सामूहिक आत्महत्या के लिए क्यों मजबूर हो रहा निम्न-मध्यम वर्ग?

चीजों से जातियों के आधार पर समझने के अतिरिक्त यह देखना भी आवश्यक है कि उपभोक्तावादी संस्कृति भी इस तरह की सामूहिक आत्महत्याओं का कारण बनती है।  पढिए फारवर्ड प्रेस का विश्लेषण :  

कर्ज एवं आर्थिक तंगहाली से सामूहिक आत्महत्याओं ने पकड़ा जोर

(एनसीआरबी की 30 दिसंबर 2016 को जारी रिपोर्ट को देखें तो कर्ज एवं आर्थिक तंगहाली के कारण साल 2014 में 12,360 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने खुदकुशी कर ली थी, जो  2015 में बढ़ कर 12,602 हो गई। चूंकि 2016 के बाद इन आत्महत्याओं पर एनसीआरबी की कोई रिपोर्ट नहीं आई है, अत: इन आत्महत्याओं का अधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, बावजूद पिछले आंकड़ों से हालात का अनुमान लगाया जा सकता है।  इधर कर्ज और तंगहाली के कारण हो रही आत्महत्याओं में सामूहिक आत्महत्याओं ने जोर पकड़ा है। साामाजिक आधार पर देखें तो अकेले आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किसान और मजदूर जहां अन्य पिछडा वर्ग की कास्तकार जातियों से रहे हैं वहीं  सामूहिक आत्महत्या करने वाले परिवार मुख्य रूप से निम्न-वैश्य जातियों के हैं। इनमें अन्य जातियां के निम्न मध्यम वर्गीय परिवार व कुछ मंझोले स्तर के व्यापारी भी शामिल हैं। -संपादक )

पिछले 14 जुलाई को झारखंड के हजारीबाग में नोटबंदी एवं जीएसटी की मार से आर्थिक तंगी के शिकार हुए माहेश्वरी परिवार के छ: लोगों की सामूहिक आत्महत्या का मामला झारखंड अभी भूला भी नहीं पाया था कि सूबे की राजधानी रांची में आर्थिक तंगी के शिकार एक ही परिवार के सात लोगों की सामूहिक आत्महत्या के हृदयविदारक घटना से पूरा ​राज्य स्तब्ध रह गया, वहीं ऐसी घटनाओं ने हमारी व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

आर्थिक तंगी के शिकार हुए माहेश्वरी परिवार के छ: लोगों ने की थी सामूहिक आत्महत्या

दूसरी तरफ उपभोक्तावादी संस्कृति भी इस तरह की सामूहिक आत्महत्याओं का कारण बनता है। भ्रष्टाचार का मूल आधार भी उपभोक्तावादी संस्कृति की उपज है। क्योंकि उपभोक्तावाद पूंजीवादी समझ की सबसे खतरनाक अवधारणा है। जाहिर है कि पूंजीवाद मुनाफा पर आधारित अवधारणा है, जिसके लिए ऐसा बाजार जरूरी होता है जहां कई गैर जरूरी माल भी आसानी से खपत हो और मुनाफा बेहिसाब। मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग इसके लिए सबसे बड़ा और सार्थक बाजार होता है।

उल्लेखनीय है कि एनसीआरबी की 30 दिसंबर 2016 को जारी रिपोर्ट को देखें तो कर्ज एवं आर्थिक तंगहाली के कारण साल 2014 में 12,360 किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों ने खुदकुशी कर ली थी, जो  2015 में बढ़ कर 12,602 हो गई। चूंकि 2016 के बाद इन आत्महत्याओं पर एनसीआरबी की कोई रिपोर्ट नहीं आई है, अत: इन आत्महत्याओं का अधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, बावजूद पिछले आंकड़ों से हालात का अनुमान लगाया जा सकता है। क्योंकि कर्ज और तंगहाली के कारण हो रही आत्महत्याओं में सामूहिक आत्महत्याओं ने जोर पकड़ा है जिसमें ​किसी तरह अपनी और अपने परिवार की अजीवीका चला रहे निम्न मध्यम वर्ग सहित बड़े व्यापारी भी शामिल हैं।

