कॉलेजियम चाहे तो न्यायपालिका में सामाजिक संतुलन संभव : पी.एस. कृष्णन

न्यायपालिका में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिले, इसके लिए आरक्षण की व्यवस्था होनी ही चाहिए। जबतक ऐसा नहीं होता है तबतक कॉलेजियम चाहे तो सामाजिक संतुलन कायम कर सकता है

(भारत सरकार के नौकरशाहों में जिन चंद लोगों ने अपने को वंचित समाज के हितों के लिए समर्पित कर दिया, उनमें पी.एस. कृष्णन भी शामिल हैं। वे एक तरह से आजादी के बाद के सामाजिक न्याय के जीते-जागते उदाहरण हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय संबंधी अपने अनुभवों को डॉ. वासंती देवी के साथ साझा किया। वासंती देवी मनोनमनियम सुन्दरनर विश्वविद्यालय, तमिलनाडु की कुलपति रही हैं। संवाद की इस प्रक्रिया में एक विस्तृत किताब वर्ष 2017 में सामने आई, जो वस्तुतः आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास है। इस किताब का हिंदी अनुवाद किताब के रूप में शीघ्र प्रकाश्य है। हम किताब प्रकाशित करने से पहले इसके कुछ हिस्सों को सिलसिलेवार वेब पाठकों को उपलब्ध करा रहे हैं। आज पढ़ें कि किस तरह न्यायपालिका में सामाजिक संतुलन कायम हो सकता है। इसके अलावा यह भी कि मीडिया और समाज में जातिगत भेदभाव को खत्म करने के उपाय क्या हों)

(गतांक से आगे)


आजादी के बाद के सामाजिक न्याय का इतिहास : पी.एस. कृष्णन की जुबानी, भाग – 28

वासंती देवी : भारत में दमितों को न्याय दिलवाने में मीडिया कि भूमिका को आप किस तरह देखते हैं? अगर दमित वर्गों के मुद्दों को मीडिया में स्थान नहीं मिल रहा तो क्या इसका कारण यह है कि उनका मीडिया संस्थानों में बहुत कम प्रतिनिधित्व है?

पी.एस. कृष्णन : कुछ अपवादों को छोड़ कर, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, दोनों ही मीडिया, एससी-एसटी व ओबीसी के साथ न्याय से जुड़े मुद्दों के प्रति उदासीन रहे हैं। यह कमी तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में ज्यादा दिखाई देती है और ‘राष्ट्रीय’ अंग्रेजी मीडिया में और ज्यादा. ‘राष्ट्रीय’ अंग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह सबसे ज्यादा है। मैंने यह पाया है कि क्षेत्रीय मीडिया इस मामले में राष्ट्रीय मीडिया से अधिक संवेदनशील है।

जब एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार ने दलितों कें संबंध में प्रधानमंत्री के बयान को नहीं दी तरजीह

मैं एक उदाहरण देना चाहूँगा। भारत सरकार ने 5-7 दिसंबर 1999 को, सभी पार्टियों के एससी-एसटी सांसदों का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जिसका उद्देश्य था “एससी-एसटी से जुड़े प्रत्येक मुद्दे की पहचान कर कार्ययोजना बनाना”। यह आयोजन तत्कालीन विधि मंत्री श्री राम जेठमलानी के संसद में दिए गए भाषण के परिप्रेक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस भाषण में जेठमलानी ने यह स्वीकार किया था कि बतौर एक राष्ट्र हम स्वाधीनता से लेकर अब तक, एससी-एसटी की समस्याओं को सुलझाने में लगभग पूरी तरह से नाकाम रहे हैं। सम्मेलन का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। इस सम्मेलन का महत्व स्वयंसिद्ध है। परन्तु हमारे मीडिया ने न तो इस सम्मेलन को महत्व दिया और ना ही प्रधानमंत्री के उद्घाटन भाषण को। एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक, जिसके दिल्ली सहित कई महानगरों से संस्करण प्रकाशित होते हैं, ने उद्घाटन का समाचार चंद शब्दों में अपने अंदर के पृष्ठों पर प्रकाशित किया। इसके प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित खबर का शीर्षक था ‘रिलीफ फाॅर श्रीलंकन लेस्बियंस’। इस खबर की लंबाई, प्रधानमंत्री के उद्घाटन भाषण से संबंधित खबर से लगभग चार गुनी थी। अगर किसी भी देश में किसी व्यक्ति को उसकी पसंदगी या नापसंदगी के लिए प्रताड़ित किए जाने से मुक्ति मिलती है तो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती परंतु दुःखद यह था कि भारत के सबसे दमित तबके से जुड़े राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे और देश के प्रधानमंत्री की उसके बारे में सोच को इतना कम महत्व दिया गया। ऐसा लगता है कि श्रीलंका के समलैंगिकों के बारे में खबर को इस प्रतिष्ठित दैनिक ने मुखपृष्ठ पर इसलिए प्रकाशित नहीं किया कि उसे समलैंगिकों से कोई सहानुभूति थी, बल्कि उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसे ऐसा लगा कि इस तरह के समाचारों के प्रकाशन से उसकी प्रसार संख्या बढ़ेगी। अगर इस अखबार को सचमुच प्रताड़ित व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति होती तो वह एससी-एसटी सांसदों के सम्मेलन के उद्घाटन की खबर को भी मुखपृष्ठ  पर छापता।

