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ओडिशा : कपड़ा साफ करने के बदले नौकरी करने पर सवर्णों ने ढाया कहर

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में भी भारत के सुदूर इलाकों में सवर्णों का शोषित तबकों के खिलाफ अत्याचार व नंगा नाच बदस्तूर जारी है। जी हां, इसे सवर्णों का नंगा नाच ही कहेंगे। ओडिशा के पुरी जिले के ब्रह्मागिरि के नुआगांव में बीते 23 जुलाई 2018 को जो हुआ उसके लिए यही शब्द सर्वोपयुक्त है। गांव के स्थानीय सवर्णों ने एक रजक परिवार पर केवल इसलिए कहर ढाया क्योंकि उस परिवार ने करीब 22 साल पहले अपने पारंपरिक पेशे को त्याग दिया था। सामंती नशे में चूर दो सौ से अधिक की संख्या में सवर्णों ने क्रूरता की सारी सीमायें लांघते हुए पीड़ित परिवार के सभी सदस्यों के साथ मारपीट तो की ही, गर्भवती महिला को इस तरह से पीटा कि उसका गर्भपात हो गया।

इतनी गंभीर घटना के बाद भी पुलिस तबतक सोयी रही जबतक कि एक सामाजिक संगठन मूलनिवासी समता परिषद द्वारा राज्य मानवाधिकार आयोग को सूचना नहीं दी गयी। आयोग के हस्तक्षेप के बाद दर्ज प्राथमिकी में 30 नामजद और दो सौ अज्ञात लोगों को अभियुक्त बनाया गया। लेकिन पुलिस ने केवल 7 लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिसिया छानबीन का आलम यह है कि इस घटना के पीड़ित अभी भी अस्पताल में हैं और सभी गिरफ्तार अभियुक्तों को जमानत मिल चुकी है और वे जेल से बाहर हैं।

ऐसी ही घटनाओं को बिहार की राजधानी पटना के आसपास के जिलों में कुख्यात रणवीर सेना के गुंडों द्वारा अंजाम दिया जाता था। उसके गुंडे गर्भ में पल रहे बच्चों तक को यह कहते हुए मार डालते थे कि एक दिन बड़ा होकर यह नक्सली बनेगा।

नुआगांव में रजक परिवार पर हुए हमले के विरोध में मूलनिवासी समता परिषद के सदस्यों द्वारा जिलाधिकारी का घेराव किया गया

ओडिशा के जिस घटना की बात हम कर रहे हैं, वह  एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य पर किये जाने वाले अत्चाचार की पराकाष्ठा है।

सामंती तत्वों ने तीन रजक परिवारों पर कहर ढाया। हमले के दौरान रमामणि सेठी का हाथ बुरी तरह तोड़ दिया गया। करीब साठ वर्ष की पीड़िता रमामणि सेठी हमलावरों से रहम की गुहार लगाती रही, लेकिन सवर्णों ने उनकी एक न सुनी। हमलावरों ने उनके घर ढाह दिया। इतना ही नहीं गर्भवती प्रतिमा सेठी के पेट पर जानलेवा प्रहार किया। इस घटना में उसका गर्भपात हो गया।

ओडिशा के पुरी जिले के नुआगांव में दलित परिवारों पर सवर्णों ने जिस तरह से हमला  किया, वह यह साबित करने के लिए काफी है कि भारत में तमाम कानूनी प्रावधान होने के बावजूद वे किस कदर निष्प्रभावी हैं। करीब 22 साल पहले सिंधुमय सेठी के बेटे पढ़ाई करने के बाद सम्मान का जीवन बिताने के लिये पारंपरिक कपड़े धोने का काम छोड़ कर नौकरी करने लगे। लेकिन सवर्णों को यह मंजूर न था। तब सवर्णों ने गांव में इस परिवार का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया था। इसके बावजूद सेठी परिवार सही-सलामत गुजर बसर कर रहा था। परंतु सवर्ण तबसे इस ताक में थे कि वे सेठी परिवार को सबक सिखायें।

हद तो तब हो गयी जब इस घटना की जानकारी स्थानीय पुलिस को दी गयी। लेकिन सामंतों के आगे पुलिस ने भी अपने हथियार डाल दिये और परिणामस्वरूप न तो घटना की कोई प्राथमिकी दर्ज की गयी और गिरफ्तारी का तो सवाल ही नहीं बनता।

लेकिन सवर्णों की इस गुंडागर्दी के बारे में जब सामाजिक संगठन मूलनिवासी समता परिषद को हुई तब संगठन द्वारा बीते 30 जुलाई 2018 को राज्य मानवाधिकार आयोग को ज्ञापन सौंपा गया। इसके बाद प्राथमिकी तो दर्ज हुई। लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। सवर्णों के अत्याचार के खिलाफ संगठन ने बीते 3 सितंबर 2018 को विरोध मार्च निकाला जिसमें हजारों की संख्या में लोग एकजुट हुए।  इस प्रदर्शन का नेतृत्व अभिराम मल्लिक, भजमन बेहेरा, अक्षय मल्लिक, कालु कान्डी, मो. अली, बंधु सेठी, दिवाकर बारिक और अनिल मल्लिक आदि ने किया।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क/सिद्धार्थ)


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