एलआईसी के दलित संगठन में खलबली, अधिकारी ने अध्यक्ष के खिलाफ लिखा खुला पत्र

मामला भारतीय जीवन बीमा निगम के एससी-एसटी कल्याण संघ से जुड़ा है। गोरखपुर डिविजन के पदाधिकारी डॉ. अलख निरंजन ने संघ के प्रधान महासचिव के..पी. चौधरी के खिलाफ एक खुला पत्र जारी किया है। उनके इस पत्र से संघ के सदस्यों में खलबली मच गयी है

अक्सर ही कहा जाता है कि दलित-बहुजनों से जुड़े लोग जब बड़े पद पर आसीन हो जाते हैं तो वे अपने मातहत काम करने वालों का शोषण, उत्पीड़न और अपमान उसी तरह से करते हैं जैसे अन्य सामंती वर्ग के लोग। ऐसा ही एक मामला भारतीय जीवन बीमा निगम से जुड़े एक दलित संगठन के संदर्भ में सामने आया है। पीड़ित अधिकारी ने संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ खुला पत्र लिखा है। उनके पत्र से संगठन में खलबली मच गयी है। 

मामला भारतीय जीवन बीमा निगम अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति/बुद्धिस्ट कर्मचारी अधिकारी कल्याण संघ से जुड़ा है। नाम के अनुरूप यह संघ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति समुदाय वर्ग के एलआईसी कर्मियों के लिए काम करता है। एक संघ के रूप में इसका विस्तार पूरे देश में है। इसके गोरखपुर मंडल के सचिव डॉ. अलख निरंजन ने अपने खुले पत्र में संघ के प्रधान महासचिव के. पी. चौधरी पर अपमान करने का आरोप लगाया है। यह पत्र उन्होंने संघ से जुड़े सभी सदस्यों को भेजा है और मांग किया है कि के. पी. चौधरी को उनके पद से हटाया जाय। 

अपने खुले पत्र में अलख निरंजन ने विस्तार से उस घटना का जिक्र किया है जिसके कारण वे आहत हुए। उन्होंने बताया है कि वे  गोरखपुर मण्डल (उत्तर मध्य क्षेत्र – कानपुर) में सहायक प्रशासनिक अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं तथा 1999 से कल्याण संघ की मण्डलीय ईकाई गोरखपुर मण्डल का महासचिव हैं। उन्होंने लिखा है कि 31 जुलाई 2019 को  दिल्ली स्थित कल्याण संघ के कार्यालय में राष्ट्रीय अध्यक्ष के. पी. चौधरी ने उनका सार्वजनिक तौर पर अपमान किया। इस संबंध में उन्होंने सुखारी राम का जिक्र किया है जो कि अखिल भारतीय सचिव प्रशासन व क्षेत्रीय उत्तर मध्य क्षेत्र, कानपुर के अध्यक्ष हैं। उनके मुताबिक के पी चौधरी ने उनके सामने ही सुखारी राम से फोन पर बातें करते हुए उन्हें अपमानित किया।

संघ के प्रधान महासचिव (तस्वीर में पहली पंक्ति में दायें से प्रथम) के.पी. चौधरी की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल

खुला पत्र में अलख निरंजन ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी बेटी के दाखिले के लिए दिल्ली में थे। ठहरने के लिए उन्होंने संघ के गेस्ट हाउस में बुकिंग करा रखी थी। लेकिन दाखिले में हो रही देरी की वजह से गेस्ट हाउस की बुकिंग का विस्तार कराना चाहा। इसके लिए उन्होंने के पी चौधरी एवं संघ के संबंधित अधिकारियों को ईमेल भी भेजा।

अलख निरंजन ने लिखा है कि 27 सालों तक संघ का सदस्य रहने के दौरान उन्होंने पहले कभी भी गेस्ट हाउस का उपयोग नहीं किया। यह पहला अवसर रहा जब उन्होंने गेस्ट हाउस की बुकिंग करवायी। साथ ही के पी चौधरी के साथ उनके अच्छे संबंध रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें अपमानित होना पड़ा। इसकी वजह के रूप में उन्होंने लिखा है कि के पी चौधरी उन्हें एक बैठक में ले गए। समय अधिक हो जाने और बेटी को कॉलेज से लाने में देरी होते देख वे बैठक से निकल गए। अलख निरंजन के मुताबिक केवल इसी वजह से के पी चौधरी ने न केवल गेस्ट हाउस की बुकिंग को रोका बल्कि अपमानित भी किया।