पी.एस. कृष्णन, भारत सरकार के पूर्व सचिव

सामान्यतः दलितों की ओर मीडिया का ध्यान तभी जाता है जब उनकी बस्तियों में बड़े पैमाने पर आगजनी या हत्याएं होती हैं। मीडिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए दलितों और आदिवासियों को यह कीमत चुकानी पड़ती है। पिछले कुछ वर्षों से ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के कुछ संस्करणों (मैं दिल्ली और हैदराबाद संस्करण पढ़ता हूं) का दलितों से जुड़े मुद्दों पर सहानुभूतिपूर्ण और संवेदनशील रवैया नजर आ रहा है। इस सिलसिले में मैं ‘द हिन्दू’ के तमिल संस्करण और पत्रिकाओं में से ‘फ्रंटलाईन’ का नाम भी लेना चाहूंगा। ये अपवाद इसलिए हैं क्योंकि इन समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के संपादकीय विभागों में सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील पत्रकार हैं। हाल में गुजरात के ऊना में 11 जुलाई 2016 को दलितों के साथ हुए भयावह अत्याचार के वीडियो के वायरल होने और इस घटना के विरोध में हजारों दलितों के लामबंद होने संबंधी खबर पर भी मीडिया का ध्यान गया।

मीडिया में एससी-एसटी व ओबीसी को जो सीमित स्थान मिलता है, उसमें भी सामान्यतः आरक्षण के मुद्दे को लेकर नकारात्मक खबरें प्रकाशित की जाती हैं। और यह सीमित स्थान भी यदाकदा ही मिलता है और इसमें कोई निरंतरता नहीं होती। उदाहरण के लिए, दलितों के सामूहिक संहार और आगजनी आदि की घटनाओं का विवरण विस्तार से प्रकाशित किया जाता है परंतु उसके बाद इन प्रकरणों का क्या होता है, इस पर मीडिया बिल्कुल ध्यान नहीं देता। मीडिया ने जिस प्रकार का दबाव – और इसमें कुछ भी गलत नहीं था – जेसिका लाल की हत्या के प्रकरण में बनाया था और जिसके कारण उसे न्याय मिल सका – उस तरह का दबाव कभी एससी-एसटी पर अत्याचार के मामलों में नहीं बनाया जाता। इस तरह के मामलों में जो थोड़ा-बहुत प्रकाशित किया भी जाता है, उसमें भी उसके पीछे के कारकों जैसे दलितों की भूमिहीनता और आदिवासियों को उनकी जमीनों से गैर-कानूनी ढ़ंग से बेदखल किए जाने की चर्चा नहीं होती। यहां मैं यह कहना चाहूंगा कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के दिल्ली संस्करण ने हाल में गुजरात के कई गांवों में दलितों की स्थिति पर लेखों की एक श्रृंखला प्रकाशित की थी।

शिक्षा नीति व हालिया नई शिक्षा नीति पर चर्चा करते समय मीडिया कभी उन्हें एस-एसटी व ओबीसी की निगाहों से नहीं देखता और ना ही मीडिया इस प्रश्न पर विचार करता है कि शिक्षा के हर स्तर पर इन वर्गों और अगड़ी जातियों के बीच के अंतर को कैसे पाटा जा सकता है। उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया के मसौदे पर सरकार व न्यायपालिका के बीच टकराव के बारे में मीडिया ने ढेरों खबरें प्रकाशित कीं परंतु उसने इस तथ्य को रेखांकित करना जरूरी नहीं समझा कि उच्चतम न्यायालय में एक भी एससी या एसटी जज नहीं है और ना ही देश के 24 उच्च न्यायालयों में से किसी का भी मुख्य न्यायाधीश इन वर्गों से है। इसी तरह, उच्च न्यायपालिका में ओबीसी और महिलाओं की उपस्थिति भी बहुत कम है।

आरक्षण को लेकर मीडिया का नकारात्मक रवैया

मीडिया में आरक्षण से संबंधित जो खबरें प्रकाशित होती हैं, उनसे घोर पूर्वाग्रह और आधारभूत तथ्यों की अज्ञानता स्पष्ट परिलक्षित होती है। जब मीडिया के समक्ष सही तथ्य रखे जाते हैं तब भी वह उनका संज्ञान नहीं लेता। इसका एक उदाहरण है जानी-मानी पत्रकार सुश्री बरखा दत्त द्वारा कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर भगवती और एक अन्य व्यक्ति का न्यूयार्क में लिया गया साक्षात्कार। मैंने अपने एक शोधपत्र में इन दोनों साक्षात्कारों का विस्तृत विश्लेषण किया और इस शोधपत्र को प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की अनेक महत्वपूर्ण हस्तियों, जिनमें सुश्री बरखा दत्त शामिल थीं, को भेजा। परंतु मुझे किसी से भी कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। यह सचमुच दुःखद और डरावना है कि मीडिया के समक्ष तथ्यात्मक और पूर्वाग्रहमुक्त जानकारी रखने के बावजूद वह उसका संज्ञान तक लेना नहीं चाहता।

मीडिया का एससी-एसटी व ओबीसी के प्रति असंवेदनशील रवैया ऊंची जातियों/उच्च मध्यम वर्ग के जाति-आधारित पूर्वाग्रहों को प्रतिबिंबित करता है। इन्हीं पूर्वाग्रहों से देश के महानगरों व अन्य बड़े शहरों में रहने वाला शहरी श्रेष्ठि वर्ग भी ग्रस्त है।

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मीडिया के बारे में मैंने जो कुछ कहा, उसका तात्पर्य सिर्फ यह है कि पत्रकारों और एंकरों की जाति के कारण मीडिया दमित वर्गों के मूल मुद्दों के प्रति असंवेदनशील है। पत्रकारों के जाति-आधारित पूर्वाग्रह इसके लिए मूलरूप से जिम्मेदार हैं। परंतु इसके साथ-साथ, मैं अन्य कई मामलों, जैसे जेसिका लाल व निर्भया प्रकरण, घोटालों का पर्दाफाश करने इत्यादि में मीडिया की भूमिका का सम्मान करता हूं। आज प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया के समक्ष जो चुनौती है, वह यह है कि वे बिना जाति आधारित पूर्वाग्रह के, निरंतर दमित वर्गों के बारे में सूचनाओं और जानकारियों के संतुलित वाहक बन सके और उनसे जुड़े मुद्दों की समग्र समझ विकसित करे।

वासंती देवी : आपने हाल में गैर-अगड़ी जातियों के न्यायपालिका में बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए अभियान शुरू किया है. क्या आप इसके औचित्य पर प्रकाश डालना चाहेंगे?

