अन्नाभाऊ साठे की कालजयी कृति : मेरी रूस यात्रा

मराठी दलित साहित्यकार अन्नाभाऊ साठे के जन्मशती वर्ष के मौके पर पढ़ें उनकी कालजयी कृति ‘माझा रशियाचा प्रवास’ का ओमप्रकाश कश्यप द्वारा हिंदी अनुवाद। रूस अन्नाभाऊ के सपनों में बसता था। रूसी क्रांति पर आधारित उनकी रचना ‘स्तालिनग्राडचा पोबाड़ा’ उनकी रूस यात्रा से पहले ही वहां लोकप्रिय हो चुकी थी। बावजूद इसके अन्नाभाऊ की रूस यात्रा आसान नहीं थी

अन्नाभाऊ साठे (1 अगस्त, 1920 – 18 जुलाई, 1969) जन्मशती वर्ष पर विशेष

[अन्नाभाऊ साठे मराठी के शीर्षतम साहित्यकारों में से हैं। उनकी कृति ‘मेरी रूस यात्रा’ को दलित साहित्य का पहला यात्रा-वृतांत कहा जाता है। उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर, आठ अध्यायों में फैले इस यात्रा-वृतांत के प्रथम अध्याय “मुंबई से मास्को” का हिंदी अनुवाद यहां प्रस्तुत है। अनुवादक के मुताबिक, रूस अन्नाभाऊ के सपनों में बसता था। रूसी क्रांति को लेकर उन्होंने ‘स्तालिनग्राडचा पोबाड़ा’ शीर्षक से एक ‘गाथा’ रची थी। उसके माध्यम से उनकी कीर्ति, उनकी रूस यात्रा से पहले ही वहां पहुंच चुकी थी। बावजूद इसके उनकी रूस यात्रा आसान नहीं थी। उनके लिए वह मनुष्य के किसी बड़े सपने के साकार होने जैसी थी। इस रचना की सहज-सरल भाषा और किस्सागोई शैली पाठक को लगातार अपनी ओर खींचती है। अनुवाद के लिए मूल रचना ‘माझा रशियाचा प्रवास’ के अलावा डॉ. अश्विन रंजनीकर के अंग्रेजी अनुवाद, ‘माई जर्नी टू रशिया’(न्यूवोइस पब्लिकेशन, औरंगाबाद) से भी मदद ली गई है।]

मुंबई से मास्को

  • अन्नाभाई साठे

मेरी अंतःप्रेरणा थी कि मैं अपने जीवन में एक बार सोवियत संघ की यात्रा करूंगा। वह दिन-प्रतिदिन लगातार बढ़ती ही जा रही थी। मेरा मन इस कल्पना से ही अतिप्रसन्न हो जाता था कि रूस में श्रमिकों की हालत कैसी होगी? मार्क्स के महानतम विचारों की अनुकृति, कामरेड लेनिन के नेतृत्व में कैसे साकार हुई होगी? कैसी होगी वह नई दुनिया! नवीन संस्कृति और नई सभ्यता वहां किस तरह से पुष्पित-पल्लवित हो रही होगी? इन कल्पनाओं के साथ मैं बेहद रोमांचित हो जाता था।

1934 में मैंने अनेक जब्तशुदा पुस्तकें पढ़ी थीं। ‘रूस की क्रांति का इतिहास’, ‘कामरेड लेनिन का जीवन-चरित्र’ वगैरह….इन पुस्तकों ने मेरे मन-मस्तिष्क को खूब आड़ोलित किया था। यही कारण है कि मैं रूस के दर्शन को बेहद लालायित था। किसी भी तरह, कम से कम एक बार मुझे रूस जाना चाहिएमेरी यह उत्कट अभिलाषा मुझे निरंतर उद्वेलित कर रही थी। मैंने दो बार पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। किंतु मुंबई के तत्कालीन मुख्यमंत्री अतिरिक्त रूप से सख्त-मिजाज थे। एक दिन उन्होंने मुझे झिड़कते हुए कहा था‘देखो! तुम हमारे लिए शत्रु के समान हो। यह हमारी रहमदिली है कि तुम अभी तक बाहर हो, वरना जेल की हवा खा रहे होते।’ वह 1948 का साल था….मुझे ‘विश्व शांति परिषद’ के लिए निमंत्रण था। अभिनेता मित्र बलराज साहनी ने मेरे लिए पेरिस के टिकट भी खरीद लिए थे। संयोगवश में उसमें शामिल नहीं हो सका था। 

