‘मुझे निलंबित कर यंत्रणा दी जा रही है ताकि मैं दलितों-पिछड़ों के लिए लिखना-बोलना छोड़ दूं’

दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई में कहा प्रोफेसर मंडल को सस्पेंड करने के लिए कॉलेज के प्रिंसिपल जिम्मेदार नहीं हैं तो चेयरमैन को पार्टी बनाइये। कोर्ट ने क्षोभ जताया कि इतने लंबे समय से एक विकलांग शिक्षक का मानसिक उत्पीड़न क्यों किया जा रहा है। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

फॉलोअप : महिषासुर-दुर्गा विवाद

महिषासुर दिवस का पहला चर्चित आयोजन वर्ष अक्टूबर 2011 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ था। उसके बाद से यह सांस्कृतिक आंदोलन बढ़ता ही गया है। आज देश के सैकड़ों कस्बों-गांवों में ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व से मुक्ति का यह उत्सव मनाया जाने लगा है। लेकिन इन वर्षों में इससे संबंधित कई अन्य घटनाक्रम भी हुए हैं। कई जगहों पर दुर्गा के खिलाफ टिप्पणी करने पर मुदकमे दर्ज हुए। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों में महिषासुर और रावेन के अपमान के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गई। कुछ कस्बों में दुर्गा के कथित अपमान के खिलाफ प्रदर्शन किए गये तो कुछ जगहों पर महिषासुर के सम्मान में भी बड़ी-बड़ी रैलियां निकाली गईं। ‘महिषासुर-दुर्गा विवाद’ से संबंधित इस फॉलोअप सीरिज में हम उन घटनाओं के पुनरावलोकन के साथ-साथ मौजूदा स्थिति की जानकारी दे रहे हैं – संपादक


वह पिछले साल 25 सितंबर का दिन था जब दशहरे के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर केदार मंडल के फेसबुक वॉल पर हिंदू देवी दुर्गा के बारे में 22 सितंबर, 2017 को की गई एक टिप्पणी को आधार बनाते हुए उन पर देशभर में 15—20 एफआईआर दर्ज करवाए जाने की सूचनाएं मीडिया में आई। मंडल पर नई दिल्ली के लोधी कॉलोनी थाने में भी दिल्ली विश्वविद्यालय के बीजेपी के शिक्षक विंग नेशनल डेमो​क्रेमेटिक टीचर्स फ्रंट द्वारा दर्ज कराई गई। इन्हीं को आधार बनाते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन्हें सस्पेंड कर दिया था, जो अभी तक अनवरत जारी है।  

दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेते केदार मंडल (बाएँ से दूसरा)

दोनों पैरों से विकलांग प्रोफेसर केदार मंडल ने इस बीच किस तरह मानसिक-आर्थिक यंत्रणा झेली, उन्हें बार-बार कैसे जान से मारने की धमकी दी गई, यह तो वह और उनके भुक्तभोगी परिजन बेहतर जान-समझ सकते हैं। मगर 4 सितंबर, 2018 को  इस मसले पर हुई सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि उनके निलंबन के लिए जिम्मेदार कॉलेज के गवर्निंग बॉडी चेयरमैन अमिताभ सिन्हा को केस में दूसरी पार्टी बनाया जाए। क्योंकि कोर्ट में इस मसले पर वही जवाबदेह होंगे। साथ ही कोर्ट ने फटकार भी लगाई कि इतने लंबे समय तक आखिर केदार मंडल को किस आधार पर निलंबित रखा गया है?

हालांकि इस मामले में प्रोफेसर मंडल जेल नहीं गए। उन्होंने कोर्ट से 6 नवंबर 2017 को अग्रिम जमानत ले ली थी। मंडल कहते हैं कि अग्रिम जमानत लेने के बाद मैंने पुलिस से जांच में सहयोग देने की बात कही, तो मुझे पूछताछ के लिए थाने में बुलाया गया और पूछा गया कि मैंने आपत्तिजनक पोस्ट का कहां से रेफरेंस लिया है?