पी.एस. कृष्णन : किसी भी आधुनिक प्रजातंत्र में न्यायपालिका के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मैं उच्च न्यायपालिका के उन निर्णयों के लिए उसके प्रति आभारी हूं, जिनके चलते एससी-एसटी और ओबीसी के कुछ अधिकार संरक्षित और स्थापित हुए हैं। इसके साथ ही, ऐसे कई निर्णय हैं, जिन्होंने वंचित वर्गों के हितों पर विपरीत प्रभाव डाला है। शायद इसका कारण यह था कि कार्यपालिका, सरकारी वकीलों के जरिए, सही परिप्रेक्ष्य में तथ्यों को न्यायालयों में प्रस्तुत नहीं कर सकी। वकीलों की इस असफलता के प्रभाव को काफी हद तक समाप्त या कम किया जा सकता है यदि न्यायाधीश विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों और अलग-अलग सामाजिक वर्गों से हों। अगर एससी-एसटी और ओबीसी – विशेषकर ओबीसी की कमजोर जातियों और अल्पसंख्यक समुदायों के पिछड़े वर्गों – के पुरूषों और महिलाओं और साथ, अगड़ी जातियों की महिलाओं का न्यायपालिका में बेहतर प्रतिनिधित्व होगा तो इससे इस तरह की समस्याएं नहीं आएंगी।। इस मुद्दे की चर्चा उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वैंकटचलैया की अध्यक्षता वाले ‘कमीशन फॉर रिव्यू ऑफ़ द वर्किंग ऑफ़ द कांस्टीटयूशन’ की सन् 2002 में प्रस्तुत रपट में भी की गयी है।

कॉलेजियम चाहे तो न्यायपालिका में सामाजिक संतुलन संभव

राज्य के दो अंगों विधायिका और कार्यपालिका का आरक्षण की व्यवस्था से प्रजातांत्रिकरण हुआ है। परंतु राज्य के तीसरे अंग न्यायपालिका में यह परिवर्तन नहीं आ सका है। न्यायपालिका हमेशा से जजों की नियुक्ति में आरक्षण की विरोधी रही है। मेरा विचार यह है कि आरक्षण के बिना भी या जब तक न्यायपालिका में औपचारिक रूप से आरक्षण की व्यवस्था लागू नहीं की जाती है, तब भी राज्य के इस अंग में सामाजिक संतुलन स्थापित किया जाना संभव है। यह कार्य या तो कालेजियम स्वयं कर सकते हैं या सरकार कालेजियमों के नियुक्ति के प्रस्तावों को इस आधार पर लौटा सकती है कि वे एससी-एसटी, ओबीसी व इन वर्गों की महिलाओं व अन्य महिलाओं के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के कारण सामाजिक संतुलन स्थापित नहीं करते। जिला स्तर की अदालतों सहित बार में ऐसे अनेक आवश्यक अर्हता प्राप्त व्यक्ति हैं, जो ऐसे वर्गों या श्रेणियों से आते हैं, जिनका उच्च न्यायपालिका में या तो प्रतिनिधित्व है ही नहीं या बहुत कम है। इन व्यक्तियों को उच्च न्यायपालिका में समुचित अनुपात में नियुक्त करने से असंतुलन दूर किया जा सकता है।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की हो स्थापना

इस समस्या का दीर्घकालीन हल यह है कि एक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना की जाए। इसकी अनुशंसा विख्यात विधिवेत्ता श्री एम.एस. सीतलवाड़ की अध्यक्षता वाले प्रथम विधि आयोग ने भी की थी। एक अन्य प्रतिष्ठित विधिवेत्ता श्री नानी पालकीवाला इस आयोग के सदस्य थे। इस अनुशंसा के कई वर्षों बाद, संविधान (42वां) संशोधन अधिनियम 1976 के अधीन राज्य को अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन करने के लिए अधिकृत किया गया। इस संशोधन अधिनियम में यह स्पष्ट प्रावधान है कि इसके क्षेत्राधिकार में जिला जज से नीचे के पद नहीं होंगे। अगर इस सेवा का गठन किया जाएगा तो स्वाभाविक है कि अन्य अखिल भारतीय सेवाओं की तरह इसमें भी आरक्षण का प्रावधान होगा। मैं इस अखिल भारतीय सेवा के गठन की ज़रुरत  पर लंबे समय से जोर डालता आ रहा हूं परंतु पिछले चालीस सालों में इस सेवा का गठन नहीं किया गया। अगर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम के लागू होने के तुरंत बाद इस सेवा का गठन कर दिया गया होता तो आज हमारे पास ऐसे वर्गों, जिनका उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व या तो है ही नहीं अथवा बहुत कम है, के अनेक ऐसे पात्र उम्मीदवार उपलब्ध होते जिन्हें उच्च न्यायपालिका में पदोन्नत किया जा सकता था। ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान सरकार इस मुद्दे का परीक्षण कर रही है। मुझे उम्मीद है कि सरकार इस मामले में जल्द ही कोई निर्णय लेगी।

मैं इस मसले को समय-समय पर विभिन्न विधि मंत्रियों और सरकार व राजनैतिक दलों के नेताओं के समक्ष उठाता रहा हूं।

वासंती देवी : भाजपा के आंबेडकर की विरासत पर कब्जा जमाने के प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं? भाजपा और हिन्दुत्ववादियों में अगड़ी जातियों का बोलबाला है. इन्हीं जातियों ने भयावह जाति व्यवस्था का निर्माण किया और वे सैकड़ों सालों से इसका लाभ उठाती आ रही हैं. क्या यह विडंबनापूर्ण नहीं है कि वे आंबेडकर को एक हिन्दू नायक के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहीं हैं?