बता दें कि 11 अक्टूबर 2016 को रांची में ही आर्थिक तंगी के कारण एक ही परिवार के छ: लोगों ने आत्महत्या कर ली थी। जबकि परिवार के सारे सदस्यों ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर रखी थी। बावजूद उन्होंने सामूहिक रूप से आत्महत्या इसलिए कर ली थी कि उन्हें कोई काम नहीं मिल रहा था और उन्हें कहीं जाकर किसी से काम मांगने में उनका आत्मस्वाभिमान आड़े आ रहा था।

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हाल ही में 14 जुलाई को हजारीबाग में एक व्यवसायी माहेश्वरी परिवार के छ: सदस्यों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली। क्योंकि वे समाज में कर्ज से दबे हुये थे। कारण जो खुलकर सामने आया वह यह था कि नोटबंदी और जीएसटी की दोहरी मार के वे शिकार हो गए थे।

पिछले 30 जुलाई को रांची जिला के कांके प्रखंड अंतर्गत बोड़ेया के अरसंडे में दीपक झा अपने परिवार के छ: सदस्यों सहित सामूहिक आत्महत्या कर लिया। बिहार के मुंगेर जिला अंतर्गत बरियारपुर थाना क्षेत्र स्थित चिरैयाबाद गांव का रहने दीपक अपने पूरे परिवार मां, पिता, एक छोटा भाई, पत्नी व दो बच्चों सहित अलख नारायण मिश्रा के मकान में किराये पर रहता था। पिता सच्चिदानंद झा के झारखंड के ही पतरातू में रेलवे से रिटायर होने के बाद पूरा परिवार रांची आ गया। वर्ष 2011 से 2015 तक दीपक बेरोजगारी से परेशान रहा। बाद में कंसलटेंसी के जरिए उसे रांची मेन रोड स्थित ऐसीलिएंट फर्नीचर में स्टोर मैनेजर की नौकरी मिली। छोटे भाई रूपेश को बीई लिमिटेड फार्मा में नौकरी मिली थी। लेकिन वह कुछ दिनों बाद ही बेरोजगार हो गया। पिता के रिटायरमेंट के बाद पूरे परिवार का खर्च का जिम्मा उस पर आ गया था। उसे ऐसीलिएंट फर्नीचर में 12 हजार का मासिक वेतन मिलता था।

झा परिवार का फाइल फोटो

दीपक ने सुसाइड नोट में अपने परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के पीछे जहां अपने बेटे की बीमारी में होने वाले खर्च को बताया है, वहीं दूसरी ओर धोखाधड़ी के मामले में बदनामी के लिए किसलय मिश्रा को जिम्मेदार ठहराया है। किसलय मिश्रा, दीपक झा के साथ मेन रोड स्थित ऐसीलिएंट फर्नीचर नामक दुकान में काम करता था।

इस दुकान में गोदरेज कंपनी का फर्नीचर बेचा जाता है। दीपक ने अपने सुसाइड नोट में किसलय मिश्रा को माफ करने का अनुरोध किया है। जबकि उसके भाई रूपेश ने मौत के लिए किसलय को जिम्मेदार ठहराते हुए उसे सजा दिलाने की मांग की है। मालूम हो कि किसलय के खिलाफ 27 जुलाई को ऐसीलिएंट फर्नीचर के संचालक हर्षवर्द्धन जैन ने भी धोखाधड़ी के आरोप में लोअर बाजार थाने में प्राथमिकी दर्ज करायी थी। पुलिस की टीम उसे बंगाल के पार्क स्ट्रीट थाना क्षेत्र से गिरफ्तार कर 29 जुलाई  को न्यायिक हिरासत में जेल भेज चुकी है।

क्या लिखा है दीपक झा के सुसाइड नोट में

दीपक झा ने लिखा है कि साल 2011 में पिता सच्चिदानंद झा पतरातू में रेलवे से रिटायर हो गये। इसके बाद परिवार रांची आ गया। वर्ष 2011 से 2015 तक वह बेरोजगारी से परेशान रहा। बाद में कंसलटेंसी के जरिए उसे ऐसीलिएंट फर्नीचर में स्टोर मैनेजर की नौकरी मिली। छोटे भाई रूपेश को बीई लिमिटेड फार्मा में नौकरी मिली थी। लेकिन वह कुछ दिनों बाद ही वह नौकरी छूट गयी। पिता के रिटायरमेंट के बाद पूरे परिवार के खर्चे का भार उस पर आ गया, जबकि उसका तनख्वाह मात्र 12 हजार रूपए मासिक था।

