फॉरवर्ड प्रेस

पिछड़ा वर्ग अपना हक नहीं ले पा रहा : डॉ. उदित राज

बीते 19 अगस्त् 2018 को दिल्ली के कंस्टीच्यूशन क्लब सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम में भाजपा के दलित सांसद डॉ. उदित राज को बोलने नहीं दिया गया। बी. पी. मंडल को समर्पित कार्यक्रम में जैसे ही उन्होंने मुलायम सिंह यादव को आरक्षण का विरोधी कहा, हंगामा हो गया। इस संबंध में फारवर्ड प्रेस ने उनसे बातचीत की।

बीते 19 अगस्त को जो घटना घटी, वह निंदनीय है। वहां क्या हुआ था?

एक सामाजिक संस्था थी वह, कोई राजनीतिक मंच तो था नहीं। मैं जब सामाजिक मंच पर जाता हूं, तो सांसद के रूप में नहीं जाता हूं। मेरी जब भी निजी रैली होती है, तो सांसद शब्द हटा देता हूं। क्योंकि, वहां पूरी तरह से सामाजिक होना चाहिए, राजनीतिक नहीं होना चाहिए। मैंने पहले ही कहा कि पहले देश हमें दलित नेता मानता है। पासवान जी अक्सर कहते हैं कि हम तीनों को ही तो देश कोसता है। पासवान जी को, मुझे और रामदास अठावले जी को। यह 10 साल से चल रहा है। तो उसमें हमने यह कहा कि पेरियार ने दक्षिण में पिछड़े वर्गों के लिए जिस तरह से जमीन तैयार की, उसी तरह से जमीन यहां भी तैयार करनी पड़ेगी, तभी जाकर पिछड़ा वर्ग को अपना अधिकार मिल पाएगा। जो पार्टियां हैं, चाहे वह आरजेडी हो, चाहे समाजवादी पार्टी हो, ये पार्टियां वैचारिक लड़ाई नहीं लड़तीं, सत्ता की लड़ाई लड़ती हैं। सत्ता की लड़ाई में व्यक्ति का फायदा होता है और जाति की संख्या की वजह से व्यक्ति सत्ता में पहुंचता है और उसका फायदा होता है। जो सामाजिक लड़ाई है, वह अलग है। सामाजिक लड़ाई में पूरे समाज का फायदा होता है, देश का फायदा होता है। तो मैंने कहा कि पहले पृष्ठभूमि तैयार करो। उस तरह से जमीन तैयार करो।

दूसरी बात यह है कि लोगों ने वहां पर कहा कि एनडीए के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के नेता कुछ बोलते ही नहीं, तो हमने कहा कि वह बोलेंगे भी नहीं कभी। क्योंकि, आप उनको नहीं चुनते हो। आप उन्हें वोट नहीं देते हो। आप पार्टियों को वोट देते हो- कांग्रेस को वोट देते हो। भाजपा को देते हो। आम आदमी पार्टी को देते हो। एनसीपी को देते हो। तब उस समय यह नहीं सोचते कि हमारी बात उठाने वाला कोई है, मैं इसी को वोट दूंगा, चाहे वो हारे या जीते। और जब सरकारें बन जाती हैं, फिर यह याद आ जाता है कि हमारा नेता क्या कर रहा है? आप पार्टी को वोट देते हो, तो पार्टी से हिसाब-किताब मांगो। इनसे हिसाब-किताब क्यों मांग रहे हो?

डॉ. उदित राज, भाजपा सांसद

दूसरी बात है कि वह खुद जानते हैं कि पार्टियां जिताकर लायी हैं, तो वो बोलेंगे ही नहीं और मान लो वो पार्टी छोड़ भी देते हैं, तो दूसरा खड़ा हो जाएगा। तो यह भी तो समाधान नहीं है कि वह पार्टी छोड़ दे। तीसरी बात मैंने बोली कि मेरी औकात पार्टी के अंदर एक काउंसलर का टिकट देने की नहीं है। अगर मैं कोई नाम आगे बढ़ाता भी हूं, तो  कहा जाएगा कि जिला अध्यक्ष से स्वीकृति आनी चाहिए। संघ के लोगों का क्या विचार है? तो हमने कहा कि भाई मैं झूठ नहीं बोलता हूं समाज में। जो अंदर की बात है, बाहर करता हूं। ज्यादातर बेईमान नेता, बाहर अपने समाज में जाएंगे और कहेंगे कि मैं तो मोदी जी से भी लड़ लूंगा। अमित शाह से लड़कर समाज के लिए काम कर लूंगा… और अंदर जाकर भीगी बिल्ली बन जाते हैं।

