मधुकर सिंह : बहुजन समाज के चितेरे कथाकार

आज जब पूरे देश में दलित विमर्श और दलित आंदोलन की धूम है, तो हमें कहानीकार, उपन्यासकार और नाटककार मधुकर सिंह याद आते हैं। हमें इस साहित्यिक पुरोधा को याद करना चाहिए और उनके द्वारा रचित साहित्य के आलोक में सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन की पड़ताल करने की जरूरत है। बता रहे हैं कुमार बिन्दू

मधुकर सिंह (2 जनवरी, 1934 – 15 जुलाई, 2014) हिंदी के ऐसे कथाकार रहे, जिन्होंने समाज के हाशिये के लोगों को अपनी कहानियों का प्रमुख पात्र बनाया और उनकी सामाजिक चेतना से हमें परिचित कराया। वे गांव के किसान, पशुपालक और दलितों के जीवन को कैसे देखते थे, यह जानना जरूरी है। इस संदर्भ में मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है। इसी तरह के सवाल के जवाब में मधुकर जी ने किसी से कहा था– एक घटना सुनो। एक ग्वाला है। उसकी एक भैंस है, जिसका बच्चा मर जाता है। तब ग्वाला भैंस का दूध दुहने के लिए उसे इंजेक्शन देता है। इसे लेकर कोई भी उस ग्वाले को क्रूर-निर्दयी कहेगा। उसकी तीखी आलोचना करेगा। लेकिन, यहां हमें यह सोचने की जरूरत है कि अगर यह गलत काम है, तो ग्वाला इसे करने के लिए विवश और बाध्य क्यों है? अगर वह भैंस का दूध प्राप्त करने के लिए इंजेक्शन का उपयोग नहीं करेगा, तो अपने परिवार को भोजन कैसे मुहैया कराएगा? इस द्वंद्वात्मकता को समझना जरूरी है। 

सत्तर के दशक में मधुकर जी ने एक कहानी लिखी थी– ‘दुश्मन’। जाति के रूप में दलित वर्ग की यह कहानी है। इस कहानी में एक दलित बस्ती में सूअर काटा गया है। उसका मांस पकाया जा रहा है। गांव के सभी दलित चुनाव में निर्वाचित हुए नेता के स्वागत की तैयारी कर रहे हैं। जब नेता की कार आती हुई दिखती है, तो लोग जयकारे लगाने लगते हैं। बाजे भी बजाते हैं। कार दलितों की बस्ती के पास आकर उस टोले की ओर बढ़ जाती है, जहां सवर्ण तबके के लोग रहते हैं। सभी दलित विस्मय से भर जाते हैं। उनकी सारी खुशी काफूर हो जाती है। तब एक दलित अपने स्वजातीय नेता को दुश्मन करार देता है। 

मधुकर जी की यह बहुचर्चित कहानी है, जो आज भी प्रासंगिक है। कोई भी नेता स्वजातीय होने से वह आपके वर्ग का हितैषी होगा, यह जरूरी नहीं है। अगर वह वर्ग शत्रु के पक्ष में खड़ा है, तो वह दुश्मन है। जो नेता हमारे आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हित के लिए कार्य करेगा, सही मायने में वही हमारा नेता होगा। इसका बोध यह कहानी बहुत सरल लेकिन प्रभावी तरीके से हमें कराती है। समालोचक सुरेंद्र चौधरी कहते थे– मधुकर सिंह की कहानी ’दुश्मन’ जैसी और कोई कहानी नहीं दिखती है। 

मधुकर जी बिहार के आरा नगर से सटे धरहरा गांव के रहने वाले थे। हालांकि उनका जन्म बंगाल में हुआ था। वे आरा में ही एक स्कूल में शिक्षक थे। मैं पहली बार उनसे मिलने कथाकार अरविंद गुप्त के साथ धरहरा गया था। मधुकर जी मुझे खांटी ग्रामीण व्यक्ति लगे। उन्होंने ग्राम्य जीवन पर आधारित कई कहानियों की रचना की। साथ ही उन्हाेंने उस समय की गाम्य जीवन की अन्य श्रेष्ठ कहानियों को संकलित करके उसे प्रकाशित कराया था। भोजपुर जिला में सत्तर के दशक में ही नक्सल आंदोलन शुरू हुआ था। सामंती शक्तियों के खिलाफ भोजपुर में चले आंदोलन का प्रभाव मधुकर जी कई कहानियों और उपन्यासों में दिखता है। इस संदर्भ में उनका उपन्यास ‘नक्सलाइट रामरतन मास्टर’ और ‘अर्जुन जिंदा है’ को याद किया जा सकता है। 

