आरक्षण के सवाल पर तुष्टिकरण से बचें राजनैतिक दल : पी.एस. कृष्णन

आरक्षण का मकसद शासन व प्रशासन में उनकी हिस्सेदारी को बढ़ाना है जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े रहे हैं। यह गरीबी उन्मूलन नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व बढ़ाने का उपक्रम है। जैसे रक्षा और विदेश नीति के मामले में सभी राजनैतिक दल एकमत होते हैं, आरक्षण के सवाल पर भी उन्हें एक राय बनानी चाहिए। जाति के आधार पर तुष्टिकरण के परिणाम अबतक नकारात्मक रहे हैं

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब वर्ष 2017 में सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज की कड़ी में पढ़ें कि देश के विभिन्न राज्यों में किस तरह दलितों, आदिवासियों और पिछड़ा वर्ग को केंद्र में रखकर राजनीतिक दल अस्तित्व में आए और क्या वजह रही है कि अबतक उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 27

वासंती देवी : गुजरात में पटेल आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे हैं. आप इस संबंध में क्या सोचते हैं?

पी.एस. कृष्णन : पटेल या पाटीदार उन सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों में से एक हैं, जो आरक्षण की मांग कर रही हैं। इसी तरह की मांग उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब इत्यादि में जाट, महाराष्ट्र में मराठा और आंध्रप्रदेश में कप्पू कर रहे हैं। इस मांग को लेकर वे आंदोलनरत भी हैं। इन मांगों और आंदोलनों से कई प्रश्न और मुद्दे उपजते हैं।

ये सभी वर्चस्वशाली जातियां हैं, जिनके सदस्य अपने-अपने क्षेत्रों/राज्यों में भूस्वामी हैं। इनमें से कुछ जातियों ने कृषि के क्षेत्र में अपने वर्चस्व का लाभ उठाते हुए व्यापार-व्यवसाय, उद्योग और सरकारी नौकरियों में भी अपनी खासी उपस्थिति बना ली है। कई आयोगों ने यह पाया है कि वे न तो शैक्षणिक दृष्टि से पिछडी हैं और ना ही सामाजिक दृष्टि से और ना ही शासकीय सेवाओं में उनका प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है। चूंकि वे आरक्षण प्राप्त करने के लिए निर्धारित मानदंडों, विशेषकर सामाजिक पिछड़ापन, को पूरा नहीं करतीं इसलिए वे सरकारों से जबरदस्ती अपनी मांगें मनवाने पर आमादा हैं।

पहले ये जातियां एससी व ओबीसी के लिए आरक्षण की कट्टर विरोधी थीं। वे इन वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था को रोक नहीं सकीं और अब वे यह मांग कर रही हैं कि उन्हें ओबीसी की सूची में शामिल किया जाए! सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों की यह मांग कि उन्हें सामाजिक रूप से पिछड़ा घोषित किया जाए अपने आप में विरोधाभासी है। यह स्पष्ट है कि सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों को पिछड़ी जातियों की सूची में शामिल नहीं किया जा सकता।

इस मांग के पीछे दो कारण हैं। पहला तो यह कि जिन जातियों को वे नीची निगाहों से देखतीं थे वे आरक्षण के सहारे उनके समकक्ष आ खड़ी हुई हैं। यद्यपि सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों का अभी भी लगभग सभी क्षेत्रों में वर्चस्व है परंतु वे दलितों और ओबीसी की सीमित सफलता को भी पचा नहीं पा रही हैं। उन्हें यह सहन नहीं हो रहा है कि दलित और ओबीसी जातियों के लोग शैक्षणिक संस्थानों में भर्ती हो रहे हैं और उन्हें राज्य और उसके अधीन संस्थाओं में रोजगार मिल रहा है। इसके अतिरिक्त, 73वें और 74वें संविधान संशोधन 1991 और संविधान में एक नए अध्याय 9(ए) के जोड़े जाने के कारण, दलितों, आदिवासियों और ओबीसी व इन वर्गों व अगड़ी जातियों की महिलाओं को आरक्षण मिलने से पंचायतों और नगर पालिकाओं आदि में इनकी बढ़ती उपस्थिति उन्हें रास नहीं आ रही है। सामाजिक दृष्टि से अगड़ी कुछ जातियों की ओबीसी की सूची में शामिल किए जाने की मांग एक अर्थ में आरक्षण की व्यवस्था की प्रभावशीलता की ओर इंगित करती है। इन वर्गों के आंदोलनकारियों की यह मांग भी है कि अगर उन्हें पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल कर आरक्षण नहीं दिया जा  सकता तो एससी, एसटी व ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था समाप्त कर दी जानी चाहिए। इस मांग से उनका असली चेहरा सामने आ गया है। स्पष्टतः वे यह नहीं चाहते कि एससी-एसटी और ओबीसी आगे बढ़ें। वे उन्हें उनकी पुरानी अवस्था में ढ़केल देना चाहते हैं। सामाजिक रूप से अगड़ी जातियों के कुछ गुमराह सदस्यों और नेताओं का यह स्वप्न है कि भारत, मंडल और आंबेडकर के पहले के युग में वापस चला जाए।

केन्द्र की पिछली सरकार ने इन आंदोलनकारियों और उनकी मांगों के दबाव में और चुनावों में लाभ पाने की उम्मीद से सोलहवीं लोकसभा को चुनने के लिए 2014 में हुए चुनाव के ठीक पहले, हड़बड़ी में जाटों को ओबीसी की केन्द्रीय सूची में शामिल कर दिया। सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की तार्किक और तथ्यपूर्ण अनुशंसा को नजरअंदाज करते हुए ऐसा किया। इस आयोग की स्थापना के बाद से यह पहली बार था कि उसकी सलाह को केन्द्र सरकार ने नजरअंदाज किया। इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय ने 7 मार्च 2015 को रामसिंह प्रकरण में दिए गए अपने निर्णय में रद्द कर दिया।

इन मांगों के पीछे कई अन्य कारण भी हैं, जैसे खेती योग्य भूमि का बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाना, वर्तमान कृषि संकट और कुछ उद्योगों जैसे सूरत के हीरा उद्योग, की बदहाली. इस तरह की आर्थिक मुसीबतें, अपने-आप में किसी जाति को पिछड़ी जाति का दर्जा देने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकतीं। खेती में समस्याएं आती ही हैं और उद्योग के क्षेत्र में भी चक्रीय बेरोज़गारी आम है। इस तरह की समस्यायों का हल उपयुक्त नीतियाँ हैं ना कि सामाजिक दृष्टि से अगड़ी जातियों को ओबीसी की सूची में शामिल कर उन्हें आरक्षण प्रदान करना।