जितने सवाल साढ़े चार साल मे मैंने उठाये हैं, उतने किसी ने नहीं उठाये। चाहे वह चंद्रशेखर रावण की रिहाई की बात हो या कोई और मुद्दा। निजी क्षेत्र में आरक्षण को लेकर भी मैंने आवाज उठायी है। 2 अप्रैल को जो दलितों को बंद किया गया, मैं खड़ा हो गया। इतना विपक्ष का भी आदमी नहीं बोला होगा, जितना मैं बोला। मैंने तो यह भी कहा टेलीविजन पर कि अभी जो दलित सांसद, विधायक और नेता हैं, उनमें ज्यादातर नौकरी कर रहे हैं। मैं नौकरी नहीं करूंगा। मैं समाज की बात रखूंगा। समाज का जहां अधिकार और हक छीना जाएगा, मैं खड़ा हो जाऊंगा। मुझे सांसदी का कोई लगाव नहीं है। लगाव है, तो देश से है। सामाजिक न्याय से है। सबकी भागीदारी से है। यह अलग बात है कि समाज ने मेरा साथ नहीं दिया। 12 साल हमने अपनी पार्टी चलायी। समाज ने हमें वोट नहीं दिया, क्योंकि हम जीतने की स्थिति में नहीं थे। वहीं, जब भाजपा में गये तो, क्योंकि जिताने की स्थिति में थे, तो वही वोट आए।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

तो हमने कहा कि भाई जब आप नेता को वोट देते नहीं हो, आप पार्टी को वोट देते हो। तो नेता से हिसाब क्यों मांगते हो? पार्टी से हिसाब मांगो। फिर हमने कहा कि मंडल कमीशन को वीपी सिंह (विश्वनाथ प्रताप सिंह) ने लागू किया। लेकिन, जब उनका देहांत हुआ, तो ओबीसी समाज के चार-छह सौ लोग भी नहीं गए। जिस समुदाय का फायदा हुआ, उस समुदाय के लोगों को जाना चाहिए। शरद यादव इस्तीफा देकर आ गए। घर जाकर अकेले बैठ गए। हजार-दो हजार लोग भी उनको मिलने नहीं गये। शरद यादव जी लड़ाई तो लड़ें, लेकिन जब शरद यादव को आपके समर्थन की जरूरत है, तो आप लोग समर्थन न करें। आप आम आदमी पार्टी को, कांग्रेस और भाजपा को वोट देते रहो, और कहाे कि शरद यादव आप हमारे लिए लड़ते रहो, हम आपके साथ हैं। इसका क्या मतलब है?

आपने विश्वनाथ प्रताप सिंह जी का भी उदाहरण दिया?

हां, हमने कहा कि जब वीपी सिंह जी ने मंडल कमीशन जब लागू कराया, तो मुलायम सिंह विपक्ष में चले गए और चंद्रशेखर से हाथ मिलाया और सरकार गिरा दी। एक दूसरी बात यह कि उत्तर प्रदेश पहला प्रदेश है, जहां पर पदोन्नति में आरक्षण खत्म किया गया और पदों में उन्नति की जगह डिमोशन (अवनति) किया गया। लाखों लोगों का डिमोशन किया गया। जो दलित चीफ इंजीनियर था, उसको एक्जिक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया। सब इंस्पेक्टर को कांस्टेबल बना दिया गया। दो, तीन, चार महीने तक तो वे लोग शर्म से कार्यालय नहीं गए, घर से नहीं निकले। इतनी दुर्गति किसने की? मुलायम सिंह यादव ने की। तो जब वैचारिक बात हो, तो तथ्यों को सामने रखना पड़ेगा और हम रखेंगे।