पी.एस. कृष्णन : आंबेडकर को अब जाकर वह स्वीकार्यता और मान्यता मिल रही है, जो उन्हें बहुत पहले मिल जानी चाहिए थी। यह स्वागत योग्य है। अतीत में जब भी मैं गांवों और गोष्ठियों व सम्मेलनों में डॉ. आंबेडकर, उनके कार्यों और उनके विचारों को रखता था तब दलित और गैर-दलित, दोनों श्रेणियों के लोगों की भौहें चढ़ जाती थीं और वे इस सोच को एक तरह से ध्वंसकारी बताते थे। शासकीय स्तर पर इस मामले में परिवर्तन की प्रक्रिया 1990 से शुरू हुई। इस सिलसिले में पहला निर्णय था उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से विभूषित किया जाना। इसके अतिरिक्त, शासन ने यह भी तय किया कि 14 अप्रैल 1990 से आंबेडकर का जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जाएगा। सामान्यतः इस तरह के आयोजन संस्कृति मंत्रालय द्वारा किए जाते हैं जो उन्हें बहुत ही घिसे-पिटे ढंग से मनाता है। कल्याण मंत्रालय के सचिव बतौर मैंने यह प्रस्तावित किया कि डॉ. आंबेडकर का जन्म शताब्दी समारोह, कल्याण मंत्रालय के तत्वाधान में मनाया जाना चाहिए क्योंकि डॉ. आंबेडकर और उनके कार्यक्षेत्र का कल्याण मंत्रालय से निकट का संबंध है( इस प्रस्ताव को तत्कालीन कल्याण मंत्री श्री रामविलास पासवान और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री वीपी सिंह ने मंजूरी दे दी(

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आंबेडकर जन्म शताब्दी समारोह का आयोजन अभूतपूर्व ढंग से किया गया। इसमें रैलियों के जरिए, आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की गई। समारोह के उद्घाटन के अवसर पर आयोजित रैली में लगभग एक लाख लोगों ने भाग लिया। इस आयोजन में विभिन्न विचार गोष्ठियों के जरिए बुद्धिजीवियों की भागीदारी सुनिश्चित की गई। इसके अतिरिक्त, यह प्रयास भी किया गया कि डॉ. आम्बेडकर की सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय की प्रस्तावना के अनुरूप नीतियां और कार्यक्रम लागू किए जाएं।

इसके बाद से वे पार्टियां जो डॉ. आंबेडकर के प्रति उदासीन रवैया अपनाती रहीं थीं, उन्होंने भी उनके प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त करना शुरू कर दिया। ओलिवर गोल्डस्मिथ की कविता ‘द डेसरतिड विलेज’ की एक पंक्ति को तनिक सा संशोधित करते हुए मैं कह सकता हूं कि ‘दोज हू केम टू स्काफ, रिमेंन्ड टू प्रे’ (जो लोग उपहास उड़ाने आए थे, वे प्रार्थना करने के लिए रूक गए)।

आंबेडकर को मान्यता मिलने से दलितों में बढ़ी जागृति

आंबेडकर को जो मान्यता मिली, उसका एक कारण दलितों की ताकत और उनके जागृति के स्तर में इजाफा भी था। अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियों को लगा कि अगर वे डॉ. आंबेडकर के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त करेंगीं तो चुनावों में उन्हें लाभ होगा। मैं इन पार्टियों की ईमानदारी और निष्ठा पर संदेह करना नहीं चाहता। अगर कोई व्यक्ति देर से ही सही, किसी सत्य को स्वीकार कर लेता है, तो उसे मजाक का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए। इस परिवर्तन का उचित इस्तेमाल यही होगा कि हम सभी ऐसी पार्टियों से अनुरोध करें कि डॉ. आंबेडकर के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त करने के साथ उन्हें उनके आदर्शों के अनुरूप नए कानून बनाने और कार्यक्रम व योजनाएं लागू करने पर ध्यान देना चाहिए। मैंने इस दिशा में प्रयास किया है। मेरा मानना है कि दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और उनके मित्रों को उन पार्टियों – जो सरकारें चला रही हैं और जो केवल डॉ. आंबेडकर को श्रद्धांजलि देकर चुप बैठ गई हैं – पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वे डॉ. आंबेडकर के सपनों को साकार करने के लिए उपयुक्त कदम उठाएं।

वासंती देवी : देश में ऑनर किलिंग्स के मामले बढ़ते जा रहे हैं। जाति पंचायतें, दलित लड़कों और वर्चस्वशाली जातियों की लड़कियों के बीच विवाह को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। कई कानूनों के बावजूद, राज्य ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। ऑनर किलिंग केवल ऐसे मामलों में होती है जब लड़का दलित हो। लड़की के दलित होने पर इस तरह की घटनाएं नहीं होतीं। गैर-दलित जातियों के बीच अंतरजातीय विवाहों के मामले में भी ऑनर किलिंग नहीं होती। क्या आप इस पर टिप्पणी करना चाहेंगे?