जांच-में-जुटी-एफएसएल-की-टीम

दीपक झा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि 9 जून 2017 को उसके बेटे का जन्म हुआ। जन्म के बाद से ही उसका सिर बड़ा था। उसके इलाज में करीब 25 लाख रुपये खर्च हो गये। इलाज के लिए पिता के रिटायरमेंट का पूरा पैसा,  मां, पत्नी के सारे जेवरात तक बेच डाले। गांव की जमीन भी बेचनी पड़ी। लेकिन बेटे जंगू की बीमारी ठीक नहीं हो सकी। उसने बेटे के इलाज के लिए अपने दोस्तों और परिचितों से भी पैसे लिये। जहां एक ओर बेटे के इलाज और परिवार के खर्च का बोझ दीपक पर था। वहीं दूसरी ओर प्रति माह घर का किराया देना, घर का खर्च देना और बेटी दृष्टि की पढ़ाई के खर्च से वह परेशान रहने लगा था। सुसाइड नोट में उसने आगे लिखा है कि  बेटे के इलाज के लिए उसने ग्राहकों के साथ-साथ स्कूल के दोस्तों व अपने मालिक से कर्ज लिया। 13 मार्च को उसकी शादी की सालगिरह थी। तब उसके पास पैसे नहीं थे। ऐसे में उसने 2 हजार रुपये एडवांस लिया था। 25 मार्च को पत्नी के बर्थ डे के दिन भी उसने पांच हजार का कर्ज मोरहाबादी में रहने वाले एक सीबीआइ अधिकारी जो उसके ग्राहक थे, से उधार लिया था।

किसलय से दोस्ती के बाद बढ़ती गयी परेशानी

दीपक ने सुसाइड नोट में यह भी लिखा है कि जमशेदपुर के किसलय मिश्रा नामक व्यक्ति से कुछ माह पहले उसकी दोस्ती हुई थी। वह भी  गोदरेज कंपनी में काम करने आया था। शुरुआती दिनों जब किसलय के पास पैसे नहीं थे, तब दीपक ने उसे पैसे से भी मदद की थी। खाने के लिए भी दिया और कभी-कभी अपने घर ले जाकर भी खाना खिला देता था। इसके बाद किसलय मिश्रा से उसकी अच्छी दोस्ती हो गयी थी। किसलय को उसने अपने क्रेडिट कार्ड से मोबाइल खरीद कर दिया था, वह भी अपने पहचान पत्र पर। इसके बाद किसलय ने उसे पैसे कमाने का उपाय भी सुझाया। दीपक ने लिखा है कि किसलय और अजीत के कहने पर वह कस्टमर्स को डिस्काउंट के पैसे नहीं देता था। पूरी ब्रिकी पर एमआरपी पर पैसे लेकर वे डिस्काउंट के पैसे रख लेते था। डिस्काउंट का पैसा आपस में बांट लिया जाता था।

दीपक ने लिखा है कि दोस्ती में उसने मोबाइल व बाइक क्रेडिट कार्ड पर किसलय को दिलवाया था, लेकिन किसलय ने मंथली इंस्टालमेंट नहीं दिया। इएमआई का दिया गया चेक जब बाउंस हो गया, तब रिकवरी एजेंट उसके घर आ गये। रिकवरी एजेंट दीपक को भला- बुरा कहने लगे। तब परिवार के सामने उसे बेइज्जती का सामना करना पड़ा था।

इस घटना को लेकर परिवार को काफी आघात पहुंचा था। तब उसकी मां ने पुराने पीतल और कांसा के बर्तन बेच कर रुपये चुकाये थे। इस बात को लेकर दीपक के भाई रूपेश ने किसलय को काफी भला-बुरा भी कहा था। लेकिन किसलय और दीपक की नजदीकियां बनी रही।  किसलय ने कंपनी में काम करते हुए ग्राहकों से ठगी के लिए उपाय निकाला। किसलय ने बाद में ग्राहकों से फर्नीचर बुकिंग के पैसे लेकर उन्हें डिलिवरी नहीं दी।

