सरकारी नौकरियां नहीं हुई हैं खत्म, आरक्षण विरोधी फैला रहे भ्रम

यह कहना तर्कसंगत नहीं है कि सरकारी सेवाओं के अधीन नौकरियों में इतनी कमी आ गयी है कि अब आरक्षण का कोई मतलब नहीं रह गया है। वास्तविकता तो यह है कि राज्य के कार्यक्षेत्र में कुछ कमी आने के बावजूद, राज्य के अधीन रोज़गार के अवसर किसी भी तरह से कम नहीं कहे जा सकते

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज की कड़ी में पढ़ें कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की जरूरत क्यों है और इसे कैसे लागू किया जा सकता है। साथ ही यह भी कि निजी शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण कैसे लागू किया जा सकता है)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 26

वासंती देवी : क्या आपको लगता है कि निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए? यह कितना व्यवहार्य होगा? निजी क्षेत्र में एससी, एससी, पिछड़े मुसलमानों और यहां तक कि अगड़े मुसलमानों का भी प्रतिनिधित्व बहुत कम है। नव-उदारवादी नीतियों के चलते राज्य धीरे-धीरे सामाजिक और उत्पादन के क्षेत्रों से बाहर निकल रहा है। ऐसे में, अगर निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं की गयी, तो इन वर्गों को रोज़गार कैसे प्राप्त होगा?   

आज किसी की भी यह हिम्मत नहीं है कि वह आरक्षण का विरोध कर सके। परन्तु आरक्षण लागू होने के दशकों बाद भी अगड़ी और अन्य जातियों के बीच के अंतर को पाटा नहीं जा सका है। आज, जब कि रोज़गार का सृजन मुख्यतः निजी क्षेत्र में हो रहा है, तब केवल सरकारी नौकरियों में आरक्षण अर्थहीन होता जा रहा है। शिक्षा आज एक उत्पाद बन गयी है, इसे सिर्फ वही खरीद सकता है जिसकी जेब में पैसे हों। जाहिर है यह वंचित वर्गों के लिए एक बड़ी समस्या है। आपके इस बारे में क्या विचार हैं?

पी.एस. कृष्णन : यह कहना सही नहीं होगा कि राज्य के अधीन पदों और सेवाओं में आरक्षण अर्थहीन हो गया है। संविधान के अनुसार, राज्य और केंद्र सरकारें, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालय आदि राज्य की परिभाषा में आते हैं। राज्य के कार्यक्षेत्र में कुछ कमी आने के बावजूद, राज्य के अधीन रोज़गार के अवसर किसी भी तरह से कम नहीं कहे जा सकते। पूर्व में मैंने उल्लेखित किया है (अनुच्छेद 21.3) कि जिन 62 मंत्रालयों से संबंधित जानकारी उपलब्ध थी, उनमें लगभग 27 लाख पद हैं। अगर अन्य मंत्रालयों के आंकड़े भी उपलब्ध हो जायें, तो यह संख्या और बढ़ जाएगी। अ, ब और स समूहों में सफाई कर्मचारियों को छोड़कर, कुल पदों की संख्या, 69 मंत्रालयों में एक वर्ष पहले, अर्थात 1 जनवरी 2013 को उपलब्ध पदों की संख्या से अधिक है। शासकीय कर्मचारियों की संख्या में जो कमी हुई है वह मुख्यतः समूह स की उपश्रेणी सफाई कर्मचारी में हुई है और इसका मुख्य कारण है साफ-सफाई के काम की आउटसोर्सिंग। अगर इन आंकड़ों में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और विश्वविद्यालयों में पदों को जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या और अधिक हो जाएगी। ये आंकड़े केवल केन्द्रीय मंत्रालयों के हैं। लगभग इतनी ही संख्या में पद राज्य सरकारों में भी उपलब्ध हैं। हर वर्ष शासकीय कर्मचारी सेवानिवृत्त होते हैं और हर वर्ष खाली पदों पर भर्ती होती है। इसलिए राज्य के अधीन सेवाओं और पदों में आरक्षण अब भी महत्वपूर्ण व प्रासंगिक है। आरक्षण की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए इसे कानूनी आधार प्रदान करना आवश्यक है। मेरी हमेशा से यह मान्यता रही है कि राज्य के अधीन सेवाओं में आरक्षण हेतु कानून बनाया जाना चाहिए। सन 1990 में एससी और एसटी के लिए इस तरह के कानून बनवाने के मेरे प्रयास की विफलता के संबंध में मैंने पूर्व में (अनुच्छेद 7.21 के खण्ड 5) चर्चा की है। ओबीसी को राज्य के अधीन सेवाओं में आरक्षण के लिए कानून बनाने की आवश्यकता को भी मैंने पूर्व में (अनुच्छेद 21.24) में रेखांकित किया है।

