सरकार का नया फरमान : दलित शब्द कहने पर लगेगा प्रतिबंध

इस शब्द के उपयोग से अछूतों के आंदोलनों में बडी संख्या में अन्य पिछडा वर्ग के लोग भी शामिल हो जाते हैं, जिससे उनकी ताकत बढ जाती है। अगर इन्हें अनुसूचित जाति के नाम से संबोधित किया जाए तो इनके आंदोलन कमजोर हो जाएंगे। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

फुले, आंबेडकर की आवाज हैं दलित, रोकने की हो रही है साजिश

केंद्र सरकार ‘दलित’ शब्द को प्रतिबंधित करने के लिए हरसंभव कदम उठाने जा रही है। इसके लिए विभिन्न न्यायालयों के आदेश व सरकार द्वारा 1990 में जारी एक परिपत्र को हवाला दिया जा रहा है।

इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में सरकारी दस्तावेजों में ‘दलित’ शब्द का उपयोग नहीं हो सकेगा। सरकार इस तबके के लोगों को ‘अनुसूचित जाति’ कहकर संबोधित करेगी। इसका एक दूरगामी परिणाम यह होगा कि ‘दलित साहित्य’ समेत दलित विषयक विभिन्न अवधारणाओं पर आयोजन, शोध आदि के लिए सरकारी फंड नहीं मिलेगा। सरकारी फंड तभी मिलेगा, जब इस प्रकार की परियोजनाएं ‘अनुसूचित जाति’ के रूप में संबोधित की जाएंगी।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने इस संबंध में एक परिपत्र जारी कर राज्य सरकारों से ‘दलित’ शब्द के उपयोग बंद करने के लिए कहा है। परिपत्र में कहा गया है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी कार्य में ‘दलित’ शब्द इस्तेमाल ना हो तथा संविधान की धारा 341 के मुताबिक इस समुदाय के लोगों को अनुसूचित जाति लिखा और कहा जाए। इस संबंध में मध्य प्रदेश और बांबे हाईकोर्ट के इस साल आए दो फैसलों को ढाल बनाया गया है।

केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत

उपरोक्त फैसलों को लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने 1990 में कल्याण मंत्रालय (अब सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय) की एक अधिसूचना को फिर से जारी किया है, जिसमें दलित वर्गों को अनुसूचित जाति के रूप में संबोधित करने का निर्देश है।

बांबे हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के इस साल के फैसलों में जहां राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को निर्देश मिले थे, वहीं सूचना और प्रसारण मंत्रालय को भी इस बारे में मीडिया से दलित शब्द को बाहर करने के उपायों के बारे में कहा गया था।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर के साथ प्रदर्शन करतीं ग्रामीण महिलाएं

असल में जून में बांबे हाईकोर्ट ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को निर्देशित किया था कि 90 दिन के भीतर मीडिया में सुनिश्चित हो कि दलित शब्द का इस्तेमाल ना किया जाए।

कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार की ओर से पीसीआई (प्रेस काउन्सल ऑफ इंडिया) को भी जल्द ही इसे लेकर गाइड लाइन्स मिलने वाली हैं। यानी 15 सितंबर तक कोई ना कोई हलचल मीडिया में हो सकती है। अगर ऐसा हुआ तो सरकारी दस्तावेजों के साथ-साथ मीडिया में भी दलित शब्द पर प्रतिबंध होगा या कम से कम इस शब्द को न लिखने की सलाह सरकार की ओर से दी जाएगी।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के सूत्रों ने फारवर्ड प्रेस को बताया कि मंत्रालय ने राज्य सरकारों को जो भी पत्र भेजा है, उसमें मंत्रालय की पूर्व में की गई सिफारिशों की जानकारी दी गई है। मंत्रालय ने हाईकोर्ट के फैसलों का कोई जिक्र नहीं किया है। मंत्रालय ने अपने पत्र में 1990 के निर्देश के हवाले से जानकारी दी है कि दलितों का अनुसूचित जाति लिखा जाना चाहिए, हरिजन शब्द भी इस्तेमाल ना हो। यानी कि इस बारे में 28 साल पहले राज्यों को निर्देश दिये गये थे, उन्हें लागू किया जाए।

