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भारतीय मौलिक समाजवाद का दस्तावेज (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य- पहला भाग)

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ वर्ष 1937 में प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने शूद्र कौन थे, उनका अतीत, उनका साहित्य और दर्शन क्या था, इस विषय को लेकर इतिहास का अनुसंधान किया। पढ़ें, कंवल भारती की समीक्षा

[भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार समीक्षा कर रहे हैं। आज पढ़ें चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ की समीक्षा, जिसका पहला संस्करण 1937 में प्रकाशित हुआ।]

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पहली कृति – ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’

  • कंवल भारती

बीसवीं सदी की शुरुआत में ही दलित-पिछड़ी जातियों में अपने इतिहास को जानने की जिज्ञासा पैदा हो गई थी। यह खोज आर्य-सिद्धांत पर खत्म हुई। दलित विचारक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनका इतिहास, साहित्य और दर्शन आर्य-अनार्यों के संघर्ष में निहित है। इसी सिद्धांत पर उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी बोधानंद ने 1930 में ‘मूल भारतवासी और आर्य’ नाम से ग्रन्थ लिखा और उसी दशक में स्वामी अछूतानन्द ने ‘आदि हिन्दू’ आन्दोलन चलाया। उन्होंने शूद्र और अतिशूद्र जातियों को आदि हिन्दू माना, और द्विज हिन्दुओं को गैर-हिन्दू करार दिया। स्वामीजी ने भी आदिहिन्दू इतिहास पर अनेक नाटकों और काव्य-कृतियों की रचना की। चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु उन्हीं के मित्र और स्वामी बोधानन्द के पटु शिष्य थे। स्वामी द्वय के सम्पर्क में आने के बाद जिज्ञासु के विचारों में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ, जबकि वे इससे पूर्व आर्य समाज के प्रभाव में थे। जिज्ञासुजी ने मूलनिवासी सिद्धांत को आगे बढ़ाया, और साहित्य के माध्यम से भारतीय मौलिक समाजवाद की विचारधारा को स्थापित किया। इस विचारधारा की उनकी पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ है। यह कृति 1937 में प्रकाशित हुई थी। इसका चौथा संशोधित संस्करण 1956 में और पाॅंचवाॅं परिवर्द्धित संस्करण 1965 में प्रकाशित हुआ था। इसके पहले संस्करण की भूमिका से, जो भदन्त बोधानन्द ने लिखी थी, पता चलता है कि यह पुस्तक जिज्ञासुजी के वृहद ग्रन्थ ‘भारत के आदि-निवासी’ का केवल चौथा अध्याय है, जो अपने विषय की एक पूर्ण पुस्तक है। इस वृहद ग्रन्थ के तीन अध्याय ‘सृष्टि और मानव-समाज का विकास’ नाम से छपे, जिसका एक ही संस्करण प्रकाशित हुआ। यह पुस्तक अब उपलब्ध् नहीं है। ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ के संशोधित संस्करण के बारे में जिज्ञासुजी ने लिखा : “आजादी की तीसरी लड़ाई के आरम्भ होते ही कुछ ऐसी संकटपूर्ण स्थिति आई कि कार्यालय के राष्ट्रीय ही नहीं, सभी प्रकाशन बन्द हो गए। आज सन् 56 के आजाद भारत में यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि अस्सी प्रतिशत से अधिक जनता सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक क्षेत्र में जातिगत रूप से पिछड़ी हुई क्यों हैं? इसे दबोचने वाले कौन हैं? और इन दबी-पिछड़ी जातियों की पहचान क्या है? दूसरी ओर इन दबी-पिछड़ी जातियों के पढ़े-लिखे लोग अब अपने पतनकारी शोषकों की कूटनीति समझने के लिए व्याकुल दिखाई देती हैं। ऐसी परिस्थिति में, आशा है, इस पुस्तक का यह नया संशोधित संस्करण उपयोगी सिद्ध होगा।”

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लेखक के बारे में

कंवल भारती

कंवल भारती (जन्म: फरवरी, 1953) प्रगतिशील आम्बेडकरवादी चिंतक आज के सर्वाधिक चर्चित व सक्रिय लेखकों में से एक हैं। ‘दलित साहित्य की अवधारणा’ ‘स्वामी अछूतानंद हरिहर संचयिता’ आदि उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें 1996 में डॉ. आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 2001 में भीमरत्न पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

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