इस संबंध में  मैंने पुलिस को विस्तार से जानकारी और प्रकाशित सामग्री उपलब्ध कराई। उसके बाद पुलिस ने कभी नहीं बुलाया। जो केस मुझ पर दर्ज हुआ है उस मसले पर चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है, जबकि इसी आधार पर मुझे 26 सितंबर 2017 को कॉलेज से सस्पेंड कर दिया गया है।

दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

अग्रिम जमानत लेने के बाद मंडल इंतजार करते रहे कि कॉलेज उन्हें निलंबन का कारण बताएगा, मगर आरटीआई से जो जानकारी उपलब्ध हुई उसके मुताबिक उनका सस्पेंसन प्रोपरली हुआ ही नहीं है। गवर्निंग बॉडी चेयरमैन निलंबन जरूर करते हैं, मगर उसे एप्रूवल के लिए वाइस चांसलर के पास भेजा जाता है, मगर उनका निलंबन वाइस चांसलर के पास एप्रूवल के लिए भेजा ही नहीं गया। जबकि दिल्ली विश्व​विद्यालय का नियम कहता है कि अगर वाइस चांसलर के संज्ञान में सस्पेंसन न हो तथा उनके हस्ताक्षर उसमें न हों तो वह मान्य नहीं होता।

ओबीसी छात्रों के आंदोलन में भाग लेते केदार मंडल

निलंबन के 3 महीने गुजरने के बाद भी प्रोफेसर मंडल को इस मामले में कोई चार्जशीट कॉलेज की तरफ से नहीं दी गई। जब चार्जशीट नहीं दी गई तो केदार मंडल ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ केसों का हवाला देते हुए प्रिंसिपल और गवर्निंग बॉडी को चिट्टी लिखी कि जिन मामलों में चार्जशीट नहीं दी जाती, उन्हें रिवॉक कर दिया गया है, इसलिए उन्हें भी ज्वाइन करवाया जाए। मगर उनकी चिट्ठी का कॉलेज की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया।

इस बात को छह महीने बीत गए तो प्रोफेसर मंडल ने एक और चिट्टी कॉलेज गवर्निंग बॉडी चेयरमैन और प्रिंसिपल को लिखी कि इतना वक्त गुजर जाने के बावजूद उनका निलंबन रिवॉक नहीं किया गया है। कोर्ट की गाइडलाइन को कोट करते हुए उन्होंने अपनी चिट्ठी में सवाल उठाया कि आखिर क्यों उनका निलंबन रद्द नहीं किया जा रहा? मगर इस चिट्ठी का भी कोई जवाब नहीं दिया गया। जवाब का 1—2 महीने तक इंतजार करने के बाद उन्होंने 9 मई 2018 को कोर्ट में रिट फाइल की। उसकी सुनवाई में कोर्ट ने डीयू और दयाल सिंह कॉलेज को नोटिस जारी किया कि प्रोफेसर मंडल की चिट्ठी का जवाब एक महीने के अंदर दे, मगर उस बात को 4 महीने बीत चुके हैं, अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया है।

प्रोफेसर केदार मंडल ने हाल ही में चेन्नई में अखिल भारतीय टेनिस महासंघ के तत्वावधान में आयोजित व्हील चेयर टेनिस टूर्नामेंट में भाग लिया

इसके बाद प्रोफेसर मंडल की तरफ से अपने वकील के माध्यम से कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का नोटिस यूनिवर्सिटी और प्रिंसिपल को भेजा। हालांकि प्रिंसिपल ने उसका जवाब तो नहीं दिया, मगर जो चिट्ठियां उन्होंने चेयरमैन को लिखी हैं वो सारी प्रोफेसर मंडल के वकील को उपलब्ध करवाईं, जिसमें प्रिंसिपल ने लिखा है कि उनसे गवर्निंग बॉडी चेयरमैन ने जबरन निलंबन की चिट्ठी लिखवाई, मना करने के बावजूद साइन करवाए गए, मगर इसमें प्रिंसिपल ने भी कहीं नहीं लिखा है कि वो प्रोफेसर मंडल को ज्वाइन करवा रहे हैं।

इतना सब होने के बावजूद भी प्रोफेसर मंडल को ज्वाइन नहीं करवाया गया तो फिर से उन्होंने न्यायालय की अवमानना की रिट दायर की। उसमें कॉलेज के प्रिंसिपल आईएस बक्षी को पार्टी बनाया गया था। प्रिंसिपल की तरफ से सफाई दी गई कि इसके लिए वे नहीं बल्कि गवर्निंग बॉडी चेयरमैन जिम्मेदार हैं। इसमें कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को निर्देशित किया है कि जैसा कि प्रिंसिपल के वकील ने कहा कि प्रोफेसर मंडल को सस्पेंड करने के लिए कॉलेज के प्रिंसिपल जिम्मेदार नहीं हैं तो चेयरमैन को पार्टी बनाइये। कोर्ट ने इस बात का भी क्षोभ जताया कि इतने लंबे समय से एक विकलांग शिक्षक का मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है।