मधुकार सिंह (2 जनवरी, 1934 – 15 जुलाई, 2014)

वे शोषण, दोहन और उत्पीड़न के खिलाफ चल रहे आंदोलन के साथ मानसिक रूप से बहुत गहरे जुड़े हुए थे, इसीलिए उसकी अभिव्यक्ति हमें उनकी कहानी, उपन्यास के अलावा नाटकों में भी दिखाई देती है। आज जब पूरे देश में दलित विमर्श और दलित आंदोलन की धूम है, तो हमें कहानीकार, उपन्यासकार और नाटककार मधुकर सिंह याद आते हैं। हमें इस साहित्यिक पुरोधा को याद करना चाहिए और उनके द्वारा रचित साहित्य के आलोक में सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन की पड़ताल करने की जरूरत है। वरना हम ‘दुश्मन’ कहानी के दलितों की स्थिति में पहुंचेंगे।

सामंती चेतना शूद्रों के अलावा निर्धन ब्राह्मण की प्रतिष्ठा को हिकारत की दृष्टि से देखने के लिए विवश करती है। गरीब ब्राह्मण को ऊंची जाति के ग्रामीण अछूत नहीं मानते हैं। समाज में एक मुसहर और एक गरीब ब्राह्मण बालक की दोस्ती होती है, तो ऊंच-नीच तथा शूद्र और सवर्ण की चेतना वाले गांव में मुसहरों के घर जला दिया जाता है। उनको पीटा जाता है। यह गाथा सुनाते हुए ‘लहू पुकारे आदमी’ कहानी हमारी चेतना को झकझोर देती है। महानगरों में भले यह जातिवाद का दंश अदृश्य हो, लेकिन गांव-कस्बों में जातिगत भेदभाव खूब है। वर्ग संघर्ष से ज्यादा जाति संघर्ष प्रबल है। इस सच्चाई को अपनी कहानियों में उजागर करते हैं ग्राम्य जीवन के चितेरे कथाकार मधुकर सिंह। यही कारण है कि आज वामपंथी दल कमजोर और सामाजिक न्याय का नारा बुलंद करने वाले दल बिहार में सशक्त हो गए हैं। यह अकारण नहीं है कि बिहार के औसतन सवर्ण भाजपा के पक्ष में आज भी मजबूती से खड़े हैं। पूंजीवाद और सामंतवाद के गठजोड़ को भले वामपंथी नेता समझे हों, लेकिन वह इस गठबंधन को कमजोर और शिकस्त देने में विफल रहे। जाति संघर्ष भी परोक्ष रूप से वर्ग संघर्ष ही है, इसे कम्युनिस्ट पार्टियां नहीं समझ सकीं।

कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में लिखा है कि मानव सभ्यता का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है। प्रश्न उठता है कि भारतीय समाज के वर्ग संघर्ष में शोषित-पीड़ित मानवता के नायक कौन रहे? वामपंथ उन्हें याद क्यों नहीं कर रहा है? और तो और विवेकानंद जैसे व्यक्तित्व को भाजपा भुना रही है और वामपंथी उन्हें विस्मृत किए हुए हैं। पिछले दिनों ‘जय भीम, लाल सलाम’ का नारा राजनीतिक गलियारे में गूंजा था, लेकिन वह दब गया। वस्तुत: शोषणमूलक समाज के विरोध और समतामूलक नए समाज के निर्माण के लिए आंदोलन करने वालों को संघर्ष का स्वरूप और मुद्दे तय करने की सही सीख मधुकर सिंह की कहानियां, उपन्यास और नाटक देते हैं। मधुकर सिंह का साहित्य वर्तमान ग्रामीण समाज के मूल आर्थिक और सामाजिक अंतर्विरोधों को समझने में दलित-बहुजनों के लिए सहायक सिद्ध होगा। 

(संपादन : नवल)


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