पी.एस. कृष्णन : दलित लड़कों और गैर-दलित लड़कियों के विवाह के मामले में ऑनर किलिंग, दलितों पर अत्याचार का एक नया तरीका है, जो हाल में समाज में हुए परिवर्तनों के साथ उभरा है। पिछले कुछ दशकों में सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए जो नीतियां और कार्यक्रम राज्य द्वारा लागू किए गए, उनके कारण दलित समुदायों के युवा बड़ी संख्या में समाज की मुख्यधारा में पहुंच गए हैं। देश में पहली बार, दलित और गैर-दलित एक साथ स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सरकारी कार्यालयों में पढ़ और काम कर रहे हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि इनमें से कुछ लोग अपनी जाति से बाहर जाकर अपने जीवनसाथी का चुनाव करें। गैर-दलित लड़कों और दलित लड़कियों के बीच विवाह को भी अच्छी नजर से नहीं देखा जाता परंतु गैर-दलित लड़कियों और दलित लड़कों के बीच विवाह को नफरत और तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है। यह मनु द्वारा इस तरह के विवाहों को ‘प्रतिलोम विवाह’ का दर्जा दिए जाने के अनुरूप है। जिन लोगों ने मनुस्मृति को कभी पढ़ा नहीं है, वे भी न जाने क्यों इसके सिद्धांतों का पालन करते दिखते हैं। विभिन्न जातियों के युवाओं के एक-दूसरे से घुलने-मिलने और सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध के पारंपरिक नियम का उल्लंघन करते हुए परस्पर विवाह करने की घटनाएं अभी तो कम हैं परंतु भविष्य में इनके बढ़ने की अपेक्षा की जा सकती है। आज भी अधिकांश विवाह जाति और उप-जाति के अंदर होते हैं। जिन मामलों में इस पारंपरिक सीमा का उल्लंघन किया जाता है वहां भी वर-वधु ऐसी अलग-अलग जातियों से होते हैं, जिनका दर्जा लगभग समान होता है। गैर-अछूतों के अछूतों से विवाह के बहुत कम उदाहरण हैं। तथाकथित ऑनर किलिंग्स, जाति प्रथा को पूरी तरह से झकझोर दिए जाने की प्रतिक्रिया हैं। जो दलित व अन्य व्यक्ति जाति प्रथा के उन्मूलन के पैरोकार हैं, वे अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों को समझकर और उनका पूरा उपयोग करते हुए इन नीचतापूर्ण व लज्जाजनक ऑनर किलिंग्स के खिलाफ अभियान चला सकते हैं। उदाहरण के लिए, इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों में यह प्रावधान है कि मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक सतर्कता व निगरानी समिति बनाई जाए जिसकी बैठक हर साल कम से कम दो बार जनवरी और जुलाई में हो। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ये बैठकें नियमित रूप से आयोजित की जाएं। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यह समिति सामूहिक हत्याओं, सामूहिक बलात्कार, बड़े पैमाने पर आगजनी व तथाकथित ऑनर किलिंग्स की घटनाओं पर विशेष ध्यान दे। अधिनियम में यह प्रावधान भी है कि केवल एससी-एसटी के विरूद्ध अत्याचार के प्रकरणों पर विचारण के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना की जाए। इस मुद्दे पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। यह सब करना मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं।

जाति प्रथा का नाश, समाज और देश के हित में है। इसका एक तरीका यह है कि अंतर्जातीय विवाहों – जिन्हें मैं जाति विरोधी विवाह कहना पसंद करता हूँ – को प्रोत्साहन व बढावा दिया जाए। इनमें अगड़ी जातियों और एससी, एसटी व कमज़ोर ओबीसी जातियों के बीच विवाह शामिल हैं। गणमान्य नागरिकों को इस तरह के विवाह करने वाले दम्पत्तियों का सार्वजनिक रूप से सम्मान करने के लिए कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए। जिन दिनों मैं हैदराबाद में रहता था, वहां कुल निर्मूलन संघ (जाति के विनाश के लिए संगठन) नामक एक संस्था थी। इस संस्था के प्रमुख सदस्यों में उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री जे. वेंकटेशम, राज्य लोकसेवा आयोग के पूर्व सदस्य श्री वीरास्वामी और मैं शामिल थे। हममें से दो अगड़ी जातियों से थे और एक ओबीसी से। हम लोग अंतर्जातीय विवाह करने वाले दम्पत्तियों का सम्मान करने के लिए कार्यक्रम आयोजित करते थे। इससे उनका मनोबल बढ़ता था और उन्हें लगता था कि भले ही उनके परिवारों ने उनके किनारा कर लिया हो परन्तु व्यापक समाज उन्हें स्वीकार कर रहा है। मैं राज्य सरकार और उसके उद्योग विभाग में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उन्हें आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए उनके लिए नौकरी या स्वरोजगार का प्रबंध करने का प्रयास भी करता था।

अंतर्जातीय विवाह करने वाले दंपत्तियों के बच्चों को मिले आरक्षण     

छठी पंचवर्षीय योजना के एससी के विकास पर कार्यकारी समूह ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ऐसे व्यक्तियों के लिए आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए, जिनके माता या पिता एससी हों। इस आरक्षण का प्रतिशत बहुत कम हो सकता है और इसे सामान्य कोटे में से दिया जाना चाहिए। यह कोटा किसी जाति के लिए न होकर ‘जाति-विहीनों’ के लिए होना चाहिए। अंतर्जातीय विवाह करने वाले दम्पत्तियों के बच्चों को माता या पिता में से किसी एक की जाति का सदस्य बनने के लिए मजबूर करने की जगह, उन्हें जाति से मुक्त रहने दिया जाना चाहिए।

मेरे ये जाति-विरोधी विचार, जिनका मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में पालन किया और जो राष्ट्रहित में भी हैं, के कारण मेरी गोपनीय चरित्रावली में एक विपरीत टिपण्णी की गयी, जिसमें मुझ पर अंतर्जातीय विवाहों की जबरदस्त वकालत करने का आरोप लगाया गया!

वासंती देवी : (1) मेरे कुछ आखिरी प्रश्न। जहां एक ओर हमारी विविधता का उत्सव मनाया जाता है और अलग-अलग सांस्कृतिक पहचानों को सुरक्षित रखने की जरूरत पर जोर दिया जाता है वहीं संस्कृतिकरण के जरिए पूरे समाज को एकसार बनाने की कोशिशें भी की जा रही हैं। ऊँची जातियों की स्वीकार्यता हासिल करने के प्रयास में दमित वर्ग, उनकी नकल करने का प्रयास कर रहे हैं। दलितों सहित निम्न जातियों द्वारा ब्राम्हणवादी मूल्यों, प्रथाओं और कर्मकांडों को अपनाया जा रहा हैं। आपके विचार से इसके क्या परिणाम होंगे, विशेषकर महिलाओं की स्थिति के संदर्भ में।  

(2) आंबेडकर ने कहा था “मैं हिन्दू पैदा हुआ था; मैं इसके लिए जिम्मेदार नहीं हूं। परंतु मैं एक हिन्दू के रूप में नहीं मरूंगा।” अंततः, उन्होंने बड़ी संख्या में अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। आज इस राह पर उनके समर्पित अनुयायी भी क्यों चल नहीं रहे हैं?  क्या कारण है कि एससी, हिन्दू धर्म से ऐसे चिपके हुए हैं मानों वही उनका मुक्तिदाता है?

