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शिवाजी के अधिकांश सहयोगी उच्च वर्ग के नहीं थे : गोविंद पानसरे

शिवाजी यदि ब्राह्मण प्रतिपालक थे और शिवाजी का शासन यदि ब्राह्मण और हिंदू धर्म को सुरक्षा प्रदान करता था, तो क्या ब्राह्मण उनके विरुद्ध ‘कोटि चंडी यज्ञ’ करते? पढ़ें, गोविंद पानसरे की चर्चित किताब ‘शिवाजी कौन थे?’ के एक अध्याय का अंश

छत्रपति शिवाजी महाराज (19 फरवरी, 1630 – 3 अप्रैल, 1680) पर विशेष

[गोविंद पानसरे ने मई, 1987 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में एक व्याख्यान दिया था, जिसका शीर्षक था– “शिवाजी के काल की प्रामाणिकता”। इसके बाद इस विषय पर दिए गए उनके अनेक भाषणों को संकलित कर मराठी में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया गया। इसका शीर्षक था– “शिवाजी कोण होता”। इस किताब हिंदी अनुवाद केशव महादेव सावरकार द्वारा किया गया। इसे “शिवाजी कौन थे?” शीर्षक से लोकवांग्मय गृह प्रकाशन, भूपेश गुप्ता भवन, 85, सायनी रोड, प्रभादेवी, मुंबई द्वारा वर्ष 2015 में प्रकाशित किया गया। इस किताब के एक अध्याय “शिवाजी और ब्राह्मण : 96 – कुली – कुलवाड़ी – शूद्र” का एक अंश हम यहां लेखक के परिजनों की अनुमति से प्रकाशित कर रहे हैं]

शिवाजी और ब्राह्मण : 96 – कुलीकुलवाड़ीशूद्र

  • गोविंद पानसरे

छत्रपति शिवाजी के नाम के साथ जो विशेषण लगाये जाते हैं, उनमें ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’ प्रसिद्ध है। उन्हें अक्सर गौ और ब्राह्मणों का पालनहार कहा जाता है।

जबकि शिवाजी महाराज के कई प्रामाणिक पत्र उपलब्ध हैं। उनमें से एक भी पत्र में शिवाजी महाराज ने स्वयं को ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’ नहीं कहा। शिवाजी के समकालीनों द्वारा लिखे गये पत्र भी हैं। उनमें एक भी पत्र में किसी ने शिवाजी को ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’ कह कर नहीं बुलाया। इसके विपरीत, शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक वर्ष के 29 पत्र उपलब्ध हैं। इन सभी पत्रों में शिवाजी स्वयं को ‘क्षत्रिय कुलोत्पन्न श्री राजा शिव छत्रपति’ कहते हैं। वह स्वयं को ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’ नहीं कहलवाते, फिर यह विशेषण कहां से आया?

श्री बी.एम. पुरंदरे लिखते हैं कि शिवाजी स्वयं को ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’ कहलवाते थे, और शिवाजी चरित्र साधन, खंड 5, क्रम 534 और 537 को इसके प्रमाणस्वरूप पेश करते हैं। इन सब पत्रों और आधारों की छानबीन के बाद, श्री शेजवलकर निर्णय देते हैं कि क्रमांक 534 के लेख में, शिवाजी स्वयं को ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’ नहीं कहलवाते, परंतु उसमें जिसका उल्लेख है, वह ब्राह्मण उन्हें यह उपाधि देता है। क्रमांक 537 के लेख में तो ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’[1] शब्द का उल्लेख ही नहीं है। इसका मतलब है कि सबकुछ झूठ है। इसमें स्पष्ट अंतर है कि शिवाजी ने स्वयं को ‘गौ-ब्राह्मण रक्षक’ कहलवाया या ब्राह्मण ने उन्हें इस तरह संबोधित किया। काम करवाने हेतु राजा के पास पहुंचने वाला या याचिका प्रस्तुत करने हेतु जाने वाला कोई भी व्यक्ति, राजा से यह कहे कि “तू हमारा पालनहार है” तो इसमें विशेष बात क्या है?

तो फिर शिवाजी के नाम के साथ लगी हुई या बाद में जबरदस्ती चिपकाई गईं ये उपाधियां कहां से आयीं?

स्वयं की कार्य-सिद्धि के लिए, ऐतिहासिक महापुरुषों के नामों के साथ अपनी सहूलियतों के अनुसार विशेषण लगाने को अधिक से अधिक होशियारी या चालाकी कहा जा सकता है। भोले-भाले आम लोग बात की जड़-मूल तक नहीं पहुंचते और उसे यूं ही अपना लेते हैं। परंतु इस कारण कोई बात सच नहीं बन जाती, इतिहास नहीं बन जाती।

गोविंद पानसरे और उनकी किताब ‘शिवाजी कौन थे?’ का आवरण पृष्ठ

ग्रांट डफ ने अपनी पुस्तक में दर्ज किया है, “गौ, प्रजा और महिलाओं की लूट से शिवाजी ने अपने सिपाहियों को प्रतिबंधित किया था।” इस बात के और भी कई आधार हैं।[2]

फिर गौ, प्रजा और महिलाओं के रक्षक इस शिवाजी को गौ-ब्राह्मणों के पालनहार कैसे बना दिया गया? प्रजा और महिलाओं को दरकिनार कर उस स्थान पर ब्राह्मण कब और किसने रख दिया, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

शिवाजी के शासन में, ब्राह्मणों के लिए विशेष रियायतें दी गईं हो, ऐसा कहीं दिखाई नहीं देता। इसके विपरीत एक पत्र में ब्राह्मणों के संबंध में शिवाजी महाराज लिखते हैं, “कौन ब्राह्मण कह कर छूट पाना चाहता है? …” और धमकी देते हैं, “जो छापामारों के छापामार हैं, उनको वैसा ही परिणाम भुगतना पड़ेगा।”[3]

जिस प्रकार सभी मराठे शिवाजी महाराज के पक्ष में नहीं थे, उसी प्रकार सभी ब्राह्मण, शिवाजी महाराज के पक्षधर नहीं थे। कई उनके विरोधी थे और इसलिए भी शिवाजी महाराज द्वारा ‘ब्राह्मण रक्षक’ की उपाधि ग्रहण करना संभव नहीं था, न तो उन्होंने ऐसा किया ही।

शिवाजी के युग में, दान-दक्षिणा झपटने के लिए ब्राह्मणों द्वारा ‘कोटि चंडी यज्ञ’ किये जाने का एक मनोरंजक उल्लेख शिवाजी-साहित्य में मिलता है। जब दिल्ली के शहंशाह के शक्ति-संपन्न-सरदार, मिर्जा राजे जयसिंह शिवाजी महाराज को पूरी तरह परास्त करने के लिए महाराष्ट्र पहुंचे तो उस समय उन्हें शिवाजी के विरुद्ध विजयश्री दिलाने हेतु, महाराष्ट्र निवासी ब्राह्मणों द्वारा ‘कोटि चंडी यज्ञ’ किया गया था। यह प्रसंग इस प्रकार है—

“मिर्जा राजे जयसिंह चिंताग्रस्त था। शिवाजी बहुत जुझारू, बड़े हुनरमंद और बांके बहादुर थे। खालिस सिपाही का शरीर-सौष्ठव, उनके हाथों अफजल खान जान से मारा गया था। शाहिस्ते खान के डेरे में घुस कर मारकाट की। वह चिंता में मगन कि विजय किस प्रकार मिलेगी। तब बड़े-बड़े ब्राह्मण पुरोहितों ने उपाय बताया कि देवी के नाम पर अनुष्ठान करने से विजय प्राप्त होगी। फिर मिर्जा ने कहा, कोटि चंडी यज्ञ किया जाय, ग्यारह करोड़ शिवलिंग बनाया जाय, मनोकामना पूरी करने के लिए बगलामुखी काल रात्री हेतु जाप किया जाय। इस प्रयोजन से 400 ब्राह्मणों को अनुष्ठान के लिए बैठाया गया। अनुष्ठान चलता रहा। अनुष्ठान चलाकर सिद्धि प्राप्त की गई। अनुष्ठान की पूर्णाहुति के बाद, ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा दी गई। फिर रवानगी हुई।”

शिवाजी यदि ब्राह्मण प्रतिपालक थे और शिवाजी का शासन यदि ब्राह्मण और हिंदू धर्म को सुरक्षा प्रदान करता था, तो क्या ब्राह्मण उनके विरुद्ध ‘कोटि चंडी यज्ञ’ करते?[4]

छत्रपति के राज्य अभिषेक पर ब्राह्मणों का विरोध

इस सच्चाई को सब जानते हैं कि महाराष्ट्र निवासी ब्राह्मण धुरंधरों ने, शिवाजी महाराज के राज्य अभिषेक का विरोध किया था। चतुर्वर्ण प्रथा और धर्मशास्त्र के अनुसार, राजा बनने का अधिकार केवल ब्राह्मणों या क्षत्रियों को ही प्राप्त था। शिवाजी वीर थे और उन्होंने राज्य प्राप्त कर लिया था, तो भी उनमें राजा बनने की पात्रता नहीं थी— ऐसा धर्मविचार था। कुछ को उनके क्षत्रिय होने में शंका थी और बाकी मानते थे कि वह क्षत्रिय कुलोत्पन्न तो थे, फिर भी ‘संस्कारहीन’ होने के कारण क्षत्रिय नहीं रहे थे। शिवाजी का यज्ञोपवित नहीं हुआ था। मंत्रोच्चार विधि के साथ विवाह नहीं हुआ था, फिर शिवाजी राजा कैसे बन सकते थे?

कुछ पुरातनपंथी, धर्म के ठेकेदारों के विचार इससे भी कठोर थे, वे कहते— ‘नंदांतम् क्षत्रिय कुलम्’, नंद राजा अंतिम क्षत्रिय था, नंद राजा की मृत्यु के बाद कोई क्षत्रिय बचा ही नहीं। अकबर के युग में कृष्ण भट्ट शेष ने ‘शूद्राचार शिरोमणि’ नामक एक ग्रंथ की रचना की थी। उसने प्रतिपादित किया कि परशुराम ने समस्त भूतल से पूर्णतया क्षत्रियों को समाप्त कर दिया था। अब हिंदू धर्म में राजसी तेज और राजवंशीय क्षत्रिय कोई बचा ही नहीं था। फिर शिवाजी का राज्य अभिषेक कैसे हो सकता था?[5]

महाराष्ट्र निवासी विद्वान ब्राह्मणों में से कोई भी शिवाजी का राज्य अभिषेक करने को तैयार नहीं था, अतः बनारस से गंगाभट्ट आया और उसने वैदिक धर्म परंपरा के अनुसार, पूर्ण धार्मिक विधि से उनका राज्य अभिषेक किया। वैसे गंगाभट्ट का मूल परिवार नांदेड का था, ज्ञान-ध्यान बनारस में प्राप्त किया था। परंतु उसे और अन्य ब्राह्मणों को राजा ने दिल खोल कर दक्षिणाएं दीं। कुछ अतिश्योक्ति हो सकती है, परंतु एक विवरण ऐसा भी है कि राज्य अभिषेक के अवसर पर ब्राह्मणों को राजा ने दान में इतना सोना दिया कि उसे किले से नीचे ढोकर लाना मुश्किल हो गया था। …

कुलवाड़ी का गौरव

महात्मा जोतीराव फुले ने शिवाजी पर एक पोवाड़ा (लोकगीत) की रचना की है। इस लोकगीत में वह शिवाजी को ‘कुलवाड़ी भूषण’ कहते हैं। लोकगीत के अंत में वह कहते हैं ‘शूद्र के पूत’[6] का गान ज्योतिराव फुले ने गाया, जिसका अर्थ है शिवाजी भोसले ‘शूद्र के बेटे’ थे, कुलवाड़ी थे। महात्मा फुले न तो इतिहास के रचयिता थे न तो इतिहासकार। वह समानता के प्रचारक और सुधारवादी थे। हो सकता है अपने लोकगीत में उन्होंने शिवाजी के संबंध में ऐसा कहा हो, जिसे आधारहीन माना जा सकता है। शोधकर्ताओं में भी इस विषय पर मतभिन्नता दिखाई देती है, चाहे वे इसे खुलकर बोलते व लिखते न हों।

शिवाजी के परिवार का पूर्व इतिहास

शिवाजी के राजपूत होने के बारे में कई उल्लेख हैं और उनके विभिन्न आधार हैं। एम.एम. दत्तों वामन पोतदार, जिन्होंने इनका अध्ययन किया, लिखते हैं, “इसमें बहुत ही रुकावटें आती हैं। उसके बाद की अवस्था का यानि निश्चित रूप से शाहू महाराज के पूर्व के वृतांत से ऐसा जान पड़ता है कि इस संबंध में उदयपुर से खोजबीन कर जानकारी प्राप्त की गई कि अधिकतर परिवार सिसौदिया हैं या नहीं। मेरे मन में इस बारे में शंका नहीं है कि शिवाजी राजपूत थे और भोसले परिवार राजपूताने सिसौदियों में से एक था। शाहजी के एक पत्र में तो ‘हम ही वे राजपूत’ ऐसा उल्लेख है। इस आधार पर यह मुद्दा अधिक स्पष्ट हो जाता है।”

यह भी पढ़ें : कैसे द्विजों ने गढ़ी छत्रपति शिवाजी की हिंदूवादी छवि?

शिवाजी महाराज जन्मजात ‘क्षत्रिय’ थे या नहीं, यह मुद्दा अर्थहीन है। शिवाजी क्षत्रिय थे, मैं भी क्षत्रिय हूं, इसलिए मैं भी महान हूं, शिवाजी भोसले थे और मेरा पारिवारिक नाम भी भोसले है, अतः मैं महापुरुष हूं, यदि कोई ऐसा प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध बनाना चाहे तो बात दूसरी है। जिसके पास शिवाजी की महानता के साथ रिश्ता जोड़ने, उनके बड़प्पन में अपना सम्मान बढ़वाने हेतु जाति और कुल नाम के अतिरिक्त दूसरा कुछ न हो, वही शिवाजी के वंश-परिवार की चर्चा करे। उनका जन्म किस परिवार में हुआ, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने काम क्या किया। जन्म कहीं हो वह किसी के अपने बस की बात नहीं। कुछ करना या न करना हमारे हाथों में होता है। संक्षेप में, जिनके हाथों और कुछ नहीं लगता वे परिवार की रामकहानी गाने के अतिरिक्त कर ही क्या सकते हैं ?

शिवाजी के सहयोगी सामान्य किसान 

यदि शिवाजी के नाम के साथ कोई वर्ण की श्रेष्ठता प्रस्थापित करना चाहे तो वह ध्यान में रखे कि, शिवाजी के अधिकांश सहयोगी उच्च वर्ग के नहीं थे। इसी के साथ वे सरदार, जमींदार, वतनदार भी नहीं थे। वे थे निम्म जातियों के समझे जाने वाले हीन, दीन, गरीब किसान।

जिन मावलों की जांबाजी, निष्ठा और असीम त्याग के बलबूते पर शिवाजी अतुलनीय पराक्रम कर पाए, वे सभी सामान्य किसान थे। प्रारंभिक दिनों में, पुराने जागीरदारों-सरदारों ने शिवाजी का पुरा-पूरा साथ नहीं दिया था, परंतु जो छोटे-बड़े नए सेनानायक शिवाजी ने तैयार किए, वे सभी साधारण लोग थे और वीरता के बल पर महान बने।

पम्हाला की घेराबंदी में से सही-सलामत भाग निकलने में जो शिवाजी का मददगार बना वह शिवा नाई था। अफजल खान के वध के अवसर पर शिवाजी के साथ विश्वसनीय और चुस्त-चालाक लड़ाकू के रूप में गया शिवा भी जाति से नाई था। उसका पारिवारिक नाम संकपाल था। वह जाबली प्रदेश के कोंडीवली गांव का निवासी था। वह भी एक साधारण व्यक्ति था।

शिवाजी के खुफिया विभाग का प्रमुख वहिरजी नाईक ‘रामोशी’ (अपराधी प्रवृत्ति की एक जनजाति) जाति का था। प्रत्यक्ष रूप से खेती-किसानी करके आजीविका कमाने वाले, साधारण कर्मियों को शिवाजी ने साथ लिया और अपने शासन का निर्माण किया। किसानी करने वाले मराठा कुनबियों को परम्परागत रूप से शूद्र ही समझा जाता था।

व्यक्ति विशेष के उदाहरणों के साथ ही इतिहास में समुदायों का उल्लेख भी है।

सभासद कृत बखर में एक टिप्पणी है। बेरड, रामोशी, आडेकरी आदि, लोगों को उनके सामर्थ्य के अनुसार सेवा में लिया गया। फल-स्वरूप, शिवाजी के राज्य में अपराध और उपद्रव कभी भी नहीं होते थे। अपराधी समझे जाने वाले लोगों को अपनी वीरता दिखाने का अवसर मिला और आम तौर पर उन्होंने उपद्रव नहीं किये।

शिवाजी ने जो नौसेना खड़ी की थी, वह भी परम्परागत क्षत्रिय या मराठों की सहायता से नहीं। शिवाजी का नौसेना प्रमुख जिस प्रकार दर्यावर्दी मुसलमान था, उसी प्रकार नौसेना के बहुसंख्यक सैनिक मछुआरे, ढीमर, भंडारी और मुसलमान आदि जातियों से ही आए थे। अपना पेट भरने के लिए समुद्र पर निर्भर श्रमिकों को ही शिवाजी ने सैनिक बनाया।

शिवाजी ने साधारण लोगों को महान बनाया और फिर उन साधारण लोगों ने शिवाजी को महान बनाया, और फिर सबने, मिलजुल कर विराट कार्य किया।

साधारण लोग जब किसी अच्छे विचार को अपनाते हैं तब वह विचार ही एक शक्ति का रूप धारण कर लेता है, और वह शक्ति साधारण लोगों से असाधारण काम करा लेती है। सहयोग और हिस्सेदारी के बगैर ऐतिहासिक असामान्य कार्य सिद्ध नहीं होते।

उच्चकुलीन अधिकतर ठाठ-बाट से रहते थे। वे नहीं चाहते थे कि जो कुछ चल रहा था, उसमें परिवर्तन हो। जो साधारण थे, वही परिवर्तन के इच्छुक थे। उन्हें ही शिवाजी ने संगठित किया, शिक्षित किया, बड़ा बनाया और अत्याचारों पर अंकुश लगाया। अत्याचार समाप्त करने को वही तैयार होते, जिन्हें अत्याचार सहना पड़ता था, अत्याचार करने वाले क्यों साथ जाते?

[1] टी. एस. शेजवलकर लिखित शिव छत्रपति, पृष्ठ 502

[2] जे. एन. सरकार लिखित (अंग्रेजी में) शिवाजी और उनका युग, पृष्ठ 205-206 और 211-213

[3] देशपांडे लिखित छत्रपति शिवाजी महाराज के पत्र, पृष्ठ 167

[4] कृष्णाजी अनन्त सभासद लिखित सभासदों की बखर, पृष्ठ 33

[5] जे. एन. सरकार लिखित (अंग्रेजी में) शिवाजी और उनका युग, पृष्ठ 202-206

[6] वही, पृष्ठ 2014-215

(प्रस्तुति : समीक्षा साहनी)


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लेखक के बारे में

गोविंद पानसरे

गोविंद पानसरे (26 नवंबर, 1933 - 20 फरवरी, 2015) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य वह प्राख्यात सामाजिक कार्यकर्ता रहे। उन्होंने 21 पुस्तकों की रचना की। उन्हें और उनकी पत्नी के उपर 16 फरवरी, 2015 गोलियां चलाई गईं। इलाज के दौरान 20 फरवरी, 2015 को उनका निधन हो गया।

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