वर्ष 1961 में मेरे उपन्यास ‘फकीरा’ को महाराष्ट्र सरकार का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। उसी दौरान ‘भारत-सोवियत सांस्कृतिक संस्था’ ने मेरी सोवियत यात्रा का कार्यक्रम बनाया। निमंत्रण मिलने के साथ ही मैं उसकी तैयारी में जुट गया। लेकिन उस समय मेरे पास यात्रा के लिए फूटी कौड़ी न थी।

मगर, ‘मैं रूस जा रहा हूं’ यह खबर जैसे ही महाराष्ट्र के लोगों को मिली, मेरे उपर मानो धन की बारिश होने लगी। जैसे कोई चमत्कार हो, एक झटके में यात्रा के आधे खर्च का इंतजाम हो गया। जैसे-तैसे, काफी परेशानियों के बाद, मुझे पासपोर्ट भी मिल गया। अंततः मैं रूस के लिए उड़ान भरने को तैयार था। अनदेखे रूस के बिंब मेरी आंखों के आगे मंडराने लगे।

अपने इष्ट मित्रों व परिजनों के साथ अन्नाभाऊ साठे (साभार : www.annabhausathe.org)

शाहिर द. ना. गव्हाणकर ने मुझे समझाया कि रूस में क्या है? कहां है? वहां क्या देखना चाहिए? बातचीत किस प्रकार करनी होगी? हम दोनों घंटों बतियाते रहे। मैं तो कभी सतारा से मुंबई तक भी अकेले नहीं गया था। अब मास्को जा रहा था। अपने घर, अपने रिश्तेदारों और देश को पीछे छोड़कर। मेरे लिए वह बड़ा ही कठिन था।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान रूस की जनता के महान पराक्रम के सम्मान में, मैंने अपनी अंतःप्रेरणा से स्तालिनग्राद के युद्ध की गाथा रची थी। उससे, लालसेना के सिपाहियों के साथ-साथ मेरी शोहरत भी बर्लिन तक जा पहुंची थी। अब, ‘भारत-सोवियत सांस्कृतिक परिषद’ के सदस्य के रूप में मैं मास्को जा रहा था। पहले चरण में मुझे मुंबई से दिल्ली तक अकेले यात्रा करनी थी। उसके बाद शिष्टमंडल के बाकी साथियों के साथ, जो मुझसे पूरी तरह अपरिचित थे—आगे बढ़ना था।

मेरे अनेक मित्रों और संबंधियों ने मुझे यात्रा की बधाई थी। घर से एयरपोर्ट तक जाते समय मुझपर फूल बरसाए। शुभकामनाएं पेश कीं। विदा करने के लिए मेरे अनेक मित्र एयरपोर्ट पर जमा थे। सभी अत्यंत प्रसन्न थे। लेकिन मैं मास्को-यात्रा की कल्पना में डूबा हुआ था। हवाई यात्रा की कल्पना से ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं। एक-एक कर मेरे सभी मित्र मुझे समझा चुके थे। एक का कहना था—‘देखना, तुम्हारे रूस में कितनी झोपडि़यां हैं! उन्हें देखकर क्या तुम्हें अच्छा लगेगा!’ एक ने चेहरे को गंभीर बनाते हुए कहा था, ‘ध्यान देना और पता लगाना कि स्टील की चादर की मोटाई कितनी है?’ एक और आदमी का कहना था, ‘वहां ईश्वर को निर्वासित कर दिया गया है, अब वह कहां रहता है, किन परिस्थितियों में है—तुम्हें इसका पता लगाना है, भूलना मत।’ 

इसी तरह के अनेकानेक निर्देश, परामर्श और सूचनाएं थीं। उनके अनुसार मुझे रूस जाकर वहां के समाज में जातिभेद, गरीबी, व्यक्ति-स्वातंत्र्य का अध्ययन करना चाहिए। मैं उन्हें सुनकर केवल ‘हूं’ ‘हां’ कर रहा था। उड़ान का समय हो चुका था। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ी हुई थीं। इसलिए में चुप्पी साधे हुए था। केवल हां-हूं कहकर गर्दन हिला देता था।

