पेरियार की नजर में भविष्य की दुनिया

यह आलेख ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ के  एक कार्यक्रम में पेरियार द्वारा 1944 में दिए गए एक भाषण का लिखित रूप है। यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ। इसके प्रारंभ में उन्होंने एक भूमिका भी लिखी है। प्रस्तुत है, आने वाली दुनिया के बारे में पेरियार की सोच

आने वाली दुनिया

कल की दुनिया कैसी थी? आज की दुनिया कैसी है? आने वाले कल की दुनिया कैसी होगी? समय के साथ-साथ, शताब्दियों के अंतराल में कौन-कौन से परिवर्तन होंगे? केवल तर्कवादी इन बातों को सही-सही समझ सकता है। धर्माचार्य के लिए इन्हें समझना अत्यंत कठिन है। यह बात मैं किस आधार पर कह रहा हूं?

धर्माचार्य मात्र उतना जानते हैं, जितना उन्होंने धर्मशास्त्रों और ऊटपटांग पौराणिक साहित्य को रट्टा लगाते हुए समझा है। उन सब चीजों से जाना है, जो ज्ञान और तर्क की कसौटी पर कहीं नहीं ठहरतीं। उनमें से कुछ केवल भावनाओं में बहकर सीखते-समझते हैं। दिमाग के बजाए दिल से सोचते हैं। अंध-श्रद्धालु की तरह मान लेते हैं कि उन्होंने जो सीखा है, वही एकमात्र सत्य है। बुद्धिवादियों का यह तरीका नहीं है। वे ज्ञानार्जन को महत्त्व देते हैं। अनुभवों से काम लेते हैं। उन सब वस्तुओं से सीखते हैं, जो उनकी नजर से गुजर चुकी हैं। प्रकृति में निरंतर हो रहे परिवर्तनों, जीव-जगत की विकास-प्रक्रिया से भी वे ज्ञान अर्जित करते हैं। इसके साथ-साथ वैज्ञानिक शोधों,महापुरुषों के ज्ञान, व्यक्तिगत खोजबीन, उपलब्ध शोधकर्म को भी वे आवश्यकतानुसार और बिना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करते हैं।

धर्माचार्य सोचता है कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है. उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है। अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते। दूसरी ओर तर्कवादी मानता है कि यह संसार प्रतिक्षण आगे की ओर गतिमान है। सबकुछ तेजी से बदल रहा है। इसलिए वह अधुनातन और श्रेष्ठतर के स्वागत को सदैव तत्पर रहता है। मेरा आशय यह नहीं है कि दुनिया-भर के सभी धर्माचार्य एक जैसे हैं। लेकिन जहां तक ब्राह्मणों का सवाल है, वे सब के सब  बुद्धिवाद का विरोध करते हैं। परंपरा नएपन की उपेक्षा करती है। वह लोगों को तर्क और मुक्त चिंतन की अनुमति नहीं देती। न ही शिक्षा-तंत्र और परीक्षा-विधि को उन्नत करने में उन्हें कोई मदद पहुंचाती है। उलटे वह लोगों के पूर्वाग्रह रहित चिंतन में बाधा उत्पन्न करती है। यह जानते हुए भी परंपरा-पोषक धर्माचार्य अज्ञानता के दलदल में बुरी तरह धंसे हैं, पुराणों के दुर्गंधयुक्त कीचड़ में वे आकंठ लिप्त हैं। अंधविश्वाश और अवैज्ञानिक विचारों ने उन्हें खतरनाक विषधर बना दिया है।

हमारे धार्मिक नेता, विशेषकर हिंदू धर्म के अनुयायी धर्माचार्यों से भी गए-गुजरे हैं। यदि धर्माचार्य लोगों को 1000 वर्ष पीछे लौटने की सलाह देता है, तो नेता उन्हें हजारों वर्ष पीछे ढकेलने की कोशिश में लगे रहते हैं। ये जनता को सदियों पीछे ढकेल भी चुके हैं। बुद्धिवाद न तो धर्माचार्यों को रास आता है, न ही हमारे हिंदू नेताओं को। उन्हें केवल अवैज्ञानिक, मूर्खतापूर्ण और बुद्धिहीन वस्तुओं से लगाव है।

अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि ये लोग नई दुनिया में भी उम्मीद लगाए रहते हैं कि आने वाला समय उन जैसे असभ्य और गंवारों का होगा। ‘स्वर्णिम अतीत’(ओल्ड इज गोल्ड) की परिकल्पना पर वही व्यक्ति विश्वास कर सकता है, जिसने नए परिवर्तन को न तो समझा हो, न उसकी कभी सराहना की हो. केवल अकल के अंधे लोग उनका अनुसरण कर सकते हैं।

हम जैसे तर्कवादी लोग पुरातन को पूर्णतः खारिज नहीं करते। उसमें जो अच्छा है, हम उसका स्वागत करते हैं। उसे अपनाने के लिए भी अच्छाई और नएपन में विश्वास करना अत्यावश्यक है। तभी हम नए और अधुनातन सत्य की खोज कर सकते हैं। समाज तभी प्रगति कर सकता है, जब हम नए और बेहतर समाज की रचना के लिए नवीनतम परिवर्तनों के स्वागत को तत्पर हों।

लोग चाहे वे किसी भी देश अथवा संस्कृति के क्यों न हों, पुरातन से संतुष्ट कभी नहीं थे। उनकी दृष्टि सदैव अधुनातन ज्ञान एवं प्रगति पर केंद्रित रही हैं। वे जिज्ञासु और निष्पक्ष थे। इसी कारण वे विस्मयकारी वस्तुओं की खोज कर पाए। आज दुनिया के हर कोने के लोग मानवोपयोगी आविष्कारों का लाभ उठा रहे हैं। इसलिए यह आलेख केवल उन लोगों के लिए है जो सत्य को अनुभव करना जानते हैं। उसे आत्मसात् करने को तत्पर हैं। ऐसे ही लोग शताब्दियों आगे के परिवर्तनों की कल्पना कर सकते हैं।

केरल के कोट्टायम जिले के वाइकोम में पेरियार स्मारक परिसर में स्थापित पेरिया की प्रतिमा (फोटो : एफपी ऑन द रोड, फरवरी 2017)

अतीत के विहंगावलोकन और महान इतिहासकारों की राय से पता चलता है कि आने वाले समय में राजशाही का अंत हो जाएगा। बहुमूल्य सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात प्रभु वर्ग का विशेषाधिकार नहीं रह पाएंगे। उस दुनिया में न तो शासक की आवश्यकता होगी, न शासन की, न राजा होगा, न ही राज्य की। लोगों की आजीविका और सुख-शान्ति पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं होगा, जैसा आजकल का चलन है। आज रोजी-रोटी के लिए किया जाने वाला श्रम अत्याधिक है, अपनी ही मेहनत का सुख प्राप्त करने के अवसर अपेक्षाकृत अत्यंत सीमित हैं। जबकि हमारे पास खेती-किसानी और सुखामोद, यहां तक कि वैभव-सामग्री जुटाने के विपुल संसाधन हैं। दूसरी ओर भूख, गरीबी और दैन्य के सताए लोग बड़ी संख्या में हैं। ऐसे लोगों के पास सामान्य सुविधाओं का अभाव हमेशा बना रहता है। उनके पास न तो भरपेट भोजन है, न ही जीवन का कोई सुख। हालांकि दुनिया में अवसरों की भरमार है। उनसे कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकता है, अपने आप को ऊंचा उठा सकता है। फिर भी ऐसे लोग बहुत कम हैं जो उन सबका आनंद उठा पाते हैं। कच्चे माल और उत्पादन के क्षेत्र तेजी से विकास की ओर अग्रसर हैं। दूसरी ओर ऐसे लोग भी अनगिनत हैं जो मामूली संसाधनों के साथ गुजारा करने को विवश हैं। समाज में जीवन की मूलभूत अनिवार्यताएं होती हैं। उनके अभाव में जीवन बहुत कठिन हो जाता है। बहुत-से लोग न्यूनतम सुविधाओं के लिए तरसते हैं। बड़ी कठिनाई में वे जीवनयापन कर पाते हैं। हमारे पास कृषि भूमि की कमी नहीं है। बाकी संसाधन भी पर्याप्त मात्रा में हैं। मगर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास जमीन का एक टुकड़ा तक नहीं है। ऐसी दुनिया में एक ओर सुख-पूर्वक जीवनयापन के भरपूर संसाधन मौजूद हैं, दूसरी ओर भुखमरी गरीबी, और दुश्चिंताओं की भरमार है। उनके कारण समाज में चुनौतियां-ही-चुनौतियां हैं।

क्या इन सबके और ईश्वर के बीच कोई संबंध है?

क्या इन सबके और मनुष्य के बीच कोई तालमेल है?

ऐसे लोग भी हैं जो सांसारिक कार्यकलापों को ईश्वर से जोड़ते हैं। परंतु हमें ऐसा कोई नहीं मिलता जो दुनिया की बुराइयों के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहराता हो। तो क्या यह मान लिया जाए कि आदमी नासमझ है, उसमें इन बुराइयों से निपटने का सामर्थ्य ही नहीं है?

27 जून 1970 को यूनेस्को द्वारा जारी सम्मान पत्र जिसमें उन्हें “नये युग का पैगंबर” तथा ‘दक्षिण-पूर्व एशिया का सुकरात’ कहा गया (फोटो : एफपी ऑन द रोड, फरवरी 2017)

प्राणी मात्र के बीच मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान है। यह आदमी ही है, जिसने ईश्वर, धर्म, दर्शन, अध्यात्म को गढ़ा है। कहा यह भी जाता है कि असाधारण मनुष्य ईश्वरका साक्षात्कार करने में सफल हुए थे। कुछ लोगों के बारे में तो यह दावा भी किया जाता है कि वे ईश्वर में इतने आत्मलीन थे कि स्वयं भगवान बन चुके थे। मैं बड़ी हिम्मत के साथ पूछता हूं—आखिर क्यों ऐसे महान व्यक्तित्व भी दुनिया में व्याप्त तमाम मूर्खताओं को उखाड़ फेंकने में नाकाम रहे? क्या इससे स्पष्ट नहीं होता कि लोग अपने सामान्य बोध से यह नहीं समझ पाए कि सांसारिक चीजों का ईश्वर, धर्म, आध्यात्मिक निर्देश, न्याय, मर्यादा, शासन आदि से कोई संबंध नहीं है। ये सिर्फ इसलिए हैं क्योंकि अधिकांश लोग स्वतंत्र रूप से सोचने तथा निर्णय लेने में अक्षम हैं?

पश्चिमी देशों में अनेक विद्वानों ने बुद्धि को महत्त्व देते हुए तर्कसंगत ढंग से सोचना आरंभ किया। उन विचारों की मदद से उन्होंने विलक्षण ज्ञान के साथ-साथ चामत्कारिक आविष्कार किए हैं। उसके फलस्वरूप वे अपनी आध्यात्मिकता के परिष्कार के साथ-साथ, अंधविश्वासों और आत्म-वंचनाओं का समाधान खोजने में भी कामयाब रहे। अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्राचीन ढकोसले ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं। यही कारण है कि उन्होंने नए युग पर ध्यान-केंद्रित करना आरंभ कर दिया है।

हम क्यों जन्मे हैं? आम आदमी को आज भी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ता है? क्यों लोग भूख और गरीबी के कारण अकाल मौत मरते हैं? जबकि दुनिया में संसाधनों का प्राचुर्य है। ये मानव-मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाले प्रश्न हैं। आज हालात बदल रहे हैं। आजकल बुद्धिवादी तरीके से अनेक चीजों का वास्तविक रूप हमारे सामने है। कालांतर में यही तरीका न केवल परिवर्तन का वाहक बनेगा, बल्कि सामाजिक क्रांति को भी जन्म देगा। एक समय ऐसा आएगा जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा। न सरकार की जरूरत रहेगी। किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा। ऐसा कोई काम नहीं होगा जिसे ओछा माना जाए; या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए। आज सरकार के पास असीमित अधिकार हैं। किंतु भविष्य में ऐसी कोई सरकार नहीं होगी, जिसके पास अंतहीन अधिकार हों। दास प्रथा का नामोनिशान नहीं बचेगा। जीवनयापन हेतु कोई दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगा। महिलाएं आत्मनिर्भर होंगी। उन्हें विशेष संरक्षण, सुरक्षा और सहयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

केरल के कोट्टायम जिले के वाइकोम में पेरियार स्मारक परिसर में बने लघु संग्रहालय में पेरियार की तस्वीर को निहारते फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन (फोटो : एफपी ऑन द रोड, फरवरी 2017)

आने वाली दुनिया में मनुष्य को सुख-पूर्वक जीवन-यापन करने के लिए एक अथवा दो घंटे का समय पर्याप्त होगा। उससे वह उतना ही वैभवशाली जीवन जी सकेगा, जैसा संत-महात्मा, जमींदार, शोषण करने वाले धर्मगुरु और तत्वज्ञानी जीते आए हैं। सामान्य सुख-सुविधाओं तथा समस्त आनंदोपभोग के लिए मात्र दो घंटे का श्रम पर्याप्त होगा। मनुष्य के सामान्य रोग जैसे पैरों का दर्द, कान, नाक, पेट, हड्डी आदि के विकार तथा अन्यान्य रोग सहन नहीं किए जाएंगे। आने वाली नई दुनिया में अकेले मनुष्य की दुश्चिंताएं और कठिनाइयाँ समाज द्वारा सही नहीं जाएंगीं। उस दुनिया में समाज एकता और सहयोग के आधार पर गठित होगा।

युद्ध जो इन दिनों आम हैं, भविष्य में उनके लिए कोई जगह नहीं होगी। लोगों को युद्ध में जान देने के लिए मजूबर नहीं किया जा सकेगा। हत्या और लूट-मार की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट होगी। कोई बेरोजगार नहीं रहेगा। न कहीं भोजन और आजीविका के लिए मारामारी होगी। लोग काम की तलाश अपने आप को सुखी और स्वस्थ रखने के लिए करेंगे। बहुमूल्य वस्तुएं, मनोरम स्थल, मनभावन दृश्य और दमदार प्रदर्शनियां,जहां लोग मिल-जुलकर जीवन का आनंद ले सकें—सभी को समान रूप से सदैव उपलब्ध होंगी। आने वाली दुनिया में साहूकार, निजी व्यापारी, उद्योगपति और पूंजीपतियों के अधीन चल रही संस्थाओं के लिए कोई जगह नहीं होगी। केवल लाभ की कामना के साथ करने वाला कोई एजेंट, ब्रोकर या दलाल आने वाली दुनिया में नजर नहीं आएगा।

सहयोगाधारित विश्व-राज्य में जल, थल और वायुसेना बीते जमाने की चीजें बन जाएंगी। बस्तियों को तबाह कर देने वाले युद्धक जहाज और हथियार खुद नष्ट कर दिए जाएंगे। आजीविका के लिए रोजगार की तलाश आसान और मानव-मात्र की पहुंच में होगी। सुखामोद में चौतरफा वृद्धि होगी। ज्ञान-विज्ञान की मदद से मनुष्य की औसत आयु में बढ़ोत्तरी होगी। जनसंख्या वृद्धि की चाहे जो रफ्तार हो, आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता तथा उन्हें जुटाने में लगने वाला श्रम मूल्य न्यूनतम स्तर पर होगा। मशीनी-क्रांति उसे सहज-संभव कर दिखाएगी।

मिसाल के तौर पर, कभी वे दिन थे जब एक कारीगर एक मिनट में औसतन 150 धागे बुन पाता था। आज ऐसी मशीनें हैं जो किस्म-किस्म के कपड़े 45,000 धागे प्रति मिनट की रफ्तार से आसानी से बुन लेती हैं। इसी तरह पहले कारीगर के लिए प्रति मिनट 2-3 सिगरेट बनाना भी मुश्किल हो जाता था। आज एक मशीन प्रति मिनट में ढाई हजार सिगरेट बना देती है। आज मशीन के डैशबोर्ड पर केवल तंबाकू की पत्तियां, कागज आदि रखने की जरूरत होती है। सिगरेट बनाने से लेकर उनके पैकेट बनाने, फिर पैक करने तक का काम मशीनें करती हैं। वहां से उन्हें आसानी से बाहर भेजा जा सकता है। इसके अलावा खराब सिगरेटों को अलग करने से लेकर नष्ट करने तक का काम मशीनें स्वत: कर लेती हैं। आज जीवन के सभी क्षेत्रों में मशीनों के जरिए आसानी से काम हो रहा है। प्रौद्योगिकी विषयक ज्ञान में तीव्र वृद्धि हो रही है। तकनीक की मदद से आने वाली दुनिया में ऐसा संभव होगा जब कोई आदमी दो सप्ताह  श्रम करके साल-भर के लिए जरूरी वस्तुओं का उपार्जन कर सकेगा।

इस बात से डरने की जरूरत नहीं है कि लोग इससे सुस्त और आराम पसंद हो जाएंगे। इस तरह की चिंता किसी को भी नहीं करनी चाहिए। यही नहीं, जैसे-जैसे जीवनोपयोगी वस्तुएं के उपार्जन के तरीकों और संसाधनों का विकास होगा, और जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं की मांग बढ़ेगी, स्वाभाविक रूप से मनुष्य के श्रम और क्षमताओं का लोकहित में पूरे वर्ष उपयोग करने के लिए आवश्यक कदम भी उठते रहेंगे। ऐसी योजनाएं बनाई जाएंगी जिससे मनुष्य के खाली समय का सार्थक सदुपयोग संभव हो सके।आधुनिकतम मानवोपयोगी आविष्कारों की कोई सीमा नहीं होगी। सभी लोगों को काम मिलेगा, विशेषरूप से गुणी, प्रतिभाशाली और मनुष्यता के हित में आधुनिक सोच से काम लेने वालों के लिए काम की कोई कमी नहीं होगी। मजदूर केवल मजदूरी के लिए काम नहीं करेगा, बल्कि वह अपने मानसिक विकास के लिए भी काम को समर्पित होगा। उससे प्रत्येक व्यक्ति व्यस्त रहेगा। केवल लार्भाजन के लिए कोई उत्पादन नहीं किया जाएगा।

तामिलनाडु के कोयम्बटूर जिले के इरोड गांव के इसी घर में 17 सितंबर 1879 को पेरियार का जन्म हुआ था। यह तस्वीर हमें केरल के कोट्टायम जिले के वाइकोम में बने पेरियार स्मारक में मिली (फोटो : एफपी ऑन द रोड, फरवरी 2017)

अपने से बड़ों को काम करते देख छोटे भी समाज हित में बहुउपयोगी योगदान देने को आश्चर्यजनक रूप से तत्पर होंगे। ठीक है, कुछ लोग सोच सकते हैं कि उनके कुछ उत्तराधिकारी सुस्त और आराम-पसंद होंगे। मैं ऐसा नहीं मानता। यह सोचते हुए कि कुछ लोग आलसी और निकम्मे हो सकते हैं, वे समाज के लिए बोझ नहीं रहेंगे। समाज की प्रगति पर उनसे न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा। यदि कोई जानबूझकर सुस्त रहने की जिद ठाने रहता है, तो वह उसके लिए नुकसानदेह होगा, न कि पूरे समाज के लिए। सच तो यह है कि आने वाले समय में कोई भी खुद को आलसी और सुस्त कहलवाने में लज्जित महसूस करेगा। लोगों में समाज के लिए कुछ न कुछ उपयोगी करने की स्पर्धा बनी रहेगी। उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक काम होगा। और किसी काम को करने वाले हाथों की कमी नहीं रहेगी। कोई किसी काम को पूरा न करने का दोष अपने सिर नहीं लेना चाहेगा।

आप पूछ सकते हैं कि क्या कुछ आदमी ऐसे भी होंगे जिन्हें ओछे और गंदे कार्यों पर लगाया जाएगा? अभी तक गंदे और खराब कार्यों से हमारा जो मतलब रहा है, आने वाली दुनिया में उन्हें ऐसा नहीं माना जाएगा। न उनके कारण किसी को हेय दृष्टि से देखा जा सकेगा। आने वाले समय में झाडू़ लगाना, मैला उठाना, झूठे बर्तन धोने, कप-प्लेट धोने जैसे कार्यों के लिए मशीनों की मदद ली जाएगी। आदमी से उम्मीद की जाएगी कि तकनीकी कौशल प्राप्त कर, मशीनों का उपयोग करना सीखे। सिर पर भारी बोझा ढोने, खींचने या गड्ढा खोदने के लिए मानव-श्रम की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। किसी भी कार्य को असम्मानजनक नहीं माना जाएगा। कवियों, कलाकारों, कलमकारों और मूर्तिकारों के बीच नई दुनिया गढ़ने के लिए स्पर्धा रहेगी। अच्छे आदमियों को अच्छे काम सौंपे जाएंगे, ताकि वे नाम और शोहरत दोनों कमा सकें।

कोई भी व्यक्ति आत्मगौरव, चरित्र और मान-मर्यादा से शून्य नहीं होगा। चूंकि व्यक्तिगत लाभ के सभी रास्ते बंद कर दिए जाएंगे, इसलिए कोई भी आदमी गलत चाल-चलन में नहीं पड़ेगा। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसका झुकाव अनुचित और अनैतिक कार्य की ओर हो। ये शर्तें प्रत्येक व्यक्ति को उच्च नैतिक मापदंडों के अनुसरण की प्रेरणा देंगीं। उसे अधिक सुसभ्य और संवेदनशील बनाएंगी। यदि कहीं ऊंच-नीच, विशेषाधिकार और अधिकारविहीनता दिखेगी, वहां घृणा, जुगुप्सा, और विरक्ति के कारण भी मौजूद होंगे—और जहां ये चीजें अनुपस्थित होंगी, वहां अनैतिकता के लिए कोई स्थान न होगा। नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। पवित्र नदियों जैसे कि गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे। वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है। भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे। यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी, वह चोरी की सोचेगा तक नहीं। इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी। नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा। बक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे। उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी।

केरल के कोट्टायम जिले के वाइकोम में पेरियार स्मारक परिसर में बने लघु संग्रहालय में रखे गए पेरियार के वस्त्र (फोटो : एफपी ऑन द रोड, 2017)

पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेश्यवृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा। स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा। कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा। ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा। वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी। स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी। स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी। पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी। दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा। आने वाले समाज में कहीं कोई वेश्यावृत्ति नहीं रहेगी।

मानसिक अपंगता के शिकार लोगों को विशेषरूप से देखभाल की जरूरत पड़ सकती है। बावजूद इसके ऐसे व्यक्तियों को तभी बंद किया जा सकेगा, जब वे दूसरे लोगों के लिए परेशानियां खड़ी कर रहे हों। स्त्री-पुरुष दोनों पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लागू करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। क्योंकि वे दोनों ही संबंधों की अच्छाई-बुराई की ओर से सावधान रहेंगे।

यातायात के साधन मुख्यतः हवाई होंगे और वे तीव्र गति से काम करेंगे। संप्रेषण प्रणाली बिना तार की होगी। सबके लिए उपलब्ध होगी और लोग उसे अपनी जेब में उठाए फिरेंगे। रेडियो प्रत्येक के हैट में लगा हो सकता है। छवियां संप्रेषित करने वाले उपकरण व्यापक रूप से प्रचलन में होंगे। दूर-संवाद अत्यंत सरल हो जाएगा और लोग ऐसे बातचीत कर सकेंगे मानो आमने-सामने बैठे हों। आदमी किसी से भी कहीं भी और कभी भी तुरंत संवाद कर सकेगा। शिक्षा का तेजी से और दूर-दूर तक प्रसार करना संभव होगा। एक सप्ताह तक की जरूरत का स्वास्थ्यकर भोजन संभवतः एक कैप्सूल में समा जाएगा जो सभी को सहज उपलब्ध होंगे।मनुष्य की आयु सौ वर्ष अथवा उससे भी दो गुनी हो चुकी होगी।

नपुंसक स्त्री या पुरुष को संतान के लिए संभोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यही नहीं पशुओं की उन्नत नस्ल के लिए ताकतवर और सुदृढ़ सांड विशेषरूप से लाए जाएंगे, स्वस्थ्य और बुद्धिमान पुरुषों को वीर्य-दान के लिए तैयार किया जाएगा, तथा उसे वैज्ञानिक ढंग से स्त्री के गर्भाशय में स्थापित किया जाएगा। वह ऐसा रास्ता होगा जिससे आने वाली संतान शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ एवं तेजवंत होगी। बच्चे के जन्म की प्रक्रिया सरल होगी, जिसके लिए दंपति को संभोग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। जनता के इच्छा और सहयोग से जनसंख्या-नियंत्रण का काम आसान हो जाएगा।

दैनिक उपभोग की वस्तुएं जैसी वे आज हैं, भविष्य में उससे अलग होंगी। उदाहरण के लिए वाहनों का भार उल्लेखनीय रूप से कम हो जाएगा। उससे पेट्रोल की खपत में कमी आएगी। भविष्य की कारें बिजली अथवा दुबारा चार्ज होने वाली बैटरियों से चल सकेंगी। बिजली का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा ताकि प्रत्येक व्यक्ति उसका लाभ उठा सके। वह मनुष्यता के लिए बहुउपयोगी होगी। इस तरह के अनेक वैज्ञानिक सुधार देखने में आएंगे। विज्ञान का बड़ी तेजी से विकास होगा, उसके माध्यम से नए-नए और उपयोगी आविष्कार सामने आएंगे।

उस दुनिया में आविष्कारों के दुरुपयोग के लिए कोई गुंजाइश नहीं होगी। आजकल संपत्ति, कानून और व्यवस्था की देखभाल, न्याय, प्रशासन, शिक्षा आदि के सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार संभालती है। इसके लिए सरकार के अलग-अलग विभाग हैं। आगे चलकर ये सब माध्यम अनावश्यक और अप्रचलित हो जाएंगे। इन कार्यों के लिए आजकल प्रचलित प्रणालियां कालांतर में अर्थहीन लगने लगेंगी। संभव है आने वाली दुनिया में भी कोई व्यक्ति ईश्वर को समझने की चाहत रखे।

ईश्वर की संकल्पना स्वतः और स्वाभाविक रूप से नहीं जन्मी है। यह विश्वास की प्रक्रिया है, जो बड़ों द्वारा छोटों में अंतरित और उपदेशित की जाती है। आने वाली दुनिया में ईश्वर की चर्चा तथा कर्मकांड करने वाले लोग नगण्य होंगे। यही नहीं ईश्वरके नाम पर जितने चमत्कारों का दावा किया जाता है, कालांतर में वे लुप्त हो जाएंगे। मनुष्य ईश्वर की चर्चा करेगा किंतु बिना किसी अलौकिकताबोध के। आज आदमी यह सोचकर ईश्वर को याद करता है, क्योंकि उसे उसकी आवश्यकता बताई जाती है। यदि हम काम करते समय अचानक बीच में आ जाने वाली बाधाओं के रहस्य को समझ लें, यदि मनुष्य की सामान्य जरूरतें उसकी आवश्यकता के अनुसार समय रहते आसानी से पूरी हो जाएं, तब उसे ईश्वर और सृष्टि की परिकल्पना की आवश्यकता ही न पड़े। स्वर्ग की परिकल्पना अवैज्ञानिक और अप्रामाणिक है। यदि मानव-मात्र के लिए धरती पर ही स्वर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध हो जाए, तब उसे स्वर्ग जैसी आधारहीन कल्पना की आवश्यकता ही नहीं पड़े। न ही स्वर्ग मिलने की चाहत उसे परेशान करे। यही मानवीय बोध की चरमसीमा है। ज्ञान-विज्ञान और विकास के क्षेत्र में ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं है।

यदि व्यक्ति में खुद को जानने की योग्यता हो तो उसे ईश्वर की जरूरत ही नहीं है। यदि मनुष्य इस दुनिया को ही अपने लिए स्वर्ग मान ले तो वह स्वर्ग के आकाश में; तथा नर्क के पाताल में स्थित होने की जैसी भ्रामक बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा। जागरूक और विवेकवान व्यक्ति इस तरह के अतार्किक सोच को तत्क्षण नकार देगा। जहां व्यक्तिगत इच्छाओं का लोप हो जाता है, वहां ईश्वर भी मर जाता है। जहां विज्ञान जिंदा हो, वहां ईश्वर को दफना दिया जाता है।

सामान्य धारणा में अपरिवर्तनीयता या अनश्वरता के बारे में ठोस परिकल्पनाएं संभव हैं। इसका आशय क्या है? इसमें भ्रम पैदा करने वाले कारक कौन से हैं? अनश्वरता को लोग ईश्वर के पर्याय और गुण के रूप में देखते आए हैं। वैज्ञानिकों की दृष्टि में इस तरह का अर्थ निकालना मूर्खता है। हम अपने निजी अनुभवों को दूसरों को बताने में प्रायः संकोची रहे हैं। इसलिए दूसरों के अनुभव और विचार हमारे मस्तिष्क पर प्रभावी हो जाते हैं। हम अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करते हैं, जो प्रायः हमारी नहीं होती। जबकि वे दुनिया के जन्म और उसकी ऐतिहासिक सहनशीलता को समझने का आदर्श माध्यम हो सकती है। इन हालात में जबकि दुनिया के अनेक रहस्य हमें अभी तक अज्ञात हैं, आभार ज्ञापन के बहाने ही सही, कोई भी बुद्धिवादी ईश्वर की पूजा नहीं करेगा।

कोई भी व्यक्ति ज्ञानार्जन द्वारा अपने जीवन में सुधार ला सकता है। यही दुनिया का नियम है। जब कोई तर्कबुद्धि से घटनाओं की सही व्याख्या नहीं कर पाता, तब वह चुपचाप अज्ञानता के वृक्ष के नीचे शरण लेकर ईश्वर को पुकारने लगता है। इस तरह के अबौद्धिक कार्यकलाप आने वाले समय में सर्वथा अनुपयुक्त माने जाएंगे।

आने वाले समय में न तो स्वर्ग होगा, न नर्क. क्योंकि उसमें सनातन पाप या पुण्य के लिए के लिए कोई स्थान नहीं होगा। किसी को किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी। सिवाय पागल के कोई दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहेगा। इसलिए स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना भविष्य में मनुष्यता के लिए अर्थहीन मान ली जाएगी।

इस तरह की आदर्श दुनिया अचानक नहीं गढ़ी जा सकती. धीर-धीरे, कदम-दर कदम आगे बढ़ते हुए मेहनती लोगों द्वारा, क्रमिक परिवर्तन के बाद, लंबे अंतराल में इस तरह की दुनिया अवश्य बनाई जा सकती है। समाज की विभिन्न समस्याओं के समाधान तथा मानवमात्र के बेहतर जीवन के लिए, नई दुनिया की संरचना के लिए यह रास्ता आदर्श होगा।

उस समाज में कोई यह नहीं पूछेगा, ‘हम क्या करें? जब सबकुछ ईश्वर की मर्जी से संचालित है.’ मनुष्यता की जो भी कमियां सामने आएंगी, लोग उनपर शांत नहीं बैठेंगे। लक्ष्य तक पहुंचने के लिए वे उनका समाधान अवश्य करेंगे। नियति और दुर्भाग्य की कोई बात नहीं होगी। प्रत्येक कार्य संपूर्ण आत्मविश्वास के साथ किया जाएगा। समाज में जो भी बुराइयां सामने आएंगी, बेहतर समाज की रचना के लिए उनका निदान तत्क्षण और निपुणता के साथ किया जाएगा।

प्राचीन रीति-रिवाजों और पंरपराओं में अंध-आस्था ने लोगों के सोचने समझने, तर्क-बुद्धि से काम लेने की प्रवृत्ति का लोप कर दिया है। ये चीजें दुनिया की प्रगति में बाधक बनी हुई हैं। कुछ लोगों के स्वार्थ इनसे जुड़े हैं. निहित स्वार्थ के लिए वही लोग, जो इन पुरानी और बकवास चीजों से ही कमाई करते रहते हैं. ऐसे लोग ही नई दुनिया की संरचना का विरोध करते हैं. उस दुनिया का विरोध करते हैं जिसमें खुशियों की, सुख-शांति की भरमार होगी। लोगों के विकास की प्रचुर संभावनाएं भी रहेंगी। बावजूद इसके जो मनुष्य के अज्ञान तथा कुछ लोगों के स्वार्थ के विरुद्ध खुलकर खड़े होंगे, वही नई दुनिया की रचना करने में समर्थ होंगे। नई दुनिया के निर्माताओं को मजबूत करते के लिए हमें उनके साथ, उनकी कतार में शामिल हो जाना चाहिए. युवाओं और बुद्धिवादियों के लिए उचित अवसर है कि वे नए विश्व की रचना हेतु अपने प्रयासों को अपने विचार, ऊर्जा और सपनों को समर्पित कर दें।

(यह आलेख ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ में  एक कार्यक्रम में पेरियार द्वारा दिया गए एक भाषण का लिखित रूप है। यह भाषण पुस्तकाकार भी प्रकाशित हुआ, जिसकी समीक्षा सुप्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक ‘दि हिंदू’ में छपी थी, जहां उनकी तुलना बीसवीं शताब्दी के एच.जी.वेल्स की गई थी। अनुवादक की टिप्पणी)

(तमिल से अंग्रेजी अनुवाद : प्रोफेसर ए.एस. वेणु, अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/एफपी डेस्क)


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  1. Rahul kumar Reply
  2. NANHE LAL Reply

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