फॉरवर्ड प्रेस

डॉ.आंबेडकर और गांधी के बीच टकराहट और संवाद के मुद्दे

भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते दस्तावेज हैं। सेवानिवृति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमानियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु  की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फॉरवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। इस हिस्से में कृष्णन ने इस बात का जवाब दिया है कि डॉ. आंबेडकर और गांधी के बीच किन मुद्दों पर टकराहट और संवाद  रहा है और कौन-कौन मुख्य दलित-बहुजन विचारक हैं, जिनके विचारों के मेल के आधार पर वंचित तबकों को न्याय मिल सकता है। संपादक


आजादी के बाद का सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की ज़ुबानी (भाग-4)

वासंती देवी :  मैंने पाया कि जातिगत और सांप्रदायिक सोच से आप जितने दूर हैं, यह सचमुच अत्यंत आश्चर्यजनक है। मैंने आपको कहते सुना है कि हमें आज एक ऐसी विचारधारा की जरुरत है, जिसमें मार्क्स, आंबेडकर, गाँधी, पेरियार और नारायण गुरु के विचारों का सम्मिश्रण हो।

पी.एस.कृष्णन : मेरी विचारधारा बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, नारायण गुरु, महात्मा गाँधी, मार्क्स इत्यादि के विचारों का सम्मिश्रण है। यह मेरे अध्ययन और मेरी बौद्धिक परिपक्वता की उपज है। मैंने पाया कि महात्मा गाँधी और बाबा साहब आंबेडकर के मतभेदों पर चर्चा करने पर व्यर्थ ही बौद्धिक ऊर्जा व्यय की जा रही है। निस्संदेह, दोनों के बीच मतभेद थे, विशेष कर ‘‘अछूत प्रथा” और उसके कुप्रभावों, इस कुत्सित परिघटना के उदय और उसके बने रहने के पीछे के कारकों और सुधारात्मक उपायों के सम्बन्ध में। इन मसलों पर गांधीजी की सोच, आंबेडकर की तुलना में संकीर्ण थी। राजनैतिक मुद्दों पर उनके मतभेद जगजाहिर हैं।

सामाजिक न्याय के योद्धा पी. एस. कृष्णन

सितम्बर-अक्टूबर 1931 में आयोजित गोलमेज सम्मलेन में उनके मतभेद खुल कर सामने आए। ब्रिटिश सरकार द्वारा गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन उस नयी राजनैतिक व्यवस्था के सम्बन्ध में भारतीय प्रतिनिधियों के विचार जानने के लिए किया गया था,  जिसे वह भारत में लागू करने पर विचार कर रही थी गांधीजी का यह दावा था कि वे सभी भारतीयों के प्रतिनिधि हैं, जिनमें अछूत प्रथा के शिकार लोग भी शामिल थे। आंबेडकर का मानना था कि गांधीजी, अछूत जातियों के प्रतिनिधि नहीं हो सकते।

हम सबको पता है कि आंबेडकर ने उस नयी राजनैतिक प्रणाली में अछूतों के लिए अलग व्यवस्था किये जाने की पुरजोर वकालत की थी, जिस प्रणाली को ब्रिटिश सरकार भारत में लागू करना चाहती थी। उन्होंने अछूतों को राहत पहुँचाने के पर्याप्त प्रयास न करने और उनके अधिकारों का प्रयोग करने में उन्हें सक्षम न बनाने के लिए ब्रिटिश सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि अगर वह प्रस्तावित नयी राजनैतिक व्यवस्था में अछूतों को ऊंची जातियों के रहमो-करम पर छोड़ देगी, तो वह एक और बहुत बड़ी भूल करेगी। उन्होंने अछूतों के लिए पृथक मताधिकार की मांग की। ब्रिटिश सरकार ने उनकी यह मांग मान ली और प्रधानमंत्री रेमसे मेक्डोनाल्ड ने 16 अगस्त, 1932 को घोषित कम्युनल अवार्ड में इसे लागू किये जाने की घोषणा कर दी। इसके विरोध में महात्मा गाँधी ने पुणे के यरवदा जेल, जहाँ उन्हें गोलमेज सम्मलेन से लौटने के बाद गिरफ्तार कर रखा गया था, में अनशन शुरू कर दिया।

