रमाबाई को डाॅ. आंबेडकर का दिल छू लेने वाला ऐतिहासिक पत्र

रमा, मैं ज्ञान का सागर निकाल रहा हूं। मुझे और किसी का भी ध्यान नही है। परंतु यह ताकत जो मुझे मिली है, उसमें तुम्हारा भी हिस्सा है। तुम मेरा संसार संभाले बैठी हो। आंसुओं का जल छिड़ककर मेरा मनोबल बढ़ा रही हो। इसलिए मैं बेबाक तरीके से ज्ञान के अथाह सागर को ग्रहण कर पा रहा हूं।

रमाबाई आंबेडकर ( 7 फरवरी, 1898 – 27 मई, 1935) पर विशेष

प्रस्तुत पत्र 30 दिसंबर, 1930 को डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लंदन से रमाबाई को लिखा था। इस पत्र को मराठी में प्रो. यशवंत मनोहर ने अपनी पुस्तक ‘रमाई’ में शामिल किया है। फारवर्ड प्रेस के लिए भरत यादव ने इसका मराठी से अनुवाद  किया है। वे मराठी वेब पत्रिका समाज रंग के संपादक, कवि व अनुवादक हैं। चूंकि यह पत्र मराठी में है और भाषिक विभिन्नता के कारण अनुवाद में कुछ त्रुटियां हो सकती हैं। इसलिए हम मराठी में भी पत्र को हू-ब-हू रख रहे हैं। त्रुटियों के बारे में हमारा ध्यान आकृष्ट अवश्य कराएं – editor@forwardpress.in 


रमा, तुम मेरे जीवन में नही आती तो..

  • डॉ. भीमराव आंबेडकर

रमा! कैसी हो रमा तुम?

तुम्हारी और यशवंत की आज मुझे बहुत याद आई। तुम्हारी यादों से मन बहुत ही उदास हो गया है। पिछले कुछ दिनों के मेरे भाषण काफी चर्चा में रहे। कॉन्फ़्रेंस में बहुत ही अच्छे और  प्रभावी भाषण हुए। ऐसा मेरे भाषणों के बारे में यहां के अखबारों ने लिखा है। इससे पहले राउंड टेबल कांफ्रेंस के बारे में अपनी भूमिका के विषय पर मैं सोच रहा था और आंखों के सामने अपने देश के सभी पीड़ित जनों का चित्र उभर आया। पीड़ा के पहाड तले ये लोग हजारों सालों से दबे हुए हैं। इस दबेपन का कोई इलाज नहीं है। ऐसा ही वे समझते हैं। मैं हैरान हो रहा हूं। रमा, पर मैं लड़ रहा हूं।

मेरी बौद्धिक ताकत बहुत ही प्रबल बन गई है। शायद मन में बहुत सारी बातें उमड़ रही हैं। हृदय बहुत ही भाव प्रवण हो गया है। मन बहुत ही विचलित हो गया है और घर की, तुम् सबकी बहुत याद आई। तुम्हारी याद आई। यशवंत की याद आई। मुझे तुम जहाज पर छोडने आयी थी। मैं मना कर रहा था। फिर भी तुम्हारा मन नही माना। तुम मुझे पहूंचाने आई थी। मैं राउंड टेबल कांफ्रेंस के लिए जा रहा था। हर तरफ मेरी जय-जयकार गूंज रही थी और यह सब तुम देख रही थी। तुम्हारा मन भर आया था, कृतार्थता से तुम उमड गयी थी। तुम्हारे मुंह से शब्द नही निकल रहे थे। परंतु, तुम्हारी आंखें, जो शब्दों से बयां नही हो पा रहा था, सब बोल रही थीं। तुम्हारा मौन शब्दों से भी कई ज्यादा मुखर बन गया था। तुम्हारे गले से निकली आवाज तुम्हारे होठों तक आकर टकरा रही थी।

