अंतर-जातीय विवाह, भूमिहार जाति की व्युत्पत्ति और जाति उन्मूलन

लेखक नयन पाटिल बता रहे हैं कि जिस अंतर-जातीय विवाह को डॉ. आंबेडकर जाति उन्मूलन का हथियार मानते थे, द्विज व पितृसत्तावादी मानसिकता के कारण  वह नयी जातियों के निर्माण में अहम भूमिका निभाता रहा है । एक उदाहरण उत्तर प्रदेश और बिहार में भूमिहार जाति की व्युत्पत्ति है

भारतीय संस्कृति विविधताओं से भरी रही है। यहां विवाह के बारे में अनेक मान्यताओं का प्रचलन दिखाई पड़ता है। सबसे खास बात यह है कि विवाह एक ऐसी संस्था का रूप लेती गई, जो पितृसत्ता को बनाए रखने में सबसे कारगर उपाय साबित हुई। जोतीराव फुले और डॉ. आंबेडकर ने जाति और पितृसत्ता तोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की। ‘जाति का विनाश’ नामक अपनी पुस्तक में डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि जातिवाद का खात्मा अंतर-जातीय विवाहों से हो सकता है। वे इसे जाति उन्मूलन का हथियार मानते थे। लेकिन, एक सच्चाई यह भी है कि द्विज वर्चस्ववाद और पितृसत्ता को कायम रखने की मानसिकता से ग्रस्त लोगों ने अंतर-जातीय विवाहों का दुरूपयोग किया।

अंतर-जातीय शादी के पीछे डॉ. आंबेडकर की सोच यह थी कि बेटी-रोटी का संबंध बनने से जातीय जड़ताएं टूटेंगी। वे यह भी मानते थे कि इसका लाभ तभी होगा जब यह केवल अंतर-जातीय न होकर अंतर-वर्गीय भी हो। जब एक मजबूत और सक्षम परिवार का संबंध दूसरे अपेक्षाकृत कम सक्षम अथवा कमजोर परिवार के साथ बनेगा तब कमजोर परिवार भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकेगा। लेकिन, अभी तक डॉ. आंबेडकर द्वारा परिकल्पित अंतर-जातीय विवाह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा है। यहां तक कि कई दलितों ने अंतर-जातीय विवाह किए हैं। कुछ तो बड़े नाम हैं जैसे – रामदास आठवले, रामविलास पासवान, प्रकाश आंबेडकर। इन तीनों मशहूर लोगों ने अंतर-जातीय शादी की है। लेकिन उनकी शादियों से वंचितों के समाज को जिस तरह का लाभ मिलना चाहिए था, नहीं मिला। 

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अब आते हैं इस सवाल पर कि क्या अंतर-जातीय विवाह से जाति का उन्मूलन हो सकता है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए इतिहास में झांकना होगा। पहली बात तो यह कि अंतर-जातीय विवाहों को लेकर दस्तावेज नहीं मिलते। साहित्य में इसके कुछ उद्धरण मिलते हैं, लेकिन अधिकांश साहित्यिक रचनाओं में नफरत की सड़ांध है। इसे द्विज ग्रंथों, मनुस्मृति से लेकर गीता तक में  देखा जा सकता है। गीता में कृष्ण कहते हैं, “अगर कुल की स्त्री किसी दूसरे कुल के पुरुष के साथ गुप्त सम्भोग करती है तो वह स्त्री दूषित चरित्र की कहलाएगी। ऐसी स्त्रियों को नरक में भी जगह नहीं मिलेंगी” 

वहीं मनुस्मृति जिसके आधार पर भारतीय द्विजों की सामाजिक व्यवस्था टिकी है, में उद्धृत है –

शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विश: स्मृते।

ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्चस्वा चाग्रजन्मन:।। (3/13)

(यानी शूद्र केवल शूद्र महिला के साथ ही शादी कर सकता है। वैश्य को वैश्य व शूद्र दोनों वर्ण की महिला के साथ शादी करने का अधिकारी है। वहीं क्षत्रिय को क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तीनों वर्णों की महिलाओं के साथ शादी का अधिकार है। जबकि ब्राह्मण को चारों वर्णों की महिला से विवाह का अधिकार है।) 