इसके साथ ही, अगड़ी जातियों के वे लोग, जो सचमुच निर्धन हैं, उनकी समस्या को स्वीकार किया जाकर उसका हल ढूँढा जाना चाहिए। इसके लिए जो सिद्धांत अपनाया जा सकता है वह यह है कि किसी बच्चे या विद्यार्थी को आर्थिक कारणों से अपनी पसंद और अपने हितों के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने से वंचित नहीं रहना चाहिए। इस समस्या का सबसे उपयुक्त हल यह है कि ऐसे विद्यार्थियों के लिए वजीफों, शिक्षण शुल्क में छूट व शिक्षा ऋण की व्यवस्था की जाए, बशर्ते इससे एससी-एसटी व ओबीसी को शैक्षणिक दृष्टि से अगड़ी जातियों के समकक्ष लाने के लिए धनराशि के आवंटन में कोई कमी न आये। आरक्षण इस समस्या का हल नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि एससी-एसटी व ओबीसी को शिक्षा प्राप्त करने में जिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उनकी जडें सामाजिक असमानता और प्रणालीगत निषेधों में होती हैं। इसके विपरीत, अगड़ी जातियों में निर्धनता की समस्या के पीछे कोई सामाजिक कारण न होकर शुद्ध आर्थिक कारण होते हैं। उनकी समस्या का यही उपयुक्त हल है, जिसकी उन्हें मांग करनी चाहिए और जिसे सरकारों को करना चाहिए। अगड़ी जातियों के नेताओं का राष्ट्रीय और संवैधानिक उत्तरदायित्व है कि वे अपनी जाति के युवाओं का मार्गदर्शन करें और उन्हें ऐसी मांगों को लेकर आन्दोलन करने के लिए न भड़काएं जो न तो सामाजिक दृष्टि से औचित्यपूर्ण हैं और ना ही संवैधानिक दृष्टि से वैध। उनका यह कर्त्तव्य भी है कि वे अगड़ी जातियों की युवा पीढ़ी को यह बताएं कि एससी-एसटी व ओबीसी ने पारंपरिक जाति प्रथा के कारण किस तरह की वंचनाएं सही हैं और यह भी कि आरक्षण की व्यवस्था, इन वर्गों को सामाजिक न्याय प्रदान करने के लिए ज़रूरी है और यह व्यवस्था तब तक जारी रखनी होगी जब तक कि एससी-एसटी व ओबीसी व एससी और ओबीसी की प्रत्येक जाति और एसटी की प्रत्येक जनजाति हर मानदंड पर अगड़ी जातियों के समकक्ष नहीं आ जाती। उन्हें युवा पीढ़ी को यह भी बताना चाहिए कि यह देश के समग्र हित में हैं और उसकी इष्टतम उन्नति के लिए अपरिहार्य है।

भारत सरकार के पूर्व सचिव पी.एस. कृष्णन

सत्ताधारी राजनैतिक दलों को उस तरह दवाब में नहीं आना चाहिए, जिस तरह केंद्र और महाराष्ट्र में 2014 में हुआ था। विपक्षी पार्टियों को भी यह ध्यान में रखना चाहिए कि वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से न तो इस तरह की मांगों का समर्थन करें और ना ही ऐसा करती हुई दिखें। इन दिनों ये दोनों ही गलत प्रवृतियां नज़र आ रही हैं।

एससी-एसटी व ओबीसी को शांतिपूर्वक संगठित होकर, सत्ताधारी व विपक्षी पार्टियों पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वे चुनावी लाभ के लोभ में इस तरह की अतार्किक मांगों के समक्ष न तो झुकें और ना ही उन्हें हवा दें।

बासंती देवी : (1) इन दिनों हम देख रहे हैं कि विभिन्न राजनैतिक दल, अलग-अलग जातियों को अपने झंडे तले लाने के लिए, सोशल इंजीनियरिंग का सहारा ले रहे हैं। इनमें से सबसे जाना-माना है बहुजन समाज पार्टी का एससी और अगड़ी जातियों को साथ लाकर, ओबीसी के विरुद्ध गठबंधन बनाने का प्रयास। क्या आप अन्य राज्यों में इस तरह के प्रयोगों या प्रस्तावित प्रयोगों के बारे में कुछ बता सकते हैं? ये कहाँ तक सफल हुए हैं? क्या ये प्रयास केवल चुनावों में लाभ पाने के लिए किये जा रहे हैं या इनके पीछे विभिन्न जातियों को साथ लाने का दूरगामी लक्ष्य है?

(2) वे कौन से जातीय समीकरण थे, जिनने हाल में बिहार में हुए विधानसभा चुनावों में महागठबंधन की मदद की? ऐसा कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार इस प्रयोग को अन्य प्रदेशों में दोहराने के कोशिश करने जा रहे हैं। क्या आपको लगता है यह रणनीति कारगर होगी और यदि हाँ तो किन राज्यों में?

(3) बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान, आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने आरक्षण की नीति पर पुनर्विचार की मांग की थी। बाद में सभी हिन्दुत्ववादी संगठनों ने इसका खंडन किया या यह कहा कि उन्हें गलत उद्दृत किया गया है। यह भी दावा किया जाता है कि भागवत के बयान की भाजपा को चुनावों में बड़ी कीमत अदा करनी पड़ी। इस मामले में आपके क्या विचार हैं?

(4) दलित पार्टियाँ किस हद दलितों के हितों के रक्षा करने में कामयाब हुई हैं? क्या आप इस प्रश्न का उत्तर विशेषकर महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और तमिलनाडु के सन्दर्भ में दे सकते हैं?

(5) भाजपा, आरएसएस और अन्य हिंदुत्व संगठनों ने सफलतापूर्वक एससी-एसटी का इस्तेमाल मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ने के लिए किया। क्या इस गठजोड़ को तोड़ कर, एससी-एसटी व अल्पसंख्यकों के बीच एकता स्थापित की जा सकती है? क्या इस दिशा में प्रयास हुए हैं?

पी.एस. कृष्णन : मेरा किसी राजनैतिक दल से जुड़ाव नहीं है। मैं राजनैतिक दलों को केवल दलितों/एससी, आदिवासियों/एसटी व ओबीसी, व ओबीसी की कमज़ोर जातियों – अर्थात भूस्वामी जातियों के अलावा अन्य जातियों – के प्रति उनकी नीतियों के सन्दर्भ में देखता हूं। अगर हम भारत के संपूर्ण आधुनिक इतिहास को देखें, तो हम पायेगें कि जिन भी व्यक्तियों ने राजनैतिक आन्दोलन खड़े किये और राजनैतिक पार्टियों की स्थापना की, वे सभी अगड़ी जातियों के श्रेष्ठि वर्ग से थे। जब भारत में पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत हुई तो जिन जातियों के लोग इसके महत्व को समझ सके, वे सभी अगड़ी जातियों से थे और उनमें भी उन जातियों से, जिनके जीवनयापन का आधार कृषि नहीं था। नतीजे में, जिन जातियों में से शिक्षित, शहरी, पेशेवर मध्यमवर्ग उभरा, उनमें शामिल थे विभिन्न क्षेत्रों के ब्राह्मण, उत्तर भारत, पूर्वी भारत और महाराष्ट्र के कायस्थ, उत्तर-पश्चिमी भारत के खत्री और बनिया/वैश्य। इसके बाद, कृषि-आधारित वर्चस्वशाली व सामाजिक दृष्टि से अगड़ी कुछ जातियों जैसे केरल के नायरों, आंध्र प्रदेश के कम्मा और रेड्डीयों व तमिलनाडू के वेल्लालर में भी यह वर्ग उभरा।

 भारत के सबसे पुराने राजनैतिक दल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, का नेतृत्व भी उपरलिखित अगड़ी जातियों के हाथों में था, सिवाय पार्टी के संस्थापक ए.ओ. ह्युम के, जो कि इस पार्टी को सन 1857 के विद्रोह और उसके बाद, देश के कुछ तबकों में पनपे असंतोष के लिए सेफ्टी वाल्व की तरह देखते थे। ऊंची जातियों के हिन्दुओं के अतिरिक्त, कांग्रेस के नेतृत्व में कुछ पारसी भी शामिल थे, जो सामाजिक-आर्थिक स्तर पर ऊंची जातियों के हिन्दुओं से जुड़े हुए थे। इसके बाद, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और महात्मा गाँधी जैसे जननेताओं के पार्टी में आगमन के साथ उसके स्वरुप में किस तरह का परिवर्तन आया और वह कैसे राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन में बदल गयी, इसका विवरण देने की यहाँ ज़रुरत नहीं है। कुल मिलाकर, स्वतंत्रता के समय और इसके तुरंत बाद, देश में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का नेतृत्व ऊंची जातियों के हाथों में था और कुछ राज्यों में, भूस्वामी ऊंची जातियों के हाथों में।  

बीसवीं सदी के प्रारंभ में मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा जैसे जो अन्य राजनैतिक दल भारत में उभरे, उनका नेतृत्व भी, क्रमशः मुसलमानों और हिन्दुओं की उच्च जातियों से था। भाजपा के नेतृत्व में भी ऊंची जातियों का बोलबाला है। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियों का नेतृत्व भी मुख्यतः ऊंची जातियों के हाथों में है। जो आन्दोलन औपचारिक रूप से राजनैतिक दल नहीं थे जैसे बीसवीं सदी के प्रारंभ में उभरे क्रान्तिकारी समूह और आरएसएस, उनपर भी ऊंची जातियों का नियंत्रण था।

नतीजा यह कि आज भी, सभी प्रमुख राजनैतिक दलों के नेतृत्व पर ऊंची जातियों और उच्च-मध्यम वर्ग का वर्चस्व है। नेतृत्व में गिने-चुने दलित, आदिवासी और ओबीसी हो सकते हैं, लेकिन उनकी भूमिका निर्णायक नहीं होती और वे एक तरह से सिर्फ दिखावटी होते हैं। इसका एक उदाहरण है, श्री पी.वी. नरसिम्हाराव के कार्यकाल में, कांग्रेस वर्किंग समिति के गठन के लिए आयोजित चुनाव, जिनमें एक भी दलित विजयी नहीं हो सका था। तत्समय के सबसे लोकप्रिय दलित नेता श्री जी. वेंकटस्वामी को दलित उम्मीदवारों मे सबसे अधिक वोट प्राप्त हुए थे परन्तु वे भी जीत हासिल नहीं कर सके थे।

सन 1967 के चुनाव तक, लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थीं। सन 1967 के बाद भी, अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का शासन बना रहा। परन्तु उस दौर में, शायद ही किसी दलित, आदिवासी या कमज़ोर ओबीसी को किसी राज्य का मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया हो। अपवाद स्वरुप यदि ऐसा हुआ भी तो इसके पीछे या तो श्रीमती इंदिरा गाँधी जैसी किसी शक्तिशाली नेता द्वारा नामांकन था  (राजस्थान में श्री जगन्नाथ पहाडिया) या कुछ विशेष परिस्थितियां (आंध्र प्रदेश में श्री संजिवैय्या)।

जब देश में ओबीसी एक राजनैतिक ताकत के रूप में उभरने शुरू हुए, तो उन्होंने पाया कि कांग्रेस के स्थापित नेतृत्व में उनके लिए कोई जगह नहीं है, अत: वे अन्य पार्टियों की ओर बढ़े। जिनमें नयी पार्टियां भी शामिल थीं। समाजवादी नेता श्री राममनोहर लोहिया और आर्य समाज से प्रभावित श्री चरण सिंह ने, उत्तर भारत में पिछड़े वर्गों के आंदोलनों और पार्टियों की नींव रखी। तमिलनाडू में जस्टिस पार्टी और पेरियार द्वारा कांग्रेस के नेतृत्व में ब्राह्मणों के दबदबे से परेशान होकर कांग्रेस छोड़ देने के बाद, द्रविड़ पार्टियों में ओबीसी को सम्मानजनक स्थान मिला। केरल में, कम्युनिस्ट पार्टी ने दलितों और ओबीसी को विकल्प उपलब्ध करवाया। इनमें से अधिकांश पार्टियां क्षेत्रीय स्तर पर ही सिमट कर रह गयीं। ओबीसी के अधिकांश मुख्यमंत्री, पिछड़े वर्गों के आंदोलनों और उनकी पार्टियों से उभरे। इनमें शामिल हैं तमिलनाडू के थिरु अन्नादुरई और थिरु करूणानिधि, बिहार के श्री कर्पूरी ठाकुर और बाद के दौर में, उत्तर प्रदेश में श्री मुलायम सिंह यादव, बिहार में श्री लालू प्रसाद यादव और श्री नीतीश कुमार और केरल में कामरेड अच्युतानंदन और कामरेड पिनारी विजयन। यहाँ यह याद दिलाना ज़रूरी है कि यद्यपि केरल में कम्युनिस्ट पार्टी, पिछड़े वर्गों की पार्टी नहीं थी परन्तु शुरू से उसके सदस्यों और नेतृत्व में, पिछड़े वर्गों का बहुमत था। कांग्रेस के ओबीसी मुख्यमंत्रियों की संख्या बहुत ही कम है। इनमें शामिल हैं केरल के श्री आर. शंकर, तमिलनाडू के श्री कामराज, महाराष्ट्र के श्री वी.पी. नायक, पंजाब के श्री ज्ञानी जैल सिंह, गुजरात के श्री माधव सिंह सोलंकी और हाल में, राजस्थान के श्री अशोक गहलोत। जिन क्षेत्रीय पार्टियाँ में उच्च जातियों से इतर राजनीतिज्ञों को नेतृत्व करने का अवसर मिला, उनमें से अधिकांश, ओबीसी की अपेक्षाकृत कम पिछड़ी जातियों – अर्थात भूस्वामी जातियों – की  पार्टियाँ बन गयीं। वे केवल इन्हीं जातियों के हितों और आकांक्षाओं के पैरोकार बन कर रह गयीं और उनमें न तो दलितों, ना ही आदिवासियों और ना ही ओबीसी की बहुसंख्यक कमज़ोर जातियों को जगह मिल सकी।

दलितों ने भी अपने राजनैतिक दल गठित करने के यत्न किये। इस दिशा में सबसे पहला कदम डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने शेड्यूलड क्लासेज फेडरेशन और उसके बाद रिपब्लिकन पार्टी का गठन कर उठाया। विभिन्न कारणों से रिपब्लिकन पार्टी कई टुकड़ों में बंट गयी और एक राजनैतिक शक्ति के रूप में उभर नहीं सकी। तमिलनाडू में अभी हाल में, दलित पैंथर्स पार्टी और पुथिया तमिज्हकम क्रमशः थिरु थोल थिरुम्वालावन एवं थिरु कृष्णास्वामी के काबिल नेतृत्व में, दलितों की पार्टियों के रूप में उभरी हैं परन्तु उनकी शक्ति और प्रभाव भी सीमित है। जिन राज्यों में ये पार्टियां काम कर रहीं हैं, वहां भी अधिकांश दलित या तो किसी प्रमुख राष्ट्रीय दल या किसी शक्तिशाली क्षेत्रीय दल को वोट देते हैं।

श्री कांशीराम और कुमारी मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) एकमात्र ऐसी दलित पार्टी है जिसने दलित नेतृत्व में अपने बल पर सरकार बनाने में सफलता पाई है। परन्तु यह पार्टी भी केवल उत्तरप्रदेश में राज्य की लगभग संपूर्ण दलित आबादी को लामबंद कर सत्ता में आ सकी है। अन्य राज्यों के दलितों में अपनी पैठ बनाने में यह पार्टी असफल रही है।

यद्यपि बसपा मुख्यतः केवल एक राज्य तक सीमित है परन्तु फिर भी उसकी सफलता महत्वपूर्ण है। और इसलिए इस पार्टी की विचारधारा और वे पारिस्थितियों जिनके चलते यह उभरी, का अध्ययन कुछ सीखने में हमारी मदद कर सकता है। बसपा का लक्ष्य दलितों और ओबीसी को एक साथ लाना है। यह उसके नाम ‘बहुजन समाज’ से ही साफ़  है। ‘बहुजन’ से अर्थ है अधिकांश लोग अर्थात ऊंची जातियों के छोड़कर, सभी लोग। यही श्री कांशीराम द्वारा गढ़े गए शुरूआती नारे से भी साफ़ है, जिसमें तिलक, तराजू और तलवार – जो कि ब्राह्मण, बनिया और राजपूत या ठाकुर जातियों के प्रतीक हैं – को दूर रखने की बात कही गयी थी। ये तीन, उत्तर भारत और विशेषकर उत्तरप्रदेश – की सबसे बड़ी ऊंची जातियां हैं। परन्तु श्री कांशीराम का आशय इन जातियों के अलावा, अन्य ऊंची जातियों जैसे कायस्थ, त्यागी, जाट इत्यादि को भी दूर रखने से था। यही तथ्य श्री कांशीराम द्वारा स्थापित गैर-राजनैतिक संगठन ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ (या डीएस-4) के नाम से भी जाहिर है। इसी संगठन से बसपा जन्मी थी। परन्तु वास्तव में हुआ यह कि ओबीसी का अधिकांश हिस्सा समाजवादी पार्टी (एसपी) के साथ चला गया, यद्यपि अधिकांश एससी, बसपा से जुड़े रहे। अगर केवल एससी के समर्थन से, बसपा इतनी सफलता कर सकी तो उसका कारण था उत्तर प्रदेश की जनसांख्यिकीय संरचना। एससी, उत्तरप्रदेश की कुल आबादी का 21 प्रतिशत हैं और इस लिहाज से यह देश की सबसे बड़ी दलित आबादी वाला राज्य है। पूरे देश में, दलित आबादी का प्रतिशत 16.6 है। ऐसे केवल कुछ ही राज्य हैं जहां दलितों का आबादी में प्रतिशत, उत्तरप्रदेश से ज्यादा हैं. इनमें शामिल हैं पंजाब (31.9 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (25.2 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (23.5 प्रतिशत)। उत्तर प्रदेश में दलित आबादी का एक बड़ा हिस्सा (54.39 प्रतिशत) केवल एक ही जाति का है – जिसे चमार या जाटव कहा जाता है। इस जाति के कई अन्य नाम और उप-जातियां हैं।

उत्तर प्रदेश की जनसांख्यिकीय संरचना के प्रभाव का आकलन, आंध्र प्रदेश जैसे राज्य से उसकी तुलना कर किया जा सकता है। यहां जो आंकड़े दिए जा रहे हैं वे अविभाजित आंध्र प्रदेश के हैं क्योंकि सन 2001 और 2011 की जनगणनाओं के समय यह राज्य अविभाजित था।  तेलंगाना के सम्बन्ध में जनगणना के आंकड़े सन 2021 में हीं उपलब्ध हो सकेंगे। आंध्र प्रदेश में, एससी का कुल आबादी में प्रतिशत 16.4 है, जो कि राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही कम है। राज्य की 91 प्रतिशत एससी आबादी दो जातियों – माला या आदि आंध्र और उसकी उप-जातियों (43 प्रतिशत) और मडिगा / अरुन्धतियर / आदि द्रविड (50 प्रतिशत) की है। आंध्र प्रदेश में जिस जाति को आदि द्रविड कहा जाता है वह, तमिलनाडु में आदि द्रविड़ की नाम से जानी वाली जाति से अलग है। इस तरह, आंध्र प्रदेश की एससी आबादी, इन दोनों जातियों की बीच लगभग बराबर बंटी हुई है। इन दोनों जातियों में नाम मात्र की भी एकता नहीं है क्योंकि मडिगाओं की यह शिकायत है कि उन्हें आरक्षण का लाभ उचित अनुपात में नहीं मिला है। इसी कारण, मडिगा, एससी का उपवर्गीकरण चाहते हैं, जबकि माला समुदाय इसकी विरोधी है। इस कारण, उत्तर प्रदेश की तुलना में, आंध्र प्रदेश में एससी को एक करना कहीं अधिक कठिन है. इसी तरह की विवेचना अन्य राज्यों के सन्दर्भ में भी की जा सकती है। दक्षिणी राज्यों में से केवल तमिलनाडू की स्थिति, जनसंख्या के लिहाज से उत्तरप्रदेश से मिलती-जुलती है। तमिलनाडू में एससी की आबादी कुल आबादी का 20 प्रतिशत है, जो कि अखिल-भारतीय औसत से ज्यादा और उत्तरप्रदेश के लगभग बराबर है। तमिलनाडु में भी एक जाति आदि द्रविड / परैयाँ, कुल एसटी आबादी का 62.8 प्रतिशत हैं। दूसरी सबसे बड़ी एससी जाति पल्लर / देवेन्द्र कुलाथोर आबादी का लगभग 16.7 प्रतिशत हैं और तीसरी सबसे बड़ी जाति है अरुन्धतिवर / चक्किलिवन, जो कि आबादी का 12.6 प्रतिशत है। तमिलनाडु में भी, उत्तर प्रदेश की तरह, दलितों को लामबंद करना संभव है यदि कोई एक नेता या नेताओं का समूह, दूरदृष्टि और समझदारी से, सबसे बड़ी जाति के साथ-साथ, दो अन्य मुख्य जातियों और एससी की अन्य छोटी जातियों का समर्थन हासिल कर सकें। यह तमिलनाडु के दलित नेतृत्व के समक्ष एक चुनौती है।

उत्तर प्रदेश में एससी की सफल लामबंदी इस कारण भी संभव हो सकी क्योंकि इस राज्य में, तमिलनाडू व अन्य दक्षिणी व प्रायद्वीपीय राज्यों की की तुलना में, एससी की बेहतरी के बहुत कम कार्यक्रम चलाये गए थे। उत्तर प्रदेश में समाज और राज्य के  मुख्य राजनैतिक दल अर्थात कांग्रेस में ऊंची जातियों का बोलबाला 1989 तक बना हुआ था और दलितों के लिए समकालीन सामाजिक-राजनैतिक प्रणाली में न तो कोई स्थान था और ना ही कोई आशा। उत्तर प्रदेश की अन्य राजनैतिक पार्टियों, जैसे समाजवादी पार्टी, पर ओबीसी सहित अन्य समूहों की भूस्वामी जातियों का वर्चस्व था और भाजपा की वह स्थिति नहीं थी, जो सन 1990 के बाद बनी। वैसे भी, भाजपा का नेतृत्व अगड़ी जातियों के हाथों में था और वह उन्हीं की पार्टी समझी जाती थी। दलित खेतिहर श्रमिकों की एक बड़ी आबादी और कमज़ोर ओबीसी सहित मुसलमानों की सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों की मौजूदगी के बावजूद, कम्युनिस्ट और वामपंथी पार्टियाँ, उन पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकीं. और इसके पीछे कारण वही थे जो पूरे देश में थे।

इन परिस्थितियों में, पंजाब के रहवासी श्री कांशीराम, जो डीएस-4 के संस्थापक थे, और कुमारी मायावती, जो उत्तर प्रदेश कीं ही थीं, के परिदृश्य पर उभरने और श्री कांशीराम द्वारा बसपा की स्थापना से एससी को आशा की एक किरण नज़र आयी। बसपा के लिए वे अच्छे दिन थे और जल्दी ही बड़ी संख्या में दलित उसके साथ आ खड़े हुए। सन 1990 के दशक के उत्तरार्ध में, उत्तरप्रदेश में जो सामाजिक-राजनैतिक स्थितियां थीं और राज्य की जो जनसांख्यिकीय संरचना थी, वह किसी अन्य राज्य में नहीं थी। उदाहरण के लिए, उत्तरप्रदेश और उत्तर और पूर्वी भारत के अधिकांश राज्यों की तुलना में, दक्षिणी राज्यों में सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों के कारण, समाज का काफी हद तक प्रजातांत्रिकरण हो गया था। विशेषकर, तमिलनाडू और केरल में उच्च जातियों का वर्चस्व या तो समाप्त हो गया था या बहुत कम हो गया था और पिछड़ी जातियों, विशेषकर भूस्वामी पिछड़ी जातियों, की सामाजिक और राजनैतिक शक्ति में बहुत इजाफा हुआ था। इस सबके बावजूद, दलित और आदिवासी इन राज्यों के सबसे कमज़ोर तबके बने रहे। परन्तु इन दोनों राज्यों में समान रूप से शक्तिशाली राजनैतिक गठबंधनों के बीच स्पर्धा के कारण, दलितों को कुछ बेहतर अवसर उपलब्ध हुए। इसके अलावा, दक्षिणी राज्यों में सामाजिक व राजनैतिक आंदोलनों के चलते, एससी की बेहतरी के लिए कई कार्यक्रम शुरू किये गए। परन्तु सभी दक्षिणी राज्यों में स्थितियां एक-सी नहीं थीं। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश (अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) – जो कि दक्षिण भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जिसमें एसटी की खासी आबादी है – में एससी-एसटी कल्याण कार्यक्रमों को बढ़ावा देने में सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन अधिकारियों का अगुआ मैं था और मेरे बाद श्री आर. शंकरन भी इसी राह पर चले। हम दोनों को इस कारण बड़े भूस्वामियों और उच्च जातियों के वर्चस्व वाले राजनैतिक नेतृत्व सहित कुछ शीर्ष नौकरशाहों का कोपभाजन बनना पड़ा परन्तु हमने ख़ुशी-ख़ुशी इसे स्वीकार किया। हमने जो राह चुनी, उससे प्रेरणा पाकर हमारे बाद आईएएस और अन्य सेवाओं में आये अधिकारियों ने भी इसी दिशा में काम किया। परन्तु इन कार्यक्रमों ने हमें उत्तराधिकार में प्राप्त सामाजिक विरूपणों – जिनका सबसे ज्यादा प्रभाव एससी पर पड़ता है – की जड़ों पर प्रहार नहीं किया। इसका कारण था राजनैतिक रूचि का अभाव और एक ओर वर्चस्वशाली सामाजिक-राजनैतिक ताकतों और दूसरी ओर दलितों, आदिवासियों व कमज़ोर ओबीसी के हितों का परस्पर टकराव। हालात ऐसे थे कि उच्च या उच्च-माध्यम जातियों – जिनमें मुख्यतः भूस्वामी जातियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली  उच्च-माध्यम पिछड़ी जातियां भी शामिल थीं – के नेतृत्व वाले राजनैतिक दल, किसी न किसी तरह, एससी आबादी के एक बड़े हिस्से का समर्थन हासिल करने में सफल हो जाते थे।

अतः, दलितों के समर्थन से, दलितों के नेतृत्व वाली एक मज़बूत पार्टी का उभार केवल उत्तर प्रदेश में सफल हो सका। यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि देश में ऐसे कई राज्य हैं जहां एससी आबादी का प्रतिशत, उत्तर प्रदेश से भी ज्यादा है और इनमें श्री कांशीराम का गृह प्रदेश पंजाब शामिल है। साफ़ है कि देश के अधिकांश हिस्सों में अब भी दलितों, आदिवासियों, कमज़ोर ओबीसी और मुसलमानों की पिछड़ी जातियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली सामाजिक-राजनैतिक ताकतों का घोर अभाव है। यह स्थिति उन लोगों के लिए चुनौती है जो  मानवतावादी, राष्ट्रवादी और संवैधानिक लक्ष्य हासिल करने के लिए, देश में प्रजातंत्र की जड़ों को और गहरा करना चाहते हैं।

हमारे देश में जनसंख्या की बनावट ऐसी है कि राज्य स्तर पर भी कोई पार्टी किसी एक जाति या वर्ग के समर्थन से सत्ता में नहीं आ सकती और इस कारण, गठबंधन और समझौते अपरिहार्य बन जाते हैं। मेरे विचार से, अगर बसपा, सत्ता में रहने के दौरान, ग्रामीण दलितों व अन्य भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों – जिनमें से अधिकांश ओबीसी और उनमें भी कमज़ोर ओबीसी थे – को खेती की भूमि उपलब्ध करवाने का व्यापक और व्यवस्थित कार्यक्रम चलाकर भूमिहीनता की समस्या को हल कर देती, तो उसे ओबीसी की कमज़ोर जातियों का समर्थन हासिल हो जाता और उसका दलित आधार मज़बूत और स्थायी बन जाता। इसके साथ ही बसपा की सरकार को राज्य के सामाजिक-आर्थिक ढांचे का कायाकल्प करने के लिए कई विधायी कदम उठाने थे और नयी योजनाएं और कार्यक्रम शुरू करने थे। इनका रोडमैप मैंने कई अन्य राजनैतिक दलों के नेताओं सहित कुमारी मायावती को भी उपलब्ध करवाया था। अगर कुमारी मायावती इस रोडमैप का पालन करतीं तो दलितों के अतिरिक्त उन्हें ओबीसी की कमज़ोर जातियों का समर्थन भी हासिल हो जाता। दलितों और ओबीसी की कमज़ोर जातियों का यह गठबंधन स्थाई और मज़बूत होता क्योंकि इसमें आर्थिक हितों का परस्पर टकराव नहीं होता। इस गठबंधन को पछाड़ना किसी भी राजनैतिक दल के लिए लगभग असंभव होता। सत्ता में रहने के दौरान कुमारी मायावती ने दलितों और अन्य कमज़ोर वर्गों के हित में कई कदम उठाये, जिनमें उन्हें उन ज़मीनों पर कब्ज़ा दिलाना शामिल था, जिनके वे केवल कागजों पर मालिक थे। मैंने जब भी उन्हें दलितों और अन्य कमज़ोर वर्गों के हितार्थ कोई विशिष्ट कदम उठाने का अनुरोध किया, उन्होंने हमेशा उस दिशा में निर्णय लिया परन्तु उनके काम करने के तरीके में समग्र दृष्टिकोण का अभाव था। इसी कारण, बसपा को हमेशा किसी न किसी ऊंची जाति – विशेषकर ब्राह्मण – के साथ की ज़रुरत पड़ती रही। एसपी ने अपने यादव आधार के साथ, मुसलमानों और ठाकुर/ राजपूतों को अपने साथ ले लिया।

आदिवासियों को अपनी राजनैतिक राह खुद बनानी पड़ी। स्वतंत्रता के शुरूआती वर्षों में बिहार (अब झारखण्ड) के विशाल आदिवासी इलाके से एक करिश्माई आदिवासी नेता श्री जयपाल सिंह का उदय हुआ परन्तु कांग्रेस ने सफलतापूर्वक उन्हें घर बिठा दिया। शिबू सोरेन जैसे नेताओं ने बिहार के झारखण्ड इलाके में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की परन्तु शुरूआती सफलता के बाद, वह भी कमज़ोर पड़ गया। असम, त्रिपुरा और मणिपुर को छोड़ कर, सभी उत्तर-पूर्वी राज्यों की संपूर्ण या अधिकांश आबादी आदिवासी है और इन राज्यों का राजनैतिक नेतृत्व आदिवासियों के हाथों में ही रहा है, चाहे वे कांग्रेस के हों या गैर-कांग्रेसी स्थानीय दलों के. त्रिपुरा में दिवंगत कामरेड नृपेन चक्रवर्ती के ज़मीनी स्तर पर अथक प्रयासों से, कम्युनिस्ट पार्टी, आदिवासी और गैर-आदिवासी आबादी को एक साथ लाने में सफल रही और वहां एक आदिवासी – कामरेड दशरथ देब – मुख्यमंत्री भी रहे। सीमित राजनैतिक अवसरों के चलते और आर्थिक दृष्टि से हाशिये पर ढकेल दिए जाने के कारण, आदिवासियों का एक बड़ा तबका ऐसे समूहों के साथ जुड़ गया, जिन्हें प्रजातंत्र में भरोसा नहीं है और जो सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते हैं। उन समूहों को नक्सलवादी, माओवादी आदि कहा जाता है।

इस तरह, जहां तक दलितों, आदिवासियों और अधिकांश ओबीसी – अर्थात कमज़ोर व भूमिहीन पिछड़ी जातियों – का प्रश्न हैं, देश में एक तरह का राजनैतिक निर्वात है। इसके साथ ही, ये वर्ग अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत हो रहे हैं और उन्हें यह अहसास हो रहा है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनैतिक दलों ने उनकी उपेक्षा की। उत्तर भारत में अत्यंत पिछड़ी जातियों का आन्दोलन अपनी प्रारंभिक अवस्था में है। बिहार से, पसमांदा मुसलमान आन्दोलन उभरा, जिसके नेताओं में बिहार के श्री अली अनवर, पूर्वी उत्तरप्रदेश के दिवंगत अशफाक हुसैन अंसारी और मध्यप्रदेश के दिवंगत इब्राहिम कुरैशी शामिल थे।

कांग्रेस का चुनावी आधार धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है और इसका मुख्य कारण है पार्टी के मुख्यतः ऊंची और उच्च-मध्यम जातियों के नेतृत्व की दलितों, आदिवासियों और कमज़ोर ओबीसी के हितों का प्रतिनिधित्व करने और समग्र रूप से उनकी बेहतरी के लिए काम करने में असफलता। सन 1940 के दशक के मध्य से लेकर अंत तक, देश के कुछ हिस्सों, जैसे केरल, तमिलनाडु के थंजावूर, बंगाल और तेलंगाना में, कम्युनिस्ट व अन्य वाम दलों ने दलितों, आदिवासियों और कमज़ोर ओबीसी के हितों और अधिकारों के लिए काम किया। परन्तु समय के साथ, इन पार्टियों के क्रान्तिकारी तेवर ढीले पड़ गए। मैं इसके कारणों में नहीं जाना चाहूँगा परन्तु इसका नतीजा यह हुआ कि आज देश के किसी भी हिस्से में दलित और आदिवासी, कम्युनिस्ट पार्टी को अपनी पार्टी नहीं मानते। केरल में भी दलितों का कम्युनिस्ट पार्टियों से मोहभंग हो गया है यद्यपि अब भी उनमें से अधिकांश इन पार्टियों को वोट देते हैं। अभी हाल तक, भाजपा भी अपने आधार का ऊंची जातियों से आगे विस्तार नहीं कर सकी थी।

इसके साथ ही, राजनैतिक दलों को अब इस नए यथार्थ का सामना करना पड़ रहा है कि दलितों, आदिवासियों और कमज़ोर ओबीसी, विशेषकर दलितों, को अपनी बदहाली का और उनके अधिकारों से वंचित किये जाने का अहसास हो रहा है। वे जाग उठे हैं और पार्टियों को यह समझ आ रहा है कि इन वर्गों के समर्थन के बिना वे न तो चुनाव जीत सकते हैं और ना ही स्थिर सरकार बना सकते हैं। यही कारण है कि आज सभी पार्टियाँ डॉ. आंबेडकर को याद कर रही हैं और दलितों के प्रति अपनी सहानुभूति और समर्थन व्यक्त कर रही हैं। इतिहास में पहली बार, ओबीसी परिवार में जन्मा एक कमज़ोर पिछड़ी जाति का व्यक्ति अपनी दम पर देश का प्रधानमंत्री और अपनी पार्टी का निर्विवाद नेता बना है। सन 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान, श्री नरेन्द्र मोदी ने केरल के कोच्चि में दलितों के ऐतिहासिक ‘कायल समारम’ के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए 9 फरवरी 2014 को कहा था कि वे यह मानते हैं कि दलितों और पिछड़ों के अधिकार, जो उन्हें स्वाधीनता के दशकों बाद भी उन्हें नसीब नहीं हो सके हैं, इन वर्गों को दिलवाना वे अपना कर्तव्य और नियति मानते हैं और यह भी कि आने वाला दशक दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों का दशक होगा। यह भाषण और इसी तरह के अन्य भाषण, शायद पहली बार किसी भाजपा नेता ने दिए होंगे। उनके इस तरह के भाषणों और उनकी स्वयं के पिछड़े वर्ग से होने से दलितों, आदिवासियों व ओबीसी में ढेर सारी अपेक्षाएं और आशाएं उभरीं। सन 2014 के लोकसभा चुनावों में, भारत के इतिहास में पहली बार, भाजपा को कांग्रेस की तुलना में दलितों के अधिक वोट मिले। जहां भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के 24 प्रतिशत वोट हासिल हुए वहीं कांग्रेस को केवल 19 प्रतिशत मत मिले। अब ये वर्ग, विशेषकर ओबीसी की कमज़ोर जातियां, श्री मोदी के भाषणों के कार्यरूप में परिणित होने का इंतज़ार कर रहे हैं। कांग्रेस और भाजपा – दोनों के अपने एससी प्रकोष्ठ हैं। वे अब अधिक सक्रियता दिखा रहे हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने 2015 में दलित शोषित मुक्ति मंच की राष्ट्रीय स्तर पर स्थापना की। इसकी राज्य इकाईयां भी हैं, जैसे हरियाणा का दलित अधिकार मंच। यह पहली बार है कि किसी वामपंथी पार्टी ने इस तरह के संगठन की स्थापना की हो। इसके पहले, जिन राज्यों में सामाजिक न्याय आन्दोलन शक्तिशाली था, वहां इस तरह के संगठनों की स्थापना की गयी थी। जैसे तमिलनाडू में सीपीएम ने अछूत प्रथा विरोधी मोर्चे की स्थापना की थी। आंध्र प्रदेश में सीपीएम ने ‘कुला विवक्षा पोराता समिति’ (जाति-आधारित भेदभाव से लड़ने के लिए समिति) और सीपीआई ने दलिता हक्कुला पोराता समिति (दलित अधिकारों के लिए लड़ने के लिए समिति) और सीपीआई (एमएल) से जुड़ी सिविल लिबर्टीज कमेटी ने कुला निर्मूलानना पोराता समिति (जाति के उन्मूलन के लिए संघर्ष हेतु समिति) की स्थापना की थी।

विभिन्न पार्टियों के ये निर्णय किस हद तक ईमानदार और सत्यनिष्ठ प्रयास है, इसका निर्णय करना मेरा काम नहीं है। क्यों न हम इन्हें सकारात्मक ढंग से देखें और यह मानें कि दरअसल यह प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया के विकास को प्रतिबिंबित करता है और दमित व शोषित वर्गों के अंधकार से निकलने के प्रयास का परिणाम हैं। यह स्वागतयोग्य है कि सभी राष्ट्रीय पार्टियों का ध्यान  दलितों, आदिवासियों (यद्यपि कुछ कम) और कमज़ोर ओबीसी (और अधिक कम) की ओर जा रहा है। मेरी तो यह अपेक्षा है और मैं इन पार्टियों से यह अपील भी करता हूँ कि वे यह समझें कि इन वर्गों में अब इतनी जागृति आ गयी है कि केवल आंबेडकर की जय-जयकार करने और उनके प्रति सहानुभूति और समर्थन के इज़हार से वे प्रभावित होने वाले नहीं हैं। वे चाहते हैं और उनकी यह अपेक्षा है कि उनकी बेहतरी के लिए ठोस कदम उठाये जायें, चाहे वे कानून के रूप में हों या कार्यक्रमों या योजनाओं के रूप में। मैंने देश के विभिन्न भागों में दलितों और अन्य वंचित वर्गों के साथ अपने सात दशकों से भी लम्बे संपर्क-संबंधों से जनित अनुभव के आधार पर इस तरह के क़दमों का एक रोडमैप तैयार किया है। मैंने इस रोडमैप से कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी दलों के अलावा, बसपा सहित कई क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व को भी अवगत कराया है। सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए उठाये जाने वाले इन क़दमों का उद्देश्य, एससी-एसटी व अगड़ी जातियों के बीच के अंतर को समाप्त करना है। ओबीसी इन दोनों वर्गों के बीच में हैं परन्तु वे अगड़ी जातियों की तुलना में, एससी-एसटी के अधिक नज़दीक हैं। इस अंतर को विकास, कल्याण और गुणवत्तापूर्ण जीवन के सभी मानकों के सन्दर्भ में कम किया जाना होगा। आरक्षण इस समग्र कार्यवाही का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है परन्तु वह सब कुछ नहीं है। सभी पार्टियों को यह समझना चाहिए कि आरक्षण की व्यवस्था के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ करना गलत होगा। वर्तमान आरक्षण व्यस्वस्था को सबसे बड़ा खतरा, केंद्रीय और राज्य सरकारों की एक प्रवृत्ति से है और वह है शक्तिशाली और वर्चस्वशाली अगड़ी जातियों की स्वयं को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग की रूप में मान्यता देने और उन्हें आरक्षण प्रदान करने की मांग के आगे झुक जाने की प्रवृत्ति। इस तरह की मांग, जाहिर तौर पर, विरोधाभासी है। सभी पार्टियों को इस मामले में एक सी नीति अपनाते हुए, आरक्षण व्यवस्था के इस दुरुपयोग व विरूपण के प्रयास को समर्थन नहीं देना चाहिए। अगर किसी राज्य में  वे विपक्ष में हैं तो उन्हें इस तरह के आंदोलनों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन दे कर सत्ता हासिल करने की लिप्सा से बचना चाहिए। सभी पार्टियों को इस मामले में राष्ट्रीय स्तर पर एक-सी नीति अपनानी चाहिए, जैसा कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा से जुड़े मामलों में करतीं हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई पार्टी या पार्टियां, अगड़ी जातियों के निर्धन परिवारों को वजीफे या शिक्षा ऋण दिलवाने का प्रयास न करें। परन्तु उन्हें इन वर्गों के लिये आरक्षण की मांग नहीं करनी चाहिए।