बांबे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ

यहां ध्यान दिला दें कि बांबे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ से पहले मध्य प्रदेश की ग्वालियर खंडपीठ का फैसला आया था जिसका जिक्र मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने अपने शासनादेश में किया है। जनवरी में ग्वालियर बेंच ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ‘दलित’ शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाने के आदेश दिये थे।

दरअसल, मोहन लाल माहौर ने दलित शब्द पर आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया था कि संविधान में इस शब्द का कोई उल्लेख नहीं है। इस वर्ग से जुड़े लोगों को अनुसूचित जाति अथवा जनजाति के रूप में ही संबोधित किया गया है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिषेक पराशर का कहना है कि यह आदेश मध्य प्रदेश में लागू हो चुका है।

बहरहाल, इसके बाद जून 2018 बांबे हाईकोर्ट ने अपने एक निर्देश में केंद्रीय सूचना मंत्रालय से कहा कि मीडिया में लिखी जा रही खबरों में दलित शब्द पर प्रतिबंध लगे।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ

कयास हैं कि प्रेस काउन्सल ऑफ इंडिया (पीसीआई) जो प्रिंट मीडिया की नियामक संस्था है, को मंत्रालय जल्द ही बांबे उच्च न्यायालय के आदेश को पढ़ने को कहेगा और उसके बाद मीडिया में दिशा-निर्देश जारी किये जाएंगे।

नागपुर कोर्ट में दलित शब्द के प्रयोग करने के मामले में ललितजी मेश्राम की ओर से याचिका दायर की गयी थी। जिसके बाद कोर्ट ने इस मामले में निर्देश जारी किये थे। यहां के वकील एसआर नारनावारे का कहना है कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय पहले ही केंद्र सरकार को दलित शब्द का प्रयोग करने के मामले में सलाह दे चुका है। बांबे हाईकोर्ट के एसआर नारनावारे ने इसी नियम को मीडिया पर लगाने की बात कही तो बीपी धर्माधिकारी और जेड ए हक की बेंच ने सुझाव दिया था कि आईबी मिनिस्ट्री को इस मामले में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश देना चाहिए।

मंत्रालय की चिट्ठी

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने तर्क दिया है कि 10 फरवरी, 1982 को गृह मंत्रालय ने राज्यों को दिये निर्देश में कहा था कि अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी करते समय संबंधित पत्र में ‘हरिजन’ शब्द हर्गिज ना लिखा जाए। साथ ही राष्ट्रपति के आदेश के तहत ‘अनुसूचित जाति’ के रूप में उनकी पहचान का उल्लेख करने को कहा था। 18 अगस्त 1990 में मंत्रालय ने राज्य सरकारों से शेड्यूल्ड कास्ट (एससी) के अनुवाद के रूप में  में ‘अनुसूचित जाति’ उपयोग करने का अनुरोध किया था।

छत्तीसगढ़ सरकार का दलित शब्द रोकने संबंधी शासनादेश। साथ ही सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के संबंधित पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी

दलित और ओबीसी समाज की राय

गौरतलब है कि दलित समुदाय का एक प्रमुख संगठन बामसेफ काफी समय से ‘दलित’ शब्द पर प्रतिबंध लगाने की मांग करता रहा है। इस संगठन से जुड़े लोगों को कहना है कि यह शब्द अपमानित करने वाला है, इसलिए इस तबके को बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा प्रदत्त ‘अनुसूचित जाति’ नाम से संबोधित करना चाहिए।

इसी प्रकार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के एक धड़े का मानना है कि अनुसूचित जाति के लोगों को दलित कहकर संबोधित किये जाने से भ्रम पैदा होता है। अनेक ऐसी सरकारी योजनाएं व फंड हैं, जिनमें अन्य वंचित वर्गों को भी हिस्सा मिलना चाहिए। लेकिन ‘दलित’ नाम देकर इसे अनुसूचित जातियों का ऊपरी तबका हड़प लेता है। इस तबके को ‘अनुसूचित जाति’ के रूप में संबाेधित किये जाने से संसाधनों का उचित बंटवारा हो सकेगा।