उन्होंने लिखा है कि उन्हें गेस्ट हाउस के बुकिंग के विस्तार की आवश्यकता नहीं होती यदि दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा उनकी बेटी के लिए समय पर छात्रावास में आवंटन मिल जाता। पहले 30 जुलाई को हास्टल मिलना संभावित था। इसलिए उनकी योजना थी कि 30 जुलाई को बेटी को हास्टल में शिफ्ट कराकर 31 जुलाई की शाम में गोरखपुर लौट जायेंगे। लेकिन कॉलेज की तरफ 2 अगस्त को छात्रावास मिलने की बात कही गयी। इस कारण उन्हें 3 अगस्त तक गेस्ट हाउस की बुकिंग बढ़ाने का अनुरोध किया था।

पीड़ित अधिकारी डॉ. अलख निरंजन

अलख निरंजन के खुले पत्र के मुताबिक, “जब मैं गेस्ट हाउस की बुकिंग बढ़वाने संबंधी अनुरोध करने के लिए के. पी. चौधरी के कक्ष में गया तब वे श्री सुखारी राम से बड़े ही तल्ख लहजे में बात कर रहे थे। पहले मैंने ध्यान नहीं दिया लेकिन थोड़ी देर बाद लगा कि वे मेरे विषय में बात कर रहे थे। वे कह रहे थे कि पिछले 8 वर्षों से डिवीजन का चुनाव क्यों नहीं हुआ, फिर मेरी तरफ मुखातिब होकर उसी तल्ख लहजे में बोले – बताइये, सेक्रेटरी साहब चुनाव क्यों नहीं हुआ, आपने संगठन को जागीर बनाकर रखा है। आप मीटिंग में एक मिनट रूक नहीं सकते थे? एक तो वैसे ही 20-25 आदमी थे और आप बैठे भी नहीं, तुरन्त चल दिये। मैं हक्का-बक्का रह गया। मैंने दबी जुबान से कहा- सर, मैं आपको बताकर बेटी को हंसराज कालेज लेने चला गया, वहां उसका क्लास समाप्त हो गया था और चुनाव तो अक्टूबर में प्रस्तावित है। फिर सुखारी राम से मुखाबित हुए, कहा कि बताइये जो व्यक्ति समाज की मीटिंग में 10 मिनट बैठ नहीं सकता उसका काम मैं क्यों करूं? …मुझे राज्यपाल अपने शपथग्रहण समारोह में बुलाते हैं तो मेरी काबलियत के कारण ही। मुझे नहीं लगता यह (मुझे) कोई मिशन का काम करता होगा, मैं इसके लिए गेस्ट हाउस क्यों बुक कराऊं। मैं अभी गोरखपुर कमेटी भंग करता हूं। इसके अलावा भी  बहुत कुछ कहें। सुखारी राम फोन पर थे उधर से कह रहे थे कि आपकी आपत्ति उचित है। बाद में बात करेंगे गेस्ट हाउस बुक करा दीजिए। चौधरी साहब ने सुखारी राम से कहा कि आपके कहने पर गेस्ट हाउस बुक करने को कह रहा हूं। इसके कहने पर नहीं।”


दूरभाष पर फारवर्ड प्रेस से बातचीत में उन्होंने बताया कि “यह घटना 31 जुलाई को मेरे साथ घटी, इसके पूर्व और कई पदाधिकारियों तथा सदस्यों के साथ घट चुकी है। कहीं भी, कभी भी किसी भी व्यक्ति को अपमानित करना चौधरी जी की आदत बन गयी है। यह प्रवृत्ति पूर्णतः अलोकतांत्रिक है। इससे हमारे सदस्यों का बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। मेरे द्वारा संघ के सभी सदस्यों को खुला पत्र भेजे जाने पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि के. पी. चाैधरी जी का व्यवहार संघ के हित में नहीं रहा है। इनमें आर. के. कोली, पूर्व महासचिव इलाहाबाद मंडल, ओंकार राम महासचिव इलाहाबाद मंडल, आर के राव महासचिव बरेली मंडल शामिल हैं।”

वहीं फारवर्ड प्रेस ने जब संघ के अध्यक्ष के पी चौधरी से दूरभाष पर घटना के संबंध में उनकी प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया तब दूसरी ओर (के पी चौधरी द्वारा) से बताया गया कि वे किसी अलख निरंजन को नहीं जानते हैँ और गेस्ट हाउस की बुकिंग का उनसे कोई लेना-देना नहीं है।

बहरहाल, बेशक यह मामला महज गेस्ट हाउस की बुकिंग से जुड़ा हो, लेकिन खुला पत्र में जिस तरह का आरोप अलख निरंजन ने लगाया है, उससे संघ के प्रधान महासचिव के. पी. चौधरी की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़ा होता है।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ)


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