ढेर सारे निर्देशों, सलाहों, सूचनाओं, आशीर्वादों, फूलों और फूलमालाओं के साथ मैंने 12 तारीख को रात्रि 11 बजे विमान के साथ, दिल्ली के लिए उड़ान भरी। महाराष्ट्र की धरती पर उस समय अंधेरे की मोटी चादर चढ़ी हुई थी। मैं उसकी एक झलक पाने की कोशिश कर रहा था। शंकरभाऊ, शांता, शकु, शाहिर द. ना. गव्हाणकर, गणपत सातपुते, श्री. वैराले, श्रीमती जयवंताबाई जैसे मेरे मित्रों और संबंधियों की छवियां, एक-एक कर मेरी आंखों के आगे तैर रही थीं। विमान में सवार होने से पहले, विदा करने आए इष्ट मित्रों और संबंधियों ने हाथ हिलाकर मुझे शुभकामनाएं दी थीं। मैं महसूस कर रहा था कि अपने घर, देश, मित्रों और संबंधियों को छोड़कर जाना मनुष्य के लिए कितना कष्टकारी होता है।

विमान सुबह पांच बजे, पालम एयरपोर्ट पर उतरा। मैंने राहत की सांस ली।

भोर की पहली किरण के साथ ही मैंने संसद सदस्य एस. ए. डांगे के बंगले में प्रवेश किया। वे उस समय निद्रानिमग्न थे। श्रीमती उषाताई डांगे ने मेरा स्वागत किया और मुस्कराते हुए कहा‘हमारा अन्ना मास्को जा रहा है।’ उस स्नेहिल क्षण मुझे अनायास ही मां की याद आ गई। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक श्रीपद अमृत डांगे (10 अक्टूबर, 1899 – 22 मई, 1991)

उषाताई जल्दी में थीं। उन्होंने मुझे रुपये दिए। वे मेरी यात्रा में मदद करने को भी तैयार थीं। परंतु मैं मुंबई से ही पूरी तैयारी के साथ निकला था। 

ताई ने पूछा, ‘अन्ना कपड़े?’

‘रख लिए हैं?’ मैंने उत्तर दिया। 

‘जूते?’ ताई ने फिर पूछा।

‘हैं।’ मैंने कहा। मेरी ओर से आश्वस्त होने के बाद वे हंसने लगीं। कदाचित वे पूछना चाहती थीं, ‘मेरे लिए क्या लेकर आओगे?’ 

दोपहर बाद, आने-जाने का टिकट और ताशकंद का वीसा पाकर मुझे तसल्ली हुई। जिस समय मैं अपनी अगली यात्रा के लिए कपड़े पहन रहा था, डांगे साहब शांतिपूर्वक मेरे पास आए। मेरा साहबी बाना देखकर वे हंसने लगे। उन्होंने मेरी टाई की गांठ को सही किया। कोट पर स्वयं ब्रुश फिराया और पीठ को थपथपाया। जिन हाथों ने मजदूरों की कई पीढि़यों को संघर्ष की शपथ दिलाई थी, जिन्होंने उनके अधिकारों के लिए अनेक लड़ाइयां लड़ी थीं, उनका स्पर्श पाकर मेरा सीना गर्व से पहाड़ जैसा तन गया। 

मुंबई के आचार्य अत्रे तथा दिल्ली के कामरेड डांगे के आशीर्वाद के साथ ‘चित्तौड़ की रानी’ नामक भारतीय विमान मुझे आसमान की ओर ले चला। मेरे मस्तिष्क में मातृभूमि से दूर होने के दुख तथा सोवियत संघ की यात्रा के आनंद की मिली-जुली धाराएं बहने लगीं। अपनी धरती से आशीर्वाद की कामना के साथ मैं बार-बार उसकी ओर निहार रहा था। मुझे जल्दी ही वापस लौटना होगा, उस क्षण मैं इस सत्य को पूरी तरह भुला चुका था….

विमान निरंतर ऊपर चढ़ता जा रहा था। मैं भली-भांति सुसज्जित और बेहद खूबसूरत विमान ‘चित्तौड़ की रानी’ को देख-देख हैरान हो रहा था। वह हिमालय की बगल से होकर उड़ रहा था। नीचे पहाड़, मामूली पहाडि़यों जैसे लग रहे थे, इमारतें माचिस की डिबिया जैसी और नदियां मामूली धाराओं के समान दिख रही थीं। 

जिस समय मैं पालम एयरपोर्ट पर ‘चित्तौड़ की रानी’ में अंतिम यात्री के रूप में सवार हुआ था, मेरे सभी सहयात्री आपस में चर्चा कर रहे थे। वे मानों मुझपर हंस रहे थे—‘वाह! क्या बेवकूफों जैसा चेहरा है।’ ऐसा उनके चेहरों से दिख रहा था। अपने गुमान में तना मैं विमान में चुपचाप बैठा हुआ था। उनमें से किसी का भी ध्यान मेरी ओर नहीं था। मेरा रंग श्यामल था, पौशाक सादा, ढीली-ढाली टाई गले में मानों लटकी हुई थी। मेरी वेश-भूषा को देख भला कौन मुझे समझदार मान सकता था! 

