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बिहार की बदल रही ‘जाति व्यवस्था’ मीडिया को रास न आई

भारत में खासकर बिहार पिछड़ापन, गरीबी, निरक्षरता, भ्रष्टाचार और गुंडावाद (जंगल राज) का पर्याय बन गया है। मुझे याद है कि मेरे एक दोस्त ने बिहार के आसपास के इलाकों में जाने के दौरान मुझे बेहद सावधान रहने की सलाह दी थी (मैं पड़ोसी उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों का दौरा करने जा रहा था!)। बिहार की ऐसी छवि क्यों है और क्यों ऐसी छवि बनायी जाती रही है, इस संबंध में सवाल उठाने की हिम्मत करने वाले कुछ ही लोग हैं। जेफरी विटसो उनमें एक हैं और  उनकी किताब ‘डेमोक्रेसी अगेंस्ट डेवलपमेंट : लोअर कास्ट पॉलिटिक्स एंड पोलिटिकल मॉडर्निटी इन पोस्टकोलोनियल इंडिया’ उनके साहसी कृत्यों में से एक है। अफसोस की बात है कि बिहार पर समाजशास्त्र और मानवशास्त्र विषयक कार्य कई सालों से नगण्य रहे हैं। विकास, लोकतंत्र और जाति की तीन धुरियों के आपसी संबंधों को समझने में विट्सो का कार्य, व्यवस्था के विरुद्ध चला जाता है। यह किताब बिहार और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) पार्टी की अनुभव के स्तर पर तथा उदारवाद, उत्तर-उपनिवेशवाद, लोकतंत्र, विकास, जाति और राज्य की विषय के स्तर पर बात करती है।

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