डॉ. भीमराव आंबेडकर व रमाबाई

होठों से निकले शब्दों की भाषा के बजाय आंखों की आंसुओं की भाषा ही तुम्हारी सहायता के लिए दौड़कर आए थे।

और अब यहां लंदन में इस सुबह बातें मन में उठ रही हैं। दिल कोमल हो गया है। जी में घबराहट सी हो रही है। कैसी हो रमा तुम? हमारा यशवंत कैसा है? मुझे याद करता है वह? उसकी संधिवात [जोड़ों] की बीमारी कैसी है? उसको सम्भालो रमा! हमारे चार बच्चे हमें छोड़ कर जा चूके हैं। अब है तो सिर्फ यशवंत ही बचा है। वही तुम्हारे मातृत्व का आधार है। उसे हमें सम्भालना होगा। यशवंत का खयाल रखना रहना रमा। यशवंत को खूब पढाना। उसे रात को पढने उठाती रहना। मेरे बाबा मुझे रात को पढने के लिए उठाया करते थे। तब तक वे जगते रहते थे। मुझे यह अनुशासन उन्होंने ही सिखाया। मैं उठकर पढने बैठ जाऊं, तब वे सोते थे। पहले-पहले मुझे पढ़ाई के लिए रात को उठने पर बहुत ही आलस लगता था। तब पढ़ाई से भी ज्यादा नींद अच्छी लगती थी। आगे चलकर तो जिंदगी भर के लिए नींद से अधिक पढ़ाई ही अहम लगने लगी।

अपने पुत्र यशवंत (बाएं) व भतीजे मुकुंदराव आंबेडकर(दाएं) के साथ डॉ. भीमराव आंबेडकर

इसका सबसे ज्यादा श्रेय मेरे बाबा को जाता है। मेरी पढ़ाई की लौ जलती रहे, इसलिए मेरे बाबा तेल की तरह जलते रहते थे। उन्होंने रात-दिन एक कर दिया। अंधेरे को उजाला बनाया। मेरे बाबा के श्रम के फल अब मिल रहे हैं। बहुत खुशी होती है रमा आज।

रमा, यशवंत को भी ऐसी ही पढ़ाई की लगन लगनी चाहिए। किताबों के लिए उसके मन में उत्कट इच्छा जगानी होगी।

रमा, अमीरी-ऐश्वर्य यह चीजें किसी काम की नहीं। तुम अपने इर्द-गिर्द देखती ही हो। लोग ऐसी ही चीजों के पीछे हमेशा से लगे हुए रहते हैं। उनकी जिन्दगियां जहां से शुरू होती है, वहीं पर ठहर जाती है। इन लोगों की जिंदगी जगह बदल नही पाती। हमारा काम ऐसी जिंदगी जीने से नही चलेगा रमा। हमारे पास सिवाय दुख के कुछ भी नही है। दरिद्रता, गरीबी के सिवाय हमारा कोई साथी नही। मुश्किलें और दिक्कतें हमें छोड़ती नही हैं। अपमान, छलावा, अवहेलना यही चीजें हमारे साथ छांव जैसी बनी हुई हैं।

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सिर्फ अंधेरा ही है। दुख का समंदर ही है। हमारा सूर्योदय हमको ही होना होगा रमा। हमें ही अपना मार्ग बनना है। उस मार्ग पर दीयों की माला भी हमें ही बनानी है। उस रास्ते पर जीत का सफर भी हमें ही तय करनी है। हमारी कोई दुनिया नही है। अपनी दुनिया हमें ही बनानी होगी।

हम ऐसे ही हैं रमा। इसलिए कहता हूं कि यशवंत को खूब पढाना। उसके कपड़ों के बारे में फिक्रमंद रहना। उसको समझाना-बूझाना। यशवंत के मन में ललक पैदा करना। मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है। यशवंत की याद आती है। मैं समझता नहीं हूं। ऐसा नही है रमा, मैं समझता हूं कि तुम इस आग में जल रही हो। पत्ते टूट कर गिर रहे हैं और जान सूखती जाए ऐसी ही तू होने लगी है। पर रमा, मैं  क्या करूं? एक तरफ से पीठ पीछे पड़ी दरिद्रता और दूसरी तरफ मेरी जिद और लिया हुआ दृढ संकल्प। संकल्प ज्ञान का!