यहां मैं समूह स की उपश्रेणी सफाई कर्मचारियों के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। इस उपश्रेणी में पदों की सबसे ज्यादा कमी आयी है। यह कर्मचारियों के संख्या घटा कर सरकार का खर्च कम करने के नाम पर किया गया है। सफाई संबंधी जो दायित्व आउटसोर्स किये गए हैं, वे स्थायी प्रकृति के हैं। स्थाई प्रकृति के कार्य को आउटसोर्स करने के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगाये जा सकते हैं क्योंकि इसके बाद भी उसी तरह के लोग यह काम कर रहे हैं। कर्मचारियों की संख्या में कमी कर, खर्च घटाने के इस प्रयास का नतीजा यह हुआ है कि सबसे निम्न श्रेणी के कर्मचारी, सरकारी नौकरी के लाभों जैसे छुट्टियां, पेंशन इत्यादि से वंचित हो गए हैं। इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए और तब तक, आउटसोर्सिंग में भी आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।

सन 1990 में एससी-एसटी के लिए आरक्षण को कानूनी जमा पहनने के मेरे प्रयासों के असफल हो जाने के बाद, मैंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, इस दिशा में फिर से काम करना शुरू किया। यह मुद्दा मेरे द्वारा नेशनल एक्शन फोरम फॉर सोशल जस्टिस के तत्वाधान में तैयार ‘दलित मैनिफेस्टो: इन्कोर्पोरेटिंग द राइट्स एंड एंटाईटिलमेंटस ऑफ़ शेड्यूलड कास्ट्स, शेड्यूलड ट्राइब्स एंड बैकवर्ड क्लासेज’ (1996) का भाग थी (इसे मेरी पुस्तक ‘एम्पावरिंग दलितस फॉर एम्पावरिंग इंडिया : अ रोडमैप’, मानक पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2009) में परिशिष्ट 1 के रूप में प्रकाशित किया गया है)। यद्यपि संयुक्त मोर्चे की सरकार ने 1996 में, दलित मैनिफेस्टो को अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में शामिल किया था तथापि इसे व कार्यक्रम के अन्य बिन्दुओं को तत्कालीन कल्याण मंत्री श्री वी.एस. रामूवालिया की कोशिशों के बाद भी, इस सरकार के बहुत जल्दी गिर जाने और कुछ अन्य कारणों से लागू नहीं किया जा सका।

