पिछली सीटों पर हिस्सेदारी : बिहार के मीडिया की जातीय संरचना

राष्ट्रीय मीडिया में “फैसला लेने वाले” पदों पर उच्च जाति हिंदू पुरुषों का हिस्सा 71 फीसदी था। पिछड़े 4 फीसदी थे। उच्च जाति हिंदू महिलाओं की मौजूदगी 17 प्रतिशत थी। दलित और आदिवासियों की संख्या शून्य थी

लगभग पाँच साल पहले, आरक्षण विरोधी अभियान के प्रति मीडिया के घोर पक्षपातपूर्ण रवैये को देखते हुए दिल्ली के मीडिया स्टडीज ग्रूप को हिंदी एवं अँग्रेजी भाषा के राष्ट्रीय मीडिया के प्रमुख पदों पर कार्यरत लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि का सर्वेक्षण करने के लिए प्रेरित किया। दिल्ली स्थित 37 मीडिया संस्थानों में किए गए उस सर्वेक्षण में हर एक संस्थान के कम-से-कम 10 सर्वोच्च पदों पर काबिज़ पत्रकारों की सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल की गई थी। राष्ट्रीय मीडिया में “फैसला लेने वाले” पदों पर उच्च जाति हिंदू पुरुषों का हिस्सा 71 फीसदी था। पिछड़े 4 फीसदी थे। उच्च जाति हिंदू महिलाओं की मौजूदगी 17 प्रतिशत थी। दलित और आदिवासियों की संख्या शून्य थी।

जब राष्ट्रीय राजधानी में मीडिया की तस्वीरें इतनी निराशाजनक है तो “पिछड़े” राज्यों से क्या उम्मीद की जा सकती है। साल 2009 में हमने बिहार के मीडिया संस्थानों के सर्वेक्षण के लिए शुरू में भी यही तकनीक अपनानी चाही, जिसके किंकर्तव्यविमूढ़ कर देने वाले परिणाम सामने आए।

राष्ट्रीय मीडिया के सर्वेक्षण में जिन 37 संस्थानों को शामिल किया गया था, उनमें से अधिकांश का मुख्यालय दिल्ली में ही होने के कारण “बड़े” पदों की संख्या पर्याप्त थी। इसलिए सर्वोच्च 10 पदों को चुनना संभव था। पटना के मीडिया संस्थानों में हमने पाँच पदों — (1) संपादक, (2) समाचार संपादक, (3) ब्यूरो चीफ, (4) मुख्य/विशेष संवाददाता और (5) प्रोविंस डेस्क इंचार्ज — को “फैसला लेने वाले” के रूप में चिह्नित किया।

पटना के अनेक मीडिया संस्थानों में उपरोक्त सभी पाँच पद भी नहीं हैं। कई अखबारों, समाचार एजेंसियों और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में कार्यरत पत्रकारों की संख्या बहुत कम है तथा यहां कार्यरत कई राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के ब्यूरो कार्यालयों में तो अकेले (ब्यूरो) “चीफ” का ही पद है। ऐसी स्थिति में इन पदों के समकक्ष कार्य कर रहे लोगों को भी “फैसला लेने वाला” माना गया। ऐसे पत्रकारों की संख्या किसी संस्थान में पाँच, कहीं तीन, कहीं दो, तो कहीं अकेले “ब्यूरो चीफ” ही “फैसला” लेते हैं। इसके तहत 42 मीडिया संस्थानों के राज्यस्तरीय सर्वोच्च पदों पर कार्यरत 78 पत्रकारों की पृष्ठभूमि जाँची गई, इनमें हिंदी – अँग्रेजी प्रिंट (उर्दू नहीं), इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थान, समाचार एजेंसियां व पत्रिकाएं शामिल थीं।

इस सर्वेक्षण में उन्हीं पत्रकारों को शामिल किया गया जो “खबरों” से जुड़े हैं। फीचर आदि प्रभागों को इसमें शामिल नहीं किया गया। अधिक पत्रकारों वाले अखबारों — हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर और राष्ट्रीय सहारा से अवरोही (ऊपर से नीचे) क्रम में 20-20 पत्रकारों को लिया गया। जबकि अन्य छोटे अखबारों के लगभग सभी पत्रकारों (यह संख्या प्रति अखबार 4 से लेकर 13 तक रही) को शामिल किया गया। यह फॉर्मूला इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर भी लागू किया गया। दिल्ली समेत अन्य महानगरों से संचालित होने वाले राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के पटना प्रमुखों को भी इसमें रखा गया है। ऐसे दैनिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, न्यूज चैनलों और समाचार एजेंसियों के प्राय: दो या एक ही पत्रकार पटना में पदस्थापित हैं। इन सभी को इसमें शामिल किया गया है।

शुरूआत के शुरू में

सर्वे का विचार वस्तुत: अगस्त 2008 में कोसी नदी में आई प्रलयकारी बाढ़ के बाद आया था। बाढ़ में हजारों लोग मारे गए थे। जिस इलाके में बाढ़ आई थी, वह यादव और दलित बहुल था। जबकि राज्य में एक ऐसी सरकार थी जो यादव राज खत्म कर चुकने की दुदुंभी बजाती फिर रही थी। इस नई सरकार के एक घटक (जद-यू) का मुख्य वोट बैंक भूमिहार, कुरमी-कोईरी और अत्यंत पिछड़ी जातियां हैं। जबकि दूसरे घटक (भाजपा) का वोट बैंक वैश्यों तथा अन्य सवर्ण जातियां है। सामंती संस्कार वाली यह सरकार बाढ़ की तबाही के लगभग दो महीने तक पीड़ितों को राहत पहुँचाने में बेहद क्रूर कोताही बरतती रही। इस मामले पर पक्ष और विपक्ष दोनों की राजनीति अत्यंत निचले किस्म की जाति-आधारित थी, इसके बावजूद बिहार की पत्रकारिता न सिर्फ इस घटिया राजनीति पर मौन थी, बल्कि उसमें बाढ़ की विभीषिका को कम-से-कम कर दिखाने और राज्य सरकार के राहत कार्यों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने की होड़ लगी थी। पत्रकारिता के इस जघन्य दुष्कर्म ने आरंभ में हमें पटना में कार्यरत पत्रकारों की भौगोलिक पृष्ठभूमि के सर्वेक्षण के लिए प्रेरित किया। हमारे सामने एक ख्याल था कि क्या राजधानी पटना में कार्यरत पत्रकारों में बहुत कम संख्या कोसी की बाढग़्रस्त जिलों के वासियों की है? क्या इसलिए वे अपनी पेशागत ज़रूरतों के विपरीत बाढ़ पीड़ितों के प्रति इतने कम संवेदनशील हैं? काम शुरू हुआ। हम इसे बेहद आसान समझ रहे थे। हमारी सोच थी कि हम दो-तीन सहकर्मी मिलकर आसानी से निपटा लेंगे। लेकिन जिस भूखंड में आदमी की मुख्य पहचान जाति हो, वहां क्या शिक्षा, और क्या भूगोल, सब द्वितीय किस्म के परिचय है। हम किन्हीं दो पत्रकारों से किसी तीसरे पत्रकार का गृह जिला पूछते तो उनमें कोई सहमति नहीं होती। लेकिन दोनों ही बिना पूछे ही उसकी जाति खुद ही बता डालते और उसमें दोनों एकमत होते हैं।

इस सर्वेक्षण में बकायदा सभी मीडिया संस्थानों के “राज्य स्तर पर फैसला लेने वाले” पत्रकारों की सूची तैयार की गई, उनके नाम, गृह जिला, शिक्षा, धर्म और जाति के कॉलमों को विभिन्न स्रोतों से जानकारी लेकर भरने का काम शुरू किया गया। इसमें हिंदी और अँग्रेजी के 42 संस्थानों के पत्रकारों के धर्म, जाति, लिंग की जानकारी हम जमा कर पाए।