मैं ज्ञान का सागर निकाल रहा हूं। मुझे और किसी का भी ध्यान नही है। परंतु यह ताकत जो मुझे मिली है उसमें तुम्हारा भी हिस्सा है। तुम यहां मेरा संसार संभाले बैठी हो। आंसुओं का जल छिड़ककर मेरा मनोबल बढ़ा रही हो।  इसलिए मैं बेबाक तरीके से ज्ञान के अथाह सागर को ग्रहण कर पा रहा हूं।

सच कहूं रमा,मैं निर्दयी नहीं। परंतु, जिद के पंख पसारकर आकाश में उड़ रहा हूं। किसी ने पुकारा तो भी यातनाएं होती हैं। मेरे मन को खरोंच पडती है और मेरा गुस्सा भड़कता है। मेरे पास भी हृदय है रमा! मैं तड़पता हूं। पर, मैं बंध चुका हूं क्रांति से! इसलिए मुझे खुद की भावनाएं चिता पर चढ़ानी पड़ती हैं। उसकी आंच तुम्हारे और यशवंत तक भी कभी-कभी पहुंचती है। यह सच है। पर, इस बार रमा मैं बाएं हाथ से लिख रहा हूं और दाएं हाथ से उमड आए आंसू पोंछ रहा हूं। पतले (यशवंत) को सम्भालना रमा। उसे पीटना मत। मैंने उसे पीटा था। इसकी कभी उसे याद भी नही दिलाना। वही तुम्हारे कलेजे का इकलौता टुकड़ा है।

इंसान के धार्मिक गुलामी का, आर्थिक और सामाजिक ऊंच-नीचता एवं मानसिक गुलामी का पता मुझे ढूंढना है।

इंसान के जीवन में ये बातें अडिग बन कर बैठी हैं। उनको पूरी तरह से जला-दफना देना चाहिए।

समाज की यादों से और संस्कार से भी यह चीजें खत्म कर देने की जरुरत है।

रमा, तुम यह पत्र पढ रही हो और तुम्हांरी आंखों मे आंसू आ गए हैं। गला भर आया है। तुम्हारा दिल थरथरा रहा है। होंठ कांप रहे हैं। मन में उमड़े हुए शब्द होठों तलक चलकर भी नही आ सकते। इतनी तुम व्याकुल हो गयी हो।

रमा, तुम मेरी जिंदगी में न आती तो?

तुम मन-साथी के रुप में न मिली होती तो? तो क्या होता? मात्र संसार सुख को ध्येय समझने वाली स्त्री मुझे छोड़ के चली गई होती। आधे पेट रहना, उपला (गोइठा) चूनने जाना या गोबर ढूंढ कर उसका उपला थांपना या उपला (गोइंठा) थांपने के काम पर जाना किसे पसंद होगा? चूल्हे के लिए ईंधन जुटाकर लाना, मुम्बई में कौन पसंद करेगा? घर के चिथडे़ हुए कपडों को सीते रहना। इतना ही नहीं, एक माचिस में पूरा माह निकालना है। इतने ही तेल में और अनाज, नमक से महीने भर का काम चलाना चाहिए। मेरा ऐसा कहना। गरीबी के ये आदेश तुम्हें मीठे नहीं लगते तो? 

तो मेरा मन टुकड़े-टुकड़े हो गया होता। मेरी जिद में दरारें पड़ गई होतीं। मुझे ज्वार आ जाता और उसी समय तुरन्त भाटा भी आ जाता। मेरे सपनों का खेल पूरी तरह से तहस-नहस हो जाता। 

रमा, मेरे जीवन के सब सुर ही बेसुरे बन जाते। सब कुछ तोड़-मरोड़ के रह जाता। सब दुखमय हो जाता। मैं शायद बौना पौधा ही बना रहता।

सम्भालना खुद को, जैसे सम्भालती हो मुझे। जल्द ही आने के लिए निकलूंगा। फिक्र नहीं करना।

सब को कुशल कहना।

तुम्हारा,

भीमराव
लंदन
30 दिसंबर, 1930

मराठी पुस्तक ‘रमाई’ (लेखक – प्रो. यशवंत मनोहर) से साभार

*****

मराठी में मूल पत्र

रमा, तू माझ्या आयुष्यात आली नसतीस तर…

रमा !

कशी आहेस रमा तू? तुझी, यशवंताची आज मला खूप आठवण आली. तुमच्या आठवणीनं मन खूपच हळवं

झालं आहे आज. मागल्या काही दिवसातली माझी भाषणे फारच गाजली. परिषदेतील सर्वोत्कृष्ट भाषणे, प्रभावी वक्तृत्वाचा सर्वोत्कृष्ट नमुना असे माझ्या भाषणांबद्दल इकडच्या वर्तमानपत्रांमधून लिहून आले आहे. या पहिल्या गोलमेज परिषदेतील माझ्या भूमिकेचा विचार मी करीत होतो. आणि डोळयापुढे आपल्या देशातील सर्व पीडितांचे संसार माझ्या डोळयासमोर उभे राहिले.

दुःखांच्या डोंगराखाली ही माणसे हजारो वर्षे गाडली गेली आहेत. या गाडलेपणाला पर्याय नाही हीच त्यांची समजूत आहे. मी हैराण होतो आहे रमा ! पण मी झुंज देतो आहे. माझी बौध्दिक शक्ती परमवीर झाली होती जणू ! खूप भावना मनात दाटून आल्या आहेत. खूपच हळवे झाले आहे मन. खूपच व्याकूळ झाले आहे मन! आणि घरातल्या तुम्हा सर्वांची आठवण आली. तुझी आठवण आली. यशवंताची आठवण आली.

मला तू बोटीवर पोचवायला आली होतीस. मी नको म्हणत होतो तरी तुझे मन तुला धरवले नाही. तू मला पोचवायला आली होतीस. मी गोलमेज परिषदेला जात होतो. माझा सर्वत्र जयजयकार सुरु होता. तू पाहत होतीस. तुझं मन गदगदून आलं होतं. कृतार्थतेनं तू ओथंबून आली होतीस. तू शब्दांनी बोलत नव्हतीस; पण तुझे डोळे जे शब्दांना सांगता येत नसते तेही सांगत होते. तुझं मौन शब्दाहून अधिक बोलकं झालं होतं. तुझ्या गळयातील आवंढा तुझ्या ओठापर्यंत येऊन थडकत होता. ओठातील शब्दांच्या भाषेपेक्षा डोळयातील आसवांचीच भाषा त्यावेळी तुझ्या मदतीला धावली होती.

आणि आता इथे लंडनमध्ये या साऱ्याच गोष्टी मनात उभ्या राहिल्या आहेत. मन नाजूक झाले आहे. जीवात कालवाकालव होत आहे. कशी आहेस रमा तू ! आपला यशवंत कसा आहे? माझी आठवण काढतो तो? त्याचे संधीवाताचे दुखणे कसे आहे? त्याला जप रमा ! आपली चार मुलं आपल्याला सोडून गेलीत. आता आहे फक्त यशवंत. तोच तुझ्या मातृत्त्वाचा आधार आहे आता. त्याला आपण जपलं पाहिजे. यशवंताची काळजी घे रमा ! यशवंताला खूप अभ्यास करायला लाव. त्याला रात्री अभ्यासाला उठवीत जा. माझे बाबा मला अभ्यासासाठी रात्री उठवीत. तोवर ते जागे राहत. मला ती शिस्तच त्यांनी लावली. मी उठलो, अभ्यास सुरु केला की ते झोपत असत. अगदी प्रारंभी मला रात्री अभ्यासाला उठण्याचा कंटाळा येई. त्यावेळी अभ्यासापेक्षा झोप महत्त्वाची वाटे. पुढे तर आयुष्यभरासाठी झोपेपेक्षा अभ्यासच मोलाचा वाटत राहिला. याचं सर्वात जास्त श्रेय माझ्या बाबांना आहे. माझ्या अभ्यासाची वात तेवत राहावी म्हणून माझे बाबा तेलासारखे जळत राहत. त्यांनी रात्रीचा दिवस केला. अंधाराचा उजेड केला. माझ्या बाबांच्या कष्टांना आता फळे आली. फार फार आनंद वाटतो रमा आज. रमा यशवंताच्या मनाला असाच अभ्यासाचा छंद लागला पाहिजे. ग्रंथाचा त्याने ध्यास घेतला पाहिजे.

रमा, वैभव, श्रीमंती या गोष्टी निरर्थक आहेत. तू अवतीभोवती पाहते आहेसच. माणसं अशाच गोष्टींच्या सारखी मागे लागलेली असतात. त्यांची जीवनं जिथून सुरु होतात तिथच थांबलेली असतात. या लोकांची आयुष्ये जागा बदलीत नाहीत. आपल्याला असं जगून चालायचं नाही रमा. आपल्याजवळ दुःखांशिवाय दुसरं काहीच नाही. दारिद्रय, गरिबी यांच्याशिवाय आपल्याला सोबत नाही. अडचणी आणि संकटे आपल्याला सोडीत नाहीत. अपमान, छळ, अवहेलना या गोष्टी आपल्याला सावलीसारख्या जखडलेल्या आहेत.

मागे अंधारच आहे. दुःखाचे समुद्रच आहेत. आपला सूर्योदय आपणच झाले पाहिजे रमा. आपणच आपला मार्ग झाले पाहिजे. त्या मार्गावर दिव्यांची ओळ आपणच झाले पाहिजे. त्या मार्गावर जिद्दीचा प्रवास आपणच झाले पाहिजे.

आपणाला दुनिया नाही. आपली दुनिया आपणच निर्माण केली पाहिजे. आपण असे आहोत रमा. म्हणून म्हणतो यशवंताला खूप अभ्यास करायला लाव. त्याच्या कपडयांची काळजी घे. त्याची समजूत घाल. त्याच्यात जिद्द जागव. मला तुझी सारखी आठवण येते. यशवंताची आठवण येते.

मला कळत नाही असं नाही रमा, मला कळतं की तू दुःखांच्या या वणव्यात स्वतः करपून जात आहेस. पाने गळत जावीत आणि जीव सुकत जावा त्याप्रमाणे तू होते आहेस. पण रमा मी तरी काय करु ! एका बाजूने हात धुवून पाठीशी लागलेले दारिद्रय. दुसऱ्या बाजूने माझ्या जिद्दीने घेतलेला वसा. वसा ज्ञानाचा !

मी ज्ञानाचा सागर उपसतो आहे. मला इतर कशाचे यावेळी भान नाही; पण ही शक्ती मला मिळवण्यात तुझाही वाटा आहे. तू इथे माझा संसार शिवत बसली आहेस. आसवांचे पाणी घालून माझे मनोबल वाढवीत आहेस. म्हणून मी बेभान मनानं ज्ञानाच्या तळगर्भाचा वेध घेतो आहे.

