मुकेश मानस : स्मृतियों में शेष रहेगा मगहर का वाशिंदा

‘मगहर’ पत्रिका के संपादक, एक दर्जन से अधिक किताबों के लेखक, रचनाकार, कवि, समीक्षक और अनुवादक रहे मुकेश मानस का निधन बीते 4 अक्टूबर, 2021 को हो गया। उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रही हैं पूनम तुषामड़

“इस निविड़ गहन अंधकार में,
 जुगनू सा जो चमकता है,
 जीवन है ..
अपने समूचे यथार्थ के साथ” 

(मुकेश मानस, कविता– ‘जीवन’, संग्रह– ‘कागज़ एक पेड़ है’)

ये पंक्तियां हैं दलित साहित्य की प्रगतिशील धारा के सशक्त कवि, कहानीकार, आलोचक, समीक्षक, ऊर्जावान प्रकाशक और संपादक रहे मुकेश मानस की। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में प्रोफेसर थे। इन सबसे बढ़कर वह एक अच्छे मित्र थे, हम सभी के लिए जो समतामूलक समाज की स्थापना के लिए फुले-आंबेडकरी विचारधारा को अहम मानते हैं। बीते 4 अक्टूबर, 2021 को महज 48 साल की संक्षिप्त उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। उनके अचानक चले की दुखद सूचना ने समस्त साहित्यिक जगत एवं उनके मित्रों को न केवल शोकाकुल कर गया बल्कि एक साहित्यिक प्रतिभा के आकस्मिक दुखद अंत से विचलित भी कर गया। 

मुकेश मानस का जन्म 15 अगस्त, 1973 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक गांव में हुआ। पारिवारिक मनमुटाव के चलते उनके पिता गांव छोड़कर अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गए। प्रारंभिक दिनों में वे किराए पर रह रहे थे। तब उनकी आर्थिक स्थिति बेहद ख़राब थी। मुकेश ने पांच वर्ष की उम्र से ही अपने परिवार में अभावपूर्ण स्थितियों को देखा। उनके पिता लोहा इकठ्ठा करते थे। धीरे-धीरे उनके पिता का काम थोड़ा अच्छा चल पड़ा और उन्होंने उत्तम नगर में अपना घर ख़रीदा और अब वे लोहा इकठ्ठा करने का ठेका लेने लगे। लेकिन उनका अच्छा समय ज्यादा दिन नहीं रह पाया क्योंकि 1984 में दंगा हो गया, जिसके कारण बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों पर ताला लग गया। परिणामस्वरुप मुकेश के पिता का काम पूरी तरह से ठप्प हो गया। मुकेश के बाल मन पर जितना गहन प्रभाव 1984 के दंगों का रहा, उससे कहीं अधिक घर की आर्थिक तंगी का रहा। घर में माता-पिता के अलावा वे चार बहन-भाई थे। मुकेश घर में सबसे बड़ा होने के कारण जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों को झेलते हुए संघर्षों में पिता का साथ देता रहा। पिता के देहांत के पश्चात् पूरे परिवार की जिम्मेदाररियों का बोझ उसने बखूबी निभाया। कुछ समय बाद उनकी मां भी चल बसीं। विषमतम स्थितियों से गुजरते हुए मुकेश ने बहनों की शादी की तथा छोटे भाई को पढ़ाने के साथ ही अपनी पढाई भी पूरी की।

वह मुकेश ही था, जो इतनी कठिन परिस्थितियों में भी नहीं हारा और गांव से दिल्ली की एक दलित बस्ती और दलित बस्ती से दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद तक के बेहद कठिन सफर को उसके अथक परिश्रम और दृढ निश्चय ने आसान बना दिया था। यहां तक कि प्रोफेसर बनने के बाद भी वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को नहीं भूला था। सामाजिक गतिविधियों से लेकर साहित्यिक लेखन और कार्यक्रमों में उसकी नियमित भागीदारी रहती थी। अपनी धारदार और संवेदनशील लेखन के बूते मुकेश मानस बहुत कम समय में साहित्यिक जगत में एक जानी पहचानी शख्सियत बन गए थे।

मुकेश मानस (15 अगस्त, 1973 – 4 अक्टूबर, 2021)

मुकेश मानस ने अपने संक्षिप्त जीवन में इतना कुछ रचा, जिससे दलित साहित्य न केवल समृद्ध हुआ बल्कि बौद्धिक वैचारिक फलक का विस्तार भी हुआ। उसकी कुल 14 पुस्तकें हैं। उसके अतिरिक्त उसकी वे रचनाएं, जो स्वतंत्र रूप से अनेक पत्र पत्रिकाओं में छपे, उसके लेखन कर्म की साक्षी हैं। 

अब यदि मैं मुकेश मानस की रचनाओं के संबंध में कहूं तो उनके उपर वामपंथ और आंबेडकरवाद दोनों धाराओं का सामान प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। मसलन–

लो हम फिर से जी उठे हैं / अब हम हैं सर्वव्यापी /
हवा में, सुगंध में / उजाले में पानी में /
किताबों में / विचारों में / सांसों की रवानी और संघर्ष की कहानी में /
अब हम हैं जिंदगानी में / हम हैं नए युग के स्पार्टकस
अब कैसे चढ़ा पाओगे हमको किसी सूली पर?