प्रोफेसर मंडल कहते हैं “मुझे गैर कानूनी तरीके से सस्पेंड किया गया है। पहले दिन से ही यह निलंबन गैरकानूनी है।”

लगभग एक साल से आर्थिक-मानसिक उत्पीड़न झेल रहे प्रोफेसर मंडल के मुताबिक सोच-समझी चाल के तहत उन्हें प्रताड़ित करने के लिए इस तरह की कार्रवाई की गई, उन्हें जिंदा लाश बनाकर रख दिया गया है। निलंबन गैरकानूनी होने के बावजूद अभी तक उन्हें ज्वाइन नहीं कराया गया है। स्थिति ऐसी बना दी गई है जिसका कोई रिजल्ट ही नहीं निकल रहा। अगर ये चीजें कानूनी और पारदर्शी होतीं तो बात और होती, मगर इसका तो प्रोसेस ही गैरकानूनी रहा, जिसका प्रमाण प्रिंसिपल बक्षी की चिट्ठियों से मिल जाता है। आरटीआई की जानकारी भी यही कहती है कि यह निलंबन गैरकानूनी है।

केदार कहते हैं कि, “मैं दिल्ली ​यूनिवर्सिटी में एससी/एसटी, ओबीसी टीचर्स और स्टूडेंट राइट्स के लिए काम करता रहा हूं इसलिए मुझे निशाने पर लिया गया है। दक्षिणपंथी ताकतों को मौका मिलते ही उन्होंने मुझे टार्गेट किया है।”

गौरतलब है कि 2011 में प्रोफेसर मंडल ने दिल्ली विश्वविद्यालय पर एक ​केस किया था, क्योंकि वहां पहले एडमिशन के लिए सिर्फ 3 या 4 कटआॅफ जारी होते थे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें जीते भी थे। अब दिल्ली विश्वविद्यालय में 12, 14, 15 कटआॅफ आती है और एससी-एसटी और ओबीसी बच्चों का एडमिशन होता है। पहले 3-4 कटआॅफ के बाद जो एससी-एसटी-ओबीसी कोटे की जो सीटें बच जाती थीं उन्हें जनरल में कनवर्ट कर दिया जाता था। इस बात को पार्लियामेंट में भी उठाया गया था। अभी भी मंडल दिल्ली विश्वविद्यालय में रुकी हुई 5000 शिक्षकों की बहाली किए जाने का केस लड़ रहे हैं।

कुछ दिन पहले 13 अगस्त 2018 को केदार मंडल की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कराई गई कि उन्हें जान से मारने की धमकी देने वाले फोन कॉल आ रहे हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में दिल्ली के बसंत कुंज थाने को सूचना दी थी कि उनके मोबाइल *******5357 पर 9213162006 से एक फोन आया। अननॉन नंबर देख पहले तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया,  मगर जब दुबारा फोन आया तो उन्होंने फोन उठाया और फोन करने वाले ने खुद को ट्रांसपोर्ट विभाग का कर्मी बताया। प्रत्युत्तर में प्रो मंडल ने अपना नाम बताया तो उसने उन्हें गंदी—गंदी गालियां देने के साथ उन्हें जान से मारने की धमकी दी। पुलिस ने इस मामले में भी कोई कार्रवाई नहीं की, लगता है पुलिस किसी अनहोनी के बाद ही ऐसे मामलों में कोई एक्शन लेती है।

बहरहाल, इन तमाम प्रताड़नाओं के बावजूद अदम्य जिजीविषा के धनी प्रोफेसर मंडल ने हिम्मत नहीं छोडी है। वे कहते हैं कि “इन प्रताड़नाओं के बावजूद मैं दलित-बहुजनों के लिए लड़ना नहीं छाेडूंगा, मुझे देश के संविधान और न्याय व्यवस्था पर भरोसा है, जो हमें अपनी बात कहने की आजादी देती है। जीत हमारी होगी।”

(कॉपी संपादन : अर्चना)


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