खरं सांगू रमा, मी निर्दय नाही. पण जिद्दीचे पंख पसरून आकाशात उडणाऱ्या मला कोणी सादही घातली, तरी यातना होतात. माझ्या मनाला खरचटतं आणि माझ्या रागाचा भडका उडतो. मलाही हृदय आहे रमा ! मी कळवळतो. पण मी बांधलो गेलो आहे क्रांतीशी ! म्हणून मला माझ्या स्वतःच्या भावना चितेवर चढवाव्या लागतात. त्याच्या तुला, यशवंतालाही कधी झळा पोचतात. हे खरं आहे; पण यावेळी रमा मी हे उजव्या हाताने लिहितो आहे आणि डाव्या हाताने अनावर झालेली आसवे पुसतो आहे. सुडक्याला सांभाळ रमा. त्याला मारु नको. मी त्याला असे मारले होते. त्याची आठवणही कधी त्याला करुन देऊ नको. तोच आता तुझ्या काळजाचा एकुलता एक घड आहे.

माणसांच्या धार्मिक गुलामगिरीचा, आर्थिक आणि सामाजिक उच्चनीचतेचा आणि मानसिक गुलामगिरीचा पत्ता मला शोधायचा आहे. माणसाच्या जीवनात या गोष्टी ठाण मांडून बसलेल्या आहेत. त्यांना पार जाळून-पुरुन टाकता आला पाहिजे. समाजाच्या स्मरणातून आणि संस्कारातूनही या गोष्टी नाहीशा झाल्या पाहिजेत.

रमा ! तू हे वाचते आहेस आणि तुझ्या डोळयात आसवं आली आहेत. कंठ दाटला आहे. तुझं काळीज थरथरायला लागलं आहे. ओठ कापू लागले आहेत. मनात उभे राहिलेले शब्द ओठापर्यंत चालतही येऊ शकत नाहीत. इतकी तू व्याकूळ झाली आहेस.

रमा, तू माझ्या आयुष्यात आली नसतीस तर? तू मनःसाथी म्हणून मिळाली नसतीस तर? तर काय झालं असतं? केवळ संसारसुखाला ध्येय समजणारी स्त्री मला सोडून गेली असती. अर्धपोटी राहणे, गोवऱ्या वेचायला जाणे वा शेण वेचून त्याच्या गोवऱ्या थापणे किंवा गोवऱ्या थापायच्या कामावर जाणे कोणाला आवडेल? स्वयंपाकासाठी इंधन गोळा करायला जाणे, मुंबईत कोण पसंत करील. घराला ठिगळे लावणे, वस्त्रांना शिवत राहणे, एवढयाच काडयाच्या पेटीत महिना निभला पाहिजे, एवढेच ध्यान्य, एवढेच तेलमीठ पुरले पाहिजे हे माझ्या मुखातून बाहेर पडलेले गरिबीचे आदेश तुला गोड वाटले नसते तर? तर माझे मन फाटून गेले असते. माझ्या जिद्दीला तडे गेले असते. मला भरती येत गेली असती आणि तिला त्या त्या वेळी लगेच ओहोटीही लागली असती. माझ्या स्वप्नांचा खेळच पार विस्कटून गेला असता रमा ! माझ्या जीवनाचा सगळा सूरच बेसूर झाला असता, सगळीच मोडतोड झाली असती. सगळाच मनःस्ताप झाला असता. मी कदाचित खुरटी वनस्पतीच झालो असतो. जप स्वतःला जशी जपतेस मला. लवकरच यायला निघेन काळजी करु नकोस.

सर्वांस कुशल सांग.

कळावे,

तुझा

भीमराव
लंडन
३० डिसेंबर १९३०

(मराठी से हिंदी में अनुवाद : भरत यादव संपादन : सिद्धार्थ/नवल/श्रवण देवरे)

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  1. Anyway warde Reply
  2. Kapil Dev Arya Reply
  3. rakesh Kumar Meshram Reply
  4. VISHWANATH KHANDU GHODESWAR Reply
  5. Manoj Sahare Reply

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