हालांकि, नई पीढ़ी चाहे वह अखिलेश यादव हों, चाहे धर्मेंद्र यादव हों, सामाजिक न्याय की बात को समझते हैं और वे इस पक्ष में नहीं हैं कि आरक्षण खत्म किया जाए और मैं जानता हूं। वे संसद में भी अच्छा बोलते हैं। तो इसे जातिवाद पर लोग ले गए, पार्टी पर ले गए। हमने कहा कि भाई मैं या तो बोलूंगा या नहीं बोलूंगा, मैं चला जाता हूं। तो वहां कुछ नासमझ लोग भी थे और हो-हल्ला करने लगे। तो कहने का यह मतलब है कि तथ्य के आधार पर तो कहो कुछ, हो-हल्ला करने का क्या मतलब है? तो वहां से बिना बोले मैं चला गया।

यह एक दु:खद घटना थी। आपको क्या लगता है, यह एक तरह का नव सामंतवाद है?

नव सामंतवाद तो… प्रमुख जातियां, ज्यादातर जो सवर्ण हैं, वो कहते हैं कि जितना ज्यादा अत्याचार दलितों के ऊपर पिछड़ा वर्ग करता है, उतना हम नहीं करते। तो जो जातियां दबंग है, वो दबाती तो हैं। लेकिन, अब कुछ फर्क आ रहा है। जैसे-जैसे इनमें सामाजिक चेतना आ रही है, तो वे जानते हैं कि यह गलत है। तो फर्क तो आया है। लेकिन, जिस जाति की संख्या ज्यादा है, पार्टी वही चला पा रहा है। लालू जी पार्टी चला पाये। मुलायम सिंह यादव चला पाये। मायावती चला पायीं। शरद पवार चला पाये। नवीन पटनायक चला पाये। दो पार्टियां छोड़ दी जाएं, क्योंकि दो पार्टियां सबको लेकर के इनकंपास(समेटना) नहीं करेंगी, तो नहीं चल पाएंगी, उनकी संख्या कम है। बाकी जितनी भी स्थानीय पार्टियां हैं। अक्सर वही 99 प्रतिशत- जिसकी जाति की संख्या बड़ी है, वही पार्टी चला ही सकता है। हावर्ड का पढ़ा हुआ आदमी आकर ग्राम प्रधान का चुनाव नहीं जीत सकता, अगर उसका जाति समीकरण पक्ष में नहीं है। नोबेल विजेता को कहता हूं, चुनाव लड़कर सांसद-विधायक बनिये। जाति मेरिट है। पैसा मेरिट है। धर्म मेरिट है। विकास की बात की जाती है। जब सरकार बन जाती है, तब विकास की बात आती है। लेकिन, जब ईवीएम का बटन दबाने की बात आती है, तो कहते कि हमारे गौरव की बात है कि हमारी जाति का आदमी नेता है।

 

आप हमेशा कहते हैं कि जो दलित नेता सांसद, विधायक हैं, वो जनप्रतिनिधि नहीं है, बल्कि नौकरी कर रहे हैं। किस ओर संकेत करना चाहते हैं आप?

नौकरी ही कर रहे हैं। जो पार्टी कहेगी, वह करेंगे। नहीं तो नौकरी से निकाल दिए जाएंगे। इस सरकार में जब कोई गलती करेगा, तो सरकार उसे डिसमिस कर सकती है। तो उस तरह से कर रहे हैं। सारे नहीं कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर कर रहे हैं। और जो अगर लड़ते भी हैं, तो शहीद हो जाते हैं। शहीद होने के बाद कोई पूछता नहीं।

पिछले चार साल में सांसद के कार्यकाल में आपने जिस तरह से मीडिया और संसद में भी जो बोला है। हमने आपको सुना है, पढ़ा है। आपको लगता नहीं, कि भाजपा और आपमें एक दूरी बन गयी है?

