25 दिसंबर और भारत के दलित-बहुजन

ईसा ने जन्म लेने के लिए किसी पुरोहित या राजा का घर नहीं चुना. वे एक बढ़ई के घर में जन्मे थे और अपनी युवा अवस्था में बढ़ई के रूप में ही काम करते. उन्होंने न तो सत्ता को चुना, न धन को, और ना ही रुतबे को. यह बाइबिल के पहले अध्याय की इस शिक्षा के अनुरूप था कि हर पुरुष और स्त्री में ईश्वर की छवि होती है

वह 25 दिसंबर 1927 का ही दिन था जब डॉ. आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) ने दलितों और कुछ ओबीसी के एक बड़े समूह का नेतृत्व करते हुए मनुस्मृति का सार्वजनिक रूप से दहन किया था। यह विधिशास्त्र, सभी शूद्रों और दलितों को नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त करता है। आज, मुख्यतः दलित इस दिन को उनकी मुक्ति की राह पर पहले कदम के रूप में याद करते हैं। डॉ. आंबेडकर ने इस साहसिक और क्रांतिकारी कदम के लिए 25 दिसंबर को ही क्यों चुना? क्या इसकी वजह यह थी कि उस दिन सारी दुनिया ईसा मसीह का जन्मदिन मनाती है?

आंबेडकर के जीवन पर आधारित पुस्तकें लिखने वाले लेखक हमें बताते हैं कि वे जोती राव फुले काे अपना प्रेरक मानते थे। फुले की सोच पर बाइबिल की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव था। बाइबिल से जोतीराव का परिचय उन स्कॉटिश मिशनरीयों ने करवाया था, जिन्होंने उन्हें शिक्षा प्रदान की थी।

मनुस्मृति की प्रतियां जलातीं दलित-बहुजन छात्राएं

बाइबिल में ईसा के जन्म से लेकर घटनाओं, व्यक्तियों और भारत के दलित बहुजनों में गहरी समानताएं हैं।  ईसा ने पहली बार सभागृह में नबी इसायस की पुस्तक़ खोली और उसमें से पढ़ा, “उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को शुभ समाचार सुनाऊं, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दूं और दमितों को स्वतंत्र करूं।”  

प्रश्न यह है कि वे किसे मुक्ति देने आये थे? इस प्रश्न का उत्तर इसमें निहित है कि वे सबसे पहले किससे जुड़े। अगर ईसा मसीह इंग्लैंड में जन्मे होते तो उनका उपनाम कारपेंटर (बढ़ई) होता और इस विशेष बच्चे के जन्म का उत्सव मनाने सबसे पहले उनके पडोसी चरवाहे आते। और यह सिलसिला आगे बढ़ता जाता। ईसा ने सबसे पहले जिन्हें अपनी राह पर चलने का आह्वान किया, वे मछुआरे थे। भारतीय सन्दर्भ में बढ़ई, चरवाहे और मछुआरे सभी शुद्र हैं, जिन्हें अब आधिकारिक भाषा में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कहा जाता है। भारत की आधी से अधिक आबादी ओबीसी की है।

ईसा मसीह के जन्म को प्रदर्शित करती एक मधुबनी पेंटिंग

ईसा मसीह, जो सर्वशक्तिमान, सृष्टि निर्माता ईश्वर का पुत्र होने का दावा करते थे, ने जन्म लेने के लिए किसी पुरोहित या राजा का घर नहीं चुना। वे एक बढ़ई के घर जन्मे और अपनी युवा अवस्था में बढ़ई के रूप में ही काम किया।

उन्होंने न तो सत्ता को चुना, न धन को और ना ही रुतबे को। यह, बाइबिल के पहले अध्याय की इस शिक्षा के अनुरूप था कि हर पुरुष और स्त्री में ईश्वर की छवि होती है।

इस प्रकार की सोच भारतीय ब्राह्मणवादी मानसिकता के लिए विदेशी है। मैं एक ऐसे परिवार में पली-बढ़ी, जिसके ब्राह्मण पूर्वजों ने ईसाई धर्म अपनाया था, परन्तु जिसके सदस्यों को बाइबिल की शिक्षाओं का अत्यंत सतही ज्ञान था और जो उनका ना के बराबर पालन करते थे। इसलिए, मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि मैं मेरे बहुजन दोस्तों और कर्मचारियों से श्रेष्ठ हूं। मैंने 40 वर्ष की आयु में पहली बार ईसा मसीह के जन्म लेने के उद्देश्य को समझा और इसने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। मैं तब तक अपने करियर, नाम और महत्वाकांक्षाओं के पीछे भाग रही थी। इसके बाद मैंने ईसा मसीह से अपनी गलत सोच और जीवन जीने के मेरे गलत तरीके के लिए क्षमा मांगी और मैंने उसके रास्ते पर चलने का निर्णय लिया।

