फॉरवर्ड प्रेस

कांग्रेस, बसपा, सपा और राजद जान लें कि बीच का कोई रास्ता नहीं होता!

 राजनीति में विचारधारा का गम्भीर संकट

मिथकों और किंवदंतियों में आता है कि जब शूद्र तप करता है, या असुर दहाड़ता है, तो ब्राह्मण-राज इंद्र का सिंहासन हिलने लगता है मैं यह तो नहीं कहूँगा कि राहुल गाँधी शूद्र या असुर हैं, पर लन्दन में आरएसएस (संघ) के खिलाफ उन्होंने जो हुंकार भरी है, उससे संघ का सिंहासन भले ही न हिला हो, पर उसके मुखिया जरूर हिल गए हैंपरिणामत: राहुल पर चौतरफा हमला शुरू हो गया है उसे नादान, नासमझ, सुपारी लेकर देश को बदनाम करने वाला और देशद्रोही सब कुछ कहा जा रहा है निस्संदेह, राहुल गाँधी ने सात समन्दर पार के मुल्कों में संघ की असलियत बता कर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के उस झूठ का पर्दाफ़ाश कर दिया है, जो वहां भारत की झूठी तस्वीर पेश करके आते हैं राहुल की वाकई तारीफ करनी होगी कि जो बात भारत में भी कोई कहने की हिम्मत नहीं जुटा सका, वह बेधड़क होकर राहुल ने लन्दन में कह दी कि संघ कई देशों में प्रतिबंधित मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा संगठन है, जिसका काम गैर-हिन्दुओं में दहशत फैलाना है, और वह भारत की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्ज़ा करके यहाँ के लोकतंत्र को समाप्त करने में लगा हुआ है

संघ के लिए यह आरोप ऐसा था, जैसे हजारों बिच्छुओं ने एक साथ डंक मार दिया हो पूरे संघ परिवार को सांप सूंघ गया संघ मुखिया मोहन भागवत इन डंकों के दर्द से बिलबिला गए और ऐसे बिलबिलाए कि संवित पात्रा जैसे संघियों के मुंह से राहुल को तमाम गालियां दिलवाने के बाद भी उनका दर्द बढ़ता ही जा रहा है अब सुनते हैं कि उन्होंने अपने दर्द को कम करने के लिए विरोधी दलों के नेताओं से वार्ता करने का मन बनाया है वह 17 से 19 सितम्बर तक दिल्ली के विज्ञान भवन में भविष्य का भारत : संघ का दृष्टिकोण विषय पर कार्यक्रम का आयोजन कर रहे हैं, जिसमें राजनीतिज्ञों के सवालों के जवाब स्वयं मोहन भागवत देंगे अखबार लिख रहे हैं कि 93 साल के इतिहास में संघ पहली बार देश और मौजूदा मुद्दों पर अपने नजरिए पर बहस का आयोजन कर रहा है यह भी खबर है कि इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण और लाइव वेबकास्टिंग की जाएगी जाहिर है कि केंद्र में संघ की सरकार है, तो उसके सारे संसाधनों का उपयोग उसके लिए खुला ही है संघ-मुग्ध अमर उजाला अपने 28 अगस्त के अंक में लिखता है,‘ कल्पना कीजिए, आरएसएस की विचारधारा और देश के प्रति उसके नजरिए पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी सवाल पूछ रहे हैं और सरसंघचालक मोहन भागवत जवाब दे रहे हैं

आरएसएस प्रमुख मोहनभागवत, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, मायावती और तेजस्वी

अगर राहुल भागवत से संवाद का आमन्त्रण स्वीकार कर लें, तो यह कल्पना हकीकत में बदल सकती है जाहिर है कि अमर उजाला को संघ की विचारधारा गलत नहीं लगती है, वरना वह खुद संघ को चुनौती देकर अपना पत्रकारिता धर्म निभाता खैर, खबर यह भी है कि संघ सवाल पूछने के लिए मायावती, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, शरद पवार, और माकपा महासचिव सीताराम येचुरी समेत 400 हस्तियों को आमन्त्रण भेजेगा निस्संदेह इन 400 हस्तियों में बौद्ध, जैन, ईसाई और मुस्लिम संगठनों के वे तमाम लोग भी होंगे, जिन पर संघ का भगवा रंग पहले से ही चढ़ा हुआ है अब सवाल मायावती, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव आदि दलित-पिछड़े नेताओं का उठता है उन्हें निमन्त्रण इसलिए भेजेगा, क्योंकि संघ अच्छी तरह जानता है कि इन नेताओं की कोई विचारधारा नहीं है उनके बुलाने से उनकी ही भद पिटेगी मेरे विचार में उनकी बुद्धिमानी इसी में है कि वे इस कार्यक्रम का न्यौता स्वीकार ही न करें

