बहुजन साहित्य की प्रस्तावना

संपादक प्रमोद रंजन व आयवन कोस्का, फारवर्ड प्रेस, पृष्ठ 128, तीन सौ रुपए(सजिल्द), 150 रुपए (अजिल्द), 100 रुपए किंडल

दलित, पिछड़े, आदिवासी, आदिम जनजातियां आदि जिन जाति-समूहों को केंद्र में रखकर बहुजन साहित्य की अभिकल्पना की गई है, वे सभी किसी न किसी श्रम-प्रधान जीविका से जुड़े हैं। उनकी पहचान उनके श्रम-कौशल से होती आई है। मगर जाति-वर्ण संबंधी असमानता और संसाधनों के अभाव में उन्हें उत्पीड़न एवं अनेकानेक वंचनाओं के शिकार होना पड़ा है। बहुजन साहित्य यदि जातियों की सीमा में खुद को कैद रखता है तो उसके स्वयं भी छोटे-छोटे गुटों में बंट जाने की संभावना निरंतर बनी रहेगी। इसलिए वह स्वाभाविक रूप से श्रम-संस्कृति का सम्मान करेगा। फलस्वरूप विभिन्न जातियों के बीच स्तरीकरण में कमी आएगी। उसकी यात्रा सर्वजनोन्मुखी साहित्य में ढलने की होगी। कुल मिलाकर बहुजन साहित्य का वास्तविक ध्येय जाति उच्छेद ही होगा – ओम प्रकाश कश्यप, लेखक

साहित्य की दुनिया में निष्कर्ष से अधिक महत्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुंचने की प्रकिया होती है। जब हम कोई उपन्यास पढ़ रहे होते हैं, तो हमारे लिए क्लाइमेक्स से अधिक महत्वपूर्ण उसमें आया जीवन होता है। यही बात कविता, कहानी व साहित्य की अन्य विधाओं के बारे में भी सही है और प्रकरांतर से यही बात इस किताब पर भी लागू होती है। फारवर्ड प्रेस पत्रिका में चले साहित्य संबंधी बहस-मुबाहिसे में से चुने हुए इन लेखों में आप एक जीवंत वैचारिक ऊष्मा पाएंगे। यह किताब बहुजन साहित्य की अवधारणा के नक्शे की निर्माण प्रक्रिया से आपका परिचय कराएगी तथा आप इसके विविध रूपों पर हुई बहसों की तीखी तासीर को महसूस कर पाएंगे। ये बहसें आपको एक सुचिंतित निष्कर्ष की ओर ले जाएं, इतनी ही इनकी भूमिका है। यही साहित्य का काम है और यही आलोचना का भी। निष्कर्ष तो आपको स्वयं ही तय करने होते हैं।(इसी पुस्तक से)

दलित साहित्य नया है, अलग आइडेंटिटी का है, जबकि ब्राह्मणवादी साहित्य संस्कार बनकर आता रहा है। उसको अलग से भी ह्रश्ववाइंट आउट कर सकते हैं, लेकिन जब हम वर्ण व्यवस्था देखते हैं कि पंडित है, ब्राह्मण आदि, तो इस तरह का साहित्य ब्राह्मणवादी साहित्य है और जब हम पुरुष वर्चस्व देखते हैं, परिवार में मालिक कौन है, तो उसके हिसाब से चलते हैं। यानि कि ब्राह्मणवादी ऐसा कुछ नहीं है, वह तो बस लक्षण है, जैसे पुरुष वर्चस्व में है। परिवार का जो ढांचा है, कंसट्र ट है, वह है और हिंदुस्तान में बिना जाति के कोई आदमी नहीं रह सकता। उसकी कोई न कोई जाति होगी और जिनकी जाति नहीं है, हम तरह-तरह से जानने की कोशिश करते हैं कि उनकी जाति या है और तब दिमाग में उसकी ह्रश्वलेसिंग करते हैं। तो ये जाति दिमाग में घुसी हुई है, यही ब्राह्मणवाद है। (इसी पुस्तक में प्रकाशित हंस के भूतपूर्व संपादक राजेंद्र यादव से साक्षात्कार का अंश)

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फारवर्ड प्रेस में ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’

बहुजन साहित्य की रूपरेखा
https://www.forwardpress.in/2016/09/bahujan-sahity-ki-ruprekha_omprakash-kashyap/

चुनौती भरी हैं बहुजन साहित्य की राहें
https://www.forwardpress.in/2017/11/chunauti-bhari-hain-bahujan-sahity-ki-rahen/

बहुजन साहित्य : वाद और विवाद से परे
https://www.forwardpress.in/2017/02/bahujan-sahity-vad-aur-vivad-se-pare/

अन्य मीडिया में ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’

‘बहुजन’ सिर्फ जातियों पर आधारित होंगे?
‘फारवर्ड प्रेस’ जिस बहुजन साहित्य की अवधारणा को विकसित करते रहने की बात करता रहा है, हो सकता है आनेवाले समय में वह साहित्य की एक नई अवधारणा के रूप में स्थापित हो, यदि उसमें शूद्र, अतिशूद्र, आदिवासी समाज और स्त्री समाज जैसे अन्य शोषित और वंचित तबके भी शामिल हों, लेकिन यहां इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या ‘बहुजन’ का अर्थ सिर्फ यही सामाजिक समुदाय होंगे और क्या उनका संबंध सिर्फ जातियों पर ही आधारित होगा? (देवेन्द्र चौबे, इंडियन कल्चरल फोरम डॉट पर प्रकाशित)

 

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