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द्विज मनोभाव की कविता है, निराला की ‘राम की शक्ति-पूजा’

राम की शक्ति-पूजा और दलित-चिंतन

यह कहना बिल्कुल सच है कि प्रगतिशील चिंतनधारा के नामवर लोग भी दलित चेतना को पचा नहीं पा रहे हैं। इसका कारण है, उनका द्विज-फोल्ड से बाहर न निकलना। ठीक उस दैत्य की तरह, जिसके प्राण दूर पहाड़ी पर रखे पिंजरे में बंद तोते में बसते हैं, उसी तरह उनके प्राण भी द्विज आस्थाओं और परंपराओं में बसते हैं। उनकी आस्थाएं जब टूटती हैं, तो उन्हें दर्द होता है, ठीक उसी तरह, जिस तरह तोते की टांग तोड़ने पर दैत्य तड़पने लगता है।

वस्तुतः सामंती या अभिजात आदर्शों से निर्मित आस्थाओं का सामाजिक यथार्थ नहीं होता है। इसलिए जब भी आदर्श और यथार्थ आमने-सामने आते हैं, आस्थाओं को चोट पहुंचती है और परंपराएं टूटती हैं। यदि ऐसा न हो, तो समाज जड़ हो जाएगा और जिसे हम वास्तव में प्रगति कहते हैं, वह कभी नहीं हो सकेगी।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और उनकी कृति ‘राम की शक्ति-पूजा’

सामंती आदर्शवाद ब्राह्मण को गुरु और बुद्धिजीवी मानता है। पर, यह सामाजिक यथार्थ के बिल्कुल विपरीत है। और तार्किक दृष्टि से तो इसे साबित ही नहीं किया जा सकता। किन्तु यही तथाकथित गुरु और बुद्धिजीवी वर्ग दलित चिंतन को लेकर इसलिए दुखी हैं, क्योंकि उनका गुरुडम खतरे में पड़ गया है। इसलिए वह आस्था और परंपरा की दुहाई देकर असल में सामंती आदर्शवाद की ही वकालत करते हैं।

कहा जाता है कि कोई गोपी उद्धव का समझाना इसीलिए नहीं मानती थीं, क्योंकि गोकुल के सभी कूपों में भांग घोटी हुई है। मुझे भी ऐसा ही लगता है कि दलित चिंतन को कोई द्विज समझना नहीं चाहता, क्योंकि उनके सबके भेजों में भी सामंती मूल्यों की भांग घोटी हुई है। इसकी पहली मिसाल है उनकी यह गर्वोक्ति– ‘‘मैं आपको चुनौती देता हूँ। साबित कीजिए कि ‘राम की शक्ति-पूजा’ में या समूचे निराला में कहीं भी सामंतवादी मूल्यों का पोषण हुआ है।’’

हो सकता है कि सामंतवाद की कोई नयी परिभाषा उनके पास हो, वरना यथास्थितिवाद की हर ललकार सामंतवाद ही है।

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निराला की ‘राम की शक्ति-पूजा’ मैंने पहली दफा 1968 में पढ़ी थी, जब मैं एम.ए. का छात्र था। इसकी हिंदी मेरी समझ में न तब सहज थी और न आज लगती है। ऐसी भाषा में कविता करना, जो जनसाधरण की समझ से परे हो, यह भी एक सामंती मूल्य ही है। इस कविता पर जो समीक्षाएं, व्याख्याएं और आलोचनाएं छपीं, उन्हीं को पढ़कर मैंने इस कविता की भाषा अर्थात् शब्दावली को समझा। जो कवि जनता की भाषा में नहीं लिखता, उसका विकास सामंती परिवेश में हुआ होता है। मैं समझता हूँ, निराला ऐसे ही व्यक्ति थे।

बुद्ध ने अपने भिक्षुओं को हिदायत दी थी कि वे कभी भी बुद्ध वचनों को छांदस (तत्कालीन सामंती भाषा) में न लिखें, सदैव प्राकृत में; यानी जनभाषा में ही लिपिबद्ध करें। निराला ने ‘राम की शक्ति-पूजा’ छांदस हिंदी (सामंती भाषा) में क्यों लिखी? उन्होंने नागार्जुन की तरह जनभाषा में कविता क्यों नहीं की? क्या इससे यह साबित नहीं होता कि निराला के सारे संस्कार सामंती थे? भाषा से ही विचार भी निर्मित होते हैं। किसी भी सामंती भाषा के कवि के जनवादी विचार नहीं हो सकते। सामंती भाषा के स्तर पर यही अंतर जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद में था। दोनों समकालीन थे। परंतु, प्रसाद पुनरुत्थानवादी ही बने रहे, जबकि प्रेमचंद अगली कई शताब्दियों तक प्रगतिशील धारा को ऊर्जा देते रहेंगे।