(कविता– ‘नए युग के स्पार्टकस’, संग्रह– ‘कागज़ एक पेड़ हैं’, पृष्ठ 20)

‘मुकेश मानस’ की कविता की ये पंक्तियाँ उसके इस संग्रह के शुरुआती दूसरे पृष्ठ पर अंकित हैं, जिन्हे पढ़ कर पंजाब के क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह ‘पाश’ की उस कविता की याद हो आती हैं, जिसमें वे कहते हैं– ‘अस्सी तां घास हैं ,फेर उग आवांगे’।

मुकेश का पहला काव्य संग्रह ‘कागज एक पेड़ है’ वर्ष 2010 में लोकमित्र प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। उसी समय मेरा पहला कविता संग्रह “माँ मुझे मत दो” भी हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्राप्त प्रकाशन सहयोग से प्रकाशित हुआ था, जिसकी कुछ कविताओं का पाठ मैंने मुकेश के निमंत्रण पर सत्यवती कॉलेज में आयोजित एक कविता गोष्ठी में किया था। मुकेश ने मेरे संग्रह की प्रशंसा करते हुए मुझे अपनी पहली कविता संग्रह भेंट में दी थी। यह हमारे बीच बौद्धिक अपनत्व की शुरूआत थी। मैंने जैसे ही इस संग्रह का पहला पृष्ठ देखा उस पर लिखा था ‘प्रिय पूनम को सादर’ और उसके ठीक नीचे थे उसके जीवन की तरह ही बेहद संदिग्ध व कठिन से हस्ताक्षर, जिसे देख मैं पूछ बैठी थी कि मुकेश यह क्या लिखा है? उसने मुस्कुराते हुए कहा था कि ‘तुम खुद समझो।’ और उसके ठीक नीचे थी मुकेश की ‘भेड़िया’ कविता की वे पंक्तियां, जो हर युग हर समय में प्रासंगिक रहेंगीं।

सच यही है कि भेड़िये / कभी ख़त्म नहीं होते /भेड़िये हर समय और हर जगह होते हैं
और सभी भेड़िये हिंसक होते हैं / बस उन्हें रहता है सही वक्त और मौके का इंतज़ार। 

मुझे स्मरण है कि मैंने वहीं कार्यक्रम के दौरान ही इस संग्रह की अनेक कविताएं पढ़ ली थी, जिनमें से पहली और दूसरे पृष्ठ पर प्रकाशित कविताएं मुझे बहुत पसंद थीं। ‘पतंग और चरखड़ी’ संग्रह की भी कुछ कविताओं ने मुझे बेहद प्रभावित किया था।

कुछ दिनों के बाद सत्यवती कॉलेज में हिंदी कविता पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. अनिल जनविजय आमंत्रित थे, जो उन दिनों रशिया के ‘मास्को रेडियो ब्रॉडकास्ट’ में हिंदी संपादक थे। उनसे मेरा परिचय मुकेश ने ही कराई। मुकेश मानस की यह खासियत थी कि वह अपने दोस्तों का जितना अच्छा प्रशंसक था, उतना ही कठोर आलोचक भी। उस दिन उसने मेरे प्रथम कविता संग्रह से कई कविताएं अनिल जनविजय जी को स्वयं पढ़ कर सुनाई थी, जिनमें ‘नदी’, ‘पत्थर देवता’ और कई अन्य कविताएं शामिल थीं।

दरअसल, मुकेश से मेरा परिचय मेरे विवाह के बाद मेरे पति गुलाब सिंह के मित्र के रूप में हुआ। तब तक मुकेश का विवाह नहीं हुआ था, किन्तु मुकेश एक जिम्मेदार भाई, एक जिम्मेदार पुत्र और एक मिलनसार दोस्त के रूप में हम से मिला था। किन्तु वह एक जिम्मेदार स्नेहिल पिता भी था उस मासूम नन्ही बच्ची का, जिसे उसने अपना नाम देकर पाला था। अपनी उस नन्ही बेटी के जन्मदिवस पर लिखी उसकी कविता संसार की समस्त बेटियों के लिये पिताओं का स्नेह किसी इंद्रधनुष की भांति ही बिखेर जाती हैं।

अपनी आँखों में / खुशगवार सपने लेकर आती हैं बेटियां
बेजोड़ खिलखिलाहट और उमंगों की तरह
बेटियां आती हैं, इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह …
अपने हाथों में महकती हुए सपने लेकर
घुप्प अंधेरों में चमकते हुए सितारों की तरह …

