फॉरवर्ड प्रेस

संसद में उठी एससी-एसटी एक्‍ट को संविधान की नौवीं अनुसूची में रखने की मांग

अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून पर लोकसभा में हुई बहस में किसने क्‍या कहा?

बीते गुरूवार को लोकसभा में अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून से जुड़ा एक संशोधन विधेयक केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया। इस दौरान केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने संशोधन विधेयक की प्रस्तावना संबंधी घोषणायें तो की ही, साथ ही इस कानून को और सुदृढ करने के प्रति अपनी सरकार की प्रतिबद्धता प्रकट की। लेकिन विपक्ष सरकार के इस संशोधन विधेयक मात्र से संतुष्ट नहीं दिखा।

विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी दिखावे के लिए संविधान की बात करते हैं, लेकिन उनके मन में मनुस्मृति है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून को संविधान की नौवीं सूची में शामिल किया जाना चाहिए ताकि इससे यह न्यायपालिका की समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाये। सरकार ‘चहेते’ कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए तो अध्यादेश लेकर आयी,  लेकिन दलितों और वंचितों के खिलाफ अत्याचार की रोकथाम के लिए कानून सख्त करने के वास्ते अध्यादेश नहीं ला सकी। उच्चतम न्यायालय के 20 मार्च के फैसले के कुछ समय बाद ही सरकार को इस संबंध में अध्यादेश लाना चाहिए था, क्योंकि ऐसा हो गया होता तो पिछले तीन-चार महीने में एससी-एसटी समुदाय के लोगों के खिलाफ हुए उत्पीड़न में उन्हें न्याय तो मिलता। दुर्भाग्यवश सरकार की ओर से ऐसा नहीं किया गया। उन्‍होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री की जुबान पर बुद्ध, फुले, संत कबीर, आंबेडकर और संत विश्वेश्वर होते हैं, लेकिन दिल में मनु रहता है। प्रधानमंत्री दिखावे के लिए संविधान की बात करते हैं, लेकिन उनके मन में मनुस्मृति होती है।

मल्लिकार्जुन खड़गे, नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा

जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तारिक अनवर ने कहा कि सरकार मजबूरी और दबाव में भारी मन से यह विधेयक लायी है। यदि उसकी नीयत साफ होती तो उच्चतम न्यायालय के फैसले के तुरंत बाद इसे अध्यादेश के रूप में लाया गया होता और 12 लोगों की जान तथा करोड़ों की संपत्ति का नुकसान नहीं उठाना पड़ता।

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वहीं राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता व केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि इस संशोधन से दलित और वंचित समाज के लोग आज राहत महसूस कर रहे होंगे। संशोधन दर्द का तात्कालिक मरहम है स्थायी इलाज नहीं। आरक्षण की अधिकतम सीमा 50प्रतिशत से बढ़ायी जाये। साथ ही न्यायपालिका में आरक्षण की वकालत करते हुये उन्होंने कहा कि जब तक सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व न्यायपालिका में नहीं होगा, तब तक ऐसे फैसले आते रहेंगे।

चर्चा में भाग लेते हुए लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान ने कहा कि वी.पी. सिंह की सरकार के बाद मोदी सरकार ने ही दलितों के लिए काम किया है। आज देश में अल्पसंख्यकों, दलितों और मुसलमानों की जो स्थिति है, उसके लिए 55 साल का कांग्रेस का शासन जिम्मेदार है या चार साल का मौजूदा सरकार का शासन। सरकार पर उद्योगपतियों के पक्षपात के आरोपों को खाजिर करते हुये उन्‍होंने कहा कि इस सरकार ने सदन में कोई भी ऐसा कानून पारित नहीं किया, जो किसी भी जाति या वर्ग के खिलाफ हो। यदि 70 साल में देश की सारी संपत्ति चंद उद्योगपतियों के पास जमा हो गयी है तो इसके लिए भी चार साल की मोदी सरकार की बजाय 55 साल की कांग्रेस सरकार जिम्मेदार है।