मेरी तरफ से तो दूरी नहीं है, और पार्टी की तरफ से भी दूरी नहीं होनी चाहिए। मैं गलत क्या कह रहा हूं? देशभक्ति वही है, जब सभी लोगों को शामिल करके- उत्पादन में, शिक्षा में, स्वास्थ्य में, राजनीति में, बाजार में, हर क्षेत्र में -उनको लिया जाए। तभी यह देश अमेरिका या किसी विकसित देश की तरह हो सकता है, नहीं तो गरीब होगा। दूसरी बात, अगर भागीदारी से पिछड़े लोगों की माली हालत ठीक होती है। आय बढ़ती है। तो यह लोग बड़े स्तर पर वाहन, कपड़ा, घड़ी, मोबाइल खरीदेंगे। यह सब उत्पादन किसका है? ज्यादातर तो वैश्य समाज के हाथ में है। तो जब इनको गरीब रखोगे, तब आपकी अर्थव्यवस्था ही बड़ी नहीं होगी। तो, हम तो अर्थव्यवस्था को बड़ा करने के चक्कर में, ग्लोबल पाॅवर मजबूत करने के लिए यह कहते हैं। तो इनको शिक्षित करो, इनको भागीदारी दो, इनको नौकरी दो। इससे इनकी भी चीजों को खरीदने की क्षमता बढ़ेगी। इससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। दूसरी बात यह है कि इनके शारीरिक शक्ति का, मानसिक शक्ति का उपयोग हो देश के निर्माण में। इनकी शारीरिक, मानसिक शक्ति का, इनकी शिक्षा का इस्तेमाल नहीं होगा, वह भी इतनी बड़ी संख्या का, तो देश कहां से तरक्की करेगा?

2016 में नयी दिल्ली में एक जनसभा को संबोधित करते डा‍ॅ. उदित राज

अगर भाजपा की तरफ से थोड़ी-बहुत अनबन होती है और अगर पार्टी आपको टिकट नहीं देती है, तो क्या फिर से आने वाली राजनीति में आप अपने स्तर पर सक्रिय रहेंगे?

जब सवाल ही खड़ा नहीं होता, तो उत्तर कहां से दें।

यह एक सवाल था, भविष्य को लेकर के…

भविष्य का सवाल अटकलों का सवाल होता है, इसमें कहीं दूर-दूर तक कोई बात…

लेकिन, कहीं न कहीं जिन उदित राज को पूरा देश जानता है। उनके अंदर बहुजनों के लिए जो प्रेम है। उनके हितों के लिए लड़ने का जो साहस है। वह आपको सबसे अलग खड़ा करता है…।

क्यों? राष्ट्रवादी हैं। तो मुझसे ज्यादा राष्ट्रवादी कोई हो ही नहीं सकता। सामाजिक न्याय वाला कोई हो नहीं सकता। आंबेडकरवादी कोई हो ही नहीं सकता। मैं तो सबकी भागीदारी की बात करता हूं। तो हमारा वाणिज्यिक प्रभाव भी बढ़ेगा। एकता भी बढ़ेगी। अखंड भारत होगा। श्रेष्ठ भारत होगा। तो इनके हक की बात करने का मतलब क्या है? अंतत: इसके दूरगामी परिणाम होंगे। उनकी विचारधारा से हम कहां गलत हैं? क्या वह कह सकते हैं कि हम गलत हैं। हम देश भक्त नहीं हैं? हम तो सबसे ज्यादा देशभक्त हैं। तो मैं तो सबसे ज्यादा देशभक्ति का काम कर रहा हूं।

संसद के मानसून सत्र में दो महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए- एक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को लेकर। जिसको सुप्रीम कोर्ट ने कमजोर किया था। केंद्र सरकार ने उसको संशोधित किया। दूसरा, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया। इसका क्या मतलब है?

