फॉरवर्ड प्रेस

नायपॉल : जिसने न इस्लाम को बख्शा, न हिंदुत्व को

नायपॉल : सच कहने वाले लेखक

(वी.एस.नायपॉल : 17 अगस्त 1932 – 11 अगस्त 2018)

वी.एस.नायपॉल

विदयासागर सूरज नायपॉल अब नहीं रहे। कल रात वह इस दुनिया से विदा हो गए। वह 85 साल के थे। वह भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिकता प्राप्त लेखक थे, जिनका जन्म त्रिनिदाद में हुआ था। 1880 के दशक में उनके पूर्वज किसी थपेड़े में त्रिनिदाद गए और फिर वहीं के होकर रह गए। अपनी मिटटी और संस्कृति से उखड़े हुए ऐसे लोगों की एक पृथक मनोदशा होती है, जिसे सामान्य रूप से समझना मुश्किल होता है। नायपॉल को समझने के लिए खास उपकरणों की जरुरत होती है। रुसी आलोचक चेर्नीशेव्स्की कहते थे, किसी लेखक की रचना को जानने-समझने के लिए उस लेखक के जीवन को जानना जरुरी होता है।

नायपॉल का बचपन निश्चित ही मुश्किल भरा रहा। 1950 में जब वह 18 के थे, उन्हें एक छात्रवृत्ति मिलती है, जिसके बूते वह इंग्लैंड पहुँचते हैं और ऑक्सफ़ोर्ड के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला पा जाते हैं। 1954 से उन्होंने लिखना शुरू कर दिया। कभी किसी दूसरे पेशे से नहीं जुड़े। यही कारण है कि उनके द्वारा लिखी किताबों की संख्या काफी है।

1971 में उन्हें उनके उपन्यास ‘इन अ फ्री स्टेट’ (In a Free State) पर बुकर और 2001 में ‘अ हाउस फॉर मिस्टर विश्वास’ (A House for Mr Bisvas) पर नोबेल पुरस्कार मिला। वह ख्यात लेखक थे। साहित्य के अलावे यात्रा-विवरणों और तत्जनित सामाजिक अध्ययनों पर भी उनकी किताबें हैं, जो खूब पढ़ी गयी हैं। अनेक विषयों पर उनके अपने विचार थे, जो उन्हें विवादित तो बनाते हैं, लेकिन उनकी मौलिकता भी रेखांकित करते हैं। उनका लिखा मैंने ज्यादा पढ़ा नहीं है। बस एक उपन्यास ‘अ हाउस फॉर मिस्टर विश्वास’ (A House for Mr Bisvas) और ‘इंडिया : अ वून्डिड सिविलाइजेशन’ (India : A Wounded civilization)। इसके अलावे कुछ इंटरव्यू, लेख आदि छुटपुट ढंग से।

वीएस नायपाल की कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें

नायपॉल अपने विचारों को लेकर विवादित रहे। उनके भीतर एक भारत था और उस भारत को वह प्यार करते थे। लेकिन उनका भारत टैगोर के भारत से भिन्न था। नायपॉल चाह कर भी टैगोर नहीं हो सकते थे। उनका भारत प्रवासी था। वह दुनिया की नज़रों से भारत को देखते थे। टैगोर भारत की दृष्टि से विश्व को देखते थे। थोड़े अंतर के साथ दोनों वैश्विक चेतना के थे। कूपमंडूक दोनों नहीं थे। लेकिन नायपॉल टैगोर की तरह दार्शनिक दृष्टि से दुनिया और उसके लोगों को नहीं देखते थे। उनके पास एक पत्रकार की दृष्टि थी बाज़ दफा मानो वह जानबूझ कर शरारत भी करते थे।