डॉ. आंबेडकर और गांधी के बीच की टकराहटें और संवाद

आंबेडकर सहित देश के सभी शीर्ष नेता यरवदा में इकट्टा हुए और महात्मा गाँधी का जीवन बचाने के लिए कम्युनल अवार्ड के विकल्प को आकार दिया। नतीजे में पूना पैक्ट या यरवदा पैक्ट हुआ। यह पैक्ट डॉ. आंबेडकर और महात्मा गाँधी के एक साथ आने का प्रतीक था। डॉ. आंबेडकर द्वारा 25 सितम्बर 1932 को बम्बई में आयोजित हिन्दू सम्मलेन में दिया गया उनका भाषण इसका साक्ष्य है। इस सम्मलेन में पूना पैक्ट का अनुमोदन और समर्थन किया गया।

पूना पैक्ट में शामिल था राजनैतिक संस्थाओं व नौकरियों में आरक्षण, अछूत प्रथा के उन्मूलन को राष्ट्रीय मिशन का दर्जा व दलितों के शैक्षणिक उत्थान और विकास के लिए शिक्षा हेतु निर्धारित बजट का एक हिस्सा आरक्षित किया जाना। परंतु अधिकांश लोग इस पैक्ट को राजनैतिक आरक्षण के लिए इसमें की गई व्यवस्था के कारण याद करते हैं। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतिनिधित्व करने वाले गांधीजी और सामाजिक समानता और अछूत जातियों की मुक्ति के लिए संघर्षरत आंबेडकर का एक साथ आना, भारतीय राजनीति का एक स्वर्णिम दौर था। परंतु यह लंबे समय तक नहीं चला और इसका अंत कड़वाहट में हुआ।

वंचितों की आवाज केरल के नारायण गुरु

संविधान सभा के गठन के बाद और संविधान निर्माण के दौरान, एक बार फिर ये दोनों नेता एक साथ आए। अछूत प्रथा और उसके उन्मूलन के प्रति गांधीजी और आंबेडकर के दृष्टिकोण में अंतर था परंतु संविधान में आंबेडकर के दृष्टिकोण को समाहित किया गया। अब केवल जरूरत इस बात की है कि अछूत प्रथा के निवारण के लिए संविधान में जो प्रावधान डाॅ. आंबेडकर द्वारा तत्कालीन नेताओं के सहयोग और समर्थन से किए गए हैं, उन्हें ईमानदारी और निष्ठा से लागू किया जाए। अनुसूचित जातियों, जनजातियों व सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के कल्याणार्थ संविधान में किए गए प्रावधानों को उनकी पूर्णता में, ईमानदारी और निष्ठा के साथ लागू करने की प्रक्रिया अभी भी प्रारंभ नहींं हो सकी है।

आज के समय में डाॅ. आंबेडकर और गांधीजी के बीच मतभेदों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना व्यर्थ है। प्रथमतः इसलिए क्योंकि ये अब गुजरे हुए कल की बात हो गई है और संविधान ने आंबेडकर के मत को मान्यता प्रदान की है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस चर्चा से संवैधानिक प्रावधानोें को ईमानदारी और निष्ठा से उनकी पूर्णता में लागू करने के मुद्दे से हमारा ध्यान बंटता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि उन सभी लोगों, जिनका अनुसूचित जातियों व उनके जैसे अन्य पीड़ित वर्गों जैसे अनुसूचित जनजातियों व कुछ हद तक सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के प्रति सकारात्मक नजरिया था, के वैचारिक योगदान का संश्लेषण कर उसका प्रयोग संविधान में सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु किए गए प्रावधानों को लागू करने और सामाजिक समानता के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए किया जाए। इस मुद्दे पर मेरे विस्तृत विचार मेरे शोध प्रबंध ‘‘सिंथेसाईजिंग द गांधी-आंबेडकर-नारायणगुरू-मार्क्स विजन्स फाॅर दलित लिबरेशन‘‘ में प्रस्तुत किए गये हैं (यह शोध प्रबंध मेरी पुस्तक ‘‘सोशल एक्सक्लूजन एंड जस्टिस इन इंडिया‘‘, राऊटलेज, 2017 में प्रकाशित है व इसका संक्षिप्त संस्करण ‘‘सोशल चेंज‘‘, वर्ष 41 अंक 1, मार्च 2011 में प्रकाशित हुआ था)। इस शोध प्रबंध में मैंने विभिन्न मुद्दों पर महात्मा गांधी और डाॅक्टर आंबेडकर के मतभेदों की विस्तृत चर्चा की है। इसके साथ ही मैंने इसमें नारायणगुरु और उनके दर्शन के बारे में भी लिखा है और यह भी बताया है कि किस प्रकार वे भी इस वैचारिक संश्लेषण का हिस्सा बन सकते हैं।