(3) आरएसएस व अन्य हिन्दुत्व समूहों के घर वापसी अभियान के बारे में आप क्या सोचते हैं? जब एससी और एसटी कभी हिन्दू धर्म का हिस्सा थे ही नहीं तो वे किस घर में वापस जायेंगे?

पी.एस. कृष्णन : इन प्रश्नों का संबंध धर्मों, समाजों, सामाजिक संगठनों, धर्मपरिवर्तन और पुनः धर्मपरिवर्तन से है। मैं अपने उत्तर की शुरूआत स्वामी विवेकानंद द्वारा सन् 1897 में मद्रास (चैन्नई) में की गई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी से करना चाहूंगा। मैं पहले ही प्रश्न क्रमांक 1 के अपने उत्तर में यह बता चुका हूँ कि इस टिप्पणी ने मेरे जीवन के शुरूआती दौर में समाज के प्रति मेरे दृष्टिकोण को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन प्रश्नों के उत्तर के संदर्भ में इस टिप्पणी के महत्व को देखते हुए मैं उसे फिर से दुहरा रहा हूं।

 

भारत पर मुसलमानों की विजय, पददलितों और गरीबों के लिए मुक्ति बनकर आई। यही कारण है कि आज हमारे देश की एक बटा पांच आबादी मुसलमानों की है। यह केवल तलवार के बल पर नहीं हुआ। यह सोचना पागलपन की सीमा होगी कि यह केवल तलवारों और बंदूकों ने किया है। अगर आप सावधान नहीं रहेंगे तो आपके मद्रास के एक बटा पांच…आधे…व्यक्ति ईसाई बन जाएंगे। मलाबार में जो कुछ मैंने देखा, क्या उससे भी बेवकूफाना कुछ हो सकता है। वहां सबसे नीची जाति के व्यक्ति को उस सड़क से नहीं गुजरने दिया जाता जिससे ऊँची जातियों के लोग गुजरते हैं। परंतु अगर वह अपना नाम बदलकर कुछ अजीब-सा अंग्रेजी नाम रख लेता है तो उसे कोई समस्या नहीं होती। अगर वह मुस्लिम नाम रख लेता है, तो उसे कोई नहीं रोकता। इससे आप इसके सिवाय क्या निष्कर्ष निकालेंगे कि सारे मलाबारी पागल हैं और उनके घर पागलखाने हैं और उनका भारत की हर नस्ल द्वारा तब तक मखौल बनाया जाना चाहिए जब तक कि वे अपने तौर-तरीके बदल न लें। उन्हें शर्म आनी चाहिए कि वे अपने इलाके में इस तरह के शैतानी और दुष्ट रिवाजों को चलने दे रहे हैं। उनके बच्चे भूख से मर जाते हैं परंतु ज्योंही वे कोई दूसरा धर्म अपना लेते हैं उन्हें भरपेट भोजन मिलने लगता है। जातियों के बीच लड़ाई अब बंद होनी चाहिए” (कम्पलीट वर्क्स ऑफ़ स्वामी विवेकानंद, खंड 3, लेक्चर्स फ्राम कोलंबो टू अल्मोड़ा 1897 में द फ्यूचर ऑफ़ इंडिया में उद्धत)।

मैंने धर्मपरिवर्तन के विभिन्न कारणों की विस्तृत चर्चा सन् 2007 में आंध्रप्रदेश सरकार को प्रस्तुत अपनी रपट ‘आंध्रप्रदेश के मुस्लिम समुदाय में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान’ में की है। यह रिपोर्ट अद्यतन किए जाने के पश्चात प्रकाशनाधीन है। इस रपट में इतिहास लेखन, जनसांख्यिकीय व समाजशास्त्रीय अध्ययनों व स्वामी विवेकानंद की इस गहन टिप्पणी के आधार पर मैंने यह दिखाया है कि भारत में इस्लाम और ईसाई धर्म, और उसके पहले बौद्ध और जैन धर्मों में, धर्मपरिवर्तन, मुख्यतः निम्न जातियों की सामाजिक और मानवीय गरिमा हासिल करने की आकांक्षा का परिणाम था। मैंने भारत के विभिन्न भागों से संबंधित बहुविषयक अध्ययनों और प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि भारत के अधिकांश मुसलमान और ईसाई उन जातियों से धर्मपरिवर्तित हैं, जिन्हें अब एससी व ओबीसी कहा जाता है। उत्तर भारत में ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वालों में से अधिकांश शिल्पकार, परंपरागत पेशों से अपनी आजीविका कमाने वाली और सेवाएं उपलब्ध करवाने वाली जातियों से थे जबकि दक्षिण भारत में इनमें से अधिकांश एससी थे।