अब फिर राहुल गाँधी पर आते हैं उन्होंने लन्दन में संघ पर एक आरोप यह भी लगाया है, कि संघ में औरतों का प्रवेश निषिद्ध है मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यह संघ की आलोचना है या संघ में औरतों के प्रवेश की वकालत है? अगर संघ में औरतों का प्रवेश हो जायेगा, तो राहुल का कौन सा मकसद हल हो जायेगा? क्या संघ में आने वाली औरतें धर्मनिरपेक्ष हो जाएँगी? अगर संघ में औरतों का प्रवेश नहीं है, तो इसका कारण जाति के अशुद्ध होने का डर है संघ में आजीवन अविवाहित रहने की शर्त है, इस शर्त के साथ स्त्री-पुरुष का एक साथ रहना जोखिम भरा है संघ में जाति-बंधन नहीं है, और स्त्रियों के रहने से स्त्री-पुरुष में प्रेम के अंकुर फूट सकते हैं, जिसके कारण विवाह जाति के बाहर होने की सम्भावना बन जाएगी और जाति-शुद्धि खत्म हो जाएगी, जो संघ की विचारधारा के खिलाफ होगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संघ से स्त्रियाँ नहीं जुड़ी हुई हैं, संघ उनका उपयोग अपने स्त्री संगठनों में करता है

संघ को ताकतवर बनाने में कांग्रेस की भूमिका

एक सवाल राहुल गाँधी से भी है क्या उन्हें मालूम है कि संघ का जो विशाल जाल आज दिखाई दे रहा है, वह रातोंरात नहीं हुआ है, बल्कि वह सालों से निरंतर बढ़ता हुआ यहाँ तक पहुंचा है और उसके लिए सारी जमीन कांग्रेस ने खुद तैयार की है जिस रामलला आन्दोलन से भाजपा को संजीवनी मिली, उसके ताले कांग्रेस ने ही खुलवाए थे,और जिस बाबरी मस्जिद को गुलामी का प्रतीक बताकर संघ और भाजपा ने पूरे देश में उन्माद फैलाया था, उसको ध्वस्त करने में भी कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव की भूमिका थी आदिवासी इलाकों में कारपोरेट की लूट का रक्तरंजित खेल भी कांग्रेस की सरकार में ही शुरू हुआ था सलवा जुडूम किसकी योजना थी? उसका अगुआ महेंद्र कर्मा क्या कांग्रेसी नेता नहीं था, जिसने आदिवासियों के गाँव के गाँव जलवा दिए थे? सलवा जुडूम आदिवासियों के लिए आतंक का पर्याय बन गया था, जो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद बंद हुआ था झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में आरएसएस की गतिविधियाँ कांग्रेस के जमाने से ही चल रही थीं क्या कांग्रेस ने रोका उनको? आज जिस जमीन पर संघ बेताज बादशाह की तरह खड़ा है, वह कांग्रेस की ही बनाई हुई है

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को जनेऊधारी हिंदू साबित करते कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला

कांग्रेस आज भी कहीं-न-कहीं संघ की विचारधारा के ही इर्द-गिर्द घूम रही है क्या राहुल गाँधी को नहीं मालूम कि पंजाब में उनकी पार्टी की सरकार ईश-निंदा के खिलाफ कानून बनाने जा रही है, जो अगर बन गया, तो उसके पहले शिकार ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने वाले बुद्धिजीवी ही होंगे क्या यह विज्ञान और वैज्ञानिक चिन्तन को कुचलने का कानून नहीं होगा? क्या इसका उपयोग सरकार की नीतियों के खिलाफ लिखने और बोलने वालों के विरुद्ध नहीं किया जायेगा? पाकिस्तान में यह कानून इसलिए है,क्योंकि वह एक धार्मिक राष्ट्र है क्या कांग्रेस की सरकार पंजाब को अंधी धार्मिकता का राज्य बनाना चाहती है? ईश-निंदा का यह कानून अगर पंजाब में बन जाता है, तो इससे सबसे बड़ा लाभ आरएसएस को ही होगा, क्योंकि मुख्यमंत्री अरमिन्दर सिंह जिन अकालियों के दबाव में यह अलोकतांत्रिक कानून बनाने जा रहे हैं, उस पर आरएसएस का ही प्रभाव है, जिसके लिए वह अन्य राज्यों पर भी दबाव बना सकता है कांग्रेस की यह कैसी विचारधारा है, जो आरएसएस के आगे ही झुकी हुई है? क्या राहुल गाँधी का यह फर्ज नहीं बनता है कि वह पंजाब में अपनी सरकार के द्वारा प्रस्तावित ईश-निंदा कानून के खिलाफ कड़ा फैसला लें, और वैज्ञानिक चिन्तन के विकास पर जोर दें?

मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस ने कभी लोकतान्त्रिक विचारधारा को अपनाया हो उसने हमेशा ही धर्म और जाति को मजबूत करने वाली राजनीति की है सामाजिक और लोकतान्त्रिक आंदोलनों के दबाव-वश उसने बहुजनों और अल्पसंख्यकों के हित में कुछ अच्छे काम जरूर किए हैं, पर अन्ततोगत्वा धर्म और जाति का दोहन ही उसकी राजनीति रही है इससे इतर अगर उसने अपनी वैचारिकी खड़ी की होती, तो आज आरएसएस की हैसियत इतनी घातक नहीं होती

वैचारिक दिवालियेपन का शिकार सपा-बसपा और राजद

लेकिन अफ़सोस कि दलितों और पिछड़ों के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग दल बनाने वाले नेताओं में भी गंभीर वैचारिक संकट है दलितों और पिछड़ों के लिए सबसे घातक हिंदुत्व की राजनीति के ही चारों तरफ इन दलों की भी राजनीति घूम रही है समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पता नहीं कितने पढ़े-लिखे हैं, पर जब भी बोलते हैं,तो उनके बोलों में उनकी पढ़ाई-लिखाई दिखाई ही नहीं देती पता नहीं कि वह कुछ अध्ययन भी करते हैं या नहीं? हाल में उनके इस बयान ने कि सत्ता में आने पर भगवान विष्णु का विशाल मन्दिर बनायेंगे, आरएसएस और भाजपा का खूब मनोरंजन किया ब्राह्मणों ने भी चैन की साँस ली मन्दिर चाहे विष्णु का बने, या उनके अवतार श्रीराम का,मजबूत तो ब्राह्मणवाद ही होगा राम और विष्णु अलग-अलग थोड़े ही हैं इसलिए यह विडम्बना ही है कि अखिलेश यादव ने समर्पण भी किया, तो ब्राह्मणवाद के ही आगे, जो भारत की विशाल श्रमशील आबादी को अछूत और पिछड़ा बनाए रखने और समाज में ऊँच-नीच की घृणित व्यवस्था कायम करने का प्रमुख कारण है यह अखिलेश यादव की कौन सी विचारधारा है? क्या इसी विचारधारा के साथ वह सत्ता में आने का सपना देख रहे हैं? अगर वह आरएसएस और भाजपा से हिंदुत्व की प्रतियोगिता कर रहे हैं, तो यह उनका पागलपन ही है, जो इस प्रतियोगिता में आरएसएस और भाजपा से बाजी मार ले जायेंगे

सपा पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की विष्णुमंदिर बनाने की घोषणा

असल में समाजवादी यादव कुनबा लोहिया के समाजवाद से निकला है, जिनकी श्रीराम में भरपूर आस्था थी और वह रामायण मेलों का आयोजन किया करते थे इस समाजवाद का मार्क्स और डॉ. आंबेडकर के समाजवाद से न कोई सम्बन्ध था और न उसने बनाया था इसलिए लोहियावादी समाजवादी मुलायम सिंह यादव के आंबेडकर-विरोध को सभी जानते हैं, जो अपने आंबेडकर-विरोध में इतने अंधे हो गए थे कि खुलेआम अपने भाषणों में न केवल आंबेडकर प्रतिमाओं को तोड़ने की बातें करते थे, बल्कि एससी-एसटी एक्ट को भी खत्म करने की बातें करते थे यह सब वह उन सवर्णों को खुश करने के लिए करते थे, जो उनसे सबसे ज्यादा नफरत करते हैं यही सवर्ण-मोह चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने वाले उनके बेटे अखिलेश यादव में है, जो उनके लिए विष्णु भगवान का मंदिर बनाना चाहते हैं इनकी वैचारिकी की अज्ञानता का आलम यह है कि इन्हें और इनके पिता दोनों को बहुजन नायकों से सख्त नफरत है, इसलिए उन्हें जोतिराव फुले, सावित्री बाई फुले, ललई सिंह यादव, रामस्वरूप वर्मा किसी के बारे में कुछ नहीं पता है कोई इनके सामने उनके नाम भी लेता है, तो इन्हें ऐसा लगता है, जैसे वे इनके दुश्मन हों इतनी नफरत कि महात्मा जोतिराव फुले के नाम से बनाए गए एक जिले का नाम भी इनको बर्दाश्त नहीं हुआ, और उसको हटाकर ही इन्हें चैन मिला था जाहिर है कि ये तथाकथित समाजवादी नेता समाजवाद के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं

राजद नेता और बिहार के पूर्व स्वास्थ्यमंत्री तेजप्रताप यादव

यही हाल लालू यादव परिवार का है सत्ता में आने का अवसर मिला तो संपत्ति बनाने में लग गए और जीवनभर सिर्फ जातीय गुणाभाग की ही राजनीति करते रहेउन्होंने कभी भी पिछड़े वर्गों में सांस्कृतिक जागरण का काम नहीं किया परिणामत: वह स्वयं भी ब्राह्मणवादी बने रहे, और उनके बेटे भी उनके एक बेटे की तस्वीर, जो शायद  मंत्री रह चुका है, शंकर भगवान के भेष में सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है पता नहीं, वह शंकर के भेष में कौन सन्देश कौम को देने की कोशिश कर रहा है?कितनी भयानक सांस्कृतिक अज्ञानता है उसकी, कि दुनिया आगे बढ़ रही है, और वह ब्राह्मणवाद में ही फंसा हुआ है क्या आरएसएस के किसी नेता को शंकर के भेष में देखा है? क्या कांवर ढोने वालों में कोई मोहन भागवत दिखाई दिए किसी को? क्या संविद पात्रा दिखाई दिए किसी को? क्या योगी और मोदी कांवर ढोते हुए दिखाई दिए? हाँ, उन्होंने बहुजनों की अज्ञानता पर हेलिकोप्टर से ख़ुशी के फूल जरूर बरसाए थे क्योंकि उन्हें ऐसे ही दलित-पिछड़े चाहिए, जो ख़ुशी-ख़ुशी आरएसएस के ब्राह्मणवाद को कन्धों पर ढोते रहें, और उनका हिन्दूराष्ट्र बनाने का रास्ता आसान करते रहें ऐसा सोया हुआ समाज और सोया हुआ नेतृत्व क्या आरएसएस का मुकाबला कर पायेगा? उस आरएसएस का, जो अपनी विचारधारा के साथ कोई समझौता किए बिना, दलित-पिछड़ों के विकास का हर रास्ता बंद करते हुए आगे बढ़ रहा है, और इसलिए आगे बढ़ रहा है, क्योंकि उसका सामना करने के लिए दलित-पिछड़ों का नेतृत्व नाकारा है

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी वैचारिक संकट से मुक्त नहीं हैं जब से कांशीराम आरएसएस और भाजपा का हाथ मायावती के हाथ में पकड़ा कर गए हैं,तब से वह उस हाथ को पकड़े ही रहीं जब पिछले आम चुनावों में उस हाथ ने बसपा का सफाया कर दिया, तो उसके बाद ही थोड़ी चेतना उनमें आई, और उन्होंने उपचुनावों में भाजपा का हाथ छोड़ा और सपा से गठजोड़ किया

बहुजन राजनेताओं को साफ-साफ समझ लेना होगा कि राजनीति में दो ही विचारधाराएँ हैं— (1) दक्षिण-पंथी, और (2) वाम-पंथी इसमें बीच का रास्ता नहीं होता है या तो आपको दाएँ चलना होगा या बाएं दोनों तरफ चलने वाले लोग अवसरवादी होते हैं और उनकी, स्वार्थ के सिवा, कोई विचारधारा नहीं होती है दलित-पिछड़ों की राजनीति धुर दक्षिण-पंथी है, क्योंकि वामपंथ को वह पसंद नहीं करती है इसलिए दक्षिण-पंथी दलों में ही सबसे ज्यादा अवसरवादी लोग हैं सच यह है कि दक्षिण-पंथी राजनीति में विचारधारा केवल आरएसएस और भाजपा के पास ही है, और उसे कोई चुनौती विचारहीनता से ग्रस्त बहुजन राजनीति से नहीं मिल रही है अगर उसे चुनौती मिल रही है, तो वह वाम विचारधारा से ही मिल रही है इसलिए वाम विचारधारा से बौखलाए हुए भाजपा और आरएसएस दलित-पिछड़े वर्गों और आदिवासी समुदायों में वाम विचार को रोकने के लिए ही उनका हिन्दूकरण करके उन्हें अज्ञानता के दलदल में फंसाने की मुहिम चलाए हुए हैं और हैरान करने वाली बात यह है कि यह मुहिम विचारहीन बहुजन दलों तथा उसके अवसरवादी नेताओं के सहारे ही चल रही है वामपंथी कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को देश-द्रोही रूप में प्रचारित करना भी उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें  ब्राह्मणवादी-मीडिया और सत्ता-शक्ति दोनों की अहम भूमिका है

(कॉपी संपादन-सिद्धार्थ)


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