बहुजनों के हितों की मुखालफत करने वाले अरुण कुमार मिश्र नहीं कर सकते उनके मानवाधिकारों की रक्षा

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए थी, जो दलितों, आदिवासियों, विमुक्त समुदाय, और अन्य कमजोर वर्गों के अधिकारों के प्रति समर्पित होता। क्योंकि इन वर्गों के अधिकारों के बिना मानवाधिकारों की संकल्पना करना निराधार है। बता रहे हैं अनुराग भास्कर

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने की है, जिसके अन्य सदस्यों में लोकसभा अध्यक्ष, गृहमंत्री, राज्यसभा के उपसभापति, लोकसभा में विपक्ष के नेता, और राज्यसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं। इस हिसाब से छह में से चार लोग केंद्र सरकार/सत्तारूढ़ दल से संबंधित है। 

न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा की नियुक्ति के बाद राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर इस बात का असंतोष जताया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की नियुक्तियों में दलितों, आदिवासियों, एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर ज़ोर नहीं दिया गया है।

आयोग में नियुक्ति के प्रश्न पर कुछ ज़रूरी बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इस आयोग का गठन वर्ष 1993 में ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अधिनियम’ के तहत हुआ था। आयोग गठित करने का उद्देश्य यह था कि मानवाधिकार संबंधित सभी मामलों में सुरक्षा की जा सके। आयोग को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी मानवाधिकार हनन के मामले की स्वतः स्ंज्ञान लेकर जांच कर सकता है। कंद्रीय स्तर के अलावा प्रत्येक राज्य में राज्य मानवाधिकार आयोग स्थापित करने का प्रावधान भी अधिनियम में दिया गया है।  

ध्यातव्य है कि वर्ष 2019 से पहले आयोग के अध्यक्ष के पद पर चयन केवल सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों में से किसी एक का किया जाता था। लेकिन 2019 में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अधिनियम में संशोधन करके यह प्रक्रिया बदल दी, और अब सुप्रीम कोर्ट का कोई भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जा सकता है।

नियुक्ति पर सवाल : सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश व वर्तमान में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष अरुण कुमार मिश्रा

गौरतलब है कि अरुण कुमार मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नहीं थे, परंतु 2019 में लाए गए संशोधन के बाद मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पर नियुक्त किए गए हैं। जनता के मन में सवाल उठना लाजमी है कि यह संशोधन किस मकसद से लाया गया था। 

सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में अपने कार्यकाल में जस्टिस अरुण मिश्रा ने वर्ष 2020 में एक औपचारिक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह कहकर सार्वजनिक तारीफ की थी कि वे वैश्विक स्तर के विचारक हैं और बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्ति है| किसी भी जज द्वारा अपने कार्यकाल के दौरान सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री की तारीफ करना न्यायपालिका से अपेक्षित व्यवहार से पूर्णता विरुद्ध था| अपने भाषण में सरकार और न्यायपालिका के बीच मौजूद नैतिक लकीर को लांघना उचित नहीं था| उस कार्यक्रम में कई अन्य देशों से आए हुए जज भी मौजूद थे| उनके सबके मन में जस्टिस अरुण मिश्रा के व्यवहार को देखकर भारत की न्यायपालिका के प्रति क्या विचार आए होंगे|

इसके अलावा इस बात पर ज़ोर देने की आवश्यकता है कि मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर नियुक्त करने से पहले किसी भी जज द्वारा अपने कार्यकाल में दिये गये निर्णय का आकलन करना भी उतना ही जरूरी है। यह प्रश्न उठना लाज़मी है कि यदि कोई व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का जज रहते समय मानवाधिकार के विपरीत निर्णय दिया हो, तो उस व्यक्ति से कैसे अपेक्षा की जाए कि वह आयोग का अध्यक्ष बनने पर न्याय करेगा। 

सेवानिवृत्त न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने अपने कार्यकाल में कुछ ऐसे निर्णय दिए, जिनका विपरीत प्रभाव दलितों और आदिवासियों के अधिकारों पर पड़ा। मसलन, 2019 में दिल्ली में रविदास मंदिर को तोड़ने का आदेश जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली दो जजों की खंडपीठ ने दिया था। बाद में जब दलित समाज ने मंदिर तोड़े जाने के विरोध में जनांदोलन खड़ा किया, तब अरुण कुमार मिश्रा को अपना निर्णय बदलना पड़ा और मंदिर को दोबारा बनाने का आदेश देना पड़ा। वर्ष 2019 में ही न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की खंडपीठ ने देश के 10 लाख से भी ज्यादा आदिवासियों को उनकी जमीन से जबरदस्ती बेदखल करने का आदेश दिया था। मामला वर्ष 2008 में वनाधिकार कानून के उल्लंघन से संबंधित दायर एक जनहित याचिका से संबंधित था। देश भर में सामाजिक संगठनों एवं बुद्धिजीवियों ने इस आदेश का विरोध किया, जिसके बाद अरुण कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ को अपने निर्णय पर रोक लगानी पड़ी। 

इसके अलावा अरुण कुमार मिश्रा आरक्षण के विरुद्ध टिप्पणियां करते रहे हैं। मसलन, वर्ष 2020 में एक निर्णय में न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा ने कहा था कि आरक्षण की हकदार जातियों की सूची पर पुनर्विचार करना चाहिए। यह बात उन्होंने तब कहीं, जबकि वर्ष् 2010 में दर्ज जिस मामले की वो सुनवाई कर रहे थे, उस मामले में आरक्षण के लाभार्थियों पर पुनर्विचार करने का प्रश्न मौजूद ही नहीं था। 22 अप्रैल, 2020 को अपने फैसले में उन्होंने आंध्र प्रदेश सरकार जनवरी 2000 के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें पांचवीं अनुसूची में शामिल क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों के पद के लिए अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को 100 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया था। उनकी यह टिप्पणी इसलिए भी असंवैधानिक थी क्योंकि संविधान के प्रावधानों के अनुरूप संसद द्वारा स्वीकृति के उपरांत ही राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गो में शामिल जातियों व समूहों (अनुसूचित जनजाति वर्ग के संबंध में) की सूची तैयार की जाती है।

वर्ष 2020 के एक और निर्णय में उन्होंने आरक्षण को गरीबों की जिंदगी बेहतर करने का जरिया बताया। जबकि संविधान में आरक्षण का प्रावधान दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के लिए लाया गया था, ना कि गरीबी उन्मूलन के लिए। एक और मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा ने एक विकलांग व्यक्ति को अपनी व्हील चेयर से जबरदस्ती खड़ा होने का आदेश दिया, जबकि वह व्यक्ति अपनी कुर्सी से खड़ा होने में सक्षम नहीं था।

जाहिर तौर पर न्यायाधीश अरुण कुमार मिश्रा के उपरोक्त निर्णय व व्याख्याएं व आचरण दलितों, आदिवासियों, और अन्य कमजोर वर्ग के मानवाधिकार के खिलाफ़ रहे हैँ। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए जनता, खासकर समाज के हाशिए पर मौजूद समुदायों, के मन में इस नियुक्ति को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। 

खासकर यह कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए थी, जो दलितों, आदिवासियों, विमुक्त समुदाय, और अन्य कमजोर वर्गों के अधिकारों के प्रति समर्पित हो। क्योंकि इन वर्गों के अधिकारों के बिना मानवाधिकारों की संकल्पना करना निराधार है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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