दुनिया के मेहनतकशों की आवाज मार्क्स

मार्क्स इसलिए उपयोगी हैं क्योंकि वे दलित और कुछ गैर-दलित समुदायों, विशेषकर ऐसी जातियों जो भूस्वामी हैं और जिनका जमीनों पर नियंत्रण है, के परस्पर विरोधाभासी हितों का विश्लेषण करने और उन्हें समझने में सहायक हो सकते हैं। मार्क्सवाद पर आधारित विवेचना हमें यह समझने में मदद कर सकती है कि दलितों और कुछ गैर-दलित जातियों जैसे मछुआरों, पत्थर तराशने वालों और अन्य ऐसी ही सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों, जो भूस्वामी नहीं हैं और जिनका जमीनों पर नियंत्रण नहीं है, के बीच हितों की टकराहट नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि दलितों और इन जातियों के बीच कोई आर्थिक टकराव या आर्थिक हितों का टकराव नहीं है। दलितों व इन जातियों का सामाजिक गठबंधन बनाया जा सकता है। ऐसे गठबंधन से संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने के अभियान के समर्थन में हम अधिक संख्या में लोगों को गोलबंद कर सकेंगे और अपने लक्ष्य जल्दी और बेहतर ढंग से हासिल कर सकेंगे।

आंबेडकर के साथ-साथ ऐसे कई नेता हैं जिनका जन्म ऐसे समुदायों में हुआ था जो अछूत प्रथा का दंश झेल रहे थे। इनमें शामिल हैं नारायणगुरु, संत रविदास इत्यादि। गांधी जी के पीछे, सामाजिक दृष्टि से अगड़े समुदायों के नेताओं की लंबी पंक्ति है जिनमें विवेकानंद, स्वामी श्रद्धानंद इत्यादि शामिल हैं। इनमें कर्नाटक के बसवेश्वर (1134-1196) और असम के श्रीमंत संकरदेव (1449-1569) भी हैं। तीसरी पंक्ति सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के नेताओं की है, जिन्होंने ऐेसे आंदोलनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनमें महाराष्ट्र के महात्मा जोतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले और तमिलनाडु के पेरियार ईवी रामासामी शामिल हैं।

ये सभी नेता हमें वह वैचारिक गोला-बारूद उपलब्ध करवा सकते हैं, जो यथास्थितिवादियों के विरूद्ध संघर्ष में हमारे लिए बहुत उपयोगी हो सकता है। इनमें से किसी को भी केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उनका कद डाॅ. आंबेडकर के बराबर नहीं था। ऐसा करके हम सामाजिक न्याय के आंदोलन के वैचारिक आधार को कमजोर करेंगे। प्राचीन तमिलनाडु और मध्यकालीन महाराष्ट्र के भक्ति संतों और उत्तर में श्री गुरुनानक हमें अछूत प्रथा, जाति प्रथा और सामाजिक असमानता के विरूद्ध सामाजिक महागठबंधन का निर्माण करने के लिए महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध करवा सकते हैं।  

कॉपी संपादन -सिद्धार्थ और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद अमरीश हरदेनिया


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। हमारी किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्कृति, सामाज व राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के सूक्ष्म पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं। पुस्तक-सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार