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कर्नाटक : उन्मादियों को बैर केवल हिजाब से नहीं

जोतीराव फुले और डॉ. आंबेडकर के आंदोलन की बदौलत ही आजाद देश के तालीमी इदारे (शिक्षण संस्थाएं) सभी जातियों और धर्मों के लिए खोल दिए गए। इसके बावजूद आज भी वर्चस्ववादी ताकतें नहीं चाहती हैं कि शोषित वर्ग को शिक्षा मिले। बता रहे हैं अभय कुमार

उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के बीच एक बार फिर मुस्लिम विरोधी कार्ड उछाल दिया गया है। इस बार हिजाब का मुद्दा उठाया जा रहा है और कोशिश यह की जा रही है कि हिजाब के आधार पर लोगों की धार्मिक गोलबंदी की जाए। लेकिन यह मामला केवल यही तक सीमित नहीं है। यह एक बड़ी साज़िश का हिस्सा हो सकता है ताकि मुस्लिम छात्रों को हिजाब के मुद्दे की आड़ में निरक्षरता के कुएं में धकेल दिया जाए तथा उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों पर “कट्टरपंथी” और “नारी विरोधी” होने के “नॅरेटिव” को और मजबूत किया जाए।

यह चिंतनीय सवाल है कि कुछ उदारवादी और नारीवादी लोग भी इस पूरे खेल को नहीं समझ रहे हैं या जानबूझकर समझना नहीं चाह रहे हैं। उल्टे वे शोषितों पर आरोप लगा रहे हैं और उन्मादी शक्तियों के काम को आसान बना रहे हैं।

हिजाब के मुद्दे पर ताजा मामला दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में सामने आया है, जहां भाजपा सत्ता में है। वैसे यह सुखद है कि देश की कई धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के दलों ने मुस्लिम छात्रों के प्रदर्शन का समर्थन किया है। लेकिन भाजपा की प्रदेश सरकार के द्वारा अपने फैसले को वापस लेने के बजाय इस मुद्दे पर बयान दिया है कि हिजाब व इस तरह के कपड़े देश की समानता, अखंडता और कानून एवं व्यवस्था को ख़तरा पहुंचाते हैं। इतना ही नहीं, अपनी बात को साबित करने के लिए राज्य सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम का भी सहारा लेते हुए कहा है कि कॉलेज द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड पुरुष और महिला छात्रों के लिए अनिवार्य है।

ऐसी बातें कहकर राज्य सरकार खुद को अदालत और जनता के सामने कानून के रास्ते पर चलनेवाली सरकार के तौर पर पेश करना चाहती है। लेकिन उसका असली मकसद मुसलमानों के जख्मों पर और नमक छिड़कना, उन्हें “पिछड़ा” और “धार्मिक “शिद्दत-पंथी” करार देना तथा खुद को “संविधान का रक्षक” और “समानता और महिलाओं के अधिकारों का हिमायती” घोषित करना है। लेकिन सच तो यह है कि हिजाब पर प्रतिबंध लगाने का यह फैसला न सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के लिए है, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द के लिए भी खतरनाक है। 

सनद रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक बार अपने भाषण में कपड़ों के आधार पर लोगों के पहचाने जाने की बात कही थी। 

सवाल है कि कैसे कोई पोशाक क़ानून और व्यवस्था के लिए खतरा कैसे हो सकती है? क्या सरकार ने कोई शोध कराया है, जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिजाब पहनने वाला अपराधी है और भगवा वस्त्र पहननेवाला व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल को नहीं तोड़ सकता और ना ही वह किसी दंगे में मार-काट कर सकता है तथा ना ही वह आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकता है?