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सन 2004 में, मेरी सलाह और कोशिशों से, राज्य के अधीन सेवाओं में एससी-एसटी के लिए आरक्षण के संबंध में कानून बनाने की बात यूपीए सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में शामिल की गयी और इस संकल्प को उसी साल, राष्ट्रपति के संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में दिए गए उद्बोधन में दोहराया भी गया। इस वायदे के परिप्रेक्ष्य में, कार्मिक मंत्रालय ने एससी, एसटी व ओबीसी के लिए आरक्षण के संबंध में विधेयक का मसविदा भी तैयार किया। परन्तु ओबीसी से जुड़े कुछ मुद्दों पर मतभेदों के चलते इसे संसद में प्रस्तुत नहीं किया गया। इन मतभेदों का वर्णन मैंने पूर्व (अनुच्छेद 21.25) में किया है। इस बहाने, एस-एसटी के लिए भी यह कानून नहीं बनाया गया,  यद्यपि उनके सम्बन्ध में कोई विवाद या मतभेद नहीं थे। इसके बाद, 2008 में एससी-एसटी के लिए अलग से विधेयक तैयार किया गया। इसे राज्यसभा ने बिना किसी बहस के पारित कर दिया और उसे लोकसभा में रखा जाना था। परन्तु यह विधेयक, इन वर्गों को आरक्षण प्रदान करने के बारे में कम और उन्हें आरक्षण से वंचित किये जाने के बारे में अधिक था। मैंने इस विधेयक को मजबूती देने और उसकी कमियों को दूर करने के लिए उसमें कुछ संशोधन प्रस्तावित किया। इन संशोधनों को एससी-एसटी मंत्रियों और सांसदों ने स्वीकार कर लिया। संशोधित विधेयक, सन 2009 की शुरुआत में, 14वीं लोकसभा के अंतिम सत्र में प्रस्तुत किया जाना था। परन्तु यह नहीं किया गया और विधेयक कालातीत हो गया। मैंने पिछली और वर्तमान सरकार के शीर्ष नेतृत्व को उपयुक्त संशोधनों के साथ विधेयक का मसविदा भेजा परन्तु अब तक इस सिलसिले में कुछ नहीं किया गया है। यह विधेयक मेरे रोडमैप पर आधारित है और यह एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर दलितों, आदिवासियों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों को जोर देना चाहिए।

मैं राज्य के अंतर्गत सेवाओं में ओबीसी के लिए आरक्षण के सम्बन्ध में कानून बनाये जाने पर भी जोर देता आ रहा हू। यह भी मेरे रोडमैप के अनुसार है। ओबीसी के लिए कानून में, एससी-एसटी के लिए कानून से कुछ अलग प्रावधान किये जाने होंगे। ओबीसी ले लिए कानून बनाये जाने पर भी जोर दिया जाना चाहिए। अगर प्रश्न क्रमांक 21 के मेरे उत्तर के अनुच्छेद 21.27 से 21.32 तक में वर्णित रणनीति को अपनाया जाता है, तो इस काम में कम कठिनाईयां पेश आएगीं।

अब हम निजी क्षेत्र की बात करें। मैं सबसे पहले निजी शैक्षणिक संस्थाओं की चर्चा करना चाहूँगा. निजी स्कूलों में प्रवेश में पहले से ही आरक्षण है। निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 12 के अनुसार, प्रत्येक गैर-अनुदान प्राप्त निजी स्कूल के लिए यह आवश्यक होगा कि वह अपनी सबसे निचली कक्षा की कम से कम 25 प्रतिशत सीटों को कमज़ोर और पिछड़े वर्गों के बच्चों से भरे। ‘पिछड़े वर्गों के बच्चों’ को अधिनियम की धारा 2 (2) (डी) में परिभाषित किया गया है. यह परिभाषा काफी व्यापक है और इसमें एससी-एसटी व ओबीसी बच्चों के अतिरिक्त, “ऐसे सभी समूह शामिल हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, भाषाई, लैंगिक या किसी ऐसे ही अन्य कारक, जिसे सम्बंधित सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो, के कारण पिछड़े हैं”। धारा 2 (2) (ई) में ‘कमजोर वर्ग के बच्चे’ को परिभाषित किया गया है और इसमें वे बच्चे शामिल होंगें जिनके माता-पिता या अभिभावक की वार्षिक आय, सम्बंधित सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम सीमा से कम हो।

भारत सरकार के पूर्व सचिव पी.एस. कृष्णन

कमज़ोर और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए निर्धारित 25 प्रतिशत कोटे को एससी-एसटी, ओबीसी व अधिसूचित आय के स्तर से कम आय वाले बच्चों के बीच विभाजित नहीं किया गया है। अगर एससी-एसटी व ओबीसी के लिए कोटे का विशिष्ट प्रतिशत निर्धारित नहीं किया जायेगा तो निजी गैर-अनुदान प्राप्त स्कूलों के कर्ताधर्ताओं के लिए पूरे 25 प्रतिशत कोटे को इन वर्गों के एक भी बच्चे को प्रवेश दिए बिना भरना संभव होगा। वे अधिकांश या सभी सीटें, ऐसे विद्यार्थियों से भर सकेंगे, जिनके माता-पिता या अभिभावक आवश्यक आय प्रमाणपत्र जुटाने में सक्षम होंगे। और यही बहुत से स्कूलों में हो रहा है, जो इस अधिनियम का पालन कर रहे हैं (ऐसे स्कूल भी हैं जो अधिनियम के इस हिस्से का पालन ही नहीं कर रहे हैं)। यह सुनिश्चित करने के लिए कि एससी-एसटी व ओबीसी विद्यार्थियों को उनका वाजिब हक़ मिले, शिक्षा का अधिकार अधिनियम को संशोधित कर, उसमें यह प्रावधान किया जाना चाहिए कि इन वर्गों के विद्यार्थियों के लिए सीटें आरक्षित की जाएं। दसवीं पंचवर्षीय योजना के एससी के सशक्तिकरण पर कार्यकारी समूह, जिसका मैं अध्यक्ष था, ने 1 अगस्त 2011 को प्रस्तुत अपनी रपट में यह सुझाव दिया था कि कोटे को निम्नांकित तरीके से उपविभाजित किया जा सकता है :

वर्गसीटें
एससी8 प्रतिशत
एसटी4 प्रतिशत
ओबीसी10 प्रतिशत
अन्य कमज़ोर व पिछड़े वर्ग3 प्रतिशत

यही अनुशंसा, दिनांक 21 सितंबर 2012 को प्रस्तुत अपनी रपट में, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एससी के शैक्षणिक विकास पर टास्कफ़ोर्स ने भी की थी।

अब मैं निजी क्षेत्र के चिकित्सा, इंजीनियरिंग, तकनीकी व अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थानों में एससी-एसटी व ओबीसी वर्गों के लिए आरक्षण के मुद्दें पर आता हूं। कुछ राज्यों में, इन संस्थानों के साथ समझौते के तहत, एससी-एसटी के लिए आरक्षण की व्यवस्था राज्य सरकारों द्वारा की गयी थी। परन्तु सन 2005 में इनामदार प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद, यह व्यवस्था समाप्त हो गयी। इस प्रकरण में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान के प्रावधान, राज्य को यह अधिकार नहीं देते कि वह निजी शैक्षणिक संस्थानों को आरक्षण प्रदान करने के निर्देश दे सके। प्रश्न क्रमांक 21 के उत्तर में पैराग्राफ 21.42 से लेकर 21.44 तक मैंने इस निर्णय के बाद हुए घटनाक्रम का वर्णन किया है. इसमें शामिल है संविधान (93वां संशोधन) अधिनियम, जिसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 में एक नया उपखंड 5 जोड़ा गया और तत्पश्चात केन्द्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम 2006 पारित किया गया। इस अधिनियम का उच्चतम न्यायालय में मेरे मार्गदर्शन में सफल बचाव किया गया परंतु सरकार ने नए उपखंड 5 के तहत अपने  उत्तरदायित्व का पालन नहीं किया (केन्द्रीय व अनुदान प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था करने के लिए कानून, अनुच्छेद 15 के उपखंड 4 के अंतर्गत किया जा सकता था और इसके लिए इस अनुच्छेद में नए उपखंड 5 को जोड़ने की आवश्यकता नहीं थी) और निजी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण के लिए आवश्यक कानून नहीं बनाए। जैसा कि मैंने प्रश्न क्रमांक 21 के उत्तर में बताया है, इस कानून के निर्माण के लिए केवल राजनैतिक स्तर पर निर्णय लिए जाने की जरूरत है। मैंने इस तथ्य का भी उल्लेख किया है कि इस आशय का राजनैतिक निर्णय तभी हो सकेगा जब एससी-एसटी और ओबीसी मिलकर एक मजबूत आंदोलन खड़ा कर सरकार को इसके लिए मजबूर कर दें। वर्तमान में जो व्यवस्था है, वह मुनाफाखोर व्यवसायिक निजी शैक्षणिक संस्थानों के पक्ष में है। इनमें से अधिकांश संस्थान पूरी तरह से व्यावसायिक हैं। इस तथ्य को उच्चतम न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में रेखांकित किया है।