वहीं राष्ट्रीय जनता दल के जय प्रकाश नारायण यादव ने कहा कि सरकार पर इस विधेयक को लाने का दबाव था इसलिए वह विधेयक लायी है। उच्चतम न्यायालय के इस कानून को कमजोर करने के फैसले के खिलाफ आंदोलन नहीं होता तो यह विधेयक सरकार नहीं लाती। उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान दलित आंदोलनकारियों पर जो मामले दायर किए गए थे, उन्हें सरकार को वापस लेना चाहिए।

जबकि जनता दल यूनाईटेड के कौशलेंद्र कुमार ने कहा कि सरकार पर आरक्षण विरोधी होने का आरोप लगाया जा रहा है जबकि मोदी सरकार दलितों तथा कमजोर वर्गों के लिए सबसे अच्छा काम कर रही है। विपक्ष सिर्फ सरकार को बदनाम करने का प्रयास कर रहा है।

विपक्षी दलों पर वार करते हुए भाजपा के विनोद कुमार सोनकर ने कहा कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के नाम का माला जपने वाली मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में न तो मध्यप्रदेश के महू में बाबासाहेब के सम्मान में कोई स्मारक बनवाया, न नागपुर की दीक्षाभूमि पर एक ईंट ही रखवाया। दिल्ली के  26 अलीपुर रोड पर स्मारक बनवाने के लिए तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने जमीन खरीदी थी,लेकिन 2004 से 2014 तक सत्ता में रही मनमोहन सिंह सरकार ने वहां भी कोई निर्माण कार्य नहीं कराया। उन्होंने भारतीय न्यायिक आयोग गठित करने की मांग भी सरकार से की,ताकि दलित और वंचित समाज के युवाओं को न्यायपालिका में हिस्सेदारी मिले।

बहस में भाग लेते हुए अन्नाद्रमुक के डॉ. के गोपाल ने कहा कि देश में गौरक्षकों द्वारा मृत मवेशियों के चमड़े आदि का काम करने वाले दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं, साथ ही उच्चतम न्यायालय के 20 मार्च के फैसले ने उनमें असुरक्षा का भाव और बढ़ा दिया था। उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए बताया कि राज्य सरकार ने दलितों के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए समुचित कदम उठाये हैं।

वहीं सरकार के पहल की तारीफ और आलोचना एक साथ करते हुए शिवसेना के अरविंद गणपत सावंत ने कहा कि सरकार ने इस मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को पलटने का तो साहस दिखाया है, लेकिन उसमें आरक्षण की अधिकतम सीमा के संबंध में इस न्यायालय के फैसले को पलटने की हिम्मत नहीं है। इसके साथ ही यह सरकार संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए भी कुछ नहीं कर रही है, जबकि चुनाव के समय इसका वादा किया गया था। सरकार ने समान नागरिक संहिता लाने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया।

तेलुगूदेशम पार्टी के सदस्य पी. रवींद्र बाबू ने सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि सरकार वाकई एससी/एसटी का भला चाहती है तो वह प्रस्तावित कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में जगह दे। सरकार संशोधन विधेयक लाकर घड़ियाली आँसू बहा रही है,अन्यथा वह इस कानून को कमजोर करने वाला फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश को राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण का अध्यक्ष नहीं बनाती।

उनके अलावा समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने अपने संबोधन में कहा कि यह विधेयक काफी जरूरी था। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के फैसले को सरकार की नाकामी बताते हुये कहा कि यदि उसने मजबूत पैरवी की होती तो आज संशोधन की जरूरत नहीं होती। उन्होंने कहा कि समस्या जड़ से समाप्त होनी चाहिये और इसके लिए मानसिकता बदलनी जरूरी है। यदि समय पर अध्यादेश लाया गया होता तो दो अप्रैल के आंदोलन की स्थिति नहीं आती।

वहीं सरकार का पक्ष रखते हुए अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने कहा कि 1993 में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की गयी थी, लेकिन अब भी इस वर्ग के लिए आरक्षित पदों पर पूरी तरह से भर्ती नहीं हुई है। दलितों तथा शोषितों के साथ अब भी अत्याचार हो रहा है और इस विचार को बदलने की सख्त जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस समस्या को समाप्त करने के लिए उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में इन वर्ग के न्यायाधीशों की नियुक्ति जरूरी है।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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