‘राम की शक्ति-पूजा’ में राम कौन हैं? क्या वह साधारण पुरुष हैं? किसी श्रमिक श्रेणी के व्यक्ति हैं? शोषित वर्ग के व्यक्ति हैं? नहीं हैं। तब कौन हैं? अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं। लंकाधिपति को मार कर वहां अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए निकले हैं। वे सामंत नहीं हैं, तो कौन हैं?

दूसरा सवाल– शक्ति कौन है? किस महाशक्ति की आराधना राम ने की? उत्तर है– दुर्गा की। ‘देखा राम ने सामने श्री दुर्गा, भास्वर’।

तीसरा सवाल– किस लिए आराधना की? क्या जनता के कल्याण के लिए? क्या युद्ध से मुक्त होने के लिए? क्या साम्राज्यवाद के अंत के लिए? उत्तर है– युद्ध के लिए, रावण को परास्त कर युद्ध जीतने के लिए, ब्राह्मणवादी साम्राज्यवादी को स्थापित करने के लिए। क्या यह सामंतवादी मूल्य नहीं हैं?

‘‘पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन’’, निराला का राम दुर्गा देवी को प्रसन्न करने के लिए अपनी एक आँख निकाल कर भेंट करना चाहता है। पर, जैसे ही वह ब्रह्मस्त्र हाथ में लेकर अपनी आँख निकालने को उद्धत होता है, महाशक्ति दुर्गा उसका हाथ पकड़ लेती है–

साधु-साधु, साधक वीर, धर्म धन धन्य राम।
कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।।

दुर्गा ने कहा– ‘राम तुम धन्य हो, धर्म के प्राण धन्य हो, वीर साधक हो।’ क्या यह सारी प्रशस्ति एक सामंत की नहीं है? एक सामंत की भेंट दुर्गा को भी लेते डर लगता है और वह राम का हाथ पकड़ लेती है। हम आये दिन सुनते हैं, कितने ही लोग भक्ति के जुनून में अपनी आँख, जीभ, भुजा और सिर काट कर दुर्गा को चढ़ा देते हैं। उनमें से किसी का भी हाथ दुर्गा ने क्यों नहीं पकड़ लिया? इसीलिए कि वे आम जन थे?

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एक सामंत की प्रशस्ति में जो-जो कहा जा सकता है, वह सब ‘राम की शक्ति-पूजा’ में मौजूद है। एक सामंत की भक्ति को देखकर ‘‘कांपा ब्रह्मांड, हुआ देवी का त्वरित उदय।’’ यह ब्रह्मांड तब क्यों नहीं कांपता, जब कोई गरीब भक्त अपना सिर काट कर चढ़ा देता है? ‘राम की शक्ति-पूजा’ पढ़ते समय रीति काव्य का स्मरण होता है। लगता है, जैसे भूषण अपने आश्रयदाता सामंत शिवाजी की प्रशंसा और महानता का बखान कर रहे हैं।

‘‘रघु नायक आगे अवनी पर नवनीत चरण’’– इस प्रशस्ति में यदि ‘रघु’ की जगह ‘शिवा’ कर दें, तो अर्थ होगा– ‘भूषण कह रहे हैं कि धरती पर शिवा जी के मक्खन जैसे मुलायम चरण पड़ रहे हैं।’ निराला ने राम के लिए कहा है कि उसके मक्खन जैसे मुलायम चरण धरती पर पड़ रहे हैं। यह सामंतवाद का प्रलाप नहीं है तो क्या है? निराला के लिए राम एक सामंत था और वह उसके भक्त थे। यह उनके स्वामी के चरण थे, इसलिए नवनीत थे। आम आदमी के चरण नवनीत कैसे हो सकते हैं?