प्रत्येक पार्टी को सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए कानून बनाने या योजनाएं और कार्यक्रम शुरू करने के अवसर उपलब्ध होते हैं – चाहे वे किसी राज्य में शासन कर रही हों या फिर केंद्र में। मैं लम्बे समय से राजनैतिक दलों से इस दिशा में करने की अपील करता आ रहा हूँ।  इसी से भारत की इष्टतम गति से प्रगति हो सकेगी और किसी भी पार्टी द्वारा राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर स्थिर सरकार देना संभव हो सकेगा। देश को इन दोनों की ज़रुरत है। यह तभी संभव हो सकेगा जब विभिन्न नेता व पार्टियाँ उस रोडमैप को कार्यान्वित करें, जिसे मैंने उन्हें उपलब्ध करवाया है। इसी से जाति-आधारित असमानता, जो सदियों से हमारे देश में व्याप्त है, समाप्त हो सकेगी और जाति व जाति प्रथा की प्रासंगिकता का अंत हो सकेगा। जब यह होगा, तभी हम जाति के उन्मूलन की बात सोच सकेंगे और एक समाज का निर्माण कर सकेंगे जो जाति-मुक्त होगा।

यहाँ मैं एक सावधानी बरतने की सलाह देना चाहूँगा। ऊपर सामाजिक न्याय के जिस कार्यक्रम का खाका खींचा गया है, उसका एकमात्र उद्देश्य एससी-एसटी व ओबीसी को वंचनाओं, असमानताओं, दमन और शोषण से मुक्त करना होना चाहिए ना कि किसी सामाजिक वर्ग या धार्मिक समुदाय के खिलाफ युद्ध करना। सामाजिक न्याय कार्यक्रम को नकारात्मक स्वरुप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए और उसे किसी समूह या वर्ग के खिलाफ नहीं बताया जाना चाहिए। उसे केवल और केवल जन्म-आधारित असमानता का विरोधी निरुपित किया जाना चाहिए। सभी पार्टियों को दमित वर्गों को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे केवल उनकी उन्नति या सशक्तिकरण के लिए काम कर रहे हैं और उनका लक्ष्य चुनावों में लाभ पाना या इन वर्गों का किसी और उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं है।

जहाँ तक विभिन्न पार्टियों या पार्टियों के गठबंधन की अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग समय पर चुनावी सफलताओं के पीछे के कारकों का सवाल है, उनके विस्तार में जाने की यहाँ ज़रुरत नहीं है। पार्टियों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी लगन और गंभीरता से सामाजिक न्याय की समग्र स्थापना के लिए उस रोडमैप पर अमल करते हैं, जिसे मैंने तैयार कर उन्हें सौंपा है। दलितों, ओबीसी की कमज़ोर जातियों और आदिवासियों की बेहतरी के लिए दीर्घकालीन योजना बनाया जाना बाकी है। इसके लिए यह ज़रूरी होगा कि विभिन्न पार्टियाँ तुरंत चुनावी लाभ पाने की न सोचें बल्कि दूरदृष्टि से काम करें. और यहाँ प्रश्न पार्टियों के भविष्य का ही नहीं है बल्कि भारतीय समाज, राष्ट्र और प्रजातंत्र के भविष्य का भी है। कौन सी पार्टी या पार्टियाँ दलितों, आदिवासियों और कमज़ोर ओबीसी जातियों सहित, सामाजिक समानता के आदर्श में विश्वास रखने वाली ताकतों का संयुक्त गठबंधन बनाएंगी, यह भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। इस तरह का गठबंधन ऐसे संयुक्त नेतृत्व द्वारा आसानी से बनाया जा सकता है, जो इन वर्गों के साथ ही अन्य वर्गों के उन लोगों का भी का प्रतिनिधित्व करता हो जो समतामूलक समाज के निर्माण की हामी हैं। अगर नेतृत्व किसी एक जाति या किसी एक नेता के हाथों में होगा तो ऐसा गठबंधन बनाना मुश्किल होगा।

इस तरह के गठबंधन पर ही दलितों, आदिवासियों और ओबीसी की कमज़ोर जातियों, जिनमें अल्पसंख्यकों की कमज़ोर जातियां शामिल हैं,  के न्यायसंगत हितों और आकांक्षाओं की पूर्ति के साथ-साथ, देश और प्रजातंत्र का भविष्य भी निर्भर करेगा। जिस तरह से, अलग-अलग कारणों से, विभिन्न पार्टियाँ इन वंचित वर्गों के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर रही हैं, उससे इन वर्गों का प्रजातान्त्रिक व्यवस्था और प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया पर विश्वास कम होगा। यह देश कि लिए एक बड़ा खतरा है, जिसे राजनैतिक दलों, विशेषकर प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को, किसी भी तरह टालने का प्रयास करना चाहिए और वे यह कर सकते हैं।

भारतीय प्रजातंत्र के सफल संचालन के लिए दो या तीन मज़बूत राष्ट्रीय पार्टियों की ज़रुरत है। भारत की राजनैतिक व्यवस्था संतुलित, स्थिर और समानता पर आधारित तभी बन सकेगी जब कांग्रेस, भाजपा और वामदल दलितों, आदिवासियों और कमज़ोर ओबीसी से जुड़े मुद्दों का समग्र समाधान निकालने के लिए निष्ठापूर्वक प्रयास करें और इन वर्गों को यह विश्वास दिलाएं कि वे पूरी गंभीरता और ईमानदारी से उनके साथ खड़े हैं।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


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