देखिए, न्यायाधीश ए.के. गोयल कई मामलों में आरक्षण विरोधी हैं, उन्होंने फैसला सुनाया। 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को कमजोर कर दिया। तीन बातें उसमें जोड़ दीं, जैसे कि एफआईआर तभी दर्ज होगी, जब डीएसपी स्तर का अधिकारी लिखकर देगा। इसमें अगर कोई सरकारी कर्मचारी है, तो उसका नियुक्तिकर्ता लिखकर देगा और कोई आमजन है, तो एसएसपी लिखकर देगा, तभी पीड़ित पर हुए अत्याचार के खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी। तीसरी और खतरनाक बात यह थी उसमें कि अगर मुकदमा झूठा साबित हुआ, तो अधिकारी पर जिम्मेदारी तय की जाएगी, तो डर के मारे कोई लिखकर नहीं देगा एफआईआर के लिए। अत: अधिनियम तो खत्म हो जाता है। सरकार ने इसको संशोधित किया। 2 अप्रैल को जो दलितों ने भारत बंद कर आंदोलन किया, उसका बड़ा असर पड़ा। तो हमने संसद में और संसद के बाहर ए.के. गोयल को हटाने की मांग की। इसके पहले पिछले साल अहमदाबाद हाई कोर्ट में न्यायाधीश ने एक फैसला सुनाते हुए कहा कि भ्रष्टाचार और आरक्षण से देश बर्बाद हुआ है। तो दो बार संसद में मैंने बोला, तब जाकर उनके फैसले का वह हिस्सा हटाया गया। तो मैं तो बोल ही रहा हूं। दूसरा, 5 मार्च का जो यूजीसी ने सर्कुलर (परिपत्र) जारी किया, उसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग का आरक्षण लगभग समाप्त कर दिया गया। जैसे- तमिलनाडु विश्वविद्यालय में 65 अध्यापकों की रिक्ति निकली, उसमें केवल पिछड़ा वर्ग के दो अध्यापक लिए गए। जबकि, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का एक भी नहीं लिया गया। इस दौरान विश्वविद्यालयों में धड़ाधड़ विज्ञापन निकाल दिया भर्ती करने के लिए, क्योंकि कई साल से भर्तियां नहीं हो रही थीं और इसलिए भी एेसा किया, ताकि 100 प्रतिशत या 90 प्रतिशत सवर्ण भर्ती हो जाएं। सरकार ने उसको रोका, बहुत अच्छा काम किया।

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राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला, अच्छी बात है। तो पिछड़ा वर्ग के किसी व्यक्ति पर या इस वर्ग के सरकारी कर्मचारी पर मान लो अत्याचार होगा, तो उसकी फरियाद सरकार तक जा सकती है, तो उसे न्याय मिलेगा। या आरक्षण लागू न होने पर भी कार्रवाई हो सकती है। तो इस तरह से जो अच्छे काम हुए हैं, उसे कहना चाहिए।

सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि पिछले चार वर्षों में जो नियुक्तियां हुईं, एक तो वे बहुत कम हुईं। उनमें भी पिछड़े वर्ग के लोगों को हक बहुत कम मिला। तो फिर यह पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक अधिकार का क्या मतलब है?

यह तो मैं खुद कहता हूं कि चार-साढ़े चार से, पांच-छह साल से भर्तियां लगभग बंद पड़ी हुई हैं। इससे बड़ा नुकसान जो हुआ है, वह पिछड़ा वर्ग का हुआ है। मैं अपनी सरकार से बातचीत करता हूं इस बारे में। दरअसल, पिछड़ा वर्ग सोया हुआ है और उसको 27 प्रतिशत की जगह सिर्फ पांच-छह प्रतिशत ही फायदा हो पाया है। पिछड़ा वर्ग अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग की तरह अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ता। पिछड़े वर्ग की राजनीति जरूर है, लेकिन वह व्यक्तिगत फायदे के लिए है। राजनीति में पिछड़े वर्ग का कोई व्यक्ति व्यक्तिगत फायदे के लिए जुड़ता है। वह लड़ाई या संघर्ष करता है, तो इसलिए कि मैं भी सांसद-विधायक बन जाऊं, मंत्री बन जाऊं। सामाजिक मुद्दों से, आंदोलन से पूरे समाज को फायदा होता है। तो पिछड़े वर्ग को दलितों की तरह आंदोलन करना चाहिए। कि मेरी तो एक ही पीढ़ी का फायदा नहीं पहुंच पाया, उसके पहले ही बंद कर दिया आपने। तो पिछड़े वर्ग में जागृति की कमी है, जिसकी वजह से इस वर्ग के लोगों का सर्वाधिक नुकसान हो रहा है।

(लिप्यांतरण एवं संपादन : प्रेम बरेलवी)


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