उपस्थिति की तलाश

प्रारंभिक सर्वेक्षण में हमने पाया कि “फैसला लेने वाले पदों” पर वंचित तबके के लोग नहीं है। हमें शक था कि भले ही वे कक्षा में दलपति न बन सके हों, लेकिन उनको पिछले बैंचों पर तो देखा ही जा सकता है, जून 2009 में हमने इस सर्वेक्षण का दायरा बढ़ाने का फ़ैसला किया। इस बार हिंदी और अँग्रेजी के 42 संस्थानों के अलावा पटना से प्रकाशित उर्दू के पाँच अखबारों को भी इसमें शामिल किया गया। कुल 47 मीडिया के संस्थानों के 230 पत्रकारों को सर्वेक्षण में समेटते हुए हमने पाया कि 73 फीसदी पदों पर ऊँची जाति के हिंदुओं (ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत, कायस्थ) का कब्जा है। अन्य पिछड़ा वर्ग के हिंदू 10 फीसदी, अशराफ़ मुसलमान 12 फीसदी तथा पसमांदा मुसलमान 4 फीसदी है। महिलाओं की उपस्थिति लगभग 4 फीसदी रही। पटना के मीडिया संस्थानों में महज तीन दलित पत्रकार मिले (देखें तालिका)।

समेकित आँकड़े : हिंदी, अँग्रेजी, उर्दू प्रिंट एवं  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सामुदायिक संरचना (सामान्य पदों पर, फैसला लेने वाले पदों के अलावा)

क्र.जाति/समुदायमीडिया में मौजूदगीबिहार में जनसंख्या
1.उच्च-जातीय हिंदू73 %13 %
 ब्राह्मण30 %4.7 %
 भूमिहार10 %2.9 %
 राजपूत17 %4.2 %
 कायस्थ16 %1.2 %
2.पिछड़ी एवं अत्यंत पिछड़ी जातियां10 %51.5 %
3.दलित1 %14.1 %
4.उच्च-जातीय मुस्लिम12 %3.37 %
 सैयद8 % 
 शेख2 % 
 पठान1 % 
 मलिक1 % 
5.पसमांदा मुस्लिम4 %10.13 %
6.महिलाएं4 % 
 उच्च-जातीय3 % 
 पिछड़ी1 % 
 दलित0 % 
 मुस्लिम (उच्च-जातीय/पसमांदा)0 % 

नोट : उच्चजातीय हिंदुओं और पिछड़ों की जनसंख्या 1931 की जनगणना पर आधारित

हिंदी प्रिंट : 87/13

बिहार की राजधानी में काम कर रहे हिंदी समाचार पत्रों, पत्रिकाओं के पत्रकारों में 87 फीसदी पत्रकार सवर्ण हिंदू परिवारों से है। इनमें 34 फीसदी ब्राह्मण, 23 फीसदी राजपूत, 14 फीसदी भूमिहार, तथा 16 फीसदी कायस्थ हैं। हिंदू पिछड़ी—अति पिछड़ी जाति, अशराफ मुसलमान और दलित समाज से आने वाले पत्रकार महज 13 फीसदी हैं। इनमें बिहार की सबसे बड़ी जाति यादव की उपस्थिति सर्वाधिक, लगभग 3 फीसदी है। ओबीसी से आने वाले अन्य पत्रकार वैश्य, कुशवाहा, कानू, केवट, कहार और चौरसिया जातियों के हैं। इनकी मौजूदगी प्राय: 1-1 फीसदी है। इसके अतिरिक्त अन्य दर्जनों पिछड़ी-अति पिछड़ी जातियों की कोई नुमाइंदगी न हिंदी-अँग्रेजी प्रिंट में दिखती है, न ही इलेक्ट्रॉनिक में। हिंदी प्रिंट में महिला (उच्च जाति हिंदू) की भागीदारी एक फीसदी है।

अँग्रेजी प्रिंट : महिलाओं की मौजूदगी

अँग्रेजी अखबारों की स्थिति काना राजा की जैसी है। यहाँ उच्च जाति हिंदू 75 प्रतिशत पदों पर काबिज़ हैं। इसमें महिलाओं की भागीदारी 7 फीसदी है। इसमें से पिछड़ी जाति की 4 फीसदी महिलाओं की मौजूदगी भी ध्यान खींचती है। हिंदू ओबीसी की उपस्थिति हिंदी प्रिंट (9 फीसदी) की तुलना में अँग्रेजी प्रिंट में दुगुनी से ज्यादा (19 फीसदी) है। अशराफ मुसलमान 4 प्रतिशत हैं। दलितों की उपस्थिति शून्य है।

