंग को औचित्यपूर्ण ठहरा रहे हैं, वे इस अपराध में सहयोगी हैं और उन पर अपराध करने के लिए दुष्प्रेरित करने के आरोप में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। जो लोग आमजनों में भय के भाव का संचार करने के लिए नकली वीडियो बनाते हैं और झूठी खबरें फैलाते हैं, जो इन वीडियो और ख़बरों को सोशल मीडिया के जरिये प्रचारित करते हैं, उनका और लिंचिंग करने वालों का लक्ष्य एक ही होता है और कानून यह साफ़ कहता है कि ऐसे लोग भी किसी अपराध के लिए उतने ही दोषी  हैं, जितने कि अपराध करने वाले। उन पर भी मुक़दमे चलाये जाने चाहिए।

अगर भीड़ द्वारा लिंचिंग रोकने के लिए कोई नया कानून बनाया जाता है, तो राजनैतिक नेतृत्व को भी उसकी जद में रखा जाना चाहिए क्योंकि वही इस तरह के अपराधों के प्रति पुलिस के नरम दृष्टिकोण के लिए उत्तरदायी है। कई मामलों में तो यह भी देखा गया है कि पीड़ितों की मदद और उनकी रक्षा करने के बजाय, पुलिस अपराधियों का साथ देती है। यह सच है कि पुलिस के अपने पूर्वाग्रह हैं परन्तु यह भी सच है कि राजनैतिक नेतृत्व के रुख और उसकी विचारधारा का भी पुलिस के आचरण पर गहरा असर पड़ता है। पुलिस अपने राजनैतिक आकाओं के निर्देशों को अनसुना नहीं कर पाती, भले ही वे कानून के विरुद्ध हों। यद्यपि निर्णय में यह कहा गया है कि हर जिले में लिंचिंग की घटनाओं को रोकने और ऐसी घटनाएं होने पर आवश्यक कार्यवाही करने के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की जाये, तथापि पुलिस तभी निष्पक्षता से व्यवहार करेगी  जब वह राजनैतिक नेतृत्व के दबाव में न हो और पुलिसकर्मियों को यह पता हो कि अगर वे निष्पक्षता से अपना काम नहीं करेंगे तो उन्हें इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे

इन कमियों के चलते, यह निर्णय लिंचिंग की घटनाओं को रोकने और उनके दोषियों को समुचित सजा दिलवाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में कारगर नहीं होगा। निर्णय में जो कमियां हैं, वे मूलभूत हैं और उन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। बड़े पैमाने पर ऐसी घटनाएं होने से मुसलमानों और दलितों का दानवीकरण हो रहा है, सामाजिक तानेबाने पर असहनीय दबाव पड़ रहा है और सामाजिक सौहार्द को गहरी चोट पहुँच रही  है। न सिर्फ यह, बल्कि इससे वे प्रजातान्त्रिक और संवैधानिक संस्थाएं भी कमज़ोर हो रही हैं जो जनता के जीवन और उसके स्वतंत्रताओं की रक्षा करने के लिए ज़िम्मेदार हैं हम अपने समाज को बर्बर नहीं बनने दे सकते। भीड़ द्वारा लिंचिंग केवल कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह कमज़ोर समुदायों को समाज से बाहर करने का भयावह राजनैतिक औजार है। नफरत की इस राजनीति का मुकाबला करना ज़रूरी है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय इस पागलपन और खून की इस प्यास को समाप्त करने में मददगार साबित होगा।

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[1] सीएसएसएस नामक इस संगठन ने आश्चर्यजनक रूप से हिंदुओं में सवर्ण और अन्य पिछडा वर्ग  (ओबीसी) को एक साथ रखा है, जबकि दलितों की अलग से गिनती की है। इस कारण ये आंकडे भारतीय समाज में मौजूद तनावों व अंतर्विरोधों को  मुकम्मल रूप में पकडने में अक्षम हैं। हम कथित गौ-रक्षकों द्वारा की गई मारपीट की घटनाओं को ही उदाहरण के तौर  देख सकते हैं।  अनेक जगहों  पर हिंदुओं में कृषक व पशुपालक जातियों  के लोग इसके शिकार हुए हैं, जो अन्य पिछडा वर्ग के हैं। जबकि मारपीट की घटनाओं को अंजाम देने वाले लोग उन संगठनों से जुडे रहे हैं, जो द्विज-हिंदुओं के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ‘हिंदू’ को एकाश्म समुदाय के रूप में देखने के कारण ये आंकडे सरकार की मंशा और न्यायालय की चूक पर तो उचित प्रश्न उठाते हैं, लेकिन  इसके लिए दोषी  द्विज समुदाय  पर उंगली नहीं रख पाते हैं। -प्रबंध संपादक, फारवर्ड प्रेस

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)


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