बैठे रघुकुल-मणि श्वेत-शिला पर, निर्मल जल
ले आये कर पद क्षालनार्थ पटु हनूमान।

सेवक का यही आदर्श सामंतवाद में सर्वोच्च है। स्वामी शिला पर बैठे हों और सेवक निर्मल जल लाकर स्वामी के हाथ-पैर न धोये– तो वह सेवक कैसा? सेवक का स्वर्ग तो स्वामी के चरणकमलों में ही है– ‘बैठे मारुति देखते राम चरणारविन्द।’ यदि सेवक के मन में यह इच्छा जागे कि वह स्वामी से बेहतर कर सकता है, तो ऐसा करने से पहले उसकी माता को ही यह बता देना चाहिए– ‘तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य।’ सामंतवादी वर्ण-व्यवस्था में सेवा कर्म ही शूद्र का धर्म है।

होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन,
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।

बेहतर होगा, इसका अर्थ डा. नगेंद्र के शब्दों में समझ लिया जाय। उनका अर्थ है, ‘‘अवतारवाद के सिद्धांत के अनुसार त्रेता युग में धर्म की रक्षा के निमित्त, रावण का वध करने के लिए, राम के रूप में परमपुरुष का नया (दशावतार क्रम में सातवां) अवतार हुआ था।’’ यह थे निराला के ‘पुरुषोत्तम नवीन’, जिनके शरीर में महाशक्ति दुर्गा लीन हुई थीं। यदि अवतार पुरुष सामंत नहीं होंगे, तो क्या साधारण जन होंगे? महाशक्ति सामंतों के पास नहीं होगी, तो क्या आम जन के पास होगी?

देखा राम ने सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुरस्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।

इस पद को विशेष रूप से समझने की जरूरत है। निराला के राम की महाशक्ति (दुर्गा) का बायां पैर असुर के कंधे पर और दायां पैर हरि (अर्थात् सिंह) पर टिका हुआ है। असुर का अर्थ है, जो सुर (यानी देवता) नहीं है– अर्थात् राक्षस, और हरि का अर्थ विष्णु भी होता है। चित्रों और प्रतिमाओं में हम दुर्गा को अपने पैर से राक्षस को रोंदते हुए देखते हैं। यहां वही भाव है, यानी दुर्गा राक्षस को कुचल रही है। विचारधारा के स्तर पर राक्षस वे हैं, जो आर्य नहीं हैं। इसे हम अनार्य और आज के सन्दर्भ में वाम विचारधारा भी कह सकते हैं। वामधारा को कुचलने वाली शक्ति यदि सामंतवादी नहीं है, तो क्या प्रगतिवादी होगी?

रावण अधर्मरत भी अपना, मैं हुआ अपर,
यह रहा शक्ति का खेल समर, शंकर शंकर!

निराला के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, वे ब्राह्मण, गौ और वर्णव्यवस्था के रक्षक हैं। इसी धर्म की रक्षा के लिए उनका अवतार हुआ है। इसलिए वे चिंतित हैं कि अधर्म-रत रावण महाशक्ति का अपना कैसे हो गया? वे पूछते हैं, ‘‘हे शंकर, शक्ति का यह कैसा खेल है?’’ धर्म-अधर्म का यह खेल नैतिक मूल्यों या मानव की पक्षधरता का नहीं है। वस्तुतः विप्र-भक्ति, गौ-सेवा और वर्णव्यवस्था के धर्म का है, जो राम का पक्ष है। रावण इस धर्म का अनुयायी न था। इसलिये राम के लिये वह अधर्म-रत था। यदि यह नैतिक मूल्यों या जन-पक्षधरता की लड़ाई होती, तो राम सबसे पहले उन सामंती मर्यादाओं के खिलाफ लड़ते, जिन्हें धर्म का रूप दिया गया था और जिनकी रक्षा के लिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम बने थे।

असल में, ‘राम की शक्ति-पूजा’ की सारी व्याख्याएं, टीकाएं और आलोचनाएं प्राध्यापकीय हैं, जो हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों को पढ़ाने और समझाने के लिए लिखी गयी हैं। उनमें न तो प्रगतिशील दृष्टिकोण मिलता है और न उनमें आलोचना का विस्तार मिलता है। वे अधिकतर द्विज लेखकों द्वारा द्विज भाव से लिखी गयी हैं, जिनका मकसद है निराला को प्रेमचंद के समानांतर क्रांतिकारी और प्रगतिशील सिद्ध करना। यह सचमुच रेत की दीवार खड़ी करने की कोशिश है, जो कामयाब हो भी गयी थी, परंतु दलित चिंतन के एक ही प्रहार ने इसे ध्वस्त कर दिया।