परंतु उस विमान में श्रीलंका से आया युवक भी सवार था। सहयात्रियों में से एक ने मुझे पहचान लिया। वे संसद सदस्य और कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र के संपादक थे। उसी महीने ‘मनोहर’ नामक साहित्यिक पत्रिका ने मीनाक्षीबाई द्वारा लिखित, मेरा परिचय प्रकाशित किया था। मेरे तमाशे ‘खपरिया चोर’ से लिया गया मेरा चित्र भी साथ में छपा था। उपस्थित यात्रियों में से किसी ने ‘मनोहर’ का वह अंक देखा था। अब बहस इस बात पर हो रही थी कि ‘खपरिया चोर’ जो विमान में यात्रियों के बीच मौजूद है—को कौन पहले पहचानता है। अंततः उनमें से किसी एक ने मुझे पहचान लिया। उसके बाद मुझे अपने श्रीलंकाई मित्र के साथ बातचीत का अवसर मिला। ताशकंद पहुंचने तक हमारे शिष्टमंडल ने मुझपर कोई ध्यान नहीं दिया।

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परंतु जैसे ही हम ताशकंद पहुंचे, उनकी आंखें खुल गईं। उन्होंने मान लिया कि मैं भी एक अच्छा इंसान हूं। मद्रास से आए जॉन साहब ने मुझसे गले मिलते हुए कहा था—‘साठे जी, हमसे गलती हुई। कृपया हमें माफ कर दीजिए। हमने आपको ऐसा-वैसा आदमी समझा था। लेकिन अब पता चला है कि आप बहुत सज्जन और भले आदमी हैं।’

ठीक 5 बजे हमारा विमान ‘चित्तौड़ की रानी’ उजबेकिस्तान की राजधानी ताशकंद के हवाई अड्डे पर उतरा। अनेक उजबेकिस्तानी मित्रों ने हमारा फूलों से स्वागत किया। उजबेकी दोस्तों में से एक ने कहा, ‘आप लोग नाश्ता करके कुछ समय के लिए विश्राम कर लीजिए। आपका विमान ‘सोवियत जेट’ तैयार है, उतरने ही वाला है।

‘‘परंतु हमारे सामान का क्या होगा। वह तो ‘चित्तौड़ की रानी’ में है।’’ मैंने पूछा। इसपर उन सत्पुरुष ने कहा, ‘सब ठीक हो जाएगा। आप किसी बात की चिंता न करें।’ इसके बाद वह हंसने लगा।

हम सबने ताशकंद में अपनी घडि़यों को 2 घंटे 30 मिनट आगे कर लिया। ठीक सात बजे हम विमान पर सवार हो गए। हमारे लिए ‘ए’ श्रेणीवर्ग में बैठने का इंतजाम किया गया था।

मेरा विमान 40 फुट (इसे 40 हजार फुट होना चाहिए—अनु.) ऊंचाई पर, 850 किलोमीटर प्रति घंटे के हिसाब से वेगवान था। विमान के अंदर की साज-सज्जा बहुत ही सामान्य थी। चारों और लाल और नीले रंग के पर्दे लटके हुए थे। साज-सज्जा के अलावा उन पर्दों का इस्तेमाल कुछ चीजों को छिपाने के लिए किया गया था। टॉयलेट, पेंट्री और मजदूरों के विश्राम कक्षों को ढंकने के लिए अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग प्रकार के पर्दे टंगे हुए थे। दरवाजों पर रशियन भाषा में कुछ लिखा था, जिसे पढ़ना मुश्किल था। भाषा को लेकर हम सब विकट चुनौती से घिरे थे।