मनु की दृष्टि में उंच-नीच का भेद कितना बड़ा है, इसका एक उदाहरण देखिए। मनुस्मृति में ही वे लिखते हैं –

कन्यां भजन्तीमुत्कृष्टं न किंचदपि दापयेत्।

जघन्ये सेवामानां तुंसयतो वावसयेदगृहे।। (8/365)

(इसके मुताबिक, उत्तम जाति के पुरूष के साथ संभोग करने वाली कन्या किसी प्रकार के दंड की भागी नहीं है। जबकि नीच जाति के पुरूष के साथ संभोग करने वाली कन्या को कठोर दंड दिया जाना चाहिए।)

जाहिर तौर पर जब इस तरह के उद्धरण धार्मिक ग्रंथों में दिए जाएंगे और समाज में उनकी व्यापक स्वीकार्यता होगी, तो क्या अंतर-जातीय विवाह जाति विहीन समाज के अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होगा? 

अतीत का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि अंतर-जातीय विवाहों से जाति के विनाश के सवाल हल नहीं हुए हैं। इसके बदले जाति संकरण अवश्य हुआ है यानी नयी जातियाें की उत्पत्ति हो गयी। यह बिल्कुल ऐसा ही है जैसा कि जीव विज्ञान में संकरण की परिभाषा बतायी गयी है। एक नस्ल की गाय का दूसरे नस्ल के सांढ से निषेचन और फिर एक नये नस्ल की गाय अथवा सांढ का जन्म लेना। 

एससी-एसटी एक्ट के विरोध में प्रदर्शन करते भूमिहार-ब्राह्मण जातियों के युवा (फाइल फोटो)

मानवशास्त्रीय अध्ययन के दौरान भी हमें ऐसे उदाहरण मिलते हैं। जैसे उत्तरप्रदेश और बिहार में एक जाति है भूमिहार। सामाजिक स्तर पर इस जाति को उंची जाति का दर्जा हासिल है। अपवादों को छोड़ दें तो आर्थिक पृष्ठभूमि भी संपन्न वर्ग की है। भाषा शास्त्र की दृष्टि से देखें तो सामान्य भाषा में भूमिहार का मतलब होता है जिसने अपनी जमीन गवां दी हो या हार गया हो, वह भूमिहार कहलाता है। वहीं संस्कृत में हार को स्वामी मालिक कहते हैं और भूमिहार वह है जो जमीन का मालिक हो। इस जाति की व्युत्पत्ति के बारे में कई बातें कही जाती हैं। एक तो यह कि भूमिहार ब्राह्मण पुरुष और क्षत्रिय महिला की संतान हैं। कुछ लोग भूमिहार को ब्राह्मण पुरुष और बौद्ध महिला की संतान मानते हैं। लेकिन अब यह भेद मिट चुका है कि कौन क्षत्रिय महिला की संतान है और कौन बौद्ध महिला की। उंची जाति के लाेगों के लिए इतना ही सुखदायक है कि भूमिहारों में उनका खून मौजूद है। हां वहीं खून जो पितृसत्तावादी समाज का प्रतीक है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि अंतर-जातीय संबंधों से जाति का उन्मूलन तो नहीं हुआ, लेकिन एक नई जाति का निर्माण अवश्य हो गया। सिर्फ भूमिहार ही नहीं, बल्कि अनेक अन्य जातियों का भी निर्माण इसी प्रकार हुआ है। इसके बारे में सटीक जानकारी और आंकड़े तो तभी सामने आएंगे, जब जातिगत जनगणना कराई जाए और उसकी की रिपोर्ट सामने आए। 

बहरहाल, हम अंतर-जातीय विवाह से जाति का उन्मूलन चाहते हैं। लेकिन, द्विज मानसिकता उस अंतर-जातीय विवाह से नयी जाति का निर्माण करना चाहती है ताकि जाति की बेड़ियां टूटने के बजाय और मजबूत बनें। हमें ऐसे में अंतर-जातीय विवाह को लेकर डॉ. आंबेडकर की परिकल्पना को ध्यान में रखना चाहिए, जिसके मूल में जाति विहीन समाज की स्थापना है।

(कॉपी संपादन : नवल/सिद्धार्थ)


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