निजी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था करवाना एससी-एसटी व ओबीसी व उनके लिए काम कर रहे व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस तरह के कानून में शिक्षण शुल्क के नियमन की व्यवस्था भी होनी चाहिए ताकि ये संस्थान शुद्धतः मुनाफा कमाने के लिए काम न करें। इसके साथ ही, इस कानून को लागू करने और उसके प्रावधानों के उचित परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत तंत्र की स्थापना करना भी आवश्यक है। मैं यहां यह बताना चाहूंगा कि कुछ राज्यों में ऐसे कानून हैं, जिनके अंतर्गत निजी शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश में आरक्षण की व्यवस्था की गई है परंतु ये कानून कमजोर हैं और इनके परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए मशीनरी या तो है ही नहीं अथवा बहुत कमजोर है।

निजी क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश में आरक्षण की व्यवस्था करना अपेक्षाकृत आसान है क्योंकि इसके लिए संविधान में विशिष्ट प्रावधान उपलब्ध हैं। अगर हम यह भी नहीं कर पाते तो ऐसी अपेक्षा करना बेकार होगा कि हम निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था कर सकेंगे।

अब मैं निजी क्षेत्र में आरक्षण के सर्वाधिक कठिन पक्ष पर आता हूं – अर्थात नौकरियों में आरक्षण। इसमें कोई संदेह नहीं कि निजी क्षेत्र में पर्यवेक्षी, तकनीकी, व्यवसायिक व प्रबंधकीय स्तरों पर एससी-एसटी व ओबीसी का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है और इसमें सुधार किया जाना आवश्यक है। सभी पार्टियों के एससी-एसटी सांसदों के 1999 में आयोजित सम्मेलन (जिसकी चर्चा प्रश्न क्रमांक 35 के उत्तर में भी की गई है) के उद्घाटन के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने निजी क्षेत्र में नौकरियों में आरक्षण के संबंध में एक प्रश्न का जवाब देते हुए कहा था कि इसके लिए सर्वसम्मति का निर्माण किया जाना आवश्यक है। श्री वाजपेयी की सरकार ने इस तरह की सर्वसम्मति के निर्माण के लिए कोई प्रयास नहीं किया। इसके बाद सत्ता में आई यूपीए सरकार ने सन् 2004 में जारी अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में निजी क्षेत्र में एससी-एसटी को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण सहित अन्य आवश्यक कदम उठाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। इस सिलसिले में अनेक बैठकें और सम्मेलन आयोजित किए गए जिनमें से कुछ में मुझे भी आमंत्रित किया गया। शुरूआत में यह काम सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय, जिसकी मंत्री श्रीमती मीरा कुमार थीं, के तत्वाधान में किया गया। बाद में यह विषय प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन हो गया। निजी क्षेत्र की शीर्ष हस्तियों ने इसके समर्थन में विचार व्यक्त किए और यह स्वीकार किया कि निजी क्षेत्र में एससी-एसटी के कम प्रतिनिधित्व का कारण इन वर्गों के व्यक्तियों में पात्रता का अभाव नहीं बल्कि उन्हें उपलब्ध अवसरों की कमी है। उन्होंने यह प्रस्ताव दिया कि वे इस इस सिलसिले में ‘सकारात्मक कार्यवाही’ जैसे इन वर्गों के लोगों को प्रशिक्षण आदि उपलब्ध करवाना, करने को तैयार हैं परंतु उन्होंने इन वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था किए जाने का कड़ा विरोध किया। ‘एफिरमेटिव एक्शन’ या सकारात्मक कार्यवाही, अमरीकी शब्दावली है। जिसका इस्तेमाल आरक्षण का विरोध करने के लिए किया जाता रहा है। इसलिए मैं बार-बार जोर देकर यह कहता आ रहा हूं कि ‘सकारात्मक कार्यवाही’ जैसी अस्पष्ट अवधारणाओं की हमारा संविधान के संदर्भ में न तो कोई आवश्यकता है और ना ही प्रासंगिकता। हमारे संविधान में आरक्षण और सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए अन्य कदमों के संबंध में स्पष्ट प्रावधान हैं और इसलिए एफिरमेटिव एक्शन जैसी अवधारणाओं को आयात करने की हमें कतई आवश्यकता नहीं है।