बंगाल से आए वरिष्ठ वकील चटर्जी भी हमारे शिष्ट-मंडल के सदस्य थे। विमान में चढ़ने के साथ ही वे निद्रामग्न हो गए थे। फिर जागने के साथ ही वे टॉयलेट को खोजने लगे। उसके बाद फिर सो गए। करीब एक घंटे बाद चटर्जी साहब अकस्मात जागे। उठने के साथ ही उन्होंने चारों ओर नजर डाली। पर्दो पर लगे नामपट्टों को पढ़ने की कोशिश की। लेकिन टॉयलेट कहां है, यह खोजने में असमर्थ रहे। वहां चारों ओर अनेक पर्दे थे, उनके बीच उन्हें टॉयलेट का पता नहीं चल पाया था। आखिरकार वे एयरहोस्टेस की मदद के लिए भाग छूटे।

विमान के भीतर उन्हें तेज गति से दौड़ते देख मैं दंग रह गया। एक साथ अनेक आशंकाओं से मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया। 

खुले आसमान में, बादलों के बीच से रास्ता बनाता हुआ विमान उड़ान भर रहा था। नीचे विभिन्न शहरों को देखते हुए मुझे लगा कि वे अनंत दीप-स्तंभों पर खड़े थे। उस समय मेरा मस्तिष्क अपनी मातृभूमि की यादों में डूबने-उतराने लगा। मेरा मन मुंबई से मास्को के बीच उड़ान भर रहा था। मुंबई मेरी आंखों से छूट ही नहीं रहा था। शांता और शकुंतला मेरी मां के चित्र के आगे दीपक जला चुकी होंगी। मेरे घर लौटने तक उसे लगातार जलते रहना था। मैं उसका ध्यान कर रहा था कि वह जल रहा होगा…..निरंतर जल रहा होगा।

उड़ते-उड़ते हमारा विमान आखिरकार मास्को एयरपोर्ट पर पहुंच गया। विमान के भीतर हमें सूचित किया जा रहा था कि हम सिगरेट न जलाएं, सीट-बेल्ट भली-भांति बांध लें। मैंने खिड़की से झांककर देखा और मास्को की पहली झलक पाकर राहत की सांस ली। मैंने आकाश से ही मास्को के प्रथम दर्शन किया। इसी के साथ उसकी कीर्तिकथाएं मेरे मानस में कौंधने लगीं।

लंबी कुदान के बाद आखिरकार विमान ने अपने पहिए जमीन पर टिका दिए। मैं सावधान था, लंबे निश्वास के साथ मैंने अपने दिमाग पर पड़े बोझ को हटाया। रात में भी, निकास-द्वार के निकट अनेक मित्र हाथ में पुष्पगुच्छ थामे, हमारे स्वागत के लिए मौजूद थे। बाहर कड़ी ठंड थी। चारों ओर तेज वर्फीली हवाएं चल रही थीं। छुरी की तरह वे हमारे शरीर को तराश रही थीं। लोगों के मुंह और नाक से मोटी वाष्प निकल रही थी। मैं पूरी तरह अभिभूत था। चेहरा लगभग बेजान। किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में बस यहां-वहां देखे जा रहा था।

मास्को में अन्नाभाऊ साठे (साभार : www.annabhausathe.org)

इस बीच, जल्दबाजी में मैं बगल में दबे अपने ओवरकोट को पहनना ही भूल गया था। मैं एक चोर की भांति समाजवादी रूस के नागरिकों को टकटकी लगाए देख रहा था। कुल मिलाकर वह देह सुन्न कर देने वाली ठंड थी। जबकि मैं उसकी ओर से पूरी तरह असावधान था। संक्षेप में, मैं पूरी तरह से अभिभूत था।

तभी कझकीना नामक महिला मेरी ओर लपकी, ‘क्या आपको ठंड नहीं लग रही है?’ उसकी आवाज सुनकर मैं सकपका गया, बोला—‘नहीं, ठंड कहां है?’ ठीक उसी समय मेरे मुंह से भाप का बड़ा-सा गोला बाहर निकला। उसने मुझे गहरी उलझन में डाल दिया। मेरी हालत देखकर कझकीना जोर से हंस पड़ी—‘ये महाशय ओवरकोट पहनना भूल चुके हैं; और ठंड से कांप रहे हैं।’ इसके बाद उसने मुझे रोका और मेरा ओवरकोट मेरे शरीर पर डाल दिया। मुझे थोड़ा आराम मिला। उसके बाद मेरा दिमाग काम करने लगा। कझकीना ने कहा, ‘यह हमारा मास्को शहर है, जिसे कल आप निश्चित रूप से देखेंगे।’

‘हूं’ कहकर मैंने चारों ओर नजर डाली। कझकीना ने फिर कहा, ‘मास्को हमारा दिल है।’ उसके इस उद्गार से मैं हैरान रह गया।

‘आप एकदम सही कहती हैं।’ मेरे मुंह से निकला। कझकीना ने पूछा, ‘आपको यहां आकर कैसा लग रहा है?’ 

