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2021 में पहली बार होगी ओबीसी की जनगणना

केंद्र सरकार 2021 में होने वाली जनगणना में ही अन्‍य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित आंकड़़े भी एकत्रित करेगी। इसमें उनके सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक आंकड़ों के साथ उन से जुड़े सभी तथ्‍यों को संकलित किया जाएगा और उसका प्रकाशन भी किया जाएगा। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 31 अगस्त 2018 को नई दिल्‍ली में भारतीय महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के साथ बैठक के बाद यह घोषणा की। बैठक 2021 की जनगणना की तैयारियों की समीक्षा के लिए बुलायी गयी थी। इसमें गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू, गृह सचिव राजीव गौबा और महा पंजीयक शैलेश के साथ गृह मंत्रालय तथा महापंजीयक कार्यालय व जनगणना आयुक्‍त कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

पहली बार हो रही है ओबीसी की गणना

गौर तलब है कि सामान्य जनगणना में एससी और एसटी वर्ग के लोगों की जनगणना पूर्व से ही होती रही है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि जनगणना में ओबीसी से जुड़े आंकड़े पृथक रुप से एकत्रित किये जायेंगे। अंतिम जातिगत जनगणना वर्ष 1931 में हुर्इ थी। जबकि आजाद भारत में पहली जनगणना 1951 में हुई थी। जनगणना में धार्मिक आंकड़ों के साथ अनुसूचित जाति व जनजाति के आंकड़े एकत्रित किये जाते हैं, लेकिन अन्‍य जातियों से जुड़ी सूचनाएं अलग से एकत्र नहीं की जाती हैं। केंद्र सरकार पहली बार ओबीसी की जातीय गणना के साथ उनसे जुड़े आकड़ों को एकत्रित करेगी।

महा पंजीयक शैलेश एवं अन्य के साथ बैठक करते केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह

बैठक में गृहमंत्री ने कहा कि 2021 की जनगणना के अंतिम और सभी आंकड़े तीन साल के अंदर जारी कर दिये जाएंगे। इसके लिये अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। मौजूदा प्रक्रिया में जनगणना के अंतिम तथा सभी आंकड़े जारी करने में लगभग सात से आठ साल का समय लगता है। गृहमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि दूर दराज के इलाकों में जन्म और मृत्यु का रजिस्‍ट्रेशन करने के लिए सामान्य पंजीयन प्रणाली में सुधार की जरुरत है। इसके अलावा नवजात मृत्यु दर, मातृत्व मृत्यु अनुपात और प्रजनन दर को सटीकता से दर्ज करने के लिए पंजीयन प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए।

क्‍या होगा असर?

माना जा रहा है कि 2021 की जनगणना में ओबीसी से जुड़े आकड़े अलग से एकत्र करने का दूरगामी असर होगा। राष्‍ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलने के बाद उसका अधिकार क्षेत्र बढ़ गया है। ऐसे में आयोग के कामकाज को प्रभावी बनाने में पिछड़ी जातियों से जुड़े आंकड़े मददगार साबित होंगे। इससे उनके लिए योजनाओं का निर्माण, क्रियान्वयन और प्रक्रिया निर्धारित करने में आसानी होगी। ये आंकड़े यह भी बताएंगे कि ओबीसी की जातियों का सरकारी शिक्षण संस्‍थाओं और नौकरी में कितनी भागीदारी है। किन जातियों की ज्‍यादा भागीदारी है या किनकी कम हिस्‍सेदारी है। रोहिणी आयोग का गठन ही ओबीसी के वर्गीकरण के लिए किया गया है। जनगणना के दौरान ओबीसी के आंकड़े रोहिणी आयोग की अनुशंसा के आलोक में महत्‍वपूर्ण फैक्‍टर का काम करेंगे।

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2011 में हुई थी सामाजिक, आर्थिक व जाति जनगणना

पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह सरकार ने 2011 की जनगणना से अलग सामाजिक, आर्थिक व जाति जनगणना करायी थी। इसमें विभिन्‍न जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक स्थिति का अध्‍ययन किया गया था। 3 जुलाई, 2015 को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इसकी रिपोर्ट को आंशिक तौर पर सार्वजनिक किया था। लेकिन इसमें जातियों का खुलासा नहीं किया गया था। इस अध्‍ययन में काफी शिकायतें भी मिली थीं। इस रिपोर्ट का सरकार के स्‍तर पर कोई इस्‍तेमाल नहीं हुआ और रिपोर्ट बौद्धिक जुगाली बनकर रह गयी थी। कई पार्टियों एवं संगठनों ने इस रिपोर्ट के जातीय आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग की थी, लेकिन इस तरह के आंकड़े जारी नहीं किये गये।

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ओबीसी से जुड़े संगठनों का दबाव

ओबीसी के लिए केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण के बाद से लगातार यह मांग उठती रही थी कि जनगणना में जाति को भी शामिल किया जाये। इन्‍हीं के आलोक में यूपीए सरकार ने सामाजिक, आर्थिक व जातीय जनणना करायी थी, लेकिन उसे मुख्‍य जनगणना से अलग रखा गया था। एनडीए सरकार ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए मुख्‍य जनगणना में ही जाति को शामिल कर लिया है। इसका सबसे बड़ा लाभ है कि आरक्षण का दावा करने वाली नयी-नयी जाति समूहों का भी सामा‍जिक, शैक्षणिक व आर्थिक अध्‍ययन संभव हो सकेगा। उनके दावों की समीक्षा भी उपलब्‍ध तथ्‍यों के आधार पर की जा सकेगी।

भाजपा की नजर ओबीसी वोट बैंक पर

केंद्र की भाजपा सरकार ने 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति के तहत ओबीसी जातियों को टारगेट किया है। राष्‍ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाना उसी का हिस्‍सा है। ओबीसी जातियों की मांगों के आधार पर ओबीसी की जातिगणना ज्‍यादा अपील करेगा और इसका लाभ भी भाजपा को मिलने की उम्‍मीद है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को ओबीसी के रूप में प्रचारित किया था और उसका लाभ भी मिला था। इसी फार्मूले को नरेंद्र मोदी फिर आजमाना चाहते हैं। इसका असर तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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