तब से स्थिति जस की तस बनी हुई है। इस सिलसिले में पहला कदम यह होना चाहिए कि एससी-एसटी के बारे में जो वायदे किए गए हैं व जो प्रतिबद्धताएं व्यक्त की गई हैं, उन्हें सब से पहले लागू किया जाय। हमें यह ध्यान में रखना होगा कि ‘निजी क्षेत्र’ एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें व्यक्तियों व परिवारों द्वारा संचालित बहुत छोटी दुकानों और व्यवसायों से लेकर विशाल औद्योगिक व कारपोरेट संस्थान शामिल हैं। इनके बीच विभिन्न आकारों और रोजगार के अवसरों वाले अनेकानेक व्यावसायिक संस्थान हैं। जाहिर है कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग बहुत छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के संदर्भ में नहीं की सकती। इसलिए, सबसे पहले यह जरूरी है कि विचार-विमर्श के जरिए यह तय किया जाए कि किस स्तर के निजी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में नौकरियों में आरक्षण की प्रस्तावित व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए। इस मामले में स्पष्टता इसलिए भी जरूरी है कि अगर, और जब, निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था लागू की जाती है, तब इसका प्रभावकारी पर्यवेक्षण और क्रियान्वयन संभव हो सके। हमें यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आरक्षण शॉप फ्लोर पर काम करने वाले मजदूरों के संदर्भ में नहीं मांगा जा रहा है। उनमें से अधिकांश पहले से ही एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के हैं। यह आरक्षण पर्यवेक्षी, तकनीकी, व्यावसायिक और प्रबंधकीय स्तर के पदों के लिए मांगा जा रहा है।

जहां तक निजी क्षेत्र में रोजगार में ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रश्न है, एससी-एसटी के संदर्भ में जिन मुद्दों पर स्पष्टता आवश्यक है, उनके अतिरिक्त, कुछ अन्य मसलों पर भी विचार किया जाना ज़रूरी है। आरक्षण की मूल अवधारणा यह है कि संबंधित क्षेत्र में उन सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए, जिनका वर्तमान में प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है और जो स्वयं अपना पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हैं। ओबीसी के मामले में निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग को पूरा करने में कम कठिनाई होगी यदि इस वर्ग के उस तबके को आरक्षण की जद से बाहर रखा जाए, जिसका पहले से ही निजी क्षेत्र की नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व है। आरक्षण की मांग केवल उन ओबीसी वर्गों के लिए की जानी चाहिए, जिनके बारे में यह दिखाया जा सके कि उनका प्रतिनिधित्व कम अथवा अपर्याप्त है। यह भी सुनिश्चित किया जाना होगा कि सामाजिक रूप से अगड़ी  जातियों के ओबीसी की सूची में घुसपैठ करने के प्रयास को नाकाम किया जाए। अगर वे अपने इस प्रयास में सफल हो जातीं हैं या यदि सरकार उनके दबाव के सामने झुक जाती है तो उससे निजी क्षेत्र में रोजगार में ओबीसी के लिए आरक्षण की मांग का औचित्य कमजोर पड़ेगा क्योंकि सामाजिक रूप से ये अगड़ी जातियां न तो किसी भी तरह से पिछड़ी कही जा सकती हैं और ना ही उनका निजी क्षेत्र में रोजगार में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है। अगर इन पहलुओं का ध्यान नहीं रखा जाएगा तो ओबीसी के लिए निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था करना बहुत कठिन हो जाएगा और न्यायपालिका में इसका बचाव करना भी।

मैं एक बार फिर जोर देकर कहना चाहूंगा कि वर्तमान में हमें अपनी ऊर्जा निजी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण सुनिश्चित करवाने पर व्यय करनी चाहिए क्योंकि यह करना अपेक्षाकृत आसान है। इसके बाद ही निजी क्षेत्र में रोजगार में आरक्षण की बात की जानी चाहिए।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


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