इस तरह, भारत में धर्मपरिवर्तन का संबंध धर्म से कम और समाज से अधिक रहा है। जिन जातियों को अपमानित किया जाता था, उन्होंने मौका पाकर धर्मपरिवर्तन का सामाजिक और मानवीय गरिमा हासिल करने के हथियार के रूप में प्रयोग किया। परंतु इसके बाद भी वे उन सामाजिक-आर्थिक कारकों के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए, जो जाति प्रथा के अंतर्गत किसी व्यक्ति के दर्जे का निर्धारण करते हैं। हाल में कैथोलिक बिशप्स कान्फ्रेंस ऑफ़ इंडिया ने 44 पृष्ठ के एक दस्तावेज का प्रकाशन किया है, जिसका शीर्षक है “पाॅलिसी ऑफ़ दलित एम्पावरमेंट इन द कैथोलिक चर्च इन इंडिया”। इस दस्तावेज में अंततः उस सच को स्वीकार किया गया है, जिसे दलित ईसाई व मेरे जैसे व्यक्ति बहुत पहले से जानते थे। और वह सच यह है कि ईसाई बनने के बाद भी दलितों के साथ भेदभाव जारी रहता है। इस दस्तावेज में एक वर्ष के भीतर इस ‘गंभीर सामाजिक पाप’ का अंत करने के लिए कार्ययोजना का वर्णन भी किया गया है। क्या ही अच्छा हो कि हिन्दू धर्म के नेता – यद्यपि वे ईसाई / कैथोलिक चर्च की तरह सुसंगठित नहीं हैं – एक साथ मिलकर सर्वसम्मति से और बिना किसी लाग-लपेट के यह स्वीकार करें कि दलितों के साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा है और हो रहा है, यह घोषणा करें कि यह एक सामाजिक पाप है और निश्चित समय सीमा के अंदर इसे समाप्त करने की योजना प्रस्तुत करे। यही काम सामाजिक नेताओं को भी करना चाहिए। मैंने अपनी रपट में बताया है कि भारत में मुस्लिम समुदाय में भी जातिगत भेदभाव होता है विशेषकर अरजाल मुसलमानों के साथ। अरजाल श्रेणी में वे मुस्लिम जातियां हैं, जिनके सदस्य पारंपरिक रूप से सफाईकर्मी का काम करते रहे हैं। यद्यपि धर्मपरिवर्तन से दलित, अछूत प्रथा और जाति-आधारित भेदभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सके हैं परंतु नए धर्मों को अपनाने से उन्हें कुछ राहत अवश्य मिली है। उदाहरण के लिए 19वीं सदी में ही ईसाई मिशनरियों ने दलितों के लिए स्कूल खोल दिए थे। ऐसी कई जातियां, जो अछूत प्रथा का शिकार थीं, मुस्लिम समाज में इस हद तक घुलमिल गई हैं कि उनकी अछूत के रूप में पहचान समाप्त हो गई है। जिन जातियों को अब भी अछूत समझा जाता है, वे मुसलमानों की कुल आबादी का एक प्रतिशत हैं। इसके विपरीत, एससी, भारत की कुल आबादी का 16.6 प्रतिशत हैं।

विस्तार में जाए बिना मैं यह कहना चाहूंगा कि वर्तमान में विभिन्न धर्मों के ‘नेता’ अपने-अपने धर्मों के अनुयायियों की संख्या में हो रही कमी के प्रति संवेदनशील हैं और इसे किसी भी तरह रोकना चाहते हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने शुद्धि आंदोलन की शुरूआत की थी। वे चाहते थे कि सभी हिन्दू अपनी जातिगत पहचान को त्यागकर एक ही उपनाम ‘आर्य’ रख लें। पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में लोगों ने उनके आह्वान पर यह उपनाम रखा। परंतु जब अछूत जातियों के लोग भी यही उपनाम रखने लगे तब तथाकथित ऊँची जातियों ने इस उपनाम को त्याग दिया। आज आर्य उपनाम वाले जो थोड़े से लोग बचे हैं, वे सभी एससी हैं। अगर हिन्दू धर्म के नेता यह चाहते हैं कि देश में हिन्दुओं की संख्या में कमी न आए तो उन्हें एक बहुत साधारण सा काम करना होगा। उन्हें एक सकारात्मक अभियान चलाना होगा, जिसका लक्ष्य अछूत प्रथा, जाति प्रथा व उनसे जनित भेदभाव को समाप्त करना हो। उन्हें हमारे मानसिक डीएनए से यह विचार ही निकाल बाहर करना होगा कि कोई व्यक्ति जन्म से श्रेष्ठ या हीन हो सकता है। यदि ऐसा हो जाता है तो हम एक सदियों पुराने काले धब्बे से मुक्ति पा लेंगे।

जहां तक एससी, ओबीसी और एसटी का सवाल है, उनके सामने विभिन्न धार्मिक व आध्यात्मिक सिद्धांत व

तत्व मीमांसाओं में से किसी एक तो चुनने का विकल्प नहीं है। इस संदर्भ में धर्म की चर्चा मात्र इसलिए होती है क्योंकि विभिन्न सामाजिक वर्ग के लोगों के अपने-अपने धर्म हैं। तथ्य यह है कि धर्म से वर्चस्वशाली सामाजिक वर्गों के व्यवहार और वंचित व कमजोर सामाजिक वर्गों की नियति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जैसा कि मैंने पहले ही बताया है, केरल और आंध्रप्रदेश के आदिवासी इलाकों में वर्चस्वशाली समुदायों ने आदिवासियों के साथ एकदम एक-सा व्यवहार किया जबकि इन दोनों राज्यों के वर्चस्वशाली समुदाय अलग-अलग धर्मों के अनुयायी थे। इसी तरह, हिन्दू एससी व ईसाई एससी पर अलग-अलग धर्मों के होने के बावजूद एक से अत्याचार होते हैं।

मेरे विचार में धर्म एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है और यह आवश्यक है कि हम धर्म-आधारित विवादों को सामाजिक न्याय की राह मे बाधक न बनने दें. धार्मिक विवादों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि एससी-एसटी व ओबीसी और अगड़ी जातियों के बीच समानता स्थापित हो सके। यह कहना पर्याप्त होगा कि संविधान देश के हर नागरिक को किसी भी धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता देता है और भय व प्रलोभन के जरिए धर्मपरिवर्तन को रोकने के लिए कई कानून हैं। संविधान का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए और कानूनों को अपना काम करने देना चाहिए।

वासंती देवी : आपकी स्मृति के कोष में में कई अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं होंगीं. इनके बारे में आज की युवा पीढ़ी और भविष्य की पीढ़ियां कैसे जानें?