हिजाब पहनने के कारण कालेज में प्रवेश नहीं दिये जाने के खिलाफ आंदोलन करतीं छात्राएं

हिजाब प्रतिबंध से भाजपा को फ़ौरन लाभ यह मिल रहा है कि इस तरह के विवाद जनता की राय को मूल प्रश्न से धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों की ओर मोड़ते हैं। वह दिन-रात केवल धर्म की बात करना चाहती हैं और उसकी पूरी कोशिश होती है कि लोग खुद को अपनी धार्मिक पहचान से बाहर नहीं देखें। मसलन वे यह न देखें कि देश की आर्थिक नीति किस दिशा में जा रही है, लोगों को किस हद तक रोजगार और जन स्वास्थ्य की सुविधाएं मिल रही हैं और युवा किस तरह की शिक्षा हासिल रहे हैं। इन सब सवालों से भाजपा के नेता बचने की कोशिश में लगे हैं। 

क्या यह कोई भूल सकता है कि कोरोना महामारी के दौरान भी जब पूरी दुनिया बीमारी से लड़ रही थी और गरीबों और मजदूर वर्ग की मदद कर रही थी, तब भाजपा ने कोरोना का धर्म खोज निकाला और तब्लीगी जमात और मुसलमानों को महामारी के प्रसार के लिए बलि का बकरा बनाया। सरकार की विफलता को छिपाने के लिए मुसलमानों के खलनायक बनाया गया और यहां तक कि उनका आर्थिक बहिष्कार भी हुआ। इस मामले में कई मुसलमानों को जेल भी भेजा गया।

दरअसल, हिजाब पर प्रतिबंध के पीछे एक बड़ी साजिश शैक्षिक रूप से पिछड़ी मुस्लिम महिलाओं को निरक्षरता के क्षेत्र में धकेलना है। सिद्धांत और व्यवहार में उन्मादी ताकतें यह कभी नहीं चाहती हैं कि पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग शिक्षित हों। उन्हें डर है कि यदि मजलूम और महकूम तबक़ात शिक्षित होंगे तो वे उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के खिलाफ बोलेंगे और इस प्रकार असमानता और शोषण पर आधारित जाति व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। फिर जो मुट्ठी भर द्विज वर्ग बहुजनों के मालिक बन गए हैं, उनका वर्चस्व खत्म हो जाएगा। 

इसी प्रकार सवर्ण जाति और उच्च वर्ग ने सदियों से दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, अकल्लियत और महिलाओं को शिक्षा से दूर रखा है और अपनी ग़ुलामी उन पर थोपी है। जोतीराव फुले और डॉ. आंबेडकर ने इन बातों को समझा और उन्होंने शिक्षा के महत्व पर जोर दिया। उनके आंदोलन की बदौलत ही आजाद देश के तालीमी इदारे (शिक्षण संस्थाएं) सभी जातियों और धर्मों के लिए खोल दिए गए। इसके बावजूद आज भी वर्चस्ववादी ताकतें नहीं चाहती हैं कि शोषित वर्ग को शिक्षा मिले। वे हिजाब का बहाना बनाकर भगवा सरकार मुस्लिम छात्रों को निरक्षर रखना चाहती है, क्योंकि इन बहादुर महिलाओं ने नागरिकता संशोधन क़ानून के दौरान दिखाया था कि महिलाएं भी आंदोलन का नेतृत्व करना जानती हैं। भाजपा व उनके नेताओं को लगता है कि अनपढ़ मुस्लिम महिलाएं उंनके लिए बड़ी चुनौती नहीं हो पाएँगी।

इन सबके अलावा यह सनद रहे कि कमजोर तबकों को शिक्षा से वंचित करने के लिए प्राईवेट विश्वविद्यालयों और कॉलेजों ने अपने परिसरों के बाहर फीस की ऊंची दीवारें खड़ी कर दी हैं और सरकारी शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाली मुस्लिम महिलाओं को अब हिजाब का बहाना बनाकर बाहर करने की योजना तैयार की गई है।

वहीं यह भारत के बौद्धिक जगत की बौद्धिकता पर सवाल खड़ा करता है कि कुछ उदारवादी विद्वान और कार्यकर्ता भी हिजाब के खिलाफ बयान देकर भगवा राजनीतिक दल के बयान को मजबूत कर रहे हैं। इस संबंध में यह कहा जाना कि वे समाज को ज़मीन पर देखने के बजाय किताबें में ढूँढते हैं, अतिश्योक्ति नहीं होगी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

अभय कुमार

जेएनयू, नई दिल्ली से पीएचडी अभय कुमार संप्रति सम-सामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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