गोवा में बच्चे ईसा मसीह के जन्म की नाट्य प्रस्तुति करते हुए

यह बात जनवरी 1993 की है। लगभग 25 वर्ष पहले की। मैंने बाइबिल पढ़ना शुरू किया और मेरा विचार और व्यवहार बदलने लगा।

मुझे यह समझ में आया कि मैं दूसरी जाति में पैदा हुए किसी व्यक्ति से अलग नहीं हूं। बल्कि, मुझे यह भी अहसास हुआ कि जाति के नाम पर किस तरह के भयावह अन्याय किये जा रहे हैं। इसलिए, 2007 में जब मेरे पति (आयवन कोस्का) को ईश्वर ने फारवर्ड प्रेस शुरू करने के प्रेरणा दी, तो मैं तुरंत उनका साथ देने के लिए राजी हो गयी। ईश्वर ने मुझे यह ताकत दी कि मैं, जिसे तब तक केवल अपनी और अपने परिवार की चिंता थी, हमारे परिवार के सीमित आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल फारवर्ड प्रेस को चलाने के लिए करूं।

अक्तूबर 2014 में जब फारवर्ड प्रेस के कारण हमारे नयी दिल्ली स्थित निवास में 15 हथियारबंद पुलिसकर्मी पहुंच गए और मेरे पति को ज़मानत लेनी पड़ी, तब हम दोनों को ईश्वर ने अलौकिक साहस दिया ताकि हम डरें नहीं और अपना काम करते जाएं।

वर्ष 2014 में फारवर्ड प्रेस के पांचवीं वर्षगांठ के मौके पर आयवन और सिल्विया कोस्का

करीब दस साल पहले, मेरे पिता ने पुणे के बाहरी इलाके में गांवों के बहुजन बच्चों के लिए ज्ञानांकुर इंग्लिश मीडियम स्कूल शुरू किया था। आज वे दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा स्थापित इस स्कूल में पहली से लेकर बारहवीं तक की कक्षाओं में 700 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं और इसका संचालन ईसा मसीह के अनुयायी कर रहे हैं। गरिमा, ज्ञानांकुर स्कूल के मूलभूत मूल्यों में शामिल है। यह स्कूल बच्चों को सिखाता है कि हर व्यक्ति बराबर है और कोई किसी से ऊंचा या नीचा नहीं है। हाल में, स्कूल में सहायक कर्मचारियों (जिन्हें आंटी कहा जाता है) और जो वंचित समाज की हैं, की सराहना करने के लिए एक विशेष सभा आयोजित की गयी।

ज्ञानांकुर स्कूल की आंटी

अगर इतने कम लोगों पर ईसा मसीह की शिक्षाओं के प्रभाव से इतनी बड़ी संख्या में आज के बहुजन चिंतकों और लेखकों को आवाज़ मिल सकती है और कल के बहुजन चिंतकों और लेखकों को गढ़ने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकता है तो ज़रा सोचिये कि अगर और लोग जिनमें ऊंची जातियों और बहुजन दोनों शामिल हों, के दिलोदिमाग पर ईसा की शिक्षाओं का प्रभाव पड़े तो इसके सकारात्मक परिणाम क्या होंगे?

क्या माता-पिता, अपनी जाति या समुदाय से बाहर शादी करने पर अपने बच्चों की जान लेना बंद कर देंगे?

क्या गांवों के स्कूलों में दलित बच्चों से शौचालय साफ़ करवाना और उन्हें कक्षा में सबसे पीछे बिठाना बंद हो जाएगा?

क्या दलितों पर हमले, उनके साथ बलात्कार और उन्हें पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएं कम या समाप्त हो जाएंगी?

क्या किसी ओबीसी को नौकरी पाने या कॉलेज में प्रवेश से उसकी जाति के कारण वंचित किया जाना रुक जाएगा?

या, क्या हम किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि पर विचार किये बगैर, उसके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करने लगेंगे क्योंकि हम एक-दूसरे में ईश्वर की छवि देखेंगे?

(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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