नायपॉल पर दक्षिणपंथी होने के आरोप लगे। इस विषय पर मैंने गहराई से विचार नहीं किया है। एकबार भाजपा नेता आडवाणी को एक इंटरव्यू में कहते सुना था कि यदि मुझे मालूम होता है कि नायपॉल का कोई इंटरव्यू या उनपर कोई दूसरा टीवी प्रोग्राम होना है, तो मैं सारे काम निरस्त कर इंतज़ार करता रहता हूँ। वह वामपंथी नहीं थे और भारतीय अर्थों में उतने सेक्युलर भी नहीं। उनकी पत्नी पाकिस्तान मूल की मुस्लिम थीं, लेकिन वह इस्लामी चेतना के तीखे आलोचक थे। हमारे भारत में इस्लाम का आलोचक होना भी दक्षिणपंथी होना माना जाता है। उनका भारत आना-जाना होता रहता था। भारतीय सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं पर उन्होंने खुलकर टिप्पणियां की और विवादित 1992 के अयोध्या बाबरी मस्जिद प्रकरण को उन्होंने ‘ऐतिहासिक संतुलन का एक कृत्य’ कहा और तत्कालीन जूनून को महिमा-मंडित किया। पाकिस्तान पर उनकी टिप्पणी है कि वह एक आतंक की कहानी है जो एक कवि के इस ख्याल से शुरू होती है कि मुस्लमान अधिक विकसित हैं, जिन्हे रहने के लिए खास जगह होनी चाहिए ।

हालांकि उनका यह एक पक्ष है। उन्होंने हिन्दू तौर-तरीकों और कठमुल्लेपन की भी वैसी ही आलोचना की है। गाँधी, विनोबा, जयप्रकाश आदि पर भी उनकी टिप्पणियां वैसे ही चौंकाती हैं। ‘इंडिया : अ वून्डिड सिविलाइजेशन’ (India: A Wounded civilization) अपने तरह की किताब है। इमरजेंसी के इर्द-गिर्द के भारत को नायपॉल ने इस किताब में समेटा है। उनके नज़रिये से आप सहमत हों, न हों, सोचने के लिए आप विवश जरूर होते हैं। भूमिका में ही लेखक ने अपनी पीड़ा रखी है– “भारत मेरे लिए एक जटिल देश है। यह मेरा गृह देश नहीं है और मेरा घर हो भी नहीं सकता, लेकिन फिर भी न मैं इसे ख़ारिज कर सकता हूँ, न इसके प्रति उदासीन हो सकता हूँ। मैं इसके दर्शनीय स्थलों का पर्यटक मात्र बनकर नहीं रह सकता। मैं एक साथ इसके बहुत निकट और दूर भी हूँ। लगभग सौ साल पहले मेरे पूर्वज यहाँ के गंगा के मैदान से पलायन कर गए थे और दुनिया के उस पार त्रीनिदाद में उन्होंने अन्य लोगों के साथ जो भारतीय समाज बनाया था, और जिसमे मैं बड़ा हुआ था, वह समाज उस भारतीय समाज से कहीं अधिक आपस में घुला-मिला था, जिससे सन 1883 में दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी का साक्षात्कार हुआ था।”

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इस किताब में स्वतंत्रोत्तर भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों, आंदोलनों और कुछ नेताओं की निर्मम लेकिन तथ्यपरक व्याख्या है। जेपी आंदोलन पर उनकी टिप्पणी है– “यह आंदोलन क्रोध और अस्वीकृति की एक अभिव्यक्ति थी, लेकिन वह एक विचारहीन आंदोलन था। वह एक भावनात्मक उदगार था, एक चीख-पुकार, वह भारत को आगे नहीं ले जाता। उसके केंद्र में कार्रवाई के पुराने गाँधीवादी आह्वान की एक सूक्ष्म विकृति थी, जिसे बेतुके राजनीतिक कार्यक्रम का रूप दे दिया गया था। उसके केंद्र में थी पराजय की प्राचीन प्रवृतियां, पीछे की तरफ मुड़ने की अवधारणा, अतीत में निमग्‍नता, प्राचीन तरीकों की पुनः खोज।” या फिर– “मार्क्सवाद और गांधीवाद का संश्लेषण, जो जयप्रकाश नारायण के प्रशंसकों के अनुसार उन्होंने प्राप्त किया है, एक प्रकार का अनर्गल प्रलाप है।”

मेरी कोशिश बस उनकी बेवाकी की बानगी रखना था। आज विस्तार से विमर्श का अवसर शायद नहीं होना चाहिए। इस पर हम उपरांत चर्चा करेंगे।

नायपॉल नहीं हैं। हम उन्हें अपनी श्रद्धाँजलि दे रहे हैं।

(कॉपी-संपादन : सिद्धार्थ)


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