मेरे पति गुलाब सिंह मुकेश के करीबी मित्रों में से एक रहे। वे बताते हैं कि कैसे स्कूल के दिनों में एक बार जब उसने साइंस मॉडल बनाया था और चूंकि वह अंग्रेजी में कमजोर था, तो अपने मॉडल के बारे में बोल नहीं पाया तो उसने अंग्रेजी सीखने की ठान ली। वह अपनी धुन का पक्का था। मैं अपनी बात कहूं तो मुकेश एक सफल आयोजक थे। उसने ‘संज्ञान’ नामक साहित्यिक गोष्ठी की भी शरुआत की, जिसके कई सफल आयोजन अलग-अलग स्थानों पर हुए। 

बहुआयामी प्रतिभा के धनी मुकेश ने आरोही’ प्रकाशन नामक अपना प्रकाशन संस्थान भी स्थापित किया, जिसके जरिए कई महत्वपूर्ण किताबों का प्रकाशन हुआ। कविता एवं कहानी लेखन के अतिरिक्त मुकेश ने ‘दलित साहित्य के बुनियादी सरोकार’, ‘हिंदी कविता की तीसरी धारा’, ‘मीडिया लेखन : सिद्धांत और लेखन’, ‘सावित्रीबाई फुले’ जैसी बौद्धिक वैचारिक लेखन किया। साथ ही, ‘यह पलाश के फूलने का समय है’ तथा चुनिंदा आदिवासी दलित कविताओं के संग्रह का कुशल संपादन अरुण प्रियं के साथ किया। इतना ही नहीं, मुकेश ने कांचा इलैया शेपर्ड की प्रसिद्ध पुस्तक ‘व्हाई आई ऍम नॉट ए हिंदू ‘ तथा एम. एन. रॉय की पुस्तक ‘इंडिया इन ट्रांजिशन’ का हिंदी अनुवाद भी किया।

बहरहाल, मुकेश का जीवन कितना संघर्ष और तकलीफों से भरा था, यह उसके दोस्तों, रिश्तेदारों और उनके जानने वालों के अतिरिक्त उनकी रचनाओं ने भी गाहे-बगाहे दर्शाया। 

दुःख हर मौसम में होते हैं / मौसम के बदलने से दुःख नहीं बदलते
बदलने का सिर्फ एहसास होता है।

(कविता– ‘दुःख’, संग्रह– ‘पतंग और चरखड़ी’, पृष्ठ 24)

मुकेश ने किसी गहरे अवसाद के क्षणों में शायद यह भी लिखा–

भाग जाऊं / भाग कर कहाँ जाऊं / लौट कर आना है यहीं /
इसी नरक में / जीवन बिताना है इसी नरक में।

(कविता– ‘चाह’, संग्रह – वही, पृष्ठ 19)

मुकेश की खासियत यह थी कि उसके विचार के केंद्र में बच्चे भी होते थे। अपनी कविताओं में उसने अपने अभावग्रस्त बचपन को तो उकेरा ही था, साथ ही अपने सपनों को भी जगह दी थी।

बच्चों के पास / पतंग थी / तो चरखड़ी नहीं थी
बच्चों की पास चरखड़ी थी / तो पतंग नहीं थी
पतंग और चरखड़ी / एक साथ पाने का सपना
बच्चों के पास हमेशा था / है।

इस तरह शायद वह अपने अभावग्रस्त बचपन के अनुभवों से उबरने की भरपूर चेष्टा करता था। शायद यही कारण रहा होगा कि उसने ‘मगहर’ पत्रिका का एक पूरा अंक ‘दलित बचपन’ के नाम से प्रकाशित किया। इसमें मेरा भी एक संस्मरण प्रकाशित है। दलित बचपन पर केंद्रित यह विशेषांक साहित्यिक जगत में खासा पसंद किया गया और चर्चित भी रहा। 

हाल के कुछ वर्षों से मुकेश ने सबसे थोड़ी दूरी बनानी शुरू कर दी थी। हाल ही मेें निधन के 20-22 दिन पहले उससे आखिरी बार फोन पर बात हुई। वह असहज था।

काश! हम जान पाते कि पारिवारिक रिश्तों में आई दरार, तलाक और बेटी से दूरी ने शायद उसे बिलकुल अकेला कर दिया था। इस अकेलेपन और जीवन के खालीपन को भरने का एक मात्र सहारा उसे शराब लगी, जो धीरे-धीरे उसे भीतर से खाली करती चली गई और एक प्रतिभाशाली प्रगतिशील रचनाकार, एक मिलनसार दोस्त, एक स्नेहिल सामाजिक कवि अपनी दुखों के निविड़ अंधकार में गुम होता चला गया।

(संपादन : नवल/अनिल)


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