जबकि व्यापक दलित समुदाय इस शब्द का पक्षधर है। इस संबंध में  दलित विचारक चंद्र भान प्रसाद कहते हैं कि “लोग नहीं चाहते हैं कि उन्हें अनुसूचित जाति का कहा जाए बल्कि ‘दलित’ ही कहा जाए। सरकार का संविधान के हवाले से कहना लोगों को भ्रम में डालना है। असल बात यह है कि दलित शब्द से सरकार डरती है।”

केरल के सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक सनी एम. कपिकड ने कहा कि “इस शब्द पर प्रतिबंध लगाकर, वे दलितों द्वारा बनायी गयी बड़ी जगह और ताकत को दूर करना चाहते हैं। हमारे लिए दलित का अर्थ टूटे, बिखरे, निराश और उत्पीड़ित समाज से है।”

इसी प्रकार, जाने माने लेखक और दलित कार्यकर्ता एएस अजीत कुमार मानना है कि “दलित समाज पहले ही इनकी जगह हरिजन और गिरिजन जैसे शब्दों को रिप्लेस करने की कोशिश को राजनीतिक और विचारधारात्मक आधार पर खारिज कर चुका है। दलित आह्वान से हमारा समुदाय एक आवाज देकर सड़कों पर हकों की लड़ाई के लिए आता है, सरकारें नहीं चाहती हैं कि उनमें एकता दिखे।”

सामाजिक कार्यकर्ता रेखा राज भी कहती हैं “किसी भी राज्य को केंद्र की सोच के अनुसार चलने की जरूरत नहीं है। लेकिन इसके उलट, केरल के बाद राजस्थान और अब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरकारों ने शासनादेश लाकर कागजों और व्यवहार में दलित शब्द को बैन किया है।”

आरएसएस की लाइन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग दलित और आदिवासी शब्द का विरोध करते रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि इन दलितों को अनुसूचित जाति तथा अादिवासियों को वनवासी कहकर संबोधित किया जाना चाहिए। वे इस बात को समझते हैं कि दलित शब्द की अवधारणा में सभी वंचित तबके आ जाते हैं। इसलिए इस शब्द के उपयोग से अछूतों के आंदोलनों में बडी संख्या में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग भी शामिल हो जाते हैं, जिससे उनकी ताकत बढ़ जाती है। अगर इन्हें अनुसूचित जाति के नाम से संबोधित किया जाए तो इनके आंदोलन कमजोर हो जाएंगे। इसी प्रकार वे इस बात को समझते हैं कि आदिवासी कहे जाने से देश के संसाधानों पर उस तबके के असली स्वामित्व का बोध होता है, जबकि वनवासी कहे जाने से उन्हें संसाधनों से वंचित किए जाने का तर्क उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि आरएसएस के लेाग पिछले कुछ समय से ‘बहुजन’ अवधारणा का भी व्यापक स्तर पर विरोध कर रहे हैं क्योंकि यह शब्द दलित अवधारण से भी अधिक व्यापक है और सभी वंचित तबकों को जोड़ने की क्षमता रखता है। गौरतलब है कि ‘बहुजन’ शब्द से संबंधी अवधारणा को प्रस्तुत करने के कारण फारवर्ड प्रेस भी इन संगठनों से जुड़े बुद्धिजीवियों के निशाने पर रहा है।

दलित समुदाय में नाराजगी

बहरहाल, छत्तीसगढ़ में दलित समाज के प्रतिनिधियों ने दलित शब्द पर प्रतिबंध को लेकर रमन सिंह सरकार की आलोचना की है। साथ ही कहा है कि सरकार को गलतफहमी है कि इससे उनके वोट बढ़ने वाले हैं। दलित समाज के नेता रमेश वार्लियन के मुताबिक यह चुनावी शिगूफा छोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि 15 सालों में कभी भी जिस राजनीतिक दल में अनुसूचित जाति वर्ग के कोई सम्मान नहीं था, अब विधानसभा चुनाव आ गया तो वह पार्टी इस वर्ग के ‘सम्मान’ करने के लिए चिंतित हो रही है।

(कॉपी संपादन : कमल/एफपी डेस्क)


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