पूर्वग्रहों को तोड़ती एक किताब

हिन्दी आलोचना में डॉ. रामविलास शर्मा ने सबसे ज्यादा भ्रम फैलाया है। वे द्विजभाव से इस कदर ग्रस्त हैं कि हिन्दू समाज के पथ-भ्रष्टक तुलसीदास को उन्होंने पथप्रदर्शक बना दिया है और सामंतवाद के प्रवक्ता निराला को प्रगतिवादी, जनवादी और समाजवादी करार दे दिया है। उनकी शिष्ट मंडली उनके इस कार्य को आगे बढ़ा रही है। लेकिन दलित चिंतन प्रश्न करता है कि निराला किस दृष्टिकोण से प्रगतिशील और जनवादी थे। न तो भाषा के स्तर पर और न भावबोध के स्तर पर वे जनवादी नजर आते हैं। महाभारत, भीष्म पितामह, महाराणा प्रताप, भक्त प्रहलाद और भक्त ध्रुव जैसी पुस्तकें लिखने वाले निराला किस तरफ से सामंतवाद-विरोधी दिखायी देते हैं? बिल्लेसुर बकरिहा, कुल्ली भाट और चतुरी चमार जैसी कहानियाँ भी उन्हें हिन्दुत्ववादी ही साबित करती हैं। उनकी कविताओं पर दुर्गा, काली, सिंधुराग और वेदांत हावी है। वे तुलसी के भक्त हैं और रामचरित मानस में विज्ञान देखते हैं। उन्हें बलपूर्वक प्रगतिशील बनाने में द्विज विद्वानों का चाहे जो मनोरथ पूरा होता हो, परंतु वह यथार्थवादी आलोचना नहीं है। वे सत्य का सामना उसी कारण से करना नहीं चाहते, जिस कारण से निराला के राम रावण की जय से भयभीत हैं। निराला का अपना भय भी इन पंक्तियों में दिखायी देता है–

स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय,
रह-रह उठता जग जीवन में रावण जय-भय।

स्थिर राघवेन्द्र अर्थात् वे राम, वे राघव या वे सामंत, जो अपनी स्थिर धर्म-व्यवस्था चाहते हैं, (कुछ भी बदलाव नहीं), उन्हें यह संशय हिला रहा है कि कहीं रावण की जीत से धर्म-व्यवस्था में बदलाव न आ जाय, जग-जीवन की स्थिरता भंग न हो जाय। स्थिर निराला भी सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के आंदोलनों से भयभीत थे।

कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार,
असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।

राम का यही अन्तर्द्वन्द्व निराला के भीतर भी था। वे परिवर्तन की स्वाभाविक गति के सामने असमर्थ थे। उनकी अंतिम समय की कुछ रचनाएँ उनके इस द्वन्द्व की ही अभिव्यक्तियां हैं। वे समझ रहे थे कि सामंती ढांचे को टूटना ही है, उसके अवशेषों को बचाने की लड़ाई जीती नहीं जा सकती। पर, यह समर्पण था, परिवर्तन नहीं था। वे ‘राम की शक्ति-पूजा’ में असमर्थ राम में महाशक्ति का प्रवेश करा देते हैं और इस तरह महाशक्ति के हाथों रावण का वध कराकर अपनी धर्म-व्यवस्था बचा लेते हैं। पर इस कविता का आधुनिक बोध यह है कि राम की भूमिका में स्वयं निराला हैं, रावण के रूप में भौतिकवाद की जय है और उस जय को रोकने में असमर्थ निराला कल्पना करते हैं कि दुर्गा प्रकट होकर असुर भौतिकवाद रूपी रावण का नाश कर देगी। अतः ‘राम की शक्ति-पूजा’ सामंतवाद विरोधी या प्रगतिशील मूल्यों की कविता नहीं है, बल्कि वह अट्टहास करते भौतिकवाद पर कवि के भावित नयनों का शोक गीत है–

हंस रहा अट्टहास रावण खल-खल,
भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ता दल।

(कॉपी-संपादन : सिद्धार्थ/राजन)


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