‘यह ठीक हमारी दिल्ली की तरह है।’ मैंने उत्तर दिया। मेरी झुकी हुई गर्दन दुबारा तन गई। 

हवाई अड्डे को पीछे छोड़कर हम कार से शहर की ओर बढ़ रहे थे। कार तीव्र गति से भाग रही थी। हमारे शिष्टमंडल के सदस्य परस्पर धीमी आवाज में बातचीत कर रहे थे। मेरी बगल में मद्रास से आए मि. जॉन बैठे हुए थे। शिष्टमंडल में उनका चयन पियानोवादक होने के कारण हुआ था। वे बड़े ही प्यारे तथा सौम्य स्वभाव के थे। उस समय मैं खिड़की पर लगे कांच को नीचे खिसकाकर, बाहर झिलमिलाती रोशनियों को देख रहा था। तभी एक तेज शीत लहर ने कार में प्रवेश किया और हमारी देहों को कंपकपाती हुई चली गई। मि. जॉन की आंखों से आंसू निकल आए। 

‘दोस्त, आप रो क्यों रहे हैं?’ मैंने उनसे पूछा।

‘हरगिज नहीं।’ जॉन चिडि़या की तरह चहचहाया, ‘मैं बिलकुल रो नहीं रहा हूं। परंतु क्या मैं कुछ पूछ सकता हूं?’

‘इसमें अनुमति जैसा क्या है?’ मैंने कहा, ‘खुलकर पूछिए!’

‘इस कड़कड़ाती ठंड में भी तुमने खिड़की के कांच नीचे गिरा दिए हैं। इसकी क्या वजह है?’ 

‘यह इसलिए कि….’ मैंने उत्तर दिया, ‘हम सब यहां, सभी कुछ के दर्शन के लिए आए हैं। मेरा मानना है कि हमें जो भी देखना है, वह बगैर किसी बाधा (कांच) के देखना चाहिए। अब तुम बताओ कि रो क्यों रहे थे?’

‘साठे जी…’ जॉन ने कहा, ‘यह सही है कि हमें यहां की हर चीज को सीधे, बगैर किसी व्यवधान के देखना चाहिए, परंतु यह शीतलहर मेरी आंखों के लिए असहनीय है। आपने गलत समझा कि मैं रो रहा था!’ 

मैं राजमार्ग के रास्ते मास्को जा रहा था। बेहद खुश भी था। किंतु मुझे एक बात मुझे लगातार परेशान कर रही थी। वह यह कि भाषा की समस्या मेरी रूस यात्रा को बरबाद कर सकती है। हमारे शिष्टमंडल में बंगाल, मध्यप्रदेश, गुजरात से आए प्रतिनिधि भी शामिल थे। वे सब अंग्रेजी में प्रवीण थे। अकेला मैं था जिसे किसी भी विदेशी भाषा का ज्ञान न था। बड़ी मुश्किल से मैंने थोड़ी-सी हिंदी बोलना सीखा था।

मैं ‘सोवियत स्काई’ नामक खूबसूरत और आलीशान होटल में पहुंचा, जहां कामरेड बारनिकोव से मेरी मुलाकात हुई। आने के साथ ही उन्होंने, मेरे हाथ को थामकर धाराप्रवाह हिंदी बोलना शुरू कर दिया—‘मैं लेनिनग्राड से बारनिकोव हूं। आपके आगमन की सूचना मिलते ही, मुझे आपकी मदद के लिए यहां बुलाया गया है। अब, अगले महीने के लिए मैं आपके साथ दुभाषिये के रूप में मौजूद रहूंगा।’ कामरेड बारनिकोव के मुक्त और भले स्वभाव और उन्हें शुद्ध हिंदी में बोलते देख मुझे अतीव आनंद हुआ। उसके बाद मैं अपने कमरे में गया। बारनिकोव मेरे कमरे में आए और मुझसे पूछा—‘कल आप रूस में सबसे पहले क्या देखना पसंद करेंगे?’

‘सबसे पहले रूस की जनता को।’ मैंने उत्तर दिया। इसपर कामरेड बारनिकोव मुस्करा दिए।

(अनुवाद : ओमप्रकाश कश्यप, संपादन : नवल)


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