भारतीयों की जाति जानने की मानसिकता

पी.एस कृष्णन का कहना है कि हमारे देश मेंं कोई यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई जाति से मुक्त हो सकता है। मेरी जाति भी लोग जानने की कोशिश करते थे। ऐसे लोगों में केंद्रीय मंत्री से लेकर नौकरशाह तक शामिल थे :

आजादी के बाद का सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी (भाग-3)

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उसमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते दस्तावेज हैं। सेवानिवृति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमानियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय तमिलनाडु  की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुत : आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। फॉरवर्ड प्रेस की इस किताब का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करने की योजना है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। इस हिस्से में वासंती देवी के प्रश्न के जवाब में कृष्णन भारतीयों की जाति जानने की मानसिकता के बारे में बता हे हैंसंपादक )

मेरी जाति के संदर्भ में विभिन्न अवसरों पर विभिन्न व्यक्तियों की जिज्ञासाओं और पूछ-ताछ का मेरे द्वारा एक ही जवाब हमेशा दिया गया, “मेरी कोई जाति नहीं है, मैं जाति से मुक्त हो चुका हूं”। इसके चलते कभी-कभी दिलचस्प स्थिति पैदा हो जाती थी, इससे जुड़े दो वाकये मैं उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करना चाहता हूं। 1980 में जनता पार्टी की सरकार के बाद इंदिरा गांधी की सरकार में ज्ञानी जैल सिंह केंद्रीय गृहमंत्री बने। इसके पहले जब 1978 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी, उस समय से मैं गृह मंत्रालय  में संयुक्त सचिव था। मेरे जिम्मे अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण से संबंधित जिम्मेदारी थी। मैं अनुसूचित जातियों के मद्दों को हल करने में निरंतर लगा रहता था, इसके प्रति मेरी संबद्धता और गंभीरता को देखते हुए गृहमंत्री बनने के बाद ज्ञानी जैल सिंह की मेरे बारे में जिज्ञासा जगी। उन्होंने मंत्रालय के अन्य अधिकारियों से मेरी जाति के बारे में पूछना शुरू किया। प्रत्येक अधिकारी ने उनको यही उत्तर दिया कि वे लोग उनको जितना जानते हैं, जितने वर्षों से जानते हैं, और उनकी जानकारी के अनुसार हमेशा उन्होंने जो पक्ष चुना, उसके आधार पर उनका कहना है कि उनकी कोई जाति नहीं है।

पी. एस. कृष्णन की तस्वीर

उस समय के अवर सचिव श्री एस.वरादन ने मंत्री जी से कहा कि वे उनको पिछले 30 वर्षों से जानते हैं और उनकी अवस्थिति हमेशा जातिविहीन की रही है। कुछ महीनों बाद एक मीटिंग से अलग श्री ज्ञानी जैल सिंह ने मेरी जाति के बारे में जानकारी लेने की बात बताई और यह भी बताया कि अन्य अधिकारियों ने क्या उत्तर दिया। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने यह पाया कि मैं किसी न किसी “उंची जाति” का हूं। अपनी इस राय के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने मुझसे पूछा कि आपको अपनी जाति छिपाने की क्या जरूरत थी। पूरी जिज्ञासा का नतीजा यह निकला कि केवल “निम्न जाति” में पैदा हुए व्यक्ति को अपनी जाति छिपाने की जरूरत होती है, “उच्च जाति” में पैदा हुए व्यक्ति को अपनी जाति छिपाने की कोई जरूरत नहीं होती। मैने उनको उत्तर दिया कि मेरा ऐसा करना जाति छिपाने के लिए नहीं था, बल्कि मैं जाति को खारिज करता हूं और जाति को खारिज करने और जाति का विरोध करने की मेरी कार्यवाही किसी जाति-विशेष के प्रति केंद्रित नहीं है, बल्कि संपूर्ण जाति-व्यवस्था के खिलाफ है। ज्ञानी जी ने सारी बात-चीत के निष्कर्ष के रूप में अपनी भावनाओं को इन शब्दों में अभिव्यक्त किया, “भगवान ने आपको वंचितों और गरीबों की सेवा करने की बु्द्धि दिया है”।

ज्ञानी जी कांग्रेस पार्टी के पिछड़ी वर्ग के उन इक्के-दुक्के लोगों में से एक थे, जो अपने दम पर  राज्य के मुख्यमंत्री, केंद्रीयमंत्री और आखिर देश के राष्ट्रपति बने। वे सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्ग के ( एसइडीसी ) की दस्तकार जाति के थे। अन्य लोग उनको ऐसे व्यक्ति के रूप में जानते थे, जो हमारे देश की राजनीतिक संस्कृति के लिए अनूठा हो। मैं उनको ऐसे व्यक्ति के रूप में जानता हूं, जो दलितों के प्रति अत्यन्त संवेदनशील थे।

अंग्रेजी किताब क्रूसेड फॉर सोशल जस्टिस की तस्वीर (जिसका हिंदी अनुवाद फॉरवर्ड प्रेस से शीघ्र प्रकाश्य)

एक अन्य उदाहरण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जुड़ा हुआ है। 1980 के दशक की शुरूआत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उस समय के अध्यक्ष श्री माधुरी शाह और सर्वाधिकार प्राप्त सचिव श्री मलहोत्रा के साथ एक चर्चा हुई। मैं उन लोगों से चाहता था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रवेश के साथ-साथ शिक्षकों की नियुक्ति के मामले में विश्वविद्यालयों को आरक्षण के नियमों को पालन करने के लिए बाध्य करे, और उन विश्वविद्यालयों के वेतन के मद का आंबटन रोक दे, जो ऐसा करने में असफल साबित होते हों, जब तक वे इस संदर्भ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशों का पालन न करें। जब सचिव ने यह तर्क दिया कि कानून यूजीसी को यह अधिकार नहीं देता है, मैने उन्हें यूजीसी के विशेष प्रावधान का ध्यान दिलाया, जो सटीक तौर पर यूजीसी को आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य करने का अधिकार देता है। अगले दिन तक चर्चा जारी रही, मैं बैठक में पहुंचता, इसके पहले यूजीसी के सचिव ने वहां उपस्थित अन्य अधिकारियों से कहा कि, “ श्री कृष्णन बहुत बुद्धिमान हैं, भले ही वे दलित हैं”, इस कथन में यह बात निहित है कि दलित होना और बुद्धिमान होना परस्पर विरोधी बाते हैं। कुछ अधिकारी जो मुझे जानते थे, उन्होंने हस्तक्षेप करते हुए  कहा, “वह दलित नहीं हैं”। तब बिना किसी झिझक के सचिव ने कहा, “ अच्छा, इस वजह से वह इतने बुद्धिमान हैं”।

ये दृष्टान्त व्यक्ति-विशेष की जातीय-पहचान जानने के बारे में  हमारे समाज की अजीब जिज्ञासा को सामने लाते हैं। दिक्कत उन  गैर दलित मूल के व्यक्तियों के साथ होती है, जो निर्णायक तौर पर दलितों के वैध अधिकारों के पक्ष में खड़ा होता और काम करता है। लोग उसके विचारों और जाति को मिला देते हैं और साथ जाति और व्यक्ति गुणों के बीच के रिश्ते के बारे में  पूर्व-धारणा और पूर्वाग्रह बना लेते हैं। इन व्यक्तिगत गुणों में बुद्धिमत्ता भी शामिल है।

( कॉपी संपादन और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद सिद्धार्थ)


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