किसलय ने कैसे दिया धोखा

दीपक की सुसाइड नोट के अनुसार  किसलय ने कोडरमा और गढ़वा के दो ग्राहकों से पैसे लिए थे। इसके लिए झांसा देकर वह रूपेश को भी साथ ले गया था। ठगी के मामले में पुलिस ने जब किसलय को गिरफ्तार किया तब वह शोरूम संचालक के साथ लोअर बाजार थाने 29 जुलाई को गया था। वहां हाजत में बंद किसलय ने आरोप लगा दिया कि ठगी के 2.70 लाख उसने दीपक और रूपेश को दिये हैं।

हालांकि दीपक ने  लिखा है कि वह धोखाधड़ी में शामिल नहीं था। क्योंकि धोखाधड़ी में ज्यादा रुपये मिलते, तो वह रुपये लेकर क्यों नहीं भागता। धोखाधड़ी के बाद रुपये लेकर तो किसलय भागा था। दीपक के अनुसार इस घटना के बाद मालिक ने उसे चार तमाचा मार कर माफ कर दिया, लेकिन वह बदनाम हो गया। इसके बावजूद उसने सुसाइड नोट में किसलय को माफ करने के लिए कहा है। उसने अपने सुसाइड नोट में उन 15 लोगों के नाम और उनके लिये रकम का भी जिक्र किया है। जिनसे उसने उधार लिये है। इसके अलावा उसके कुछ अन्य लोगों के नाम भी लिखे हैं।

क्रोमेटोफोबिया का शिकार तो नहीं था झा परिवार

एक ही परिवार के सात लोगों की मौत ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जानकार बताते हैं कि कहीं पूरा परिवार खासकर उसका मुखिया क्रोमेटोफोबिया से तो पी़ड़ित नहीं था। क्रोमेटोफोबिया यानी पैसे को लेकर  डर। पश्चिमी देशों में तो कर्ज के डर से हर पांच में एक व्यक्ति पीड़ित है, लेकिन अपने देश में इस तरह का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।

सामूहिक आत्महत्या पर मनोचिकित्सक डॉ अमूल रंजन कहते हैं जिसके सिर पर कर्ज का बोझ हो वह क्रोमेटोफोबिया से प्रभावित हो सकता है और इस मनोवैज्ञानिक हालात में वह खुदकुशी जैसा कदम भी उठा सकता है। आमतौर पर इस फोबिया यानी डर से वह लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं जिनके पास धन की तंगी होती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार कई बार ज्यादा धन भी इस फोबिया का कारण बनता है। मसलन, कोई बच्चा अगर अपने मां-बाप को पैसे के लिए लड़ते-झगड़ते देखे तो बड़ा होकर उसके मन में पैसे को लेकर निगेटिव धारण बैठ जायेगी और वह क्रोमेटोफोबिया का शिकार हो सकता है।

ऐसी घटनाओं का सामाजिक ताना—बाना और व्यवस्था जिम्मेवार

हाल के दिनों में आत्महत्या की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। रांची के कांके और हजारीबाग में हुई घटनाओं में भी हो सकता है कि आर्थिक परेशानी के कारण लोग डिप्रेशन में चले गये हों। इसे एक दिन का प्लान नहीं कह सकते। ऐसी घटनाएं प्लानिंग के तहत होती हैं। पहले घर के बड़े मिल कर परेशानी का समाधान निकालते थे। आज परेशानी से बचने के लिए व्यक्ति को हत्या या आत्महत्या करना ही आसान लगता है। बड़ों की प्लानिंग में छोटों को भी हामी भरनी पड़ जाती है। इसे कंट्रैक्चुअल सुसाइड कह सकते हैं। यानी नकारात्मक सोच के कारण आत्महत्या करना।  ऐसी घटना का एक कारण यह भी है कि व्यक्ति समाज या अपने रिश्तेदारों से कोई बात शेयर नहीं कर पाता है और दूसरी होने वाली घटना से प्रेरित हो जाता है। आर्थिक परेशानी, बदनामी और बीमारी के कारण अवसाद में चला जाता है। जिससे निकलने का एकमात्र उपाय आत्महत्या को समझ लेता है। ऐसी स्थिति का पैदा होना निश्चित रूप से हमारा सामाजिक ताना—बाना और व्यवस्था पूरी तरह जिम्मेवार है। जिसका एकमात्र उपाय व्यवस्था में बदलाव है, जिसके बाद हमारा सामाजिक ताना—बाना भी बदल जाएगा।


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