हिंदी और अँग्रेजी प्रिंट में एक रोचक अंतर भूमिहार और राजपूतों की संख्या का है। हिंदी प्रिंट की तुलना में यहां इन दो जातियों की संख्या आधी से भी कम (राजपूत 11 फीसदी और भूमिहार 6 फीसदी) हो गई है। अंग्रेजी प्रिंट पर ब्राह्मणों (36 प्रतिशत) तथा कायस्थों (21 प्रतिशत) का आधिपत्य दिखता है। अँग्रेजी प्रिंट में तीन हिंदू ओबीसी, एक ईसाई व एक अशराफ मुसलमान (पुरुष) फैसला लेने वाले पद पर भी है। हिंदी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक में इन पदों पर निरपवाद रूप से ऊँची जाति के पुरुष काबिज़ है।

इलेक्ट्रॉनिक : 10 बनाम 90

पिछड़े नेता शहीद जगवेद प्रसाद का नारा था — “दस का शासन नब्बे पर, नहीं चलेगा/सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है।” यह 1971-72 की बात है। लेकिन आज तक अन्य पिछड़ा वर्ग का सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व ज्ञान की सत्ता पर काबिज़ होने के रास्तों को पहचानने में नाकाम रहा है। सांस्कृतिक सत्ता का तो इनके लिए कोई मोल नहीं रहा। 100 में से 90 का दावा करने वाले जगदेव का दूसरा नारा यह भी था — “भैंस पालो, अखाड़ा खोदो, राजनीति करो।” लालू प्रसाद ने तो 15 साल आइटी को समझने से इनकार करते हुए ही गुजार दिए। पिछड़े नेताओं ने कभी शिक्षा की बात की भी तो वह कई कारणों से साक्षरता से आगे नहीं बढ़ सकी।

बहरहाल, हिंदी-अँग्रेजी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सामाजिक परिदृश्य सर्वाधिक एकरस है। इनमें 90 फीसदी पदों पर ऊँची जाति के हिंदुओं का कब्जा है। हिंदू ओबीसी 7 फीसदी हैं। अशराफ मुसलमानों की नुमाइंदगी 3 फीसदी है। महिलाएँ जरूर 10 फीसदी हैं, जो ऊँची जाति के हिंदू परिवारों से आती हैं। दलित यहाँ भी सिरे से नदारद है।

उर्दू प्रिंट : पिछड़ा मुसलमान आंदोलन का प्रभाव

हिंदी और अँग्रेजी प्रिंट मीडिया के विपरीत उर्दू मीडिया की ओर देखना कई मामलों में सुखद है। पटना से उर्दू के पाँच दैनिक छपते हैं — कौमी तंज़ीम, रोजऩामा (राष्ट्रीय सहारा), संगम, पिंदार और फारूकी तंज़ीम। आश्चर्यजनक रूप में इनमें से तीन — संगम, पिंदार और फारूकी तंजीम — का मलिकाना हक पसमांदा (पिछड़े मुसलमान) तबके के पास है। इन तीनों के संपादक भी इसी समुदाय के हैं। हिंदी या अँग्रेजी मीडिया के संबंध में फिलवक्त ऐसी कल्पना भी असंभव है। वस्तुत: बिहार में हिंदुओं का सामाजिक न्याय का राजनीतिक आंदोलन अपने विरोधाभासों में घिर कर मरणासन्न स्थिति में हैं। जबकि पिछड़े मुसलमानों का आंदोलन एक जीवंत आंदोलन है। पिछले कुछ वर्षों से इसका तेज और तेवर देखते बन रहा है।6 फीसदी है। इन तथ्यों के साथ ही यह देखना विचलित करता है कि उर्दू समेत पूरी पत्रकारिता में दलित मुसलमानों और मुसलमान महिलाओं की कोई नुमाइंदगी नहीं है।

एक और प्रतिगामी बात यह है कि पसमांदा नेतृत्व वाले उर्दू अखबार भी मुसमानों के दैनंदिन जीवन पर धर्म की जकड़बंदी को ढीला करने की कोई कोशिश नहीं कर रहे।

अगली बार जब आप बिहार से आने वाली कोई खबर पढ़े या सुनें, चाहे हिंदी में या अँग्रेजी में, तो ध्यान में एक बात रखें कि किसकी आँखों और कानों — और सबसे महत्वपूर्ण बात — किसके दिमाग के द्वारा ये “खबरें” आप तक पहुँच रही हैं।

लेआऊट और कॉपी-संपादन : राजन

(फारवर्ड प्रेस के जून 2011 अंक में प्रकाशित)


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