पी.एस. कृष्णन : यह सही है कि किसी भी दस्तावेज की लम्बाई के एक सीमा होती है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यद्यपि आपने मुझे बहुत ढील दी और बार-बार मुझसे यह कहा कि मैं शब्द सीमा की चिंता न करूं, परन्तु फिर भी मुझे कई घटनाओं और उनके विस्तार में जाने से बचना पड़ा। मेरे दिमाग में कई ऐसी घटनाओं और प्रसंगों की स्मृति तैर रही हैं। इनमें शामिल हैं अनेक नेताओं, सामाजिक व अन्य संस्थाओं के प्रतिनिधियों, विभिन्न राजनैतिक दलों और आंदोलनों, मेरे सहकर्मियों और विविध क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों के साथ मेरे जुडाव, टकराव और संपर्क-सम्बन्ध से सम्बंधित घटनाएं, जो सामाजिक न्याय और समानता की स्थापना के लिए मेरे प्रयासों के दौरान हुईं। अगर पाठक, इस वर्णन को पढ़ने के बाद ऐसा महसूस करने हैं और मुझे इस आशय का फीडबैक देते हैं कि इसका अधिक विस्तार से विवरण उनके लिए उपयोगी होगा, तो मैं भविष्य में किसी और स्वरुप में, इसे प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। मेरे एजेंडे में अभी एससी, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों, अछूत प्रथा, वंचित वर्गों पर अत्याचार, आरक्षण व न्यायिक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के तरीकों पर तथ्यात्मक व समग्र पुस्तकों का लेखन है।

वासंती देवी : अंत में, आप अपनी जीवन-यात्रा और उन कारकों, जिन ने आपकी मदद की, को संक्षिप्त में किन शब्दों में प्रस्तुत करना चाहेंगें?    

पी.एस. कृष्णन : मेरा आदर्श व विचारधारा का आधार था वह प्रकाश जो मेरे जीवनपथ को आलोकित कर रहा था। और वह था ‘अत्त दीपो भव’ (अपना प्रकाश स्वयं बनो) का बौद्ध सूत्र वाक्य।

परन्तु मैं कई ऐसे कारकों से लाभान्वित हुआ, जो बाह्य थे। मेरे माता-पिता और भाई-बहन उदारवादी सोच के थे। मैंने पूर्व में मेरे जीवन की दिशा के निर्धारण में मेरे पिता पी. एल. सुब्रमण्यम की भूमिका की चर्चा की है। उनके साथ हुई एक चर्चा और डॉ. आंबेडकर के पहले भाषण, जिसे मैंने पढ़ा था, ने मुझे सामाजिक न्याय के पथ पर अग्रसर किया। मैंने यह भी बताया है कि किस प्रकार मेरी माँ अन्नपूर्णा या अन्नाम्मा, मेरे अनुरोध और मेरे द्वारा मनाये जाने पर, विभिन्न समुदायों के मेरे मित्रों को परिवार के भोजनकक्ष में प्रेमपूर्वक खाना खिलने के लिए राजी हुईं। यह मेरे जीवन के शुरूआती दौर की बात है। बाद में, सौभाग्यवश, मुझे पत्नी के रूप में शांता का साथ मिला, जो पिछले 55 सालों से मेरी जीवनसंगिनी हैं। वे मेरे लिए सदा सुख और संबल का स्त्रोत रहीं हैं।  वे स्वयं भी एक उदारवादी परिवार से आतीं हैं और उनकी तीनों बहनों और अधिकांश भाईयों ने अपनी जाति और समुदाय से बाहर विवाह किये। वे मेरे आदर्शों में साझेदार थीं और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उन्होंने स्वयं भी ठोस उपलब्धियां हासिल कीं, विशेषकर कुम्हारों और अन्य पारंपरिक शिल्पकारों के सन्दर्भ में। इन वर्गों के बीच उनका कार्य और उनके बारे में उनका लेखन अपने आप में इस क्षेत्र में उनका योगदान है। सच तो यह है कि ओबीसी की शिल्पकार जातियों के बारे में मेरी गहरी समझ विकसित करने में उनका काफी योगदान रहा।

अपनी अगली पीढ़ियों के सम्बन्ध में भी मैं भाग्यशाली रहा। मेरी बेटी शुभा और पोती तिष्या भी न्याय और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशील हैं। सन 1973 में, जब शुभा करीब छह साल की थी, हैदराबाद में हमारे एक पड़ोसी, जो न्यायिक सेवा में थे और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए, ने उससे पूछा कि क्या वह अमुक जाति की है। एक क्षण की भी देरी किये बिना, शुभा ने जवाब दिया “माकू कुलं लेडू, मेमू मनुश्युलामु” ( हमारे कोई जाति नहीं है. हम मनुष्य हैं)। तिष्या, जो मात्र 14 साल की है, अपनी क्लास में जाति प्रथा और उसकी बुराईयों की जानकार और समानता और पूर्वाग्रहों से मुक्ति की पैरोकर के रूप में जानी जाती है।

मैं इस अर्थ में भी भाग्यशाली था कि मेरे साथी, मित्र, सहकर्मी और सहयोगी, विभिन्न पारिवारिक पृष्ठभूमियों वाले   सामाजिक दृष्टि से उदारवादी व्यक्ति थे और उनमें से कई अपने-अपने क्षेत्रों और अपने-अपने तरीके से सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सक्रिय थे। मेरे बचपन से लेकर, आईएएस में मेरे कार्यकाल और 28 साल पहले मेरे सेवानिवृत्त होने के बाद तक मुझे ऐसे व्यक्तियों का साथ और सहयोग मिला।

क्या कोई इससे अधिक भाग्यशाली हो सकता है? मेरे पास इसके सिवा कोई विकल्प नहीं था कि मैं समाज के लिए जो सबसे बेहतर कर सकता था, वह करूं। जो कुछ मुझे मिला, उसके बाद भी, अगर मैं वह नहीं करना, जो मैंने किया और अगर मैं वो प्रयास नहीं करता, जो मैंने किये – तो यह अक्